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जजों के लिए 'माय लॉर्ड' या 'लॉर्डशिप' जैसे शब्द किस तरह संबोधन में शामिल हो गए?

कलकत्ता हाईकोर्ट. यहां के चीफ जस्टिस टीबीएन राधाकृष्णन का कहना है कि बंगाल और अंडमान के सभी न्यायिक अधिकारी उन्हें ‘माय लॉर्ड’ या ‘लॉर्डशिप’ कहकर संबोधित न करें. इसकी जगह ‘सर’ कहकर संबोधित करें. इसके लिए उन्होंने एक लेटर जारी किया है. हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल राय चटोपाध्याय की ओर से पश्चिम बंगाल और अंडमान-निकोबार के जिला न्यायाधीशों और निचली अदालतों के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र भेजकर चीफ जस्टिस के इस संदेश से अवगत करवाया गया है.

लेटर में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश चाहते हैं कि ‘अब आगे से जिला न्यायपालिका, माननीय उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री के सदस्य माननीय मुख्य न्यायाधीश को ‘माय लॉर्ड’ और ‘लॉर्डशिप’ की जगह ‘सर’ कहकर संबोधित करें. इस स्टोरी में हम इस पर बात करेंगे कि ब्रिटिश काल में किस तरह ये शब्द जजों को संबोधित करने के लिए प्रयोग किए जाने लगे.

पहला मौका नहीं

लेकिन उससे पहले ये बता दें कि ये पहला मौका नहीं है, जब किसी जस्टिस की ओर से इस तरह का बयान आया है. इस साल की शुरुआत में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एस मुरलीधर ने सभी वकीलों से इसी तरह का अनुरोध किया था कि उन्हें संबोधित करते हुए “माय लॉर्ड” या “लॉर्डशिप” जैसे शब्दों का उपयोग करने से बचें.

जुलाई 2019 में राजस्थान हाईकोर्ट की फुल बेंच ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था. इसमें न्यायाधीशों के सामने उपस्थित होने और न्यायाधीशों को “माय लॉर्ड” या “लॉर्डशिप” के रूप में संबोधित करने से रोकने का अनुरोध किया था.

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चीफ जस्टिस एसए बोबड़े (फोटो- PTI)

जनवरी, 2014 में जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस एसए बोबडे की पीठ ने कहा था कि ‘माय लॉर्ड’ या ‘लॉर्डशिप’- ऐसे शब्दों से न्यायाधीशों को संबोधित करना अनिवार्य नहीं है. न्यायाधीशों को केवल गरिमापूर्ण तरीके से संबोधित किए जाने की जरूरत है. दरअसल शिव सागर तिवारी नाम के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि आप एक ऑर्डर इश्यू करिए कि जजों के लिए इस तरह के शब्दों का प्रयोग बंद हों.

#2009 में मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्रू द्वारा भी वकीलों को ऐसे शब्दों का उपयोग करने से परहेज करने के लिए कहा गया था.

कब से है प्रचलन में?

‘माय लॉर्ड’ और ‘योर लॉर्डशिप’ शब्द औपनिवेशिक अतीत के अवशेष हैं. कोर्ट के प्रति सम्मान दिखाने के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल ब्रिटिश राज में किया जाता था. यूके के कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट्स बताती हैं कि हाईकोर्ट के जज को ‘माय लॉर्ड’ के रूप में संबोधित किया जाता है. सर्किट जजों को Your Honour, मैजिस्ट्रेट जज को Your Worship इसके अलावा जिला न्यायाधीशों और ट्रिब्यूनल न्यायाधीशों को सर या मैडम कहा जाता है.

दिल्ली हाईकोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट और डिस्ट्रिक कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट मनमोहन सिंह बताते हैं कि इंडिया में अंग्रेजों से पहले मुगलों का राज था. न्याय व्यवस्था में भी उन्हीं का सिस्टम चलता था. इंडिया में अंग्रेजों का जब पूरा सिस्टम आया था, तो वो अपने साथ न्याय वाली वही व्यवस्था ले आए. ब्रिटेन में ‘हाउस ऑफ लॉर्ड’ होता है. ‘लॉर्ड’ शब्द वहीं से आया. जब तक देश में अंग्रेज रहे जजों को इस से संबोधित किया जाता रहा.

अंग्रेज तो चले गए, लेकिन ये शब्द यहीं रह गए. उनका कहना है कि ये इतना प्रचलित शब्द हो गया कि बोलने वाले इस पर ध्यान नहीं देते. उनका कहना है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के लोग या सीनियर वकील भी इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं.

2006 में पहली बार विरोध

सबसे पहले 2006 में  बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस तरह के शब्दों के उपयोग को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया. इसमें कहा गया था कि ऐसा संबोधन औपनिवेशिक अतीत का एक अवशेष है. इसलिए जजों को ‘माय लॉर्ड’ या ‘लॉर्डशिप’ कहकर संबोधित न किया जाए. इसके बाद कई कोर्ट के जजों ने कहा कि इस शब्दा का इस्तेमाल न किया जाए.

Bar Council Of India ने सबसे पहले 2006 में इन शब्दों पर आपत्ति जताई थी.
Bar Council Of India ने सबसे पहले 2006 में इन शब्दों पर आपत्ति जताई थी.

