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चमत्कारों को मानने वाले लोग धर्म की ओर क्यों जाते हैं?

यह अंश नरेंद्र दाभोलकर की किताब अंधविश्वास उन्मूलन के पहले भाग विचार से लिया गया है. इसके दूसरे और तीसरे भाग आचार और सिद्धांत हैं. यह किताब राजकमल प्रकाशन के उपक्रम सार्थक से प्रकाशित है. नरेंद्र दाभोलकर की नई किताब  भ्रम और निरसन भी राजकमल प्रकाशन के उपक्रम सार्थक से जल्द ही प्रकाशित होने वाली है.


 

अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं. निरंतर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह. अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धांत जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है. भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नजर आता है. अन्धविश्वास उन्मूलन : आचार पुस्तक में धर्म के नाम पर कर्मकांड और पाखंडों के खिलाफ आन्दोलन, जन-जाग्रति कार्यक्रम और भंडाफोड़ जैसे प्रयासों का ब्योरा है. पुस्तक में भूत से साक्षात्कार कराने का पर्दाफाश, ओझाओं की पोल खोलती घटनाएं, मंदिर में जाग्रत देवता और गणेश देवता के दूध पीने के चमत्कार के विवरण पठनीय तो हैं ही, उनसे देखने, सोचने और समझने की पुख्ता जमीन भी उजागर होती है. निस्संदेह अपने विषयों के नवीन विश्लेषण से यह पुस्तक पाठकों में अहम् भूमिका निभाने जैसी है. अन्धविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की और ले जानेवाली यह पुस्तक परंपरा का तिमिर-भेद तो है ही, विज्ञान का लक्ष्य भी है.


लेखक परिचय 

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर

शिक्षा: एम.बी.बी.एस.

कार्य-संघर्ष व उपलब्धि: सन् 1982 में अंधविश्वास उन्मूलन कार्य का प्रारंभ. 1989 में महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना. आजन्म समिति के कार्याध्यक्ष रहे. महाराष्ट्र में समिति की 180 शाखाएं कार्यरत हैं.

अंधविश्वास उन्मूलन विषय पर दर्जन-भर पुस्तकों का लेखन. पुस्तकों के निरंतर नए संस्करण प्रकाशित. पुस्तकों को अनेक पुरस्कार. पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन करते रहे और मीडिया में प्रतिक्रिया, प्रतिवाद, साक्षात्कार, संवाद लगातार प्रकाशित होते रहे. बुवाबाजी, भानमति, चमत्कार, ज्योतिष, अनिष्ट रूढ़ि-परंपरा के खिलाफ निरंतर संघर्ष. विवेकवादी विचारों का प्रचार-प्रसार कार्य. विज्ञाननिष्ठ समाज-निर्माण का रचनात्मक कार्य. बारह वर्ष तक मराठी साप्ताहिक ‘साधना’ का संपादन. सन् 2006 में ‘दशक श्रेष्ठ कार्यकर्ता’ का महाराष्ट्र फाउंडेशन का सम्मान. सम्मान के रूप में दस लाख रुपये एवं गौरवचिह्न. पुरस्कार की राशि महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति को समर्पित. 20 अगस्त, 2013 को अज्ञात तत्त्वों द्वारा गोली मारकर हत्या. हत्या के तुरंत बाद उनकी बरसों विलंबित मांग की पूर्ति के रूप में महाराष्ट्र अंधविश्वास उन्मूलन कानून पारित. ऐसा कानून पारित करनेवाला महाराष्ट्र देश का सर्वप्रथम राज्य. समग्र जीवन संघर्षशील. भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत ‘पद्मश्री’ से सम्मानित.


पुस्तक अंश: अंधविश्वास उन्मूलन पहला भाग: विचार 

बुवाबाजी के विरुद्ध संघर्ष क्यों?

