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JNU से रिटायर होने वक्त नामवर सिंह ने क्या कहा था?

सुमन केशरी
सुमन केशरी

जे.एन.यू. में नामवर सिंह‘ संस्था की तरह के एक व्यक्ति और मनुष्य जैसी संवेदना लिए एक संस्था के महत्त्व को रेखांकित करती पुस्तक है. इस किताब को सुमन केशरी ने लिखा है. यह आलोचक नामवर सिंह या अध्यापक नामवर सिंह का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से तैयार की गई किताब नहीं है, बल्कि आज जब शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं, यह पुस्तक देश की एक विशिष्ट संस्था, उसके निर्माण में नामवर जी के योगदान और स्वयं नामवर जी के विकास में उस संस्था के महत्त्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से तैयार की गई है. इस तरह यह एक व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं बल्कि चिन्तन के एक खास स्कूल के प्रभावों-परिणामों का भी लेखा-जोखा करती पुस्तक है.


पुस्तक अंश : जेएनयू में नामवर

…तब हिन्दी-उर्दू के हम सिर्फ़ चार अध्यापक थे और छात्रा भी छह, वे भी हिन्दी के. एक नया सेन्टर इसी पूंजी से शुरू हुआ था. आज उस सेन्टर में हिन्दी-उर्दू के बारह अध्यापक हैं. छात्रों की संख्या भी साठ से ऊपर ही होगी. आंकड़े के हिसाब से यह तीन गुनी बल्कि और ज़्यादा तरक्की कही जाएगी. लेकिन जो सपना था, जो विज़न था उसको देखते हुए शायद यह बहुत सन्तोषप्रद न हो. इन अठारह वर्षों में जो कुछ किया, जो कुछ हुआ, जो कुछ लिखा; उसमें साल भर की सबेटिकल छुट्टी के दौरान लिखी हुई ‘दूसरी परम्परा की खोज’ मेरे लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धि है. उस किताब के लिए मैं विश्वविद्यालय का ऋणी हूं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आने से पहले ‘मुक्तिबोध’ की चार पंक्तियाँ मेरे दिमाग में बराबर गूंजती रहती थीं. आज भी मेरे साथ हैं और आगे भी रहेंगी. और वह सवाल था कि-

‘‘अब तक क्या किया

जीवन क्या जिया

ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम

मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम!!’’

यह एक चुनौती थी. हमने इस समाज से, इस देश से कितना लिया है! आज इंसान से एक दर्ज़ नीचे रहनेवालों की तादाद हमारे देश में नब्बे फीसदी से ज्यादा है. हम अध्यापक और विद्यार्थी उनकी तुलना में कितनी सुविधाओं से सम्पन्न हैं? एक ओर यह सब कुछ तो देश की जनता से ही मिला है, पैसा मिला है, सारी सुविधाएं मिली हैं. उसकी तुलना में अगर हम देखें तो हमने क्या दिया है उन लोगों को? यह मेरे मन में बार-बार सवाल उमड़ता था और चूंकि हमारा साधन, हमारा माध्यम साहित्य है और साहित्य में भी जिसके बारे में हम कुछ थोड़ा-सा जानते हैं, वह एक भाषा का साहित्य है. उसके माध्यम से हम क्या कर सकते हैं? ये कुछ सपने थे, कुछ बेचैनियां थीं हमारे मन में, जिन्हें लेकर, जिनके लिए एक सही जगह की तलाश थी मेरे मन में. सच पूछें तो ख्याल थे कुछ, कुछ आइडियाज थे और उस नाटककार या उस ‘एक्टर’ की तरह से मुझे ‘थियेटर’ की तलाश थी, जहां मैं कम-से-कम वो ‘थियेटर ऑफ आइडियाज’ कह लीजिए, ‘व्यूज’ कह लीजिए जहां मैं उस रंगमंच को भरे-पूरे रूप में प्राप्त करके कुछ कर दिखाऊं. जहिर है, उसके लिए सहयोगियों की ज़रूरत थी और ऐसे कुछ सहयोगी मिले भी. एक ऐसा थियेटर भी मिला जो विचारों में उन्मुक्त था, खुला हुआ था, मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वह सब मिला. यह कुंवारी धरती थी, हर तरह से कुंवारी थी. मैं तो चार साल बाद आया. पर वे भाग्यशाली लोग हैं जिन्होंने सन 1970 से इस जमीन को तोड़कर यहां एक नई दुनिया बनाने की कोशिश की थी. लेकिन देखते-देखते… मुझे…अगर एक पोढ़ी-पकी, बनी-बनाई हुई यूनिवर्सिटी मिली होती तो शायद मैं या हम लोग वह नहीं कर पाते जो कर सके. इसलिए हमने तो कोरी पटिया से शुरू की. कोरी स्लेट से शुरू किया था और एक हद तक यह हमारे लिए सौभाग्य की बात थी और विश्वविद्यालय भी ऐसा मिला जो लगभग एक ‘लीजेंड’ उस समय बना हुआ था. धीरे-धीरे वह ‘लीजेंड’ अब तो टूट रहा है.

