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जहांगीर का अंग्रेज़ी दोस्त जिसे वो 'खान हॉकिन्स' कहकर बुलाया करता था!

आज 24 अगस्त है और आज की तारीख़ का संबंध है ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से.

15 वीं सदी के अंत तक यूरोप के कई देश व्यापार के लिए पूर्व की तरफ बढ़ रहे थे. अरब देशों से व्यापार से उन्हें भारत का माल, जैसे कपास, मसाले आदि मिलते थे. लेकिन वो सीधे भारत से व्यापार नहीं कर पा रहे थे. यूरोप की अर्थव्यवस्था ख़स्ता हाल थी. उत्पादन और खेती के लिए वहां का मौसम अनुकूल नहीं था. इसलिए इस दौरान यूरोप से कई जहाज़ी बेड़े व्यापार के नए मौक़े खोजने के लिए निकलने लगे. यूरोप में इस काल को ‘ऐज ऑफ़ डिस्कवरी’ कहा गया. स्पेन, फ़्रांस डच और पुर्तगाल इनमें सबसे आगे थे. ब्रिटेन की हालत कुछ ख़ास अच्छी नहीं थी. 16वीं सदी के अंत तक व्यापार के नाम पर वो ज़्यादातर स्पेनिश और डच जहाज़ों में लूटपाट मचाया करता था.

मसालों का द्वीप 

भारतीय उपमहाद्वीप से व्यापार करने में सबसे पहले सफलता मिली पुर्तगालियों को. 1498 में ‘वास्को डी गामा’ पुर्तगाल से यात्रा करता हुआ भारत पहुंचा और मालाबार कोस्ट पर मौजूद Calicut में उतरा. उसने भारत में व्यापार के कई ट्रेंडिंग पोस्ट बनाए. और इसी के साथ यूरोप में भारतीय महाद्वीप में व्यापार स्थापित करने को लेकर होड़ शुरू हो गई.

1577 में फ़्रांसिस ड्रेक नाम के एक ब्रिटिश जहाज़ी ने सुदूर पूर्व की यात्रा करने की ठानी. इसके लिए उसने साउथ अमेरिका की तरफ़ यात्रा की योजना बनाई. जहां से स्पैनिश जहाज़ी सोना भरकर लाया करते थे. इस यात्रा के दौरान उसने जावा और मलाकु द्वीपों पर डेरा डाला. मलाकु को तब मसालों का द्वीप कहा जाता था. यहां से वो खूब सारा जायफल और लौंग लेकर 1580 में वापस ब्रिटेन पहुंचा. शुरुआत में उसे इन मसालों की कीमत का पता नहीं था. लेकिन ये मसाले उन दिनों गोश्त को प्रिज़र्व करने के काम आते थे. इसलिए ब्रिटेन के व्यापारियों ने इन्हें कई गुना दाम पर हाथों-हाथ ख़रीद लिया. इस यात्रा ने ड्रेक को ब्रिटेन में रातों-रात हीरो बना दिया.

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8 जुलाई 1497 को वास्को द गामा चार जहाज़ों के एक बेड़े के साथ लिस्बन से भारत तक की यात्रा पर निकला (तस्वीर: Wikimedia)

जैसा कि पहले बताया, उन दिनों स्पेन, पुर्तगाल और ब्रिटेन में आपस में ठनी रहती थी. इस दौरान होने वाली समुद्री लड़ाइयों में ब्रिटेन के हाथ कुछ पुर्तगाली जहाज़ लगे. इसमें से एक जहाज़ भारत से माल लेकर वापस लौट रहा था, जिसमें सोना चांदी और बहुत से मसाले भरे हुए थे. साथ में एक ऐसी चीज़ भी थी जो इन सबसे ज़्यादा मूल्यवान थी. ये थी इस यात्रा की हैंडबुक, जिसमें चीन, भारत और जापान तक के समुद्री रास्तों की जानकारी थी. इसके अलावा इस हैंडबुक में व्यापारिक ठिकानों का ब्योरा भी दिया गया था.

कंपनी बहादुर 

लंदन के व्यापारियों ने मसालों से होने वाले फ़ायदे का स्वाद चख लिया था. इसलिए उन्होंने महारानी एलिजाबेथ के आगे एक अपील दायर की. अपील में इंडियन ओशियन में व्यापार की अर्ज़ी शामिल थी. स्पेन और पुर्तगाल पूर्व में ट्रेड मोनोपॉली बनाए हुए थे. वे इसे तोड़ना चाहते थे.