ढकोसलों को जीवन में स्थान देने का मतलब अंधविश्वास के खतरे को मोल लेना है. जहाँ पर प्रत्यक्ष शोषण होता है, वहाँ पर लोग इस बात को मानते हैं. आज भी गाँवों के लोग काला जादू, भानमती के विषय को लेकर एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते हैं. खूनखराबा होता है. हजारों रुपयों की क्षति भी होती है. इसे रोकना जरूरी हो गया है. देश में स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं की बहुत कमी है. इसके विरुद्ध आवाज उठाने की बजाय लोग दैवी इलाजों के जरिए अपना शारीरिक और मानसिक नुकसान तो कर ही लेते हैं, साथ ही समाज में एक गलत संदेश भी पहुँचाते हैं. मानसिक बीमारियों के कारण तो और भी गंभीर हालात पैदा होते हैं. ‘मन बीमार होता है’ की बात देश के लोग हजम नहीं कर पाते और व्यक्ति के ‘विचित्र व्यवहार’ को ‘बाहर की पीड़ा’ समझा जाता है. स्वाभाविक रूप से इस पीड़ा का इलाज बाबा, बुवा और गुरु के पास ही किया जाता है. अमूल्य समय, बुद्धि, पैसा एवं स्वास्थ्य तक की बरबादी हो जाती है. मरीज ठीक होने की बजाय और बीमार हो जाता है. जीवन की निरर्थकता की भावना से पीड़ित महिलाएँ बाबा के भुलावे में आ जाती हैं. परिणामस्वरूप उनके चरित्र पर आँच आ जाती है. ढकोसले के कारण पहले ही अंधविश्वासी बना मन और भी बौरा जाता है. प्रारब्ध, नियति, दैवी दंड जैसी कल्पनाओं का प्रभाव सामाजिक जीवन पर गहराई से पड़ता है. ‘गुनाहों का देवता’ बने बाबा की व्यवस्था में संचित धन, सत्ता, जनसंचार माध्यम एवं गुंडों का आतंक स्वस्थ सामाजिक जीवन को हानि पहुँचाता है. राजनीतिक एवं सामाजिक प्रतिनिधि जब बाबा को साष्टांग नमस्कार करते हैं तब जनतंत्र ही धोखे में आ जाता है. यह यथार्थ है और इससे जो मानसिक गुलामी फैलती है, वह अधिक गंभीर समस्या बनती है.

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प्रत्येक बाबा, गुरु, स्वामी अपने अनुयायी को आश्वस्त करते हैं कि ‘तुम्हारी भलाई किस बात में है, यह तुम नहीं, मैं जानता हूँ. बिना आशंका के मेरी शरण में आ जाओ. मुझ पर श्रद्धा रखो, सब कुछ ठीक हो जाएगा.’ ऐसा आश्वासन हर व्यक्ति को अपने बचपन में माता-पिता से मिलता है क्योंकि सभी स्तरों पर वह उन पर ही निर्भर होता है. जैसे वह बड़ा होने लगता है, वैसे आत्मनिर्भर बनने लगता है. प्रगल्भ होने पर भी अगर वह जीवन के फैसले दूसरों के विचारों से लेने लगे तो फिर यही मानना पड़ेगा कि उसकी अब तक की परवरिश में कुछ कमी रह गई है. इस तर्क के आधार पर कह सकते हैं कि जो गुरु अपने शिष्य को दृष्टि देता है, उसे अपने पैरों पर खड़ा करता है, जीवन में संकटों का सामना करने की हिम्मत देता है, वह सच्चा नि:स्वार्थी गुरु होता है. लेकिन जो गुरु भक्त के जीवन की सार्वकालिक जिम्मेदारियाँ लेने का दावा करता है, वह भक्तों को कमजोर बना देता है. उसे मानसिक पंगु बना देता है. इसका एक कारण गुरु-महिमा का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन भी है. ‘गुरु शिष्य की आशंकाओं को मूल से ही नष्ट कर देता है. उसके भय को दूर भगा देता है. उसे जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त करता है. ऐसे गुरु के दर्शनमात्र से ही वासना एवं विकार छूट जाते हैं और अक्षय आनंद मिलता है.’ लेकिन यह सब गुरु करता कैसे है? इस प्रश्न के उत्तर में तीन मार्ग बताए जाते हैं : (1) ध्यान, प्राणायाम, मंत्र जैसे आध्यात्मिक मार्ग, (2) बौद्धिक स्तर पर सत्संग, (3) गुरु की इच्छाशक्ति एवं उसके आस-पास का वलय, गुरु से निर्मित होनेवाले दैवी स्पंदन आदि. इसमें सच क्या है? व्यक्ति हर रोज, हर पल आर्थिक, सामाजिक,शारीरिक शोषण का सामना करता है. वहाँ पर योग, ध्यान और मंत्र कुछ काम नहीं आते. शायद उनसे मन को कुछ क्षणों तक शांति मिले लेकिन दुख का निवारण नहीं होता. कथित गुरु, स्वामी एवं बाबा के सत्संग के विचार असंगत एवं अशास्त्रीय होते हैं. उनके आस-पास कोई दैवी वलय, कोई स्पंदन नहीं होता जो लोगों की बीमारियाँ ठीक कर सके. स्पष्टत: ऐसे निरर्थक विचारों को फैलाना साधुत्व का ढोंग है.

