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प्रोफेसर से डायरेक्टर बने वो महान फिल्म मेकर, जिन्होंने नैशनल अवॉर्ड्स की झड़ी लगा दी

तारीख 10 जून, 2021. सिनेमा जगत को बड़ी भारी क्षति पहुंचती है. खबर आती है कि जाने-माने डायरेक्टर बुद्धदेब दासगुप्ता (Buddhadeb Dasgupta) नहीं रहे. फिल्म इंडस्ट्री और पॉलिटिक्स से जुड़े दिग्गज लोग हरकत में आ जाते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें याद करते हुए लिखते हैं,

श्री बुद्धदेब दासगुप्ता के निधन का समाचार जानकर बेहद दुख हुआ. उनके काम की विविधता में समाज के हर तबके के लिए कुछ-न-कुछ था. वो एक विख्यात कवि और विचारक थे.

Narendra Modi Tweet
प्रधानमंत्री मोदी का ट्वीट.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने उन्हें याद करते हुए लिखा,

अपने काम के जरिए उन्होंने सिनेमा की भाषा में गीतात्मकता भरी. उनका निधन सिनेमा जगत के लिए बहुत बड़ा नुकसान है. उनके परिवार, सहकर्मियों और प्रशंसकों के साथ मेरी संवेदनाएं हैं.

Mamata Banerjee Tweet
ममता बैनर्जी ने भी उन्हें याद किया.

उनकी फिल्म ‘कालपुरुष’ में काम कर चुके एक्टर राहुल बोस ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा,

‘कालपुरुष’ पर काम करना एक चैलेंज के समान था. वो एक नाजुक और गहरी फिल्म थी. मुझे बुद्ध दा का डायरेक्शन स्टाइल समझने में समय लगा. लेकिन जब एक बार समझ आ गया, तो सब बड़ी आसानी से बहने लगा. वे संवेदनशील, भावुक और शरारती किस्म का सेंस ऑफ ह्यूमर रखने वाले इंसान थे. जो लोग हमें छोड़कर चले जाते हैं, उनके लिए एक क्लीशे इस्तेमाल किया जाता है कि उन्हें मिस किया जाएगा. लेकिन जो लोग वाकई सिनेमा से प्यार करते हैं, वो जान जाएंगे कि ये शब्द आज से ज्यादा कभी सच्चे नहीं लगेंगे.

Rahul Bose Post
राहुल बोस ने अपने इंस्टाग्राम पर लंबा-चौड़ा पोस्ट लिखा.

फिल्ममेकर और एक्ट्रेस नंदिता दास ने महान आर्टिस्ट को याद करते हुए अपने ट्विटर पर लिखा,

बुद्धदेब दासगुप्ता ने दो बार मुझे अपनी फिल्मों में एक्टिंग करने के लिए बुलाया. लेकिन मैं काम नहीं कर पाई. मेरा ही नुकसान हुआ. उनकी फिल्मों की तरह उनका सौहार्द भी मेरे साथ हमेशा रहेगा.

Nandita Das Post
नंदिता दास ने बताया जब वो दो मौकों पर बुद्ध दा के साथ काम नहीं कर पाई.

नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी फिल्म ‘अनवर का अजब किस्सा’ के डायरेक्टर को याद करते हुए लिखा,

एक सच्चे साहसी डायरेक्टर. जो अपने सभी किरदारों को बराबर प्रोत्साहन देते थे. जो अपने एक्टर्स के जरिए अपने किरदारों की आंतरिक दशा को बाहर लाते थे. एक महा मानव. सौभाग्यशाली रहा कि उनके साथ काम करने का मौका मिला. आप मिस किए जाएंगे बुद्धदेब दासगुप्ता दा.

Nawazuddin Siddiqui Tweet
बुद्ध दा ने नवाजुद्दीन को ‘अनवर का अजब किस्सा’ में डायरेक्ट किया था.

