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यह उपन्यास अश्लील है 'जीवन की तरह'- राही मासूम रज़ा

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15 मार्च 1992 को मशहूर लेखक और उपन्यासकार राही मासूम रज़ा का निधन हुआ था. ‘आधा गांव’, ‘टोपी शुक्ला’, ‘असंतोष के दिन’,  ‘दिल एक सादा कागज़’ और ‘ओस की बूंद’ उनके लिखे कुछ मशहूर उपन्यास हैं. राही मासूम रज़ा ने ही मशहूर टीवी  सीरीज़ महाभारत के लिए स्क्रिप्ट और डायलॉग लिखे थे. डॉक्टर राही मासूम रजा ने कई हिन्दी फिल्मों के लिए पटकथा और डायलॉग भी लिखे थे.


मुझे यह उपन्यास लिखकर कोई ख़ुशी नहीं हुई. क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है. परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूँ और मेरे ही जैसे और बहुत-से लोग भी हैं. हम लोगों में और टोपी में केवल एक अन्तर है. हम लोग कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी अवसर पर ‘कम्प्रोमाइज’ कर लेते हैं. और इसलिए हम लोग जी भी रहे हैं. टोपी कोई देवता या पैग़म्बर नहीं था. किन्तु उसने ‘कम्प्रोमाइज’ नहीं किया. और इसलिए उसने आत्महत्या कर ली. परन्तु ‘आधा गाँव’ ही की तरह यह किसी आदमी या कई आदमियों की कहानी नहीं है. यह कहानी भी समय की है. इस कहानी का हीरो भी समय है. समय के सिवा कोई इस लायक़ नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाए.

‘आधा गाॉव’ में बेशुमार गालियाँ थीं. मौलाना ‘टोपी शुक्ला’ में एक भी गाली नहीं है. परन्तु शायद यह पूरा उपन्यास एक गन्दी गाली है. और मैं यह गाली डंके की चोट पर बक रहा हूं. यह उपन्यास अश्लील है ‘जीवन की तरह’- राही मासूम रज़ा. आइए पढ़ते हैं राही मासूम रज़ा की किताबों के कुछ अंश-


 

पुस्तक अंश- आधा गाँव

वह बड़ा शरीफ लड़का था. आप उसे क्या जानें! वह तो कासिमाबाद के थाने पर गोली खाकर मर गया. मैं तो उस वक़्त यहां था नहीं. मगर सुना है कि वह बड़ी बहादुरी से मरा. यानी जब उसे यकीन हो गया कि वह मर रहा है तो वह मौत से डरकर रोया नहीं. कहते हैं कि उसने भागते हुए एक आदमी का दामन पकड़ लिया और कहा, ‘ए भैया, गंगउली जय्यहो तो कह दीहो हमरी अम्मा से, कि हम मर गये. ई दरद बहिनचोद हमरी जान ले लीहे.’ आप तो शायद इस जबान को समझे भी न होंगे, क्योंकि आप लोगों ने तो उर्दू को मुसलमान कर लिया है. मगर ख़ुदा की क़सम, जो ज़बान इस वक़्त मैं बोल रहा हूँ वह मेरी मादरी ज़बान नहीं है. मेरी मादरी ज़बान तो वही है जिसमें मुमताज ने अपनी माँ को पैगाम भेजा था. यह उर्दू बोलने पर तो हम्माद-दा पूरे गांव में नक्कू बने हुए हैं. पाकिस्तान बनने के बाद आप इस उर्दू को यहीं छोड़ जायेंगे या अपने साथ ले जायँगे? देखिये, मैं कोई सियासी आदमी नहीं हूं. लेकिन मैंने लड़ाई का मैदान देखा है. लड़ाई में मरने वाले बड़ी बेकसी की मौत मरते हैं. मारने वाला भी बडा बदसूरत हो जाता है. क्योंकि अपनी जान बचाने के लिए वह सामने वाले को दुश्मन मानने और उससे नफ़रत करने पर मजबूर होता है. मुमकिन है कि अगर उनमें से कोई मुझे यहां, गंगौली में मिलता तो मैं उसे सिग्रेट पिलाता, गन्ने का रस पिलाता, उसे अपने तालाब में नहाने की दावत देता और फ़िर रात को उसके लिए किसी ढोल की तरह खिंचे हुए पलंग पर नर्म और गर्म बिस्तर लगवाता और उससे उसके मुल्क की बातें करता… और उसे अपने मुल्क की बातें सुनाता. लेकिन वहां मैंने उसे मार डाला. क्योंकि अगर मैं उसे न मारता तो वह मुझे मार डालता. इसीलिए मैं डरता हूं. आप जान का डर पैदा कर रहे हैं. डर की यह फस्ल हमीं को काटनी पड़ेगी. इसीलिए मैं बहुत डरता हूं”

