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'गौशाला में आग लगाने की धमकी दोगे तो लोग भड़क जाएंगे'

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नवीन चौधरी
नवीन चौधरी

लेखक के बारे में

लल्लनटॉप के पुराने साथी नवीन चौधरी बिहार के मधुबनी जि़ले के रुद्रपुर गांव में 31 जुलाई, 1978 को जन्मे. नवीन राजस्थान विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में परास्तानक हैं. पढ़ाई के दौरान छात्र-राजनीति में खूब सक्रिय रहे. इन्होंने एमबीए की डिग्री भी हासिल की है. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण और आदित्य बिड़ला ग्रुप के ब्रांड और मार्केटिंग डिपार्टमेंट में विभिन्न पदों पर रह चुके नवीन फोटोग्राफी, व्यंग्य-लेखन एवं ट्रैवलॉग राइटिंग भी करते हैं. नवीन चौधरी से सम्पर्क का ज़रिया है—naveen2999@gmail.com


जनता स्टोर – पुस्तक अंश

9 अगस्त, 1998; रविवार

‘भाई, न्यूज़पेपर पढ़ा?’ फ़ोन पर दुष्यन्त था. मयूर ने एक आँख बन्द किए हुए और दूसरी आधी खोलकर घड़ी की ओर देखा. सुबह के 6:45 हो रहे थे.

‘भाई, अगली 26 जनवरी को बहादुरी अवार्ड लेने की तो नहीं सोच रहा तू?’ मयूर ने लेटे-लेटे ही भर्राई आवाज़ में रिसीवर कान पर रखकर पूछा.

‘क्या मतलब?’

‘अबे, संडे के दिन 6:45 पर उठना बहादुरी का काम होता है. मैं इतना बहादुर नहीं. सो रहा हूँ और तू भी सो जा.’

‘मैं भी सो ही रहा था, भाई. मम्मी ने न्यूज़ पढ़ के उठाया मुझे. तू भी देख फटाफट पेज नम्बर 4 पे.’

‘ऐसा क्या कांड हो गया फिर से… देखता हूँ…तब तुझे कॉल करता हूँ.’

आँखें मलता हुआ मयूर बिस्तर से उठा और अँगड़ाई लेता बाहर निकला. अख़बार अभी बाहर बरामदे में ही पड़ा हुआ था. मयूर ने अख़बार उठाया और उबासी लेते हुए चौथा पेज खोला. ऊपर पहली ख़बर पर नज़र पड़ते ही उबासी बीच में रुक गई और मुँह से निकला—’ओ भैण…’

सांकेतिक इमेज (साभार - http://ww2.infovilag.hu)
सांकेतिक इमेज (साभार – http://ww2.infovilag.hu)

मयूर ने तुरन्त अपना मुँह दबाकर गाली निकलने से रोका और ड्राइंग रूम में झाँककर देखा, कोई नहीं था. रविवार की छुट्टी होने की वजह से सब थोड़ा आराम के मूड में थे और उठे नहीं थे. मयूर ने चौथे पेज को अख़बार से फाड़कर जेब में रख लिया और अख़बार वापस बरामदे में पटककर फिर से अपने कमरे में भाग गया. दरवाज़ा बन्द करके उसने अख़बार जेब से निकाला और पूरी ख़बर पढ़नी शुरू की—’छात्र नेता एवं छात्रसंघ के सांस्कृतिक सचिव राघवेन्द्र शर्मा जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार.’ नींद से उठे होने के कारण सिर्फ़ हेडिंग पढ़ पाया, बाक़ी ख़बर के अक्षर धुँधले दिख रहे थे.