बुद्ध दा नहीं रहे. वे लंबे समय से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे. इलाज भी चल रहा था. लेकिन फिर 10 जून को उनके देहांत की खबर आई. सच है कि उनके जाने से सिनेमा जगत को बड़ी हानि हुई है. बुद्ध दा ऐसे डायरेक्टर थे जो सिनेमा को व्यापार नहीं, कला समझते थे. ऐसा माध्यम समझते थे जिसके जरिए वो अपनी कहानियां सुना सकें. ऐसे डायरेक्टर जिनके किरदार इस व्यावहारिक जगत में ‘मिसफिट’ कहलाये जाएंगे. उसी कला के धनी को याद करेंगे.

Bharat Talkies


# आंखें मींचकर दिमाग में चित्र बनाते-बनाते महान फिल्ममेकर बन गए

पुरुलिया. पश्चिम बंगाल का जिला. उसी जिले में एक छोटा सा कस्बा है, अनारा नाम का. 11 फ़रवरी, 1944 को उसी कस्बे में बुद्धदेब दासगुप्ता का जन्म हुआ. नौ भाई-बहनों में बुद्ध दा तीसरे नंबर पर थे. पिता तारानाथ भारतीय रेलवे में डॉक्टर की पोस्ट पर कार्यरत थे. पिता का काम ऐसा था कि पूरे परिवार को हर कुछ महीनों में एक राज्य से दूसरे राज्य ट्रैवल करना पड़ता था. यही वजह है कि बंगाल में जन्मे बुद्ध दा का अधिकांश बचपन बंगाल से दूर बीता. बड़े शहरों की व्यस्तता से दूर रहे. बुद्ध दा का बचपन से ही कला की तरफ रुझान रहा है. हर चीज़ को वो चित्रों के माध्यम से समझने और देखने की कोशिश करते. उनके ऐसे नजरिए के लिए जिम्मेदार थीं उनकी मां. उनकी मां अपने बच्चों को पियानो पर संगीत सुनाती. महाभारत, रामायण आदि की कहानियां सुनातीं. और अपने बच्चों से अपनी आंखें बंद करने को कहतीं.

Buddhadeb Dasgupta Films
बुद्ध दा की फिल्मों के चित्र ही उनकी सबसे बड़ी पहचान हैं. फोटो – उनकी फिल्म ‘अंधी गली’ का स्टिल

बालक बुद्धदेव भी आंख मींचकर सब सुनते. और जो भी सुनते, उसका अपने दिमाग में चित्र बनाने लगते. बुद्ध दा के सिनेमा को स्टडी करने वाले उनकी फिल्मों के चित्रों के कायल हैं. मानते हैं कि चाहे उनका किरदार कहानी की किसी भी दिशा में बह रहा हो, लेकिन उनकी फिल्मों के चित्र ऐसे जीवित हैं, सशक्त हैं जैसे किसी कविता को चित्रों के माध्यम से दिखाया जा रहा हो. माना जाता है कि सिर्फ दो फ्रेम देखकर ही आप बुद्ध दा की फिल्मों को पहचान सकते हैं. ऐसी समझ थी उन्हें चित्रों की. वो उनके चित्र ही थे, जिन्होंने उन्हें साथी डायरेक्टर्स से अलग लाकर खड़ा किया. बुद्ध दा के अपने चित्र सोचने की नींव पड़ी बचपन में. खैर, स्कूली पढ़ाई पूरी होने को आई. सोचा कि कला की ओर अपनी इस रुचि को नई दिशा दी जाए. पिता से आग्रह किया कि मुझे पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट में पढ़ना है. पिता ने साफ मना कर दिया. नतीजतन, बुद्ध दा को अपनी दूसरी रुचि की ओर बढ़ना पड़ा. जो थी अर्थशास्त्र. कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला ले लिया और अर्थशास्त्र पढ़ने लगे. कॉलेज में उनके एक प्रोफेसर थे, तरुण सान्याल. जिन्होंने बुद्ध दा का परिचय पश्चिमी क्लासिकल म्यूज़िक से कराया. उन्हें संगीत का ये फॉर्म भाने लगा. आगे जाकर इसकी झलक उनकी फिल्मों में भी देखने को मिली.


