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'हिंदू होने के लिए ईश्वर की सत्ता मानना जरूरी नहीं'

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shashi newडॉक्टर शशि थरूर संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अवर महासचिव हैं. मनमोहन सरकार में विदेश और मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं. तिरुवनंतपुरम से दो बार लोकसभा हैं. संसद की विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष हैं. ‘कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज़’ समेत कई पुरस्कार मिल चुके हैं. शशि थरूर विख्यात आलोचक और स्तंभकार होने के साथ-साथ 15 कथा-साहित्य और दूसरी पुस्तकों के लेखक हैं. इनमें महत्वपूर्ण व्यंग्य पुस्तक ‘द ग्रेट इंडियन नॉवेल’ (1989), ‘इंडिया : फ्रॉम मिडनाइट टू द मिलेनियम’ (1997), ‘इंडिया शास्त्र :  रिफलैक्शंस ऑन द नेशन इन आवर टाइम’ (2015) और हाल ही में ‘अंधकार काल : भारत में ब्रिटिश साम्राज्य’ (2017) ’शामिल हैं. मौजूदा किताब ‘मैं हिंदू क्यों हूं’ उनकी चर्चित अंग्रेजी पुस्तक ‘व्हाई आई एम हिंदू’ का हिंदी संस्करण है. हम आपको इसी का एक अंश पढ़वा रहे हैं:


कट्टर सिद्धांतों से मुक्त धर्म

हिंदूवाद एक सभ्यता है, न कि एक कट्टर धार्मिक सिद्धांत. हिंदू अधर्म जैसी कोई चीज़ ही नहीं है. हिंदूवाद एक ऐसा धर्म है जो अपने हर अनुयायी को अपनी कल्पनाशीलता से अपना इष्टदेव गढ़ने की छूट देता है. हिंदू धर्म में सचमुच यह एक अनोखी बात है कि इसमें अधर्म जैसी कोई धारणा ही नहीं है. इसमें कोई ऐसे कट्टर सिद्धान्त हैं ही नहीं, जिनसे भटक जाने पर आप पर ‘अधर्मी’ होने का आरोप लगाया जा सके. और तो और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना भी एक हिंदू  होने के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है. जैसा कि हमने ऊपर ज़िक्र किया है, चार्वाक पंथ हिंदू  दर्शन की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है, जो नास्तिकता के सिद्धांत पर आधारित है. फिर भी, इस पंथ के अनुयायी अपने-आपको हिंदू कहते हैं.

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चार्वाक पंथ को प्राचीन हिंदूवाद की बौद्धिक उदारता के एक दिलचस्प उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है. चार्वाक न केवल बड़ी शान से भौतिकवादी होने का दावा करते थे, बल्कि आस्तिकों की कई श्रद्धेय मान्यताओं को खुल्लम-खुल्ला चुनौती देते थे. ऋषि माधवाचार्य ने ‘सर्वदर्शन संग्रह’ में चार्वाक पंथ की विचारधारा को प्रस्तुत करते हुए लिखा था-

न तो कोई स्वर्गलोक है, न मोक्ष, न दूसरे लोक तक जारी रहने वाली कोई आत्मा. और न कोई ऐसी पूजापाठ या अनुष्ठान की व्यवस्था, जिससे लोक-परलोक सुधरता हो.

चार्वाक संत-साधुओं और उनकी गतिविधियों को तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे-

अग्निहोत्र यज्ञ, त्रिवेद, भिक्षुक का त्रिदण्ड और शरीर पर धूलि रमाकर घूमना मात्र आजीविका के साधन हैं, जिन्हें विधाता ने उन लोगों के लिए चुना है, जिनके पास न समझ है न ऊर्जा.

वे आस्तिक दार्शनिकों के सैद्धांतिक दावों पर भी प्रहार करने से नहीं चूकते थे-

यदि ज्योतिस्तोम यज्ञ में बलि किया गया पशु स्वर्गलोक में जाता है, तो भक्त अपने पिता को अग्निकुण्ड में क्यों नहीं चढ़ा देता?

दूसरे अर्थों में, हिंदूवाद अपनी परिधि में लगभग सभी तरह के विश्वासों और भक्तियों को समेटे हुए है. वह कुछ को चुनकर अन्य को अस्वीकार नहीं करता. महात्मा गाँधी ने हिंदू धर्म की इस विशिष्टता की सराहना करते हुए लिखा था-

कट्टरता से इसकी स्वतंत्रता मुझे बहुत ज़्यादा सम्मोहित करती है, क्योंकि यह अपने अनुयायियों को आत्म-अभिव्यक्ति की अधिकतम संभावना प्रदान करता है.