मयूर ने फटाफट मुँह धोया और छत पर जाकर पेपर जेब से निकालकर फिर से पढ़ना शुरू किया. ख़बर के हिसाब से शहर के एक बड़े व्यवसायी ने राघवेन्द्र पर छात्रसंघ चुनावों के लिए जबरन पैसा माँगने और न देने पर उन्हें जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए पुलिस में रिपोर्ट की थी. दुकानदारों ने यह भी कहा कि इससे पहले सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘घूमर’ के लिए भी राघवेन्द्र ने दुकान और उसकी गौशाला में आग लगाने की धमकी देकर जबरन चन्दा वसूला था और रसीद भी नहीं दी थी. पुलिस ने रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए राघवेन्द्र को गिरफ्तार कर लिया. मयूर ने नीचे उतरकर दुष्यन्त को फ़ोन किया और बोला राघवेन्द्र से मिलने पुलिस स्टेशन चलते हैं.

क़रीब 10 बजे दुष्यन्त मुझे लेकर ब्रह्मपुरी थाने पहुँचा. मयूर पहले से बाहर खड़ा था. हम तीनों अन्दर घुसे. एक कांस्टेबल बाहर निकल रहा था, उसने हमें ऊपर से नीचे तक घूरा और फिर बाहर चला गया. थाने के अन्दर दाईं तरफ़ एक बेगनवेलिया दीवार के सहारे चढ़ती हुई दूसरी तरफ़ फाँदने को थी. ठीक सामने बरामदे में एक तरफ़ टेबल और बेंच लगी हुई थी. राघवेन्द्र डेनिम की शर्ट का एक बटन खोले टेबल से पीठ टिकाए हुए बेंच पर बैठा था. हाथ में चाय का गिलास लिये सामने गेट की तरफ़ मुँह करके बैठा वह पुलिस वालों से बातें कर रहा था. उसके बगल में खम्भे के सहारे एक कांस्टेबल खड़ा था और एक तरफ़ लोहे की फोल्ंिडग कुर्सी पर एक स्टार वाला पुलिस ऑफि़ सर बैठा था. दोनों पुलिस वाले राघवेन्द्र से ऐसे हँस-बोल रहे थे जैसे कि वह गिरफ्तार होकर थाने में नहीं, बल्कि उनके घर पर चाय पीने आया है. वैसे इतने दिनों में तो मुझे समझ आ ही गया था कि पुलिस वाले भी छात्र नेताओं से तब तक दोस्ती बना के ही रखते हैं जब तक कि मामला बहुत संगीन न हो या उन्हें कहा न जाए कड़क होने को.

चुनाव का माहौल - सांकेतिक इमेज (रॉयटर्स/दानिश इस्माइल)
चुनाव का माहौल – सांकेतिक इमेज (रॉयटर्स/दानिश इस्माइल)

राघवेन्द्र ने हमें देखा और चाय को पीछे टेबल पर रखकर खड़ा हो गया और बोला—’अरे, तुम लोग…आओ.’ फिर एक स्टार वाले ऑफिसर (एएसआई) से बोला—’पहचानते हो इन लोगों को?’ एएसआई ने हम सबको देखा और बोला—’हाँ,मयूर को तो जानता हूँ बाक़ी को भी देखा हुआ है.’

राघवेन्द्र ने मयूर की पीठ थपथपा के कहा—’हीरो है हमारा. आगे बहुत नाम करेगा.’ फिर उसने कांस्टेबल को तीन चाय लाने का इशारा किया और कांस्टेबल चाय का ऑर्डर देने चला गया.

हम कुछ कहें उससे पहले ही राघवेन्द्र बोल पड़ा—’बेटा, गेम हो गया अपने साथ. सामने वाले चुनाव की तैयारी हमसे ज़्यादा तेज़ कर रहे हैं. अब हमें भी स्पीड बढ़ानी होगी, सिर्फ़ महीना भर रह गया है.’

‘मतलब?’

‘यह आदमी अशोक विजयवर्गीय का खास है और उसके कहने पर यह केस हुआ है.’ राघवेन्द्र ने कहा.

‘एक काम करते हैं, चल के फोड़ देते हैं साले को. इसको भी, और उस अशोक विजयवर्गीय को भी.’ दुष्यन्त बोला.