# ‘अच्छी खासी नौकरी छोड़कर फिल्ममेकर क्यों बनना चाहते हो?’

1967 की नक्सलबाड़ी बगावत का बंगाल के इतिहास की पृष्ठभूमि पर एक अलग ही महत्व है. उस दौरान बुद्ध दा एक स्टूडेंट थे. उन्होंने अपने कई करीबी दोस्तों को इस बगावत से जुड़ते देखा. लेकिन खुद कभी ऐसे किसी हिंसक आंदोलन का हिस्सा नहीं बने. उन्हें उस बगावत की विचारधारा में कमियां नजर आती थी. इसलिए पढ़ाई पर ध्यान देना बेहतर समझा.

कॉलेज की पढ़ाई पूरी हुई. मास्टर्स की पढ़ाई के लिए बुद्ध दा ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया. ऐसा नहीं था कि बुद्ध दा को अर्थशास्त्र पढ़ने में मज़ा नहीं आ रहा था. या उसे पढ़ना उनकी कोई मजबूरी थी. उलटा, वे खूब शौक से अर्थशास्त्र पढ़ते. लेकिन फिल्में अब भी उनका पीछानहीं छोड़ रही थीं. पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट में पढ़ने का मौका तो नहीं मिला. लेकिन किसी दोस्त के जरिए कलकत्ता फिल्म सोसाइटी के बारे में पता चला. कुछ सिनेमा प्रेमियों का ग्रुप, जहां नियमित तौर पर फिल्मों पर चर्चा होती है. जहां सत्यजीत राय, हरिसाधन दासगुप्ता और बंसी चंद्रगुप्त जैसे डायरेक्टर्स आते हैं. और सोसाइटी के मेंबर्स के साथ घंटों अपनी फिल्मों पर चर्चा करते हैं. बुद्ध दा जानकर उत्सुक हो गए. और झट से सोसाइटी के मेंबर बन गए. इस सोसाइटी से जुडने के बाद मानो उनकी दुनिया बदल गई. चार्ली चैपलिन, अकिरा कुरोसावा, इंगमार बर्गमन जैसे वर्ल्ड सिनेमा के दिग्गज डायरेक्टर्स के काम से अवगत होने का मौका मिला.

Charlie Chaplin
फिल्म सोसाइटी ने उनका परिचय वर्ल्ड सिनेमा से कराया. फोटो – चार्ली चैपलिन की फिल्म का फोटो

वर्ल्ड सिनेमा ने अच्छे सिनेमा के प्रति उनके प्यार को और गहरा कर दिया. अब फैसला किया खुद की फिल्में बनाने का. शुरुआत की शॉर्ट डाक्यूमेंट्री फिल्म्स से. पहली थी 1968 में आई ‘द कॉन्टिनेंट ऑफ लव’. आगे चलकर ‘फिशरमैन ऑफ सुंदरबन’ और ‘माइ किंग ऑफ ड्रम्स’ जैसी डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाईं. ये कोई महान फिल्में नहीं थीं. ऐसा खुद बुद्ध दा मानते थे. लेकिन वो अपनी पूरी ज़िंदगी इन फिल्मों के शुक्रगुजार रहे. वो इसलिए क्योंकि बुद्ध दा किसी फिल्म स्कूल से ताल्लुक नहीं रखते थे. उनकी इन्हीं फिल्मों ने उन्हें फिल्ममेकिंग की टेक्निकल साइड से परिचित कराया.

Buddhadeb Dasgupta Documentary Films 1
बुद्ध दा अपनी डाक्यूमेंट्री फिल्मों को महान नहीं मानते थे, लेकिन खुद को सदा उनका आभारी मानते थे.

बुद्ध दा खुद से ही फिल्में बना रहे थे. पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. इसलिए उन्होंने श्यामसुंदर कॉलेज जॉइन कर लिया और वहां बतौर प्रोफेसर अर्थशास्त्र पढ़ाने लगे. इसके बाद अगली नौकरी भी बतौर प्रोफेसर ही जारी रखी. कलकत्ता के सिटी कॉलेज में. लेकिन उस दौरान उन्हें कुछ खटक रहा था. ऐसा नहीं था कि अर्थशास्त्र से मन ऊब गया था. वो खुद मानते थे कि अगर फिल्ममेकर नहीं बनते तो पक्का अर्थशास्त्री बनते. लगने लगा कि अर्थशास्त्र की क्लास में जो पढ़ा रहे हैं उसका वास्तविक दुनिया से कोई लेना-देना ही न हो जैसे. घर पर बात की. कि नौकरी छोड़ना चाहते हैं. फुल-टाइम फिल्ममेकर बनना चाहते हैं. मां ने सपोर्ट किया. लेकिन पिता रूठ गए. काफी मनाने के बाद बेटे को इजाज़त दी.