बुवा और बाबा के संदर्भ में अध्ययन करने पर कौन सा चित्र सामने आता है? इस देश में संत-महात्माओं ने धर्म के माध्यम से मानवता एवं करुणा का मार्ग बताया और कृति भी की. बुवा, बाबा, गुरु, संत साहित्य का उपयोग अपनी सुविधा के लिए करते हैं. मुँह से संतों की वाणी का खुश्क उच्चारण करनेवाले ये लोग बड़े मतलबी और आत्मकेंद्रित होते हैं. उनका रहन-सहन मानो व्यक्ति की महिमा बढ़ानेवाला तंत्र ही होता है. बाबा के भक्त विशिष्ट रंगों के वस्त्र पहनते हैं. गले में मालाएँ पहनते हैं. सीने पर गुरु की छविवाला बिल्ला लटकाकर घूमते हैं. जेब में लटकी कलम पर भी बाबा का फोटो होता है. गुरु इन लोगों को जो छोटा-मोटा मंत्र देते हैं, उन्हें वह जीवन का उद्धार करनेवाले सांकेतिक वचन लगता है. यह माहौल लोगों में एकता का निर्माण करता है. उसमें संतोष एवं सामर्थ्य होता है. धीरे-धीरे भक्त इस माहौल के आदी हो जाते हैं. एकाध इस माहौल से थोड़ा बाहर जाने की कोशिश करता है तो उसे चौखट से बाहर न झाँकने की हिदायत दी जाती है. यह सब कुछ एक खुफिया माहौल तैयार करता है. बाबा या साधु आश्रम में रहते हैं. आश्रम चाहे नरेंद्र महाराज का हो या स्वयं को भगवान माननेवाले ओशो का, प्रक्रिया समान ही होती है. इस प्रक्रिया में अटके लोगों को एकमात्र भक्ति ही जीवन का अंतिम कर्तव्य लगती है. गुरु का विरोध करना महापाप समझा जाता है. विरोधी दुर्जन लगते हैं और उनका सर्वनाश पुण्य का काम माना जाता है. गुरु के अनुग्रह से जीवन का कल्याण होगा और संसाररूपी भवसागर को पार किया जा सकेगा, ऐसे संदेश भक्तों के मन पर कुरेदे जाते हैं. तब भक्त एक कट्टर सैनिक बन जाता है. गुरुगीरी के ढकोसले मानो अभेद्य चक्रव्यूह बन जाते हैं. इसे मजबूत बनाने के लिए निरंतर ब्रेन वाशिंग एवं कंडिशनिंग जारी रहती है. भक्त सम्मोहित होते हैं. ऐसी अवस्था में उनकी चौकन्नी वृत्ति शिथिल हो जाती है. गुरु, बाबा पर तीव्र भक्ति और प्रीति के कारण सम्मोहन की अवस्था में भक्त शीघ्र ही पहुँचते हैं. संवेदनाओं के भ्रम तैयार होते हैं. आस-पास कुछ न होते हुए भी चंदन की खुशबू आने लगती है. देवताओं के मधुर स्वर कानों में गूँजने लगते हैं. भाग्यवान भक्तों को अपने महाराज के रूप में देवता के दर्शन होते हैं. दैवी साक्षात्कार का गवाह बनने का पुण्यलाभ होता है. बाबा के शब्द मानो मोक्ष का मार्ग खोल देते हैं. मंत्रमुग्ध कर देनेवाले वातावरण में तल्लीन हुए भक्तों से एक ही संदेश मिलता है, ‘हमारे जीवन की पूरी जिम्मेदारी बाबा ने ली है, यह भाग्य खुल जाने का संकेत है. जीवन की सारी चिंताएँ मिट गई हैं. सुख, शांति, संतोष, संपन्नता के महाद्वार खुलनेवाले हैं. बाबा के आशीर्वाद से हमें एक ही समय में भौतिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक, पारलौकिक अधिकार प्राप्त हो गए हैं.’

यह मानसिकता एक गूढ़ वातावरण तैयार करती है जिसमें मनुष्य प्रश्नों को सुलझाने के लिए जरूरी विवेक खो देता है. वह अपनी और समाज की बुद्धि, श्रम और समय को मुफ्त गँवा देता है.

