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किस्सा बुलाकी साव- 22, लवटोलिया पुल पर बुलाकी ने कंटीरबा को पीटा

अविनाश दास
अविनाश दास

अविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव  नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, ‘आरा वाली अनारकली’ नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस ‘दास दरभंगवी’ का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आ रहा है. बुलाकी के किस्सों की इक्कीस किस्तें आप पढ़ चुके हैं. जिन्हें आप यहां क्लिक कर पा सकते हैं. हाजिर है बाईसवीं किस्त, पढ़िए.


होली का संग खेलूं, बालम हमरो बिदेस

एक ज़माना था, जब हमारी तरफ के लोग मोरंग जाते थे. रोजी-रोटी कमाने. मोरंग नेपाल में कौशिकी नदी के पूरब में बसा हुआ शहर है. लोककथाओं में मोरंग को देश कहा जाता था. जट-जटिन की कथा में विरह से तड़पती हुई जटिन का पति मोरंग ही गया था. अंग्रेज़ों के समय में लोग कमाने के लिए बंगाल जाने लगे. कहते थे कि बंगाल देश की औरतें जादूगरनी होती हैं. भिखारी ठाकुर के नाटकों का नायक बंगाल जाकर वहां की औरत से शादी कर लेता था. पहली पंचवर्षीय योजना के बाद जब भाखड़ा-नांगल ने पंजाब की तक़दीर बदल दी, तो लोग पंजाब जानेे लगे. नेपाल, बंगाल और पंजाब में बिहार की बड़ी आबादी बसी हुई है. हमारे गांव की होली में पलायन और वियोग का यह दर्द “राग काफी” में गाया जाता है, ‘जब से गयो श्‍याम, चिट्ठियो न भेजे – पायो न कछुक संदेस – होली का संग खेलूं, बालम हमरो बिदेस’.

जब हम बड़े हो रहे थे, लोग दिल्‍ली-बंबई का रुख कर रहे थे. बुलाकी साव की बहन का ब्‍याह हमारे गांव में हुआ था. उसका भगिना कंटीरबा (कंटीर साव) सत्रह साल की उम्र में दिल्‍ली चला गया. मुझसे चार साल बड़ा था. गया था, तो उसकी मूंछें उग रही थीं. दो साल बाद बड़ी रौनक के साथ गांव लौटा. मूंछें ग़ायब थीं. टेरलीन की हाफ बांह वाली कमीज़ और पांव के पास फैली हुई फुल पैंट पहन कर घूमता था. पास से गुज़रता तो बालों से गमकौआ (खुशबूदार) तेल की महक आती थी. हम साथ खेले थे, तो उसने हमारी उम्र के सब दोस्‍तों को घुघनी-मुरही की पार्टी दी. दिल्‍ली जाने से पहले गांव के प्राइमरी स्‍कूल में पढ़ाने वाली देवी जी की बेटी पर लाइन मारता था. लेकिन तब कहने की हिम्‍मत नहीं थी. अब इतनी हिम्‍मत आ गयी कि लौटने के दूसरे दिन ही देवी जी के घर जाकर उनकी बेटी का हाथ मांग लिया.

कंटीरबा ने बाहर आकर हम सबको बताया कि उसके प्रस्‍ताव के बाद देवी जी अपने दुर्भाग्‍य पर रोने लगीं. देवी जी ने रोते-रोते कंटीरबा को बताया कि पिछले लगन में ही उनकी बेटी का ब्‍याह और गौना एक साथ हो गया. उसका पति दरभंगा में दोनार चौक के पास उगना टाइम्‍स के दफ्तर के सामने पान की गुमटी का मालिक है. यह बताते हुए भी कंटीरबा का दिल टूटा हुआ नहीं लग रहा था. बल्कि वह तो चाय पीकर देवी जी के घर से लौटा. चूंकि दिल्‍ली से लौट कर कंटीरबा ने हीरो कंपनी की एक साइकिल ख़रीदी थी, उसने हिसाब लगाया कि आधे घंटे में रोज़ दोनार चौक पहुंचा जा सकता है. और वह सचमुच रोज़ अपनी साइकिल लेकर दोनार चौक जाने-आने लगा. एक दिन जब हम बड़ के पेड़ के पास खड़े थे, हमने देखा कि कंटीरबा साइकिल से चला आ रहा है. उसकी साइकिल के पीछे वाले करियर पर देवी जी की शादीशुदा बेटी बैठी हुई है.