लेकिन मनमोहन सिंह का कहना है कि ये कल्चर में शामिल हो गया है. कोई कह दे, कोई रूल बना दे, इससे बात बनने वाली है नहीं. उनका कहना है कि वकालत ज्यादातर दूसरों को देखकर सीखा जाता है. सीनियर लॉयर जिस तरह जजों को संबोधित करते हैं, उसका असर उनके साथ प्रैक्टिस करने वालों पर पड़ता है. ऐसे में आने वाली जनरेशन भी वही करती है, जो सीनियर कर रहे हैं. अगर 10 में से 8 लोग ‘माय लॉर्ड’ कह रहे हैं और सिर्फ दो नहीं कह रहे हैं, तो इससे बात नहीं बनती.

जजों को खुश करने की कोशिश

वहीं सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहीं वकील विजया लक्ष्मी का कहना है कि हमारी न्याय व्यवस्था ब्रिटिशर्स से ली गई है. वहीं से ‘माय लॉर्ड’ आया है. सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि ‘माय लॉर्ड’ की जगह ‘सर’ कह सकते हैं. पहले कभी अनिवार्य था, लेकिन अब नहीं है. कई सारे वकील हैं, जो ‘माय लॉर्ड’ नहीं कहते हैं. लेकिन कई वकील जज को खुश करने के लिए ‘माय लॉड’ कहते हैं. कई जज ऐसा कहने पर खुश होते हैं. उन्हें अच्छा फील होता है.

सुप्रीम कोर्ट के एक और वकील का कहना है कि Dispensation of justice यानी न्याय देना ‘लॉर्ड’ यानी ईश्वर का काम है. लेकिन जब वो काम कोई इंसान कर रहा है, जज के रूप में, तो उसे ‘माय लॉर्ड’ या ‘लॉर्डशिप’ कहते हैं. वकीलों की आदत बन गई है, इसलिए उनके लिए ये बड़ी बात नहीं है. हालांकि बदलाव होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट भी 'माय लॉर्ड' या 'लॉर्डशिप' जैसे शब्दों से बचने के लिए कह चुका है.
सुप्रीम कोर्ट भी ‘माय लॉर्ड’ या ‘लॉर्डशिप’ जैसे शब्दों से बचने के लिए कह चुका है.

तीस हज़ारी कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे वकील अभिषेक असवाल का कहना है-

न्यायपालिका में जज का विशेष महत्व है. यह एक सम्मानित पद है. कोर्ट में जज साहब या सर कहना भी सम्मान को दर्शाता है. संविधान का आर्टिकल-14 : समानता का अधिकार देता है इसके अनुसार कानून की नज़र में सभी लोग बराबर होते है कानून लिंग, धर्म ,जाति , पद के आधार पर किसी भी इंसान को विशेष तरजीह नहीं देता.

इन देशों में क्या प्रैक्टिस है?

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में बहस करने के लिए गाइडलाइंस जारी किया गया है. इसमें कहा गया है कि वर्तमान प्रैक्टिस के मुताबिक, चीफ जस्टिस को Mr. कह कर संबोधित कर सकते हैं. दूसरे जजों को जस्टिस स्कैलिया, जस्टिस जिन्सबर्ग और ‘Your Honor’ कहा जाता है. अगर कोई जस्टिस आपको संबोधित कर रहा है, लेकिन आप उसके नाम को लेकर डाउट में हैं, ऐसे में ‘Your Honor’ कहना सही होगा. ऐसे में आप जज का गलत नाम लेने से बच जाएंगे.

सिंगापुर में भी सुप्रीम कोर्ट के जज को ‘Your Honor’ कहकर संबोधित किया जा सकता है. ऑस्ट्रेलिया में हाईकोर्ट और फेडरल कोर्ट जजों को ‘Your Honor’ कहा जाता है.

चलते चलते

जजों के ड्रेस को लेकर कई तरह की बातें होतीं हैं. फिल्मों में भी आपने देखा होगा कि जज ब्लैक ड्रेस के साथ ही विग (Wig) पहनते हैं. पहला विग 1660 में चार्ल्स द्वितीय द्वारा आयात किया गया था. इन्हें मानव के बाल या घोड़े के बाल से बनाए जाते थे. ब्रिटेन में धनी लोग इस तरह के विग पहनते थे. लेकिन 18वीं शताब्दी में न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों के ड्रेस का हिस्सा बन गया. 21वीं शताब्दी में भी ब्रिटेन में हाईकोर्ट के जज और Queen’s Counsel और कॉमनवेल्थ कंट्री फुल-बॉटम विग्स पहनते हैं. कोर्ट की कार्यवाही में भाग लेने वाले जज, बैरिस्टर और क्लर्क को सूट के ऊपर ब्लैक सिल्क गाउन टाई विग और उनके गले में एक बैंड पहनना जरूरी है.

भारत में भी वकीलों और जजों के ड्रेसकोड को लेकर नियम कायदे बनाए गए हैं. Part VI: Chapter IV of the Bar Council of India Rules/ Rules Under Section 49(1)(gg) of the Advocates Act, 1961 के तहत वकीलों के लिए ड्रेस कोड निर्धारित किया गया है. हालांकि जजों के लिए अलग से ड्रेस कोड नहीं है. वो सीनियर वकीलों का ड्रेस ही पहनते/पहनती हैं.


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