अंनिस चमत्कारों का विरोध करती है. क्योंकि वे उपर्युक्त मानसिकता के निर्माण में कलियुग का नारद बनते हैं, ऐसे भक्तों को विवेकानंद का उदाहरण देना चाहिए. अमेरिकन अखबारों ने विवेकानंद से चमत्कार दिखाने की विनती की. उसका इनकार करते हुए विवेकानंद दहाड़े, ‘मैं कोई चमत्कार दिखानेवाला जादूगर नहीं. पंचेंद्रियों को अजब लगनेवाली घटनाएँ घटती रहती हैं जो प्रकृति के नियमानुसार होती हैं. मंत्रमुग्ध मन की समझ में ये खेल नहीं आते. लेकिन सुशील लोग ऐसे झमेलों में नहीं पड़ते.’

ढकोसले और चमत्कारों का शिकार बना मन मानसिक गुलामी को जन्म देता है. भारतीय समाज की रचना अथवा व्यवस्था मूलत: दैववाद की बुनियाद पर खड़ी है. कोई भी छोटा-बड़ा संकट उनके लिए भाग्य का फेर होता है. लोग मानते हैं कि दैवी शक्ति को प्राप्त किए बाबा हमें संकटों से मुक्ति दिलाएँगे. समस्याओं का मुकाबला करने की बजाय चमत्कार के अंधविश्वासी लोग ढकोसले की ओर मुड़ते हैं. हमारा समाज ईश्वर, अनिष्ट रूढ़ियाँ, कर्मकांड जैसे अंधविश्वास के चक्रव्यूह में फँसा हुआ है. इसीलिए वह संवेदनाशून्य एवं डरपोक बन गया है. आत्मविश्वास के साथ, प्रयत्नों के साथ एकाध समस्या का सामना करना अथवा साहस से किसी कर्तव्य को पूरा करना इन लोगों के बस में नहीं होता. कठिन यथार्थ से डरकर लोग अपनी बुद्धि और स्वाभिमान को ओझा-गुनी या बाबा के पास गिरवी रख देते हैं. बाबा का प्रभावी हथियार चमत्कार ही होता है. इसीलिए समाज को स्वाभिमानी, प्रयत्नवादी एवं निडर बनाने के लिए उनके चमत्कारों का विरोध करना जरूरी है.

धर्म और परंपरा की मान्यता है कि यह चमत्कार सिद्धि के कारण संभव होते हैं. ऐसी सिद्धि बाबा को उनकी शक्ति से प्राप्त होती है, लेकिन हमारी धर्म-परंपरा यह भी कहती है कि इन सिद्धियों के मोहजाल में नहीं फँसना चाहिए, उनकी उपासना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह बहुत क्षुद्र होती है. संत-महात्माओं ने भी बहुत बार सचेत किया है कि सिद्धि-चमत्कार के मायाजाल में जो फँस जाएगा, उसकी अवनति होगी. जिनके मन में सच्चा धर्मभाव है, वे हमेशा से ही चमत्कार के विरोधी रहे हैं. संत साहित्य ने हमेशा ही ऐसे लोगों को दुत्कारा है. जो चमत्कारों के जरिए शिष्यों की भीड़ जमा करते हैं, ऐसे चमत्कार करनेवाले गुरु से दूर रहने के लिए कहा गया है. पल भर के लिए मान लेते हैं कि हाथ से सोने की अँगूठी अथवा चेन निकालनेवाले सत्य साईं बाबा के पास अद्भुत शक्ति थी तो यह प्रश्न हम पूछ सकते हैं कि आर्थिक समस्याओं से घिरे अपने देश के लिए उन्होंने क्या किया? एकाध वर्ष बारिश न होने के कारण अकाल पड़ जाता है. कभी अधिक बारिश होने से बाढ़ आती है, ऐसे समय बाबा अपना चमत्कार क्यों नहीं दिखाते? अकाल पड़ने पर बारिश लाना और बाढ़ आने पर उसे रोक देने का चमत्कार क्यों नहीं किया जाता है? अपनी इस दैवी शक्ति का उपयोग वे कभी भी लोककल्याण अथवा समाजहित के लिए नहीं करते; अर्थात् ऐसी कोई क्षमता इन बाबाओं में नहीं होती है. ऐसे लोगों से दूर रहना ही अक्लमंदी है क्योंकि धर्म के आचरण से इनका कोई संबंध नहीं.