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राही मासूम रज़ा की किताब- आधा गांव

 

पुस्तक अंश- आधा गाँव

“धर्म संकट में है. गंगाजली उठाकर प्रतिज्ञा करो कि भारत की पवित्र भूमि को मुसलमानों के ख़ून से धोना है.” स्वामीजी जोश में आ चुके थे, “देखो, कलकत्ता और लाहौर और नवाखाली में इन मलेच्छ तुर्कों ने इमारी माताओं का कैसा अपमान किया है”

“बोलो बजरंगबली की…” एक अकेली आवाज़ उठी.

“जय !”  सारा गांव गूंज उठा.

फिर मजमा खड़ा हो गया. स्वामीजी अँधेरे में दूसरे गाँव की तरफ़ चले गये. और जब वह चले गये तो मजबूर होकर भीड़ को ख़ुद सोचना पड़ा. और उसने यह सोचा कि मुसलमान तो मुसलमान हैं. सलीमपर और बारिखपुऱ के मुसलमानों में बस इतना फ़र्क है कि सलीमपुर वाले जरा दूर हैं और बारिखपुरवाले पास. इसलिए ‘बंजरंगबली की जय’ बोलती हुई भीड़ बारिखपुर की तरफ़ चल पड़ी.

यह ख़बर जब ठाकुर जयपालसिंह को मिली तो वह घबरा गये. सलीमपुर के खान साहब पर धावा करना और बात थी और बारिखपुर के हज्ज़ामों,जुलाहों और दो-एक पठानों को कत्ल करना कुछ और इन लोगों ने उनका क्या बिगाड़ा था! ये तो हमेशा से उन्हीं के साथ जीते-मरते चले आ रहे थे.

“दुहाई है माई-बाप की!”  बफ़ाती आँगन में ढेर हो गया. न मालूम किस गाँव के कुछ हिंदू जवान उसके पीछे लपके चले आ रहे थे. वह ठाकर साहब को देखकर ठहर गये. उनमें से एक बीड़ी सुलगाने लगा. ठाकुर जयपालसिंह ने बफ़ाती को पहचान लिया. वह अपने बफ़ाती कुँजड़े को भला कैसे न पहचानते!

‘बोलो बजरंगबली की जय!’ नारे की आवाज़ कहीं क़रीब से आयी “के मरलस हो तोके?” जयपालसिंह ने बफ़ाती से पूछा. उनका बदन गुस्से से थर-थर कांप रहा था.

“हम ओह लोगन के ना पहचन्ते, सरकार!” बफ़ाती ने कहा.

मशालों की रोशनी ने रात में आग लगा दी थी. रात धांय-धांय जल रही थी.

पुस्तक लिंक – http://rajkamalprakashan.com/raj/best-seller/aadha-gaon


 

पुस्तक अंश- टोपी शुक्ला

देखिए बात यह है कि पहले ख़्वाब केवल तीन तरह के होते थे- बच्चों का ख़्वाब, जवानों का ख़्वाब और बूढ़ों का ख़्वाब. फिर ख़्वाबों की इस फेहरिस्त में आज़ादी के ख़्वाब भी शामिल हो गए. और फिर ख़्वाबो की दुनिया में बड़ा घपला हुआ. माता-पिता के ख़्वाब बेटे-बेटियों के ख़्वाबों से टकराने लगे. पिताजी बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते हैं, और बेटा कम्युनिस्ट पार्टी का होल टाइमर बनकर बैठ जाता है. केवल यही घपला नहीं हुआ. बरसाती कीड़ों की तरह भांति-भांति के ख़्वाब निकल आए. क्लर्कों के ख़्वा. मजदूरों के ख़्वाब. मिल-मालिकों के ख़्वाब. फिल्म स्टार बनने के ख़्वाब. हिन्दी ख़्वाब. उर्दू ख़्वाब. हिन्दुस्तानी ख़्वाब. पाकिस्तानी ख़्वाब. हिन्दू ख़्वाब.  मुसलमान ख़्वाब. सारा देश ख़्वाबों की दलदल में फंस गया. बच्चों, नौजवानों और बूढ़ों के ख़्वाब ख़्वाबों की धक्कमपेल में तितर-बितर हो गए. हिन्दू बच्चों, हिन्दू बूढ़ों और हिन्दू नौजवानों के ख़्वाब मुसलमान बच्चों, मुसलमान बूढ़ों और मुसलमान नौजवानों के ख़्वाबों से अलग हो गए. ख़्वाब बंगाली, पंजाबी और उत्तर प्रदेशी हो गए.