एलिज़ाबेथ से पर्मिशन लेकर 1596 में तीन जहाज़ भारतीय महाद्वीप के लिए निकले. इन जहाज़ों के कप्तानों को लम्बी यात्रा का अनुभव नहीं था. ना ही वो इससे पहले कभी पूर्व की यात्रा पर गए थे. इसलिए तीनों जहाज़ बीच यात्रा में रास्ता भटककर खो गए.  इसके बाद इस यात्रा की कमान संभाली राल्फ फिंच ने. जो इससे पहले मेसोपोटामिया और पर्शियन खाड़ी की यात्रा कर चुका था. फिंच को भारतीय महासागर में व्यापार के लिए कंसलटेंट बना लिया गया.

सितंबर 1599 में ब्रिटेन के व्यापारियों ने भारतीय उपमहाद्वीप में यात्रा के लिए एक फंड बनाया. जिसमें उन्होंने मिलकर 30 हज़ार पाउंड यानी क़रीब 30 लाख रुपए का निवेश किया. उन्होंने दुबारा महारानी एलिज़ाबेथ से इंडियन ओशियन के इलाक़े में व्यापार की इजाज़त मांगी. 31 दिसम्बर को महारानी एलिज़ाबेथ ने इस समूह को एक रॉयल चार्टर ग्रांट किया. जिसके तहत एक नई कंपनी को भारत और इंडीज में व्यापार का एकाधिकार मिल गया. कंपनी का नाम था,

‘Governor and Company of Merchants of London trading into the East Indies’.

यही आगे चलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कहलाई. भारत में इसी को आगे जाकर ‘कम्पनी बहादुर’ के नाम से बुलाया जाने लगा. 1601 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के तहत पहली यात्रा की कमान दी गई जेम्स लैंकेस्टर को. इस यात्रा के दौरान लैंकेस्टर ने इंडोनेशिया के पास जावा और मोलुकू द्वीप में अपने ट्रेड सेंटर स्थापित किए.

हेक्टर और विलियम हॉकिन्स

1603 में एलिज़ाबेथ की मृत्यु जो गई और ‘जेम्स VI’ ब्रिटेन का राजा बन गया. उसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी को दिए गए अधिकारों को बरकरार रखा. इसके बाद कम्पनी की दूसरी यात्रा शुरू हुई 1607 में. इस यात्रा में तीन जहाज़ थे. पहला था ‘रेड ड्रैगन’ दूसरा ‘कंसेंट’ और तीसरे जहाज़ का नाम था ‘हेक्टर’. हेक्टर का कप्तान था विलियम हॉकिन्स.

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हॉकिंस को जहांगीर की ताक़त देखकर अहसास हो गया था कि युद्ध से भारत पर क़ब्ज़ा नहीं किया जा सकता. इसलिए उसने कूटनीति का सहारा लिया. (तस्वीर: Getty)

24 अगस्त 1608 यानी आज ही के दिन हेक्टर ने भारतीय महाद्वीप में कदम रखा. हॉकिन्स ने हेक्टर का लंगर सूरत के बंदरगाह में डाला. इस यात्रा के नतीजे में ब्रिटिश भारत पहुंच तो गए लेकिन उनके आगे की राह आसान न थी. जैसे ही हेक्टर सूरत पहुंचा, उसे पुर्तगालियों ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया. हॉकिन्स को बताया गया कि भारत के सारे पोर्ट पुर्तगाल के राजा के अधीन हैं. बिना लाइसेंस के किसी भी शिप को वहां लंगर डालने की आज्ञा नहीं दी जा सकती.

हॉकिन्स अपने साथ हेक्टर में बहुत सारे तोहफ़े लेकर आया था. इनमें से कुछ उसने पुर्तगालियों को सौंप दिए. जिसके बदले उसे आगरा जाकर बादशाह से मुलाक़ात करने की इजाज़त मिल गई. उसने एक अफ़ग़ान व्यापारी का वेश धरा और आगरा की ओर निकल गया. 16 अप्रैल 1609 को हॉकिन्स आगरा पहुंचा. ब्रिटेन से निकलते वक्त उसको ये जानकारी दी गई थी कि भारत में उसकी मुलाक़ात बादशाह अकबर से होगी. लेकिन वो आगरा पहुंचा तो वहां सिंहासन पर जहांगीर बैठा हुआ था.

जहांगीर के दरबार में 

जहांगीर के दरबार में पहुंचकर उसने ब्रिटेन के राजा जेम्स VI का संदेश सुनाया. और अपने साथ लाए बहुत से तोहफ़े दरबार में पेश किए. इन तोहफ़ों में ब्रिटेन के ख़ास चित्रकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स भी शामिल थी. जहांगीर इन तोहफ़ों से बहुत खुश हुआ. उसने हॉकिन्स को दरबार में राजदूत के तौर पर शामिल होने का न्योता दिया. दोनों पक्के शराबी थी. इसलिए कुछ ही दिनों में जहांगीर और हॉकिन्स की गहरी दोस्ती हो गई. हॉकिन्स की मंशा थी कि किसी तरह वो व्यापार के लिए जहांगीर को मना सके. नतीजतन उसने मुग़ल पोशाक पहनना शुरू कर दी. और वो मुग़ल अभिजात्य वर्ग की तरह ही पेश आने लगा. इस कारण जहांगीर ने उसे एक विशेष नाम दिया- खान हॉकिन्स.