चमत्कारों को माननेवाले लोग धर्म की ओर क्यों जाते हैं? वे वासना और स्वार्थ का त्याग करने के लिए नहीं जाते. उदात्त और पवित्र होने के लिए भी वे नहीं जाते; बल्कि उन्हें किसी लाभ की आवश्यकता होती है. किसी को नौकरी की इच्छा होती है, किसी को नौकरी में पदोन्नति की इच्छा होती है. कोई काले धंधे से निर्दोष छूटना चाहता है. अपने दुष्कृत्यों की टीस लोगों के मन में हमेशा बनी रहती है. पाप के कारण होनेवाले लाभ का त्याग नहीं किया जाता, लेकिन विवेकबुद्धि की टीस से मुक्त होने के लिए लोगों को बाबा और बुवा के पास जाना आसान और सुरक्षित लगता है. अपनी दैवी शक्ति का करिश्मा दिखानेवाले बाबा तथा उच्च आध्यात्मिक उद्घोषणा करनेवाले बाबा लोगों के अधिक समीप होते हैं. यह मानना गलत है कि धार्मिक प्रवृत्ति के लोग ढकोसले के पीछे चलते हैं. इसके विरुद्ध नैतिकता की दृष्टि से अधार्मिक भक्त अपनी भ्रष्टता को सुरक्षित रखने के लिए बाबा या साधुओं के पीछे पड़ते हैं. इस प्रकार भ्रष्ट मानसिकता का ढकोसले के माध्यम से पोषण होता है.

भारतीय संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि ‘प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शोधक बुद्धि, सुधारवाद एवं मानवतावाद का प्रसार करे.’ वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ यह विश्वास होता है कि समूचा विश्व कार्य-कारण भाव से बद्ध है. शोधक बुद्धि का अर्थ सजग दृष्टि से यथार्थ की ओर देखना है, अथवा उसके लिए प्रयत्न करना है. सुधारवाद का अर्थ है, जो परंपरा से हो रहा है, उसका आधुनिक दृष्टि से जायजा लेकर उसमें निहित वैयक्तिक और सामाजिक हित जैसी बातों का चयन करना. मानवतावाद का अर्थ बंधुत्व की वैश्विक भावना है. भारतीय संविधान का बताया हुआ यह कर्तव्य और ढकोसले के कारण पनपी मानसिकता एक-दूसरे से असंगत है. इसका अर्थ यह है कि ढकोसले की शरण में जानेवाला मन अपने संवैधानिक कर्तव्य को टालता है.

बाबा और बुवा के ढकोसलों के साधन बने चमत्कारों का विरोध करने पर उनके समर्थकों को संत-महात्माओं के किए चमत्कार याद आते हैं. सैकड़ों वर्ष पूर्व जो बातें हुईं, उनका कोई प्रमाण आज उपलब्ध नहीं है, इसीलिए उनकी शास्त्रीय जाँच-पड़ताल भी असंभव है. ऐसे चमत्कारों के संदर्भ में उन्हें ‘सत्य’ समझकर महत्त्व देना असंगत है. ऐसा समझनेवालों को निम्नलिखित विचारों पर गौर करना चाहिए.
आधुनिक काल के संत तुकडोजी महाराज ने चमत्कारों के दुष्परिणामों को बताने की कोशिश इन शब्दों में की है :

चमत्कारों के पीछे पड़कर, अनेक हो गए हैं बरबाद, हे सज्जनो,
अब न करो किसी चमत्कार का वर्णन. गाँव में आकर,
भोले-भाले लोगों के पीछे पड़कर, ये ढोंगी इन्हें लूटते हैं.
लोग प्रयत्नों का मार्ग छोड़ते हैं. थोड़े में लाभ चाहते हैं.
चमत्कारियों के भुलावे में आकर अनेक हो गए हैं बरबाद!