इस तरह यह एक काल-निरपेक्ष धर्म है. जितना प्राचीनतम, उतना ही नवीनतम. अपने दायरे में वे सभी ग्रंथ, दर्शन, पंथ और मत समेटे हुए जो ज़रूरी नहीं कि एक-दूसरे से सहमत हों. पर इनमें से किसी को भी किसी भी धार्मिक उच्च सत्ता ने कभी ख़ारिज नहीं किया. ‘हिंदू’ धर्म में ऐसी कोई सर्वोच्च सत्ता है भी नहीं. इसलिए कभी  किसी ‘हिंदू  न्यायिक जाँच’ की संभावना भी नहीं है. क्योंकि न तो कोई ऐसा धर्मग्रंथ है, जिसके निर्देशों का पालन अनिवार्य हो और न ही कोई ऐसी सर्वोच्च सत्ता है जो इस तरह की जाँच का आदेश दे सके. हिंदू चिंतन एक विशाल पुस्तकालय की तरह है. इसमें कभी भी, कोई भी पुस्तक ‘आउट ऑफ़ प्रिंट’ नहीं होती. यह संभव है कि किसी पुस्तक को सदियों से पढ़ा न गया हो. पर वह पुस्तकालय में मौजूद रहती है. कोई कभी भी उस पुस्तक को पढ़ सकता है. उसको संशोधित कर सकता है. उसमें नई टिप्पणियाँ या विचार जोड़कर उसे पुनर्मुद्रित कर सकता है. पर अधिकांशतः मूल पुस्तक भी ज्यों-की-त्यों पुस्तकालय में मौजूद रहती है. उसे देखो-बाँचो, उपयोग करो या व्यर्थ समझकर नज़रअंदाज़ करो, वह अपना अस्तित्व नहीं खोती.

फिर भी यह प्रश्न कि आख़िर ‘हिंदू  कौन है?’ अक्सर उठता रहा है. स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हस्तियाँ भी इस बहस में शामिल होती रही हैं. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सनातन धर्म सभा की एक बैठक में कहा था-

वेदों के स्वयं स्पष्ट और स्वयंसिद्ध सत्यों में विश्वास रखने वाला व्यक्ति हिंदू  है.

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इस तरह उन्होंने श्रद्धेय धर्मग्रंथों के आधार पर एक धार्मिक पहचान स्थापित करने का प्रयास किया. यह इसलिए भी ज़रूरी लग रहा था क्योंकि ब्रिटिश राज के दौरान मुसलमानों को ‘क़ुरान को मानने वाले’ एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय के रूप में मान्यता मिल चुकी थी. तिलक चाहते थे कि उपनिवेशीय भारत में हिंदुओं को भी एक विशिष्ट धार्मिक पहचान का लाभ मिल सके.

दो दशक बाद महात्मा गाँधी ने तिलक की इस परिभाषा को विस्तार देते हुए लिखा-‘

हिंदू वे लोग हैं, जो वेदों, उपनिषदों, विभिन्न धर्म-ग्रन्थों, ईश्वर के अनेक अवतारों, पुनर्जन्म, वर्ण और आश्रम व्यवस्था, जीवन के चार चरण, गौ-पूजा और गौ-रक्षा में विश्वास रखते हैं. और मूर्ति-पूजा पर अविश्वास प्रकट नहीं करते.मेरे ख़याल से यह बहुत लंबी सूची है और मुझे मिलाकर बहुत से हिंदू इनमें से कुछ शर्तों को अनावश्यक समझते हैं. फिर भी अपने-आपको गर्व से हिंदू  मानते हैं. हिंदुत्व के राजनीतिक दर्शन के कट्टरवादी विचारक वीडी सावरकर (जिनके विचारों पर आगे चलकर विस्तार से चर्चा करेंगे) ने 1920 के दशक में कहा था-

वेदों की धार्मिक सत्ता को न मानने वाला भी हिंदू हो सकता है.

उनके विचार में हिंदू पहचान की दृष्टि से एकात्ववाद और पंथवाद, द्वैत और अद्वैत, वेदों और उपनिषदों और अज्ञेयवाद और अनीश्वरवाद के बीच धार्मिक विवाद कोई अर्थ नहीं रखते थे. सावरकर ‘हिंदूवाद’ की बजाय ‘हिंदुत्व’ को एक ऐसे सांस्कृतिक सूत्र के रूप में देखते थे, जो भारत में रहने वाले सभी लोगों को आपस में जोड़ता था. इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था-

अलग-अलग लोगों के लिए एक हिंदू  होने का अलग-अलग अर्थ है.

ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी और इतिहासकार सर अल्फ्रेड ल्यॉल के अनुसार-

हिंदूवाद विसंगतियों और विरोधाभासों से भरा ‘एक उलझाव भरा जंगल’ था, पूरे भारत में फैली एक ऐसी धार्मिक अराजकता, जिसे समझ पाना और परिभाषित कर पाना बहुत मुश्किल था.

सम्भवतः इसीलिए डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1926 में हिंदूवाद पर अपने प्रसिद्ध व्याख्यानों की शुरुआत करते हुए कहा था-‘

क्या यह आस्थाओं का अजायबघर है. धार्मिक रस्मों का पिटारा या सिर्फ़ भौगोलिक अभिव्यक्ति का एक मानचित्र?

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जैसा कि मैंने कहा है. इस चयनशीलता का एक परिणाम हिंदुओं में अन्य धर्मों और पूजा पद्धतियों को स्वीकार करने की उदारता है, जिन्हें वे कई बार अपना भी लेते हैं।हिंदू  अक्सर अन्य धर्मों के पूजा-स्थलों के प्रति श्रद्धा जताते देखे जाते हैं और उनके पवित्र प्रतीकों को अपने साथ ले जाना और सँभालकर रखना पसंद करते हैं. इतिहास सूफ़ी दरगाहों, सिख गुरुद्वारों और ईसाई धर्मस्थलों में हिंदू  श्रद्धालुओं की भीड़ के वर्णनों से भरा पड़ा है। (तमिलनाडु के वेलंकन्नी शहर में बेसेलिका ऑफ़ अवर लेडी ऑफ़ गुड हेल्थ-जिसे ‘लॉर्डेस ऑफ़ द ईस्ट’ के नाम से भी जाना जाता है-और मुंबई के बांद्रा उपनगर में माउंट मेरी चर्च हिंदुओं में ख़ासतौर से लोकप्रिय दो ईसाई धर्मस्थल हैं. दरगाहों और गुरुद्वारों की लोकप्रियता का तो कहना ही क्या?) मेरे स्वर्गीय पिता एक पक्के हिंदू थे. दिन में दो बार स्नान के बाद पूजा करते थे. वे नियम से देश के विभिन्न भागों में स्थित प्रमुख मंदिरों के दर्शन करने जाते रहते थे. जब 1960 के दशक में गुरुवयूर मंदिर में आग लगी तो उन्होंने मुंबई में इसके पुनर्निर्माण के लिए चंदा इकट्ठा करने का अभियान चलाया. और अपनी थोड़ी-सी जमापूँजी ख़ुशी-ख़ुशी इस काम के लिए समर्पित कर दी. फिर भी जब उनके एक कैथलिक मित्र और बीमा एजेंट ने वेटिकन की यात्रा से लौटने के बाद उन्हें विर्जिन मैरी की एक ताबीज़ भेंट की, जिसे स्वयं पोप का वरदान प्राप्त था, तो उन्होंने वर्षों तक बड़ी श्रद्धा से उसे अपने पास सँभाले रखा। अधिकांश हिंदू इसी हिंदूवाद को जानते हैं-एक ऐसा धर्म, जो दूसरे धर्मों को भी न केवल सम्मान बल्कि श्रद्धा की दृष्टि से देखता है.

दिव्यता के प्रति श्रद्धा, इसका स्रोत कुछ भी क्यों न हो, एक उल्लेखनीय हिंदू विशिष्टता है-जो कट्टर धार्मिक सिद्धांतों को स्वीकार न करने की लंबी परंपरा का प्रतीक है. 11 सितंबर, 1893 को शिकागो की ‘पार्लियामेंट ऑफ़ वोर्ल्ड्स रिलिजंस’ में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में स्वामी विवेकानंद ने हिंदूवाद पर बात करते हुए कहा था कि यह धर्म विश्व को सिर्फ़़ सहिष्णुता ही नहीं बल्कि स्वीकृति सिखाता है. उनका मानना था कि हिंदू धर्म के खुलेपन, विविधता और अन्य धर्मों को स्वीकार करने की क्षमता को देखते हुए यही एक ऐसा धर्म था जो दूसरों को ख़तरे में डाले बिना अपना प्रभाव बढ़ा सकता है. इस धर्म संसद में उन्होंने उस उदार मानवतावाद का विस्तार से वर्णन किया था, जो उनके (और मेरे) धर्म का हृदय-प्रदेश था। मुझे उस धर्म से जुड़ा होने पर गर्व है, जिसने विश्व को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति की सीख दी है. हम न सिर्फ़़ सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि सभी धर्मों को सच्चे धर्म के रूप में स्वीकार करते हैं.