उन दिनों बुलाकी साव थोड़ा उदास रहता था. उसकी उदासी का सबब जानने की न मेरी उम्र थी, न हैसियत. उसकी उदासी में भी मुझे उसके साथ रहना अच्‍छा लगता था. एक दिन जब मैं बुलाकी साव के साथ लवटोलिया (नवटोल/नया टोला) की छोटी सी पुलिया के किनारे बैठा था – कंटीरबा की साइकिल वहां से गुज़री. बुलाकी साव ने उसे आवाज़ देकर अपने पास बुलाया. कंटीरबा ने साइकिल मोड़ी और अदा के साथ उतर कर अपना दाहिना हाथ बुलाकी साव की तरफ बढ़ाया. बुलाकी साव ने उसके लंबे बालों की एक चुटिया मुट्ठी में पकड़ ली. कंटीरबा बिलबिलाने लगा और उसका आगे बढ़ा हुआ हाथ स्‍वत: बुलाकी साव के पांव की तरफ चला गया. बुलाकी ने कहा, ‘दिल्‍ली घूम आया, तो रिश्‍ता भूल गया रे… हम ही तुम्‍हारे मामा थे और मामा रहेंगे.’ कंटीरबा ने कहा, ‘गल्‍त हो गया जी. अब झोंटा छोड़ दो न.’

कंटीरबा की बोली-बानी सुन कर बुलाकी का हाथ उसके बालों पर ढीला पड़ गया. हैरान बुलाकी ने उससे पूछा, ‘कहां गया था?’ कंटीरबा का जवाब था, ‘वो जी, मैं ज्रा गुदड़ी ब्‍जार ग्‍या था जी!’ मैंने देखा कि कंटीरबा की बात सुन कर बुलाकी का चेहरा लाल हो गया. उसने एक ज़ोर का थप्‍पड़ कंटीरबा को लगाया, फिर ताबड़तोड़ प्रश्‍नोत्तरी शुरू हुई. बुलाकी हर थप्‍पड़ के साथ एक सवाल पूछता और कंटीरबा अपने गाल सहलाते हुए उसके प्रश्‍नों का जवाब देता.

“किस गांव में पैदा हुए?”
“बरहेता गांव…”
“कौन साल था?”
“एखत्तर-बहत्तर…”
“दिल्‍ली कब गये?”
“सन नवासी में गये थे जी…”
“लौटे कौन साल हो?”
“एकानबे चल रहा है जी… पछिला महीना लौटे हैं…”
“बरगाही के… जिस गांव में सत्रह साल रहा, उस गांव की भाखा भूल गया और डिल्‍ली में दो साल रहकर वहां की भाखा लेकर गांव आ गया…”

बुलाकी मेरी चप्‍पल उठा कर कंटीरबा को दौड़ाने ही वाला था कि कंटीरबा बुलाकी के पांव पर गिर गया, ‘गलती हो गया मामा… माफ कर दीजिए.’ बुलाकी ने उसे उठा कर सीने से लगा लिया और भर भर भर भर रोने लगा. कंटीरबा ने बुलाकी के सीने से ख़ुद को आज़ाद किया और अपनी साइकिल लेकर चला गया. मैं और बुलाकी पुलिया पर ही रह गये. काफी देर तक हम चुप रहे. फिर बुलाकी ने चुप्‍पी तोड़ी और मुझे यह कविता सुनायी.

पानी में मछली
हाथो में डफली

बचाओ बचाओ

ढहती गिरती छत
बातों में शरबत

बचाओ बचाओ

शाख़ों पर कोयल
बासमती चावल

बचाओ बचाओ

जाड़े में सूरज
पुराना पखावज

बचाओ बचाओ

मीठा बताशा
मिट्टी की भाषा

बचाओ बचाओ


आपके पास भी अगर रोचक किस्से, किरदार या घटना है. तो हमें लिख भेजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमारी एडिटोरियल टीम को पसंद आया, तो उसे ‘दी लल्लनटॉप’ पर जगह दी जाएगी.


बुलाकी साव की पिछली सभी कड़ियां पढ़ना चाहते हैं तो नीचे जहां ‘किस्सा बुलाकी साव’ का बटन बना हुआ है वहां क्लिक करें-

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