चमत्कारों पर विश्वास करना और उसे प्रेरित करनेवाले बाबा एवं बुवा को सराहने में नुकसान यही है कि लोग प्रयत्न और पुरुषार्थ से विश्वास खो बैठते हैं. वे दूसरों की हालत भी ऐसी ही बनाते हैं. चमत्कारों के संदर्भ में यह पलायनवादी भूमिका बिलकुल स्पष्ट नजर आती है. चमत्कारों से व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में केवल नुकसान ही होता है. ऐसी परिस्थिति में चमत्कारों को साबित करने की जिम्मेदारी, उसके दावेदार बुवा-बाबा पर ही सौंपनी चाहिए. तब भारतीय संविधान द्वारा बताया हुआ वैज्ञानिक दृष्टिकोण बिलकुल आसानी से सामान्य जनता समझ पाएगी. तभी यह समझ में आएगा कि कार्य-कारण भाव को छोड़कर कोई चमत्कार नहीं होता. चमत्कारों के जरिए साधुत्व का ढोंग करनेवाले, गुरुगीरी रचानेवालों को भी झटका लगेगा. लोगों की वर्तमान ढकोसलों को माननेवाली प्रवृत्ति चिंताजनक है. विडंबना यह है कि आडंबर एवं ढकोसलों को चुनौती देनेवाली महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति को ही अपराधियों के कठघरे में खड़ा किया जाता है. ऐसे में फिर अंधविश्वास उखाड़ने के लिए कानून बनाने की बात लोगों को नहीं जँचती.

मनुष्य का सबसे करारा शस्त्र उसकी बुद्धि है. मानवीय संस्कृति का विकास उसकी प्रज्ञा के विकास से संबद्ध रहा है. ‘बुद्धि से जाँच लूँगा और साबित होने पर ही मान लूँगा’—यह शास्त्रीय दृष्टिकोण की प्रतिज्ञा होती है. उस प्रतिज्ञा को भुलाकर ही चमत्कारों पर विश्वास किया जा सकता है. चमत्कारों को स्वीकार करना मानसिक गुलामी की शुरुआत होती है. ढकोसले के कारण यह गुलामी और भी मजबूत होती है. एक उदाहरण के जरिए यह स्पष्ट हो जाएगा कि ढकोसलों को माननेवाले लोगों के विचार कितने मजेदार हैं :

तरडगाँव, जि. सतारा (महाराष्ट्र) में रहनेवाला विलासबाबा पानी से आग जलाकर यज्ञ करता था. सिक्कों से विभूति पैदा करता था. उसके इस चमत्कार को सरेआम घोषित करने के लिए हमने उसके विरोध में उसके ही गाँव में सभा का आयोजन किया. भारी भीड़ जमा हो गई. हमने चमत्कारों के प्रयोग शुरू किए. पानी से आग जलाई, सिक्कों से विभूति निकाली. अन्य चमत्कारों की ओर मुड़ने से पहले ही विलासबाबा के पचासों भक्त मंच पर दौड़ते आ गए और चिल्लाए, ‘आप जो कर रहे हैं, वे मामूली प्रयोग हैं. रासायनिक पदार्थों का थोड़ा-सा ज्ञान रखनेवाले स्कूल के बच्चे भी ये प्रयोग कर सकते हैं. विलासबाबा की बात अलग है, उनके चमत्कार दैवी शक्ति के कारण होते हैं.’

ऐसा स्पष्टीकरण आगे की बात को अपने आप स्पष्ट करता है.