उस नए दौर में आने पर, इस नई दुनिया में आने पर मेरे भीतर एक नया इनसान बना और पैदा हुआ, जिसका एहसास इन अठारह वर्षों में तो नहीं हुआ, लेकिन अब इस विश्वविद्यालय को छोड़ते हुए महसूस करता हूं. यहाँ विद्यार्थियों से, छात्रों से जो बौद्धिक चुनौतियां मिलीं, अगर वे नहीं मिलतीं तो हम लोग भी उसी तरह से एक खास तरह की ‘स्मॅगनेस’ के शिकार हो गए होते.

रोजमर्रा जो चुनौतियां हमें विद्यार्थियों से कक्षाओं के बाहर होस्टल में, सड़कों पर, सेमिनार में मिलीं और उसके साथ ही मैं बहुत भाग्यशाली हूं…किसी दूसरे विश्वविद्यालय में शायद वह अवसर न मिलता जहां मुझसे बेहतर, मुझसे ज्यादा अच्छे दूसरे शास्त्रों में, दूसरी विधाओं में, चाहे वह सामाजिक विज्ञान हो चाहे वह अन्तर्राष्ट्रीय विद्या संस्थान हो या विज्ञान के लोग हों, उन लोगों से मिलने, जानने और सीखने का मुझे अवसर मिला.

एक ऐसी ‘लाइब्रेरी’ मिली और उस दौर के एक ऐसे ‘लाइब्रेरियन’ मिले…मेरी ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की ‘लाइब्रेरी’ है. अगर कोई हाजिरी की किताब रहती तो पता चलता कि वहां जानेवालों में शायद सबसे नियमित यही आदमी था. कभी-कभी उन घड़ियों में भी, जब जानेवाले थोड़े लोग होते थे.

बाहरी आचार-विचार को देखनेवाले लोग नहीं जानते कि किसी आदमी के शरीर के अन्दर दौड़नेवाली वो हजारों नसें हैं, जो खून और खुराक पहुंचाती हैं. वो अदृश्य दान इस विश्वविद्यालय का मेरे लिए रहा है.