# पहली फिल्म जिसे हर कोई देखना चाहता था

बुद्ध दा ने नौकरी छोड़ दी. और अपनी पहली फीचर फिल्म बनाने का फैसला लिया. ऐसे दौर में जब सत्यजीत राय और ऋत्विक घटक जैसे महान डायरेक्टर्स फिल्में बना रहे थे. वर्ल्ड सिनेमा के दृष्टिकोण से देखें तो भारतीय सिनेमा का इतिहास दो भागों में बंटा है. सत्यजीत राय से पहले का सिनेमा और उनके बाद का सिनेमा. सत्यजीत राय, मृणाल सेन और ऋत्विक घटक जैसे डायरेक्टर्स ने भारतीय सिनेमा को वर्ल्ड सिनेमा के मैप पर लाकर खड़ा कर दिया था. जब बुद्ध दा ने फिल्में बनाना शुरू किया, तो उन्हें एक बात का डर था. कि उनका सिनेमा सत्यजीत राय या किसी अन्य महान फिल्ममेकर जैसा ना हो. वो अपनी आवाज ढूंढना चाहते थे.

अपनी आवाज ढूंढी. 1978 में आई ‘दूरत्वो’ के जरिए. बतौर डायरेक्टर, उनकी पहली फीचर फिल्म. लो बजट में बनी और महज 16 दिनों में पूरा शूट निपट गया. फिल्म की टोटल लेंथ थी करीब 20,000 फीट. नक्सल मूवमेंट का बैकड्रॉप लेकर कहानी को रचा गया. फिल्म केंद्रित थी पति-पत्नी के नाजुक रिश्ते पर. पति को पता चलता है कि उसकी पत्नी शादी से पहले प्रेग्नेंट थी. वो भी अपनी मर्जी से. ये उसके लिए बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो जाता है. बौखला जाता है. उसे छोड़कर चला जाता है. लेकिन उसकी अंतरात्मा में एक सवाल दबा रह जाता है. क्या एक शादी में ईमानदारी सबसे जरूरी चीज़ है?

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दूरत्वो, वो फिल्म जिसकी सत्यजीत राय ने भी तारीफ की. फोटो – यूट्यूब

फिल्म की कई स्क्रीनिंग्स हुई. सत्यजीत राय ने फिल्म की जमकर तारीफ़ें की. फिल्म को एक कविता समान बताया. उसकी टेक्निकल साइड की प्रशंसा की. फिल्म की तारीफ करने वालों में राय अकेले नहीं थे. फिल्म ने बेस्ट फीचर फिल्म इन बांग्ला का नैशनल अवॉर्ड अपने नाम किया. फिल्म की वेल्यू कमर्शियल मार्केट में भले ही कमजोर थी लेकिन बावजूद इसके बर्लिन, लोकर्नो और शिकागो के फिल्म फेस्टिवल्स इसे स्क्रीन करने के लिए इच्छुक थे. विदेशों में फिल्म की स्क्रीनिंग हुई भी, वहां भी बुद्ध दा के काम के हिस्से तारीफ़ें ही आईं.