सत्य साईं बाबा एवं अन्य ऐसे बाबाओं-महाराजों की अपेक्षा जादूगर सौ गुना प्रभावी चमत्कार दिखाते हैं, लेकिन इस वजह से कोई उन्हें महाराज समझकर उनके पैर नहीं छूता. जीवन के प्रश्नों का उत्तर उनसे कोई नहीं पूछता. जादूगर मनोरंजन करनेवाला कलाकार होता है. उसके चमत्कार ही उसकी कला का आविष्कार होते हैं. लेकिन चमत्कार करनेवाले बाबा एवं बुवा की बात ही अलग होती है. खाली हैट से जिंदा खरगोश निकालनेवाले जादूगर के पापी पेट का सवाल होता है. लेकिन अपने ही खाली हाथ से थोड़ी विभूति निकालनेवाला बाबा परम पूजनीय होता है. बाबा के दिए हुए चुटकी भर भस्म से जीवन की मनोकामनाएँ पूरी हो जाएँगी, ऐसा भ्रम भक्त अपने मन में पालते हैं. कोर्ट में मुकदमे का सामना करते समय अपराधी के कठघरे में खड़ा भक्त बाबा की विभूति लेकर खड़ा रहता है. इधर-उधर देखकर चुपचाप पलक झपकते उस विभूति को फँूक देता है. उसका मन कहता है कि विभूति के दो कणों के फरियादी के गवाह तक पहुँचने से उसकी गवाही अपने पक्ष में आ जाएगी. दो कण वकील तक पहुँच जाएँ तो उसका विरोध अथवा प्रतिवाद प्रभावी नहीं रहेगा और बाबा के पावन स्पर्श से प्राप्त उस विभूति का एक कण भी जज तक पहुँचेगा तब तो वह केस ही जीत जाएगा. लेकिन इन सभी खयालों का प्रमाण क्या है? एकाध व्यक्ति अच्छा भाषण देता है, इसका मतलब यह नहीं कि वह अच्छा गाना गाता है अथवा नृत्य करता है. ऐसा कहना जितना निरर्थक है, उतनी ही अर्थशून्यता भस्म को दैवी शक्ति का प्रतीक मानने में है. लेकिन इन प्रश्नों को पूछना मना है क्योंकि ढकोसलों के प्रभाव से बनी मानसिक गुलामी मनुष्य की बुद्धि को पंगु, कमजोर और अंधा बना देती है. इसकी गिरफ्त में आए मनुष्य का व्यक्तित्व टूट जाता है. वह बुवा, बाबा, स्वामी और गुरु की अलौकिक शक्ति के हाथ में अपने आपको सौंप देता है. मनुष्य जीवन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बुद्धि-वैभव, निर्णय-क्षमता, विवेकी विचारों की क्षमता ढकोसले के पास गिरवी पड़ जाते हैं. व्यक्ति पराश्रित बन जाता है. आखिरकार परिवर्तन की लड़ाई बहुत कठिन बन जाती है. कोई भी बाबा अथवा बुवा समाज-व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन की बात नहीं करता. स्वयं की शरण में भक्त आ जाए, ऐसा आदेश देता है. वह भक्तों के कल्याण का मार्ग बताता है. भक्तों के लिए बाबा का शब्द ब्रह्मवाक्य और नैतिक होता है. विरोध में बोलनेवालों के लिए धमकी से लेकर मारपीट तक के मार्ग अपनाए जाते हैं. अपने आश्रितों को उनके कल्याण का आश्वासन दिया जाता है. उनके लिए सिर्फ एक शर्त रखी जाती है कि वे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल न करें. इस प्रकार ढकोसले के सभी पंथ, उपपंथ फासीवाद के लिए अनुकूल आधार निर्मित करते हैं.

ढकोसले के विरुद्ध संघर्ष महाराष्ट्र में कोई नई बात नहीं है. सन् 1935 में महाराष्ट्र में किर्लोस्कर मासिक बहुत चर्चित हो गया था. उसके जरिए ढकोसले के विरुद्ध ‘ढकोसले का सर्वनाश’ संघ स्थापित किया गया. उस संघ के सदस्यों को दिए जानेवाले प्रवेश पत्रक का नमूना ऐसा था—’मेरे समाज में बुवा एवं महाराज के पीछे दीवाने स्त्री-पुरुषों की संख्या बहुत है. ये बुवा जल्द ही बुवाशाही को पैदा करते हैं जो मनुष्य को निष्क्रिय बनाता है. लोग बुवा की कृपा से सब कुछ प्राप्त करने की होड़ में शामिल होते हैं, जबकि बुवाशाही समाज एवं राष्ट्र की उन्नति में बाधा बन जाती है. वह पूरी तरह से नष्ट हो जाए, ऐसा मेरा मानना है, इसीलिए मैं इस संघ का सदस्य बनने जा रहा हूँ.’