Namwar Singh
नामवर सिंह

कहीं पढ़ा था कि दत्तात्रेय के चौबीस गुरु थे. चौबीस तो ख़ैर कहने के लिए थे. मशहूर यह था कि वे जहां भी जाते, वहां कुछ-न-कुछ सीखने के लिए मिल जाता. जैसे ओखली में मूसर चलानेवाली, धान कूटनेवाली औरत हो और उसकी चूड़ी झनझना रही हो, तो उससे भी दत्तात्रेय को कोई एक ज्ञान मिल जाया करता था. ऐसा जिज्ञासु होने का दावा तो मैं नहीं कर सकता, लेकिन मैंने कोशिश की है कि यहां के प्रवास में जितने लोगों से सम्भव है, ज्ञान बटोर लूं. वह बटोरी हुई पूंजी इस कदर मेरे मानस का हिस्सा बन चुकी है कि उसके मूल स्त्रोतों के नाम भी आज याद नहीं रहे.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आया तो हिन्दी सुनाई नहीं पड़ती थी. हिन्दी बोलनेवाले लड़के थे लेकिन उन्हें संकोच होता था. एक खास तरह की आधुनिकता थी. उसे मैं अंग्रेजियत नहीं कहूंगा. उसमें कुछ ‘बोहेमियन’ तत्त्व मिला हुआ था. लेकिन जिसे कहें कि एक गरीबी का भी गर्व हुआ करता है, एक गंवारपन का भी स्वाभिमान हुआ करता है, उस स्वाभिमान के साथ इस पूरे विश्वविद्यालय में यह गंवार आदमी धोती-कुर्ता पहने हुए खड़ा रह सका. यह ताकत मुझे अपने गांव के लोगों से, बनारस से मिली थी. मुझे लगता था कि यह देसीपन इस विश्वविद्यालय के लिए बहुत ज़रूरी है. ये विश्वविद्यालय उस विदेशी हवा-पानी के खुराक से जवाहरलाल नेहरू के नाम को सार्थक नहीं कर पाएगा. ये देसीपन अपने आप इस विश्वविद्यालय में जुड़कर एक नई ताकत, एक नई शक्ति बना. जो मुझे बल देता रहा है.

मित्रों ने जिक्र किया कि हिन्दी की जो ‘स्टीरियो टाइप’ एक तस्वीर बनी थी, उसे मैं तोड़ना चाहता था और उस तस्वीर को तोड़ने के लिए ज़रूरी था कि हिन्दी केवल अपनी पहचान अकेले दम पर, केवल हिन्दी को लेकर नहीं बना सकती. इसके लिए सगी बहन उर्दू का साथ जरूरी है. स्कूल बोर्ड की अपनी पहली बैठक में सेन्टर का पाठ्यक्रम प्रस्तुत करते हुए मैंने प्रस्तावना के रूप में कहा था: और विश्वविद्यालयों में उर्दू और हिन्दी के विभाग जो जी चाहे करें, हम तो जे.एन.यू. में, हमारा सेन्टर ऐसा बने जहां कि गंगा जमुनी संगम चाहते हैं. बड़ा फर्क पड़ेगा इससे. प्रस्ताव का स्वागत करनेवालों में एन.के.वी. मूर्ति पहले सदस्य थे, जो इस विश्वविद्यालय के प्रथम रजिस्ट्रार रह चुके थे. और अब भी यह अकेला विश्वविद्यालय है जहां हिन्दी के विद्यार्थी को उर्दू पढ़ना और उर्दू के विद्यार्थी को हिन्दी पढ़ना अनिवार्य है.

…प्रेमचन्द के ‘गोदान’ उपन्यास में होरी की आखिरी बात याद आती है. होरी कहता है, ‘‘जो कुछ अपने से नहीं बन पड़ा उसी के दुखों का नाम तो मोह है“.

इस क्षण जबकि हर तरह के मोह से आदमी को मुक्त होना चाहिए, अजीब बात है कि इनसान होने के नाते उस मोह से, जो अधूरे मनसूबे हैं, उनसे मुक्त होना बड़ा कठिन लगता है. एक सपना था कि हिन्दी-उर्दू के साथ कम-से-कम दक्षिण की एक भाषा हो, पश्चिम की एक भाषा हो, पूरब की एक भाषा हो और आधार रूप में संस्कृत हो. इन्हें मिलाकर कम-से-कम एक ऐसे भारतीय साहित्य, तुलनात्मक साहित्य की तस्वीर रखी जाए, जहाँ हर भाषा अपनी पहचान कायम रखते हुए भारतीय साहित्य की व्यापकता का आभास दे.

