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जब कैफ़ी आज़मी ने अपनी प्रेमिका को खून से ख़त लिखा

शौकत कैफ़ी एक कमाल की अदाकारा थीं. 22 नवंबर 2019 को इनकी मौत हो गई. शौकत ने इप्टा और पृथ्वी थियेटर में खूब सारा काम किया. इसके अलावा उन्होंने बहुत-सी फ़िल्मों में भी काम किया. याद की रहगुज़र, शौकत कैफ़ी की आपबीती है और पहली कृति भी. कैफ़ी आज़मी और शौकत कैफ़ी के इश्क़ की एक छोटी सी दास्तान किताब याद की रहगुज़र से पढ़िए.


पुस्तक अंश: याद की रहगुज़र

मैंने देखा कि कैफ़ी एक दरख्त के नीचे तन्हा और उदास-उदास खड़े हैं. दूसरे लोग इधर-उधर देखने में मसरूफ थे. मैं चुपके से कैफ़ी के पास जाकर खड़ी हो गई. क़ैफ़ी ने उदास लहजे में कहा “हम दो-चार दिन में चले जाएंगे, फिर आप से मुलाकात भी नहीं होगी. वैसे भी आप दूर-दूर ही रहने लगी हैं.” मैं चुप रही. अपने अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रही. बार-बार आंखों में आंसू आ रहे थे जिन्हें दिखाना नहीं चाहती थी. क़ैफ़ी कहने लगे : “अगर आप इजाज़त दें तो एक नज़्म आपकी नज्र करना चाहता हूं.” मैंने सिर झुकाए-झुकाए गर्दन हिला दी. कैफ़ी ने मेरी तरफ़ गौर से देखते हुए नज़्म शुरू की : नज़्म का उन्वान है ‘तुम’:

शिगुफ़्तगी का लताफ़त का शिकार’ हो तुम
फ़क़त बहार नहीं हासिले-बहार हो तुम
जो एक फूल में है क़ैद वो गुलिस्तां हो
जो इक कली में है पिन्हां वह लालाज़ार हो तुम
हलावतों की तमन्ना मलाहतों की मुराद
गुरूर कलियों का, फूलों का इन्किसार हो तुम…
जिसे न गूँथ सकी आरजू वो हार हो तुम…

यह नज़्म सुनने के बाद मेरे आंसू पागलों की तरह बहने लगे और मैं वहां से भाग गई. शाम तक सारा क़ाफ़िला वहीं रहा. चाय वगैरह पी गई. फिर चांद निकल आया. सबने मिलकर एक खेल सोचा. एक आदमी चोर बनता था और उसका काम यह होता था कि वह एक-एक आदमी के लिए एक-एक लफ़्ज़़ में उसका कैरेक्टर बताए. दूसरे आदमी का काम यह था कि वह बताए कि पहले आदमी ने कौन-सा लफ़्ज़ किस शख्स का कैरेक्टर बताने के लिए इस्तेमाल किया है. मुझे ठीक से याद नहीं कि वह खेल कौन जीता लेकिन इतना याद है कि कैफी ने मेरा नाम मक़्नातीस रखा था.

तीसरे दिन सरदार जाफ़री, सुल्ताना आपा और मजरूह सुल्तानपुरी तो वापस बम्बई लौट गए लेकिन कैफ़ी ठहर गए. मेरी छोटी बहनों से उनकी दोस्ती हो गई थी. अब्बाजान भी कैफ़ी को पसंद करने लगे थे लेकिन मेरे दोनों बड़े भाई और छोटी आपाजान को मेरा कैफ़ी से बात करना भी नागवार था. उन लोगों की कोशिश यह होती थी कि जब भी मैं और कैफ़ी अकेले हों तो उनमें से कोई न कोई आकर बैठ जाए.

एक दिन मैंने जल्दी से खाना खा लिया और कैफ़ी के कमरे में चली गई जहां वो अकेले बैठे थे. घर वाले खाने में मस्रूफ़ थे. मैंने बातों-बातों में कहा : “आप मुंबई जाकर उन्हीं से शादी कर लीजिए, फिर सब ठीक हो जाएगा.