मनुष्य और पशु में आहार, निद्रा, भय और मैथुन की प्रेरणाएँ समान हैं. मनुष्य के पास पशु से अधिक बुद्धि नामक प्राकृतिक देन है, जिसे हम विवेक कहते हैं. यह मनुष्य को भले-बुरे का ज्ञान देता है. लेकिन ढकोसले में अटका व्यक्ति स्वयं ही अपनी बुद्धि की हत्या करता है, उसमें और पशु में कोई अंतर नहीं रह जाता. ‘मुद्राराक्षस’ नाटक में आर्य चाणक्य ने कहा है, कि ‘मेरे सगे-संबंधी चले गए, लोभी बनकर आए लोग चले गए, सैनिक गए, धन गया, कोई परवाह नहीं, लेकिन मेरी बुद्धि मुझे धोखा न दे.’ हमारे देश में धर्म और समाज के क्षेत्र में बौद्धिक गुलामी अधिक थी और आज भी उतनी ही है. परंपरा से चली आ रही चीज ठीक है, उसके संदर्भ में तथा अन्य बातों के संदर्भ में आशंका न हो फिर सुधार की बात क्या खाक की जा सकती है? कोई भी परिवर्तन ईश्वर के अवतार से ही होगा, ऐसी अवतारवाद की भावना समाज में दृढ़ है. इसीलिए अपनी करनी से ही कुछ प्राप्त करने की बजाय स्वतंत्र प्रज्ञा को त्यागकर किसी विभूति की शरण में जाने का ऐब समाज में व्याप्त है. ऐसी विभूतियाँ बुवा, स्वामी, गुरु के रूप में मौजूद हैं. लोग भी अपने परिवार एवं राष्ट्र को उपेक्षित रखकर अपना तन-मन बाबा के पास गिरवी रखते हैं. बाबा-बुवा और उनकी बिरादरी में बुद्धि-हत्या की ऐसीे फैक्टरियाँ खुली हुई हैं. उससे समाज कैसे बचेगा, यह एक सामाजिक प्रश्न है. बहुसंख्य बाबा बताते हैं कि जग मिथ्या है, माया है, क्षणिक है, तो फिर समाज के प्रति जिज्ञासा रखकर क्या होगा? ऐसे में अपने आप निरर्थकता की मानसिकता बढ़ती है; साहस और उत्साह शेष नहीं रहता; दैववाद और अंधविश्वास का बोलबाला रहता है. अन्याय के प्रति चिढ़, प्रतिकार करने की तीव्र इच्छा, परिवर्तन की पुरुषार्थी वृत्ति ढकोसले की बुनियाद को खोखला कर सकती है लेकिन समाज ढकोसले में ही तल्लीन है.

साधुत्व के ढोंग से दूर रहने के लिए ऐसा संकल्प करना चाहिए कि मैं अपने आत्मविश्वास को खोने नहीं दूँगा. मेरे प्रश्नों को सुलझाने का मार्ग वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं विवेकवाद ही दे सकता है. सर्वसामान्य नीति-संकेतों का पालन करने से आचरण निर्विवाद बनता है. अपनी ही मर्यादा में रहकर, इनसानियत के आधार पर, धीरज के साथ जीने में ही मनुष्य की प्रतिष्ठा है. स्वयं साधुत्व के ढकोसले से दूर रहने में ही जीवन की सार्थकता है. जो गुरु अथवा बाबा भक्तों के सभी प्रश्नों के उत्तर देने की आजीवन जिम्मेदारी लेता है, वह उसे अज्ञान एवं अंधकार की खोह में धकेल देता है. सच्चा गुरु भक्त को आत्मनिर्भर बनाता है, संघर्ष में लड़ने की हिम्मत देता है. उसे सजग एवं मजबूत बनाता है. अपनी विवेक-बुद्धि के रूप में ऐसा गुरु प्रत्येक मनुष्य के पास होता है, जो ढकोसले से और गुरुगीरी के आडंबर से हमें मुक्ति दिलाता है.


किताब का नाम – अंधविश्वास उन्मूलन पहला भाग: विचार
मूल्य – 135 रुपए (पेपरबैक) | 315 रुपए (हार्डकवर)
ऑनलाइन उपलब्धता – अमेज़न
लेखक – डॉ. नरेंद्र दाभोलकर 
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन


 

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सौरव गांगुली पर क्विज़!

सौरव गांगुली पर क्विज़. अपना ज्ञान यहां चेक कल्लो!

कॉन्ट्रोवर्सियल पेंटर एमएफ हुसैन के बारे में कितना जानते हैं आप, ये क्विज खेलकर बताइये

एमएफ हुसैन की पेंटिंग और विवाद के बारे में तो गूगल करके आपने खूब जान लिया. अब ज़रा यहां कलाकारी दिखाइए.

'हिटमैन' रोहित शर्मा को आप कितना जानते हैं, ये क्विज़ खेलकर बताइए

आज 33 साल के हो गए हैं रोहित शर्मा.

क्विज़: खून में दौड़ती है देशभक्ति? तो जलियांवाला बाग के 10 सवालों के जवाब दो

जलियांवाला बाग कांड के बारे में अपनी जानकारी आप भी चेक कर लीजिए.

बजट का कितना ज्ञान है, ये क्विज़ खेलकर चेक कर लो!

कितना नंबर पाया, बताते हुए जाना. #Budget2020

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.

क्रिकेट के पक्के वाले फैन हो तो इस क्विज़ को जीतकर बताओ

कित्ता नंबर मिला, सच-सच बताना.

सलमान खान के फैन, इधर आओ क्विज खेल के बताओ

क्विज में सही जवाब देने वाले के लिए एक खास इनाम है.