सांकेतिक इमेज (रॉयटर्स)
सांकेतिक इमेज (रॉयटर्स)

‘तुम लोगों को पता नहीं अशोक विजयवर्गीय कौन है?’ राघवेन्द्र ने बड़े आश्चर्य से हम सबसे पूछा. हमने कहा—’नहीं.’ राघवेन्द्र फिर बोला—’कास में इतना टाइम हो गया और तुम्हें इतनी-सी बात नहीं पता?’ राघवेन्द्र ने सवाल पूछकर हम तीनों को देखा और हमारे चेहरे पर आए प्रश्नवाचक चिह्न को देखते हुए आगे जवाब दिया—ADB यानी अशोक डेवलपर्स एंड बिल्डर्स के मालिक अशोक विजयवर्गीय हमारे दोस्त सुरेश विजय के पिताजी हैं. विजयवर्गीय को लोग शॉर्ट में विजय लिखते हैं. समझे अब.’

मयूर को आगे की सारी कहानी समझ में आ गई. वह बोला—’मतलब यह हुआ कि ठीक चुनावों से पहले पूरी प्लानिंग से इन लोगों ने यह झूठा केस किया है जिससे कि इमेज ख़राब हो जाए आपकी…’

‘नहीं, वह तो बाद की बात है. पहले इस केस के नाम पर मुझे टिकट नहीं देंगे और सुरेश का रास्ता साफ़ करेंगे.’

‘तो सुरेश को भी फोड़ देते हैं, इतना क्या डरना इन सूतियों से.’ दुष्यन्त फिर उत्तेजित होकर बोला.

मयूर ने दुष्यन्त के हाथ पर हाथ रखकर उसे शान्त होने का मौन सन्देश दिया और राघवेन्द्र से पूछा—’पर भैया, यह गौशाला वाला कहाँ से आया सीन में? क्या गेम कह रहे हो आप, कुछ समझ में नहीं आ रहा.’

किराना स्टोर (रॉयटर्स/दानिश इस्माइल)
किराना स्टोर – सांकेतिक इमेज  (रॉयटर्स/दानिश इस्माइल)

‘इसकी सिर्फ़ गौशाला नहीं है, इसकी ज्वेलरी शॉप भी है; लेकिन गौशाला के नाम पे बड़ा खेल खेलता है ये. तुम कह रहे थे कि चल के फोड़ देते हैं. वह हो नहीं सकता क्योंकि यह बहुत पहुँच वाला और फर्जी आदमी है. गौशाला के नाम पे टैक्स चोरी करता है. अपने ज्वेलरी का प्रॉफिट इधर लगा देता है और टैक्स बचाता है. इसके अलावा गौशाला को किसी एनजीओ एक्ट में रजिस्टर कराया हुआ है, जिसमें जो चन्दा दो उस पर टैक्स छूट है.

यह लोगों से चेक लेता है और 2 प्रतिशत काट के कैश दे देता है. जहाँ 20 प्रतिशत टैक्स लगना है वहाँ 2 प्रतिशत में काम हो जाता है लोगों का. ऐसे करके बहुत बड़े-बड़े लोगों को ओब्लाइज करता है ये, इसलिए ज़्यादा पंगे नहीं ले सकते इससे. वैसे अपनी ज्वेलरी शॉप से पहले मुझे चन्दा दिया है इसने.’

‘तो कहता न कि दुकान पर आए थे धमकाने, यह गौशाला कहाँ से आई बीच में?’

‘गाय माता है हमारी. गौशाला में आग लगाने की धमकी दोगे तो लोग भड़क जाएँगे, इसीलिए इसने गौशाला का बहाना मारा है. अगर मैं बागी लड़ा तो गाय माता को जलाने जा रहा था, ऐसा बोल के पंडितों को ही भड़का देंगे अपने खिलाफ़. अलवर और मेवात में तो आए दिन यह काम होता है.’

‘अब?’

‘अभी कुछ नहीं. कल जमानत होने दो, फिर व्यवस्था करते हैं इन सबकी. चुनाव तो लडूँगा चाहे कास से, चाहे कास के बिना.’