# कम फिल्में लेकिन क्वालिटी वाला काम

बुद्धदेब दासगुप्ता अपनी फिल्मों के जरिए अपनी कहानियां बताना चाहते थे. इसलिए वो अपने क्रिएटिव विजन के साथ किसी को भी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करने देते थे. कोई प्रड्यूसर दखल देने की कोशिश करता तो फिल्म सेट छोड़कर चले जाते. बेचारे प्रड्यूसर्स ने सेट पर आना ही बंद कर दिया था. अगर आते भी तो कोसों दूर बैठते. बुद्ध दा के लिए उनके विजन से बढ़कर कुछ नहीं था. इसलिए उनकी फिल्मोग्राफी में आपको कम ही फिल्में दिखेंगी. जब जरूरत महसूस हुई, तभी फिल्म बनाई. उनकी फिल्मों में से पांच ने बेस्ट फिल्म का नैशनल अवॉर्ड जीता. वहीं, दो की वजह से उन्हें बेस्ट डायरेक्टर का नैशनल अवॉर्ड मिला. वो इकलौते भारतीय फिल्ममेकर हैं जिनकी पांच फिल्में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के मास्टर्स सेक्शन में स्क्रीन की जा चुकी हैं. उनकी फिल्म ‘उत्तरा’ की बदौलत उन्हें वेनिस फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल डायरेक्टर का अवॉर्ड जीतने का मौका भी मिला था. अवॉर्ड्स के मामले में उनकी उपलब्धियां इतनी थी कि ये एपिसोड छोटा पड़ जाएगा. इसलिए उनकी फिल्मोग्राफी में से हमनें उनकी पांच फिल्में चुनी हैं. पांच फिल्में जो आपके लिए और सिनेमा जगत के लिए बेहद जरूरी हैं.

#1. बाघ बहादुर (1989)

बुद्धदेब दासगुप्ता के बचपन का एक हिस्सा खड़गपुर में बीता. जहां बंगालियों की तुलना में आंध्रप्रदेश के तेलंगी समाज के लोग ज्यादा थे. बुद्ध दा के बचपन में तेलंगी लोक कलाकार अपने शरीर को चीते की तरह रंग लेते थे. फिर गाते और नाचते. बुद्ध दा को अपनी फिल्म ‘बाघ बहादुर’ का आइडिया अपने बचपन की इसी मेमरी से आया था. बस उन्हें अपनी फिल्म का नायक चाहिए था. तभी नजर पड़ी एक फिल्म मैगजीन पर. जिसके कवर पर थे पवन मल्होत्रा. कुछ समय पहले ही उन्होंने ‘सलीम लंगड़े पर मत रो’ से डेब्यू किया था.

Mazdoor
बुद्ध दा ने अपने बचपन के अनुभवों पर फिल्म की नींव रखी.

पवन मल्होत्रा ने स्क्रॉल को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि बुद्ध दा को उनकी आंखें पसंद आई थीं. कहानी थी एक मजदूर की. जो हर साल अपने गांव लौटता है. एक बाघ बनने के लिए. बाघ की कॉस्टयूम पहनकर दर्शकों के लिए परफॉर्म करता. हर साल ये सिलसिला जारी रहता है. लेकिन वक्त बदल रहा है. लोगों के मनोरंजन के माध्यम बदलने लगते हैं. अब गांव में सर्कस आता है. जिसके साथ आता है एक असली चीता. सवाल है कि क्या असली चीते के सामने लोगों को नकली बाघ की कोई जरूरत है? और क्या इस बाघ बने इंसान का अपना भी कोई अस्तित्व है.

फिल्म को बेस्ट फिल्म के नैशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था.


#2. गृहयुद्ध (1982)

पश्चिम बंगाल सरकार ने एक अनुबंध के तहत फिल्म प्रड्यूस की थी. बंगाल का नक्सल मूवमेंट इस फिल्म का बैकड्रॉप था. जिसे दिखाया एक नायिका के नजरिए से. निरुपमा का भाई इस मूवमेंट में मारा जाता है. बावजूद इसके निरुपमा के किरदार को किसी भाग्य की मारी की तरह पेश नहीं किया गया. बल्कि, वो ऐसे माहौल में एक उम्मीद की किरण बनकर उभरती है. एक बेहतर भविष्य के लिए.

Nirupama
नक्सल मूवमेंट का बैकड्रॉप लेकर बनाई गई फिल्म.

फिल्म में निरुपमा का किरदार निभाया था ममता शंकर ने. जो सत्यजीत राय की ‘आगंतुक’ और मृणाल सेन की ‘मृगया’ जैसी फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं. ‘गृहयुद्ध’ ने वेनिस फिल्म फेस्टिवल के 39वें एडिशन में भी कम्पीट किया था.


