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LGBTQ 4: 'ए मुझे हाथ नहीं लगाना कोई'

वह देश का जाना-माना चेहरा हैं, लेकिन उनका पूरा नाम लिखा जाए- लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, तो आपको थोड़ा सोचना पड़ेगा. वह लक्ष्मी, बल्कि ‘हिजड़ा लक्ष्मी’ के तौर ज्यादा जानी जाती हैं. एक्ट्रेस हैं, भरतनाट्यम डांसर हैं और हिजड़ों के अधिकारों के लिए लड़ती भी हैं.

वह यूनाइटेड नेशंस में एशिया पैसिफिक को रिप्रेजेंट करने वाली पहली ट्रांसजेंडर हैं. ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द तो भाषाई लिहाफ है, समाज उन्हें ‘हिजड़ा’ ही कहता है. महाराष्ट्र के ठाणे में जन्मी लक्ष्मी ने अपनी कहानी एक किताब में लिखी है. किताब का नाम है, ‘मैं हिजड़ा…मैं लक्ष्मी.’ वाणी प्रकाशन ने इसे छापा है.

पेश है इस किताब का एक हिस्सा:

पर मेरी ये चाहत कुछ लोगों को ज्यादा ही खलने लगी थी. नाचना यानी लड़की, औरत… ऐसा समीकरण हमारे समाज ने बनाया है. लोग मुझे बायक्या छक्का, मामू ऐसा कहकर चिढ़ाने लगे थे. मैं नृत्य में अपनी बीमारी भूलने की कोशिश करता था, पर