फिर, ‘स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज’ से बड़ा विदेशी भाषाओं के अध्ययन का कोई संस्थान इस देश में नहीं है. रूसी, जर्मन, फ्रेंच, स्पैनिश, चीनी, जापानी के साथ ही अरबी, फ़ारसी इत्यादि भाषाओं की सर्वोच्च पढ़ाई यहीं होती है. ऐसे वातावरण में तुलनात्मक अनुशीलन की पद्धति अपनाकर भारतीय साहित्य क्या शक्ल ले सकता है, यह सोचते ही ‘‘तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुत हरेः, विस्मयो मे महान्यजन् हृष्यामिच पुनः पुनः’’  रोमांच हो आता है इसकी कल्पना करके. यह सपना हमारा रहा है और मैं समझता हूं कि सपना देखना छोड़ना नहीं चाहिए. क्योंकि कभी-कभी सपना देखने का अधिकार भी छिन जाता है. तब हकीकत भी मुरझा जाती है और मर जाती है. मुझे उम्मीद है कि भारतीय भाषा केन्द्र आगे आनेवाले समय में, और विश्वविद्यालय का इस ओर ध्यान जाएगा, सही मायने में भारतीय भाषाओं के साहित्य का मरकज़ और केन्द्र बन सकेगा.

इस विश्वविद्यालय में जो चुनाव लड़े जाते हैं, उनके पोस्टर से अन्दाजा लगता है कि कितनी सर्जनशीलता है, कितनी सांस्कृतिक सम्पदा यहां मौजूद है. उन तमाम चीज़ों को क्या हम अपने ‘एकेडेमिक प्रोग्राम’ के द्वारा एक ऊंचा स्तर नहीं प्रदान कर सकते? इन प्रतिभाओं को देखते हुए मैं मित्रों से कहना चाहता हूं कि यह तभी होगा कि जब उसके लिए भारतीयता का, भारतीय भाषाओं का ठोस आधार होगा. इनके बिना वह ‘एस्थेटिक डाइमेंशन’ दिया नहीं जा सकता है. ये कुछ सपने हैं जो आपके पास छोड़े जा रहा हूं.

जो भी दिया था वह आपका ही दान था और

तुमने जितना भी ग्रहण किया

उतना ही मुझे ऋणी बनाया है

रवीन्द्रनाथ की कविता की ये पंक्तियां मुझे याद आती हैं. इन शब्दों के साथ मैं आज के अवसर पर इसलिए भी कि पुरानी परम्परा में कुछ तो जड़ें हैं ही, मैं ढूंढता ही रहा कि विद्यार्थियों ने आयोजन किया है, हमारी परम्परा में ऐसे समय क्या गुरु के पास कहने को कोई शब्द होते हैं? मैंने देखा कि सारी परम्परा में शिष्यों के तो विदाई देने के तमाम मंत्र हैं; लेकिन गुरु विदाई लेता हो और उसके पास भी ऐसे अवसर पर कहने के लिए कोई मंत्र हो, समूचे शास्त्र में मुझे कहीं नहीं मिला. क्या इसका यह अर्थ है कि विद्यार्थी आते-जाते रहते हैं, गुरु तो स्थाणु है, अचल है, वह कहीं नहीं जाता है. इन शब्दों के साथ मैं आपसे विदा लेता हूं.


(नामवर सिंह द्वारा 1992 में जे.एन.यू. से सेवानिवृत्ति के समय दिया गया वक्तव्य)


किताब का नाम – JNU में नामवर सिंह

लेखक – सुमन केशरी

विधा – संस्मरण

प्रकाशन –  राजकमल प्रकाशन

पेज संख्या – 263

कीमत – 695/- रूपये


वीडियो- नामवर सिंह: वो साहित्यकार जिसने जेएनयू के हिंदी डिपार्टमेंट की तस्वीर बदल दी

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