#3. चराचर (1993)

बेस्ट फिल्म का नैशनल अवॉर्ड जीता. साथ ही बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बीयर, जो उस फिल्म फेस्टिवल का सर्वोच्च पुरस्कार है, के लिए भी कम्पीट किया. कहानी है लाखा की. एक चिड़िया पकड़ने वाला. उसकी पुश्तें यही काम करती आ रही हैं. चिड़िया पकड़ते हैं और बाज़ार में बेच आते हैं. लेकिन लाखा चिड़िया पकड़ने के इस धंधे पर सवालिया निशान उठाता है. उसकी पत्नी सरी को भी उससे शिकायत है. कि उसकी ज़िंदगी सिर्फ चिड़ियों के इर्द-गिर्द ही घूमती है. उनके सिवा उसे किसी और चीज़ से मोह नहीं. धीरे-धीरे लाखा और उसका भाई भूषण शहर के एक डीलर को चिड़ियां बेचने लगते हैं. इनके काम से खुश होकर ये डीलर उन्हें खाने पर बुलाता है. तभी वहां एक अनहोनी घट जाती है.

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‘ब्योमकेश बक्शी’ वाले रजीत कपूर लीड रोल में थे. फोटो – यूट्यूब

फिल्म में लाखा का किरदार निभाया था रजीत कपूर ने. जिन्हें आप बसु चैटर्जी के शो ‘ब्योमकेश बक्शी’ से भी पहचानते हैं.


#4. कालपुरुष (2005)

दूसरा मौका जब मिथुन चक्रवर्ती ने बुद्ध दा के साथ काम किया. इससे पहले दोनों ने 1992 में आई ‘तहादेर कोथा’ में भी काम किया था. फिल्म की कहानी एक पिता और बेटे के रिश्ते पर फोकस करती है. किसी गलतफहमी की वजह से पिता सालों पहले घर छोड़कर चला जाता है. इधर बेटे की ज़िंदगी भी उथल-पुथल हो जाती है. जब उसे पता चलता है कि उसकी बीवी उसे धोखा दे रही है. वो अपने रिश्ते से भागकर अपने पिता की खोज में निकल पड़ता है. फिल्म में बेटे का किरदार निभाया राहुल बोस ने. वहीं, पिता बने हैं मिथुन. राहुल वाला किरदार भले ही फिल्म का सेंट्रल किरदार है, फिर भी आपको मिथुन के किरदार से सहानुभूति होगी. उसका दर्द देखकर. उसका पश्चाताप देखकर.

Father And Son
पिता और बेटे के रिश्ते पर बनी नैशनल अवॉर्ड विनिंग फिल्म.

फिल्म टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीन की गई थी. वहीं, इंडिया में इसने बेस्ट फीचर फिल्म का नैशनल अवॉर्ड जीता था.


#5. उत्तरा (2000)

निमाई और बलराम. दोनों दोस्त. साथ ही शौकिया पहलवान भी. दोनों की दोस्ती बदल जाती है जब बलराम की शादी हो जाती है. उत्तरा से. अब दोनों पहलवानों में होड़ मच जाती है. उत्तरा को जीतने की. सिर्फ इतना सुनकर इसे लव ट्रायंगल कहना सरासर गलत होगा. फिल्म प्यार की बात नहीं करती. बल्कि बात करती है कट्टरवाद की. बात करती है विषैले पुरुषार्थ की. सवाल करती है कि विषैला पुरुषार्थ कैसे खोखले समाज की रचना कर रहा है. फिल्म ये सब बातें कहती है लेकिन प्रतीकात्मक रूप से.

Balram Marries Uttara
प्रतीकात्मक रूप से फिल्म कई गहरे मुद्दों पर बात करती है.

फिल्म की बदौलत बुद्धदेब दासगुप्ता ने बेस्ट डायरेक्टर का नैशनल अवॉर्ड अपने नाम किया था. वहीं, वेनिस फिल्म फेस्टिवल के अलावा इसे टोरंटो और लॉस एंजेलेस के फिल्म फेस्टिवल्स में भी स्क्रीन किया गया.

इनके अलावा भी बुद्ध दा की अनेकों फिल्में हैं जिन्हें आप देख सकते हैं. लिस्ट एंडलेस है. बुद्ध दा को हमारी ओर से ट्रिब्यूट. वो सदा याद रहेंगे. उनका काम सदा हमारे बीच रहेगा.


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