अपने संस्मरणों में हॉकिन्स ने जहांगीर के बारे में लिखा है-

‘यकीनन जहांगीर धन, सेना और बल के हिसाब से पूर्व के सबसे ताकतवर सम्राटों में से एक है. पहली नज़र में लगता है कि सब उससे प्यार करते है, लेकिन इस प्यार के पीछे की असलियत है, जनता में उसका ख़ौफ़.’

जहांगीर अपनी सनक के लिए मशहूर था. वो हल्के से संदेह पर ही अपने विश्वासपात्र सचिवों को मार डालता था.

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विलियम हॉकिंस की एक तस्वीर (सोर्स: Wikimedia)

हॉकिन्स ने देखा कि एक सैनिक जिसने अधिक वेतन की मांग की, उसे शेरों के साथ बंद पिंजरे में कुश्ती करने की सजा दी गई. एक अन्य व्यक्ति ने जब गलती से एक चीनी प्याला तोड़ दिया तो उसे कोड़ों से मारने की सजा दी गई. इसके बाद उस व्यक्ति को चीन भेज दिया गया, ताकि वो प्याले की मरम्मत करवा कर लाए.

एक छोटी सी गलती से ग़ुस्सा होकर उसने अपने बेटे शहरयार के गले को सुई से गोद दिया. जहांगीर जब दरबार में पेश होता तो उसके साथ कुल्हाड़ी और चाबुक लिए लोग होते. जो उसके एक आदेश पर किसी को भी सजा देने के लिए तैयार रहते थे.

बादशाह से बातचीत के दौरान हॉकिन्स हमेशा सावधान रहता कि किसी बात पर वो नाराज़ ना हो जाए. बातों-बातों में उसने कई बार कोशिश करी कि जहांगीर से व्यापार को लेकर बात छेड़ी जाए. लेकिन जहांगीर को ब्रिटेन से संबंध बनाने में कोई रुचि नहीं थी. वो अकबर की छोड़ी हुई विशाल रियासत का मालिक था . हॉकिन्स के पास देने को ऐसा कुछ नहीं था जिसकी जहांगीर को ज़रूरत हो. हर बार वो बात को घुमा-फिराकर घोड़ों और शराब पर ले आया करता.

मुग़ल दरबार में थॉमस रो

हॉकिन्स लगभग दो साल तक मुग़ल दरबार का हिस्सा बना रहा. उसकी बादशाह से बढ़ती नज़दीकी देख दरबारियों ने जहांगीर के कान भरने शुरू कर दिए. जिसके नतीजे में हॉकिन्स धीरे-धीरे जहांगीर की छत्र छाया से दूर होता चला गया. अंत में जब उसे लगा कि यहां उसकी दाल नहीं गलने वाली तो वो वापस ब्रिटेन की ओर लौट गया. हालांकि ब्रिटेन पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई.

इस यात्रा की असफलता देखकर ईस्ट इंडिया कम्पनी ने एक ख़ास राजदूत को भारत भेजा. इस राजदूत का नाम था थॉमस रो.  1615 में थॉमस रो भारत आया. उसने जहांगीर से मुलाक़ात की. तीन साल की कोशिशों के बाद उसे एक व्यापारिक समझौता करने में सफलता मिली.

समझौते के अनुसार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारतीय बंदरगाहों से व्यापार की इजाज़त मिल गई थी. तय हुआ कि बदले में ब्रिटेन के उत्पाद भारत लाए जाएंगे. लेकिन जहांगीर को इसका होश नहीं था कि ब्रिटेन में ऐसी किसी चीज़ का उत्पादन होता ही नहीं, जिसका व्यापार भारत में हो सके. उसे तो सिर्फ़ ब्रिटेन से तोहफ़े में लाए गए शिकारी कुत्तों, महंगी शराब और पेंटिंग्स का शौक़ था.

पुर्तगाली जहां अपनी सारी ताक़त युद्ध और व्यापार पर खर्च कर रहे थे. वहीं ब्रिटेन समझ गया था कि राजनैतिक कौशल का उपयोग कर वो भारत में आसानी से अपना व्यापार बड़ा सकता था. इसीलिए उसने थॉमस रो जैसे मंझे हुए राजदूत को भारत भेजा. इस पहली डील के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने एक-एक कर भारत के महत्वपूर्ण तटों पर अपने ट्रेडिंग सेंटर स्थापित कर लिए. और धीरे-धीरे वो भारत में सबसे बड़ी ‘इम्पीरियल पावर’ यानी औपनिवेशिक ताक़त बन गया.


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