अगले दिन के अख़बार में मुकेश सिनसिनवार का बयान आया—’कास का इस चन्दा वसूली से कोई लेना-देना नहीं है. कास छात्र राजनीति में शुचिता की पक्षधर है और गुंडागर्दी को समर्थन नहीं करती. इसलिए मामला पूरी तरह साफ़ होने तक राघवेन्द्र को न तो कास के किसी पद पर रखा जाएगा और न ही किसी पद के लिए उम्मीदवार बनाया जाएगा. ऐसा करके कास छात्र राजनीति में एक उदाहरण पेश करेगी. यह कहने के साथ ही मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि राघवेन्द्र ऐसा नहीं कर सकता. राघवेन्द्र के ऊपर केस कास की छवि ख़राब करने के लिए किया गया है. कास राघवेन्द्र के साथ है.’

जनता स्टोर की स्टोरी (सांकेतिक इमेज/रॉयटर्स)
जनता स्टोर की स्टोरी (सांकेतिक इमेज/रॉयटर्स)

मुकेश ने बिना राघवेन्द्र को दोषी कहे दोषी भी कह दिया और उसे किसी भी पद पर उम्मीदवार न रखने की बात कहकर चुनाव के टिकट की दौड़ से भी बाहर कर दिया. टाइमिंग के हिसाब से जब यह मुक़दमा हुआ था, इससे उम्मीद नहीं थी कि टिकट घोषित होने तक यह मामला साफ़ होगा और राघवेन्द्र को टिकट मिलेगा.

राघवेन्द्र जिसे कल तक कास की तरफ़ से छात्रसंघ अध्यक्ष पद का सबसे मज़बूत दावेदार माना जा रहा था, वह अब टिकट की रेस से बाहर होने वाला था. लेकिन राघवेन्द्र कभी भी कास की वजह से पहचाना नहीं गया. उसकी अपनी छवि थी जो उसने महाराजा कॉलेज के अध्यक्ष रहते हुए बनाई और उसके बाद यूनिवॢसटी में राजेन्द्र चौधरी को जितवाने में भी कास का कम और उसका बड़ा योगदान था. इसलिए मुकेश सिनसिनवार के यह क़दम राघवेन्द्र को कितना कमज़ोर करते,यह तो पता नहीं; पर हाँ, कास ज़रूर कमज़ोर हो रही थी.


10 अगस्त, 1998

राघवेन्द्र को सोमवार को जमानत मिल गई और बाहर आते ही उसने गोखले हॉस्टल में लड़कों की मीटिंग बुलाकर घोषित कर दिया कि वह किसी से नहीं दबेगा और तैयारी पूरी रहेगी. सारे दोस्त कमर कस लें.

राघवेन्द्र को लग रहा था कि वह अप्रत्यक्ष रूप से निर्दलीय चुनाव लड़ने की बात कहकर मुकेश पर दबाव बनाएगा, पर उसे रत्ती भर भी अन्दाज़ा नहीं था कि मुकेश और सुरेश खुद चाहते हैं कि राघवेन्द्र निर्दलीय लड़े. सुरेश अपने दम पर ढूँडा को हरा नहीं सकता था, जबकि निर्दलीय होकर भी राघवेन्द्र सुरेश से ज़्यादा वोट ले आने की क्षमता रखता था. अगर राघवेन्द्र और ढूँडा की सीधी लड़ाई होती है तो यह दोनों एक-दूसरे के वोट काटेंगे और फ़ायदा सुरेश को होगा.