राही मासूम रज़ा की किताब- टोपी शुक्ला
राही मासूम रज़ा की किताब- टोपी शुक्ला

लाश!

यह शब्द कितना घिनौना है! आदमी अपनी मौत से, अपने घर में, अपने बाल-बच्चों के सामने मरता है तब भी बिना आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं और आदमी सड़क पर किसी बलवाई के हाथों मारा जाता है, तब भी बिना आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं. भाषा कितनी ग़रीब होती है! शब्दों का कैसा ज़बरदस्त काल है! कितनी शर्म की बात है कि हम घर पर मरनेवाले और बलवे में मारे जानेवाले में फ़र्क नहीं कर सकते, जबकि घर पर केवल एक व्यक्ति मरता है और बलवाइयों के हाथों परम्परा मरती है, सभ्यता मरती है, इतिहास मरता है. कबीर की राम की बहुरिया मरती है. जायसी की पद्मावती मरती है. कुतुबन की मृगावती मरती है, सूर की राधा मरती है. वारिस की हीर मरती है. तुलसी के राम मरते हैं. अनीस के हुसैन मरते हैं. कोई लाशों के इस अम्बार को नहीं देखता. हम लाशें गिनते हैं. सात आदमी मरें. चौदह दूकान लुटीं. दो घरों में आग लगा दी गई. जैसे कि घर, दूकान और आदमी केवल शब्द हैं जिन्हें शब्दकोशों से निकालकर वातावरण में मंडराने के लिए छोड़ दिया गया हो!

पुस्तक लिंक : http://rajkamalprakashan.com/raj/topi-shukla


पुस्तक अंश- असंतोष के दिन

मुसलमानों के पास कोई क्षेत्रीय पहचान नहीं. हमारी राष्ट्रीय राजनीति भी मुसलमान को केवल एक धार्मिक पहचान देती है. वह अब मराठी, पंजाबी, कर्णाटकी, आंध्री, गुजराती नहीं माना जाता, वह केवल मुसलमान है. राजनीति चाहे दाएं हाथ की हो चाहे बाएँ हाथ की. कोई मुसलमान को उसकी क्षेत्रीय पहचान देने को तैयार नहीं है. चुनाव के दिनों में चुनाव का नक्शा बनता है, वोटरों की खानाबन्दी होती है तो मुसलमान का खाना अलग बनता है. उत्तरी बम्बई में इतने गुजराती, इतने मराठी, इतने सिन्धी, इतने पंजाबी, इतने तमिल और इतने मुसलमान.

मुसलमान एक कटी हुई पतंग की तरह सारे भारत में डग मार रहा है और कटी हुई पतंग तो लूटी ही जाती है! जिसके हाथ जितनी डोर लग जाए.

“क्योंकि वह मेरा घर भी है. ‘क्योंकि’ -यह शब्द कितना मजबूत है और इस तरह के हज़ारों-हज़ार ‘क्योंकि’ और हैं और कोई तलवार इतनी तेज़ नहीं हो सकती कि इस ‘क्योंकि’ को काट दे! और जब तक यह क्योंकि ज़िंदा है, मैं सय्यद मासूम रज़ा आब्दी गाज़ीपुर ही का रहूँगा, चाहे मेरे दादा कहीं के रहे हों”- राही मासूम रज़ा (आधा गाँव की भूमिका से)

राही मासूम रज़ा की किताब- असंतोष के दिन
राही मासूम रज़ा की किताब- असंतोष के दिन

पुस्तक लिंक: http://rajkamalprakashan.com/raj/asantosh-ke-din-1149

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