उन्होंने एक श्लोक ‘शिव महिमा स्तोत्रम्’ भी सुनाया था जो उन्हें स्कूल के दिनों से याद था-

जिस तरह अलग-अलग नदियाँ, अलग-अलग स्थानों से प्रकट होकर समुद्र में जा मिलती हैं, उसी तरह हे प्रभु, मनुष्य अलग-अलग और सीधे-टेढ़े रास्तों से चलकर अन्ततः तुम्हारी शरण में ही पहुँचते हैं.

‘भगवद्गीता’ में भी यही ख़ूबसूरत बात कही गई है-

जो कोई भी मेरे पास आता है, जिस रूप में भी आता है, मैं उस तक पहुँचता हूँ, सभी मनुष्य अपने-अपने रास्तों पर संघर्षरत हैं जो अन्ततः मुझ तक पहुँचते हैं.

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यह एक महत्वपूर्ण विचार था और विवेकानंद द्वारा सिखाए जा रहे दर्शन का केंद्र बिंदु था. सहिष्णुता का आख़िर यही मतलब है कि आपके पास सत्य है और जिसके पास नहीं है, उसे भी ख़ुश रहने दोगे. आप सहिष्णुता के माध्यम से उसे ग़लत होने का अधिकार दोगे. दूसरी तरफ़, स्वीकृति का यह अर्थ था कि आपके पास सत्य है और शायद दूसरे के पास भी सत्य है. आप उसके सत्य को भी स्वीकार करो और उसका सम्मान करो. आप यह भी उम्मीद करेंगे कि दूसरा भी आपके सत्य को स्वीकार करे और उसका सम्मान करे. भिन्नता को स्वीकार करने की यह रीत-यह विचार कि जीवन और आस्था के अन्य मार्ग भी उतने ही वैध हैं, हिंदूवाद का केंद्र बिंदु है. और भारत की प्रजातांत्रिक संस्कृति का आधार है.

शिकागो में अपने एक अन्य व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद ने बड़े गर्व से घोषणा की थी-

मैं विश्व को चुनौती देता हूँ कि संस्कृत दर्शन की समूची व्यवस्था में एक भी ऐसा वाक्य ढूँढ़कर दिखाए कि सिर्फ़़ हिंदुओं का उद्धार होगा, दूसरों का नहीं.

 

व्यास ने लिखा है-

अपनी जाति और पंथ के बाहर भी हमें आदर्श मनुष्य दिखाई देते हैं.

हिंदूवाद की एक बड़ी शक्ति, हालाँकि कुछ लोग इसे कमज़ोरी के रूप में देखते हैं, लिखित धर्म-निर्देशों का अभाव है. हिंदू धर्म यह मानता है कि अलग-अलग लोगों को लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अलग-अलग रास्तों की ज़रूरत हो सकती है. स्वयं हिंदू धर्म के भीतर भी सभी के लिए एक जैसा धार्मिक व्यवहार लागू करने की इच्छा नहीं है. ऐसा माना जाता है कि भिन्न-भिन्न आध्यात्मिक और बौद्धिक स्तर के लोग ईश्वर से जुड़ने के लिए अलग-अलग रास्ते और तौर-तरीक़े अपनाएंगे.


शशि थरूर ने यह किताब तीन खंडों में प्रस्तुत की है. पहले खंड ‘मेरा हिंदूवाद’ में हिंदू धर्म के सभी पहलुओं को छुआ गया है. इसके प्रमुख पंथ, मत, गुरु और शिक्षाएं. दूसरे खंड  ‘राजनीतिक हिंदूवाद’ में राजनीतिक नेताओं, रणनीतिज्ञों, विचारकों और उनके धार्मिक सहयोगियों द्वारा अपने हितों के लिए हिंदू धर्म को ‘हाइजैक’ करने की कोशिशों का वर्णन है. तीसरे खंड ‘सच्चे हिंदू वाद की वापसी’ में हिंदू धर्म को आज दिखाई देने वाली ज़्यादतियों और विकृतियों से मुक्त करके इसके सच्चे और मूल स्वरूप और मर्म को फिर से स्थापित करने के उपायों पर चर्चा की गई है.

पुस्तक- मैं हिंदू क्यों हूं?
लेखक- डॉक्टर शशि थरूर
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
विषय- नॉन फिक्शन
प्रकाशन वर्ष- 2018
संस्करण- पेपरपैक्स/एचबी
भाषा- हिंदी
मूल्य- 299/695

 


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