इसकी सिर्फ़ गौशाला नहीं है, इसकी ज्वेलरी शॉप भी है; लेकिन गौशाला के नाम पे बड़ा खेल खेलता है ये (सांकेतिक इमेज - रॉयटर्स)
इसकी सिर्फ़ गौशाला नहीं है, इसकी ज्वेलरी शॉप भी है; लेकिन गौशाला के नाम पे बड़ा खेल खेलता है ये (सांकेतिक इमेज – रॉयटर्स)

गोखले हॉस्टल की मीटिंग के बाद राघवेन्द्र ने वैसी ही मीटिंग और हॉस्टलों में भी की. वह निर्दलीय चुनाव लड़ने को तैयार था. मयूर उसके चुनाव-प्रचार की प्लानिंग करने लगा. दुष्यन्त के स्पोर्ट्स के दोस्त, मयूर के हॉस्टल के दोस्त, राघवेन्द्र के लोग सबकी लिस्ट बनाकर माइक्रो-प्लानिंग शुरू हो गई थी. अब समय था कि उन्हें पूरी तरह से अपने पक्ष में लाकर प्रचार के लिए राजी करवाया जाए और यह जि़म्मेदारी अब मयूर पर थी.

सुरेश और राघवेन्द्र के बीच में जंग का बिगुल अघोषित रूप से बज चुका था और इसे खुल के बजाने के लिए टिकट के ऐलान का इन्तज़ार था जो सितम्बर के पहले हफ्ते में होना था. फंडा


पुस्तक के बारे में

नब्बे का दशक सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों के लिए इस मायने में निर्णायक साबित हुआ कि अब तक के कई भीतरी विधि-निषेध इस दौर में आकर अपना असर अन्तत: खो बैठे. जीवन के दैनिक क्रियाकलाप में उनकी उपयोगिता को सन्दिग्ध पहले से ही महसूस किया जा रहा था लेकिन अब आकर जब खुले बाज़ार के चलते विश्व-भर की नैतिकताएँ एक दूसरे के सामने खड़ी हो गईं और एक दूसरे की निगाह से अपना मूल्यांकन करने लगीं तो सभी को अपना बहुत कुछ व्यर्थ लगने लगा और इसके चलते जो अब तक खोया था उसे पाने की हताशा सर चढ़कर बोलने लगी.

मंडल के बाद जाति जिस तरह भारतीय समाज में एक नए विमर्श का बाना धरकर वापस आई वह सत्तर और अस्सी के सामाजिक आदर्शवाद के लिए अकल्पनीय था. वृहत् विचारों की जगह अब जातियों के आधार पर अपनी अस्मिता की खोज होने लगी और राजनीति पहले जहाँ जातीय समीकरणों को वोटों में बदलने के लिए चुपके-चुपके गाँव की शरण लिया करती थी, उसका मौका उसे अब शिक्षा के आधुनिक केन्द्रों में भी, खुलेआम मिलने लगा.

पुस्तक का मुखपृष्ठ
पुस्तक का मुखपृष्ठ

यह उपन्यास ऐसे ही एक शिक्षण-संस्थान के नए युवा की नई ज़ुबान और नई रफ्तार में लिखी कहानी है. बड़े स्तर की राजनीति द्वारा छात्रशक्ति का दुरुपयोग, छात्रों के अपने जातिगत अहंकारों की लड़ाई, प्रेम त्रिकोण, छात्र-चुनाव, हिंसा, साजि़शें, हत्याएँ, बलात्कार जैसे इन सभी कहानियों के स्थायी चित्र बन गए हैं, वह सब इस उपन्यास में भी है और उसे इतने प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया गया है कि खुद ही हम यह सोचने पर बाध्य हो जाते हैं कि अस्मिताओं की पहचान और विचार के विकेन्द्रीकरण को हमने सोवियत संघ के विघटन के बाद जितनी उम्मीद से देखा था, कहीं वह कोई बहुत बड़ा भटकाव तो नहीं था?

लेकिन अच्छी बात यह है कि इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद अब उस भटकाव का आत्मविश्वास कम होने लगा है और नई पीढ़ी एक बड़े फलक पर, ज़्यादा वयस्क और विस्तृत सोच की खोज करती दिखाई दे रही है.


किताब का नामः जनता स्टोर
लेखकः नवीन चौधरी
प्रकाशकः फंडा (राधाकृष्ण प्रकाशन का उपक्रम)
उपलब्धता: अमेज़न
मूल्यः 199 रुपए (पेपरबैक)


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