कैफ़ी कहने लगे : “मैं आपकी हर बात सुनने के लिए तैयार हूं लेकिन अगर आप कहें कि मैं तेल की शीशी से शादी कर लूं तो यह नहीं होगा.” मुझे हंसी आ गई. मैंने कहा : “अच्छा अपना हाथ दिखाइए.” कैफ़ी ने सीधा हाथ आगे कर दिया। मैंने उनका हाथ बड़े प्यार से थाम लिया और उनकी किस्मत की लकीरें देखने लगी. एक लकीर पर हाथ रखकर मैंने कहा : “आपकी love marriage होगी.

सच ?” कैफ़ी मेरी तरफ़ देखने लगे.

हां, यह जो शहादत की उंगली’ के नीचे एक स्टार-सा बना हुआ है ना, यही इसकी अलामत है.” मैंने एक पेपर उठाया और उस पर लिखा : “ज़िन्दगी के सफ़र में अगर तुम मेरे हमसफ़र होते तो यह ज़िन्दगी इस तरह गुजर जाती जैसे फूलों पर से नसीमे-सहर’ का एक तेज़ झोंका.“ और वह पेपर कैफ़ी की तरफ़ बढ़ा दिया. कैफ़ी ने पढ़कर मेरी तरफ़ देखा और कहा : “मेरी जिन्दगी की किस्मत इन्हीं आंखों में है.

फिर लोग आ गए और मैं वहां से उठ गई. फिर यह हुआ कि बीच के कमरे में, जहां से मैं कैफ़ी के कमरे में जा सकती थी, ताला पड़ गया और कैफ़ी से मिलने के लिए मुझे बुरी तरह से मना कर दिया गया. अम्मांजान ने भी डांटा. दूसरे बहन-भाइयों को मुझे डांटने की हिम्मत नहीं थी क्योंकि मैं बुरी तरह जवाब देने में उस्ताद थी लेकिन अम्माजान को मैंने कोई जवाब नहीं दिया. मेरी दो छोटी बहनें, जिनके नाम कमर और ज़फ़र हैं, मेरी चमचियां थीं. पलंग पर लेटकर रोने लगती तो दोनों बहनें मुझसे लिपट जाती… “अल्लाह, आपा बी, अगर आपकी शादी कैफ़ी भाई से हो गई तो कितना अच्छा लगेगा. इतने बड़े मशहुर शायर. हम अपने दोस्तों में शान से बताएंगे कि हमारे बहनोई कैफ़ी आज़मी हैं.”

फिर मुझे पता चला कि कैफ़ी रोते हुए बम्बई चले गए और मुझे मिलने भी नहीं दिया गया. शाम का वक़्त था, मैं पागलों की तरह उनके कमरे में गई जो बिल्कुल खाली था. दीवानों की तरह उनकी मेज़ के कागजात उलट-पलटकर देखने लगी. मेरे पास उनका कोई पता नहीं था. आंखों में आंसू उमड़े चले आ रहे थे. अचानक मेरी नजर एक राइटिंग पैड पर पड़ी. जल्दी-जल्दी कांपते हाथों से उसके वरक उलट-पलटकर देख रही थी कि बीच के पेपर में एक इंतिहाई खूबसूरत नज़्म लिखी हुई मिली. नीचे बम्बई का पता लिखा हुआ था. सेंडसर्ट रोड, राज भवन, बम्बई 22. एकदम जान में जान आ गई. मैं वहीं कुर्सी पर ढेर हो गई. जब जरा होश ठिकाने आए तो नज़्म पढ़ना शुरू की…

शौकत के नाम

वो चांद जिसकी तमन्ना थी मेरी रातों को
तुम ही वो चांद हो इस चांद-सी जबीं’ की क़सम
वो फूल जिसके लिए मैं चमन-चमन में
तुम ही वो फूल हो रुख़सारे अहमरीं की क़सम
वो सिहरो-नगमा इसी चश्मे-कैफ़वार में है
घुली हुई है गुलिस्तां की चांदनी जिसमें

इतनी हसीन नज़्म मैंने जिन्दगी में पहली बार पढ़ी थी मगर अफ़्सोस कि पूरी याद नहीं. यह नज़्म पढ़ते ही मैंने वही पैड लिया और दीवानों की तरह ऊपर छत पर पहुंच गई और कैफ़ी को बेसाख्तगी से खत लिखा.

कैफ़ी, मुझे तुमसे मोहब्बत है, बेपनाह मोहब्बत. दुनिया की कोई ताकत मुझे तुम तक पहुंचने से नहीं रोक सकती, पहाड़, दरिया, समन्दर, लोग, आस्मान, फ़रिश्ते, खुदा…और पता नहीं क्या-क्या.

तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी,

शौकत

नीचे पता अपने चचाजाद भाई अक्बर के स्कूल का लिख दिया. अक्बर मेरे मर्हूम चचा का लड़का था जो हमारे पास ही रहता और पढ़ता था, हमदर्द, मोहब्बत वाला. कैफ़ी को पसन्द करता था और मुझसे हमदर्दी थी. उसी ने मुझे राय दी थी कि आप अपने खत मेरे स्कूल के पते पर मंगवा सकती हैं. पांच-छह दिन में ही कैफ़ी का जवाब आ गया. मुझे उस खत का कुछ हिस्सा आज भी याद है :

शौकत मेरी शौकत!

तुम्हारा खत मिला. उसका एक-एक हर्फ़ मेरे अन्दर इस तरह जज़्ब हो रहा था जैसे पहली बारिश के क़तरे प्यासी जमीन में जज़्ब हो जाते हैं.

फिर खतों का सिलसिला शुरू हो गया. रोज़ अकबर मुझे कभी छह, कभी बारह खत लाकर देता. मुझ पे लिखी हुई नज़्में होती और इंतिहाई खूबसूरत खत. मैं सबसे छुपकर छत पर चली जाती और एक-एक ख़त को पांच-पांच, छह-छह बार पढ़ती और ख़यालों की एक हसीन दुनिया में पहुंच जाती. फिर मेरे भी छह-छह खत रोज़ जाने लगे. बाद में मुनीष (कैफ़ी के दोस्त) ने बताया कि कम्यून मखता के लिए एक बोर्ड लगा होता था, जिस पर मेरे पूरे खत सजाकर लगाए जाते थे. एक हैंडराइटिंग, एक ही राइटिंग पैड पर लिखे हुए ख़त. कामरेड शरारत से कैफ़ी को खूब छेड़ते और हंसते. फिर एक दिन ऐसा आया कि घरवालों को पता चल गया. चारों तरफ़ से पाबन्दियां लगने लगीं. घर में मेरे अब्बाजान और दो छोटी बहिनों के अलावा कोई मेरा तरफ़दार नहीं था. अकबर की वजह से कैफ़ी के खत तो मुझे मिल जाते लेकिन मेरे खत कैफ़ी तक नहीं पहुंचते क्योंकि चपरासी तो सब बड़े भाईजान और छोटू भाईजान की तरफ थे लेकिन का कामाटन (बाई जो घर में झाडू-बतन करती है) मेरी तरफ़दार थी. मैं उसके ज़रिए खत भेजती थी वह गेंहू पिसवानेवाले डिब्बे में बंद करके ले जाती या कभी सौदा लेने वाली भुट्टी (टोकरी वा बास्केट) में या अखबार रखकर उसके नीचे मेरे खत रखकर ले जाती. मेरे भाइयों को पता चल गया तो मेरे खत उससे लेकर फाड़ दिए जाते.  घर में एक हंगामा हुआ. मेरा मामूज़ाद भाई आ गया था. कभी वह मेरे अब्बाजान का रिवाल्वर निकाल लेता कि मैं अपने आपको शूट कर लूंगा. एक बार नीला थोथा खा लिया. भाईजान वगैरह अस्पताल ले गए. वहां उसका इलाज हुआ, ठीक हो गया.

जब पन्द्रह-बीस दिन गुजर गए और मेरे ख़त बम्बई नहीं पहुंचे तो कैफ़ी बेचैन हो गए (वो समझे कि मैं खफ़ा हो गई हूं). उन्होंने अपने खून से एक ख़त लिखा. जिसे देखकर मैं पागल-सी हो गई. मेरा सिर चकराने लगा. मैंने अब्बाजान से साफ़-साफ़ कह दिया कि मैं सिर्फ़ कैफ़ी से शादी करूंगी वरना किसी से नहीं और वह ख़ून से लिखा हुआ ख़त अब्बाजान को दिखा दिया. (वह ख़त आज भी मेरे पास है.)

“21 मार्च,

शब,

एक बजे तुमको एक ख़त लिखकर लिफ़ाफ़ा बन्द किया और लेटा कि शायद सो जाऊं लेकिन नींद नहीं आई. फिर तुम्हारा ख़त पढ़ा और बेइख्तियार आंसू निकल आए.

शौकत, तुमको मुझ पर भरोसा नहीं, मेरी मोहब्बत पर एतबार नहीं ? यह मेरी बदनसीबी नहीं तो और क्या है? समझ में नहीं आता कि तुमको अपनी मोहब्बत का कैसे यकीन दिलाऊं. फिर एक बात समझ में आई. ब्लेड लेकर अपनी कलाई के ऊपर एक गहरा-सा जख़्म डाला और ख़ून से तुमको ख़त लिख रहा हूं. अब तक तुम्हारी मोहब्बत में आंसू बहाए थे, अब ख़ून, आगे-आगे देखिए होता है क्या?

मोती, मुझे बड़ा रंज है कि तुमने ये फ़िक़रे मुझे क्यों लिखे, “मैंने देखा, उसकी निगाहें मेरी तरफ़ नहीं हैं बल्कि वह और किसी निस्वानी पैकर को इशारा कर रहा है जो उसका मतलब नहीं समझ रही है या समझना नहीं चाहती.” शौकत, ये अल्फ़ाज़ वापस ले लो.

मेरी मोहब्बत की तौहीन न करो. अगर तुम मेरे लिए कुछ नहीं कर सकतीं तो न सही, मैंने तुमसे मोहब्बत जो की थी तो कौन-सी उम्मीद थी. मेरा और मेरी मोहब्बत का ख़ुदा मालिक है. रह गया यह कि मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं या नहीं और तुमसे शादी करुंगा या नहीं, यह तुम भी देख लोगी और दुनिया भी. मेरी शौकत मुझे बताओ कि मेरा और मेरी मोहब्बत का क्या हश्र होगा. मैं तुमसे इतनी दूर हूं कि तुमको मेरी हालत मालूम नहीं और दूसरे लोग जो कह दें तुम मान लेती हो. तुमको मेरी मजबूरियों पर तरस भी नहीं आता. कोई बात नागवार हो तो मुआफ़ कर देना.

बहुत-बहुत प्यार.

तुम्हारा कैफ़ी”

खत पढ़कर अब्बाजान मुस्कुराए (हम बहन-भाइयों का रिश्ता अब्बाजान से दोस्तों का-सा था), कहने लगे : “बेटे, ये शायर लोग बड़े रोमांटिक होते हैं. असली जिन्दगी और उनकी शायरी में बड़ा फ़र्क है. ये लिखेंगे कि मैं आपकी याद में पत्थरों से अपना सिर फोड़ रहा हूं और अपने ख़ून से ख़त लिख रहा हूं. हालांकि हकीक़त में वो एक दरख़्त के नीचे लेटे ठंडी-ठंडी हवा खा रहे होंगे और बकरी के ख़ून से ख़त लिख रहे होंगे. खैर, मैं आपको बम्बई ले चलूंगा. वहां आप अपनी आंखों से उनकी ज़िन्दगी देखिए और फिर फैसला कीजिए.

उधर कैफ़ी को मेरे ख़त नहीं मिल रहे थे. उनकी बुरी हालत थी. रोते-रोते बुरा हाल. पार्टी में सबको उन पर रहम आ गया, ख़ास तौर से कॉमरेड मिर्जा अशफ़ाक़ वेग को. जो वकील और पार्टी के होल टाइमर थे और इंग्लिश अख्बार ‘न्यू एज’ में काम करते थे. एक दिन लिखते-लिखते वो अपना कलम बन्द करके पी.सी. जोशी के पास गए जो उस वक़्त पार्टी के जनरल सेक्रेटरी थे. उनसे इजाज़त लेकर सीधे औरंगाबाद पहुंचे और अब्बाजान के दफ्तर में चपरासी को बताया कि वो सी.आई.डी. के आफ़िसर हैं और अब्बू जान से मिलना चाहते हैं. अब्बाजान ने फ़ौरन दफ़्तर में बुला लिया. फिर उन्होंने आहिस्ता-आहिस्ता अपनी असलियत बताई. मुझे कुछ पता नहीं कि क्या बातें हुई, सिर्फ इतना पता चला कि अब्बाजान अन्दर आए और मेरी मां से कहा कि खाना जरा अच्छा पकवाओ, मेरे एक अजीज मेहमान आए हुए हैं. यह तो मुझे बाद में पता चला कि मिर्जा अशफ़ाक़ बेग ने अब्बाजान को मेरी शादी कैफ़ी से करने के लिए राजी करके ही छोड़ा.


किताब का नामः याद की रहगुज़र

लेखकः शौकत कैफ़ी

प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

मूल्यः 185 रुपये (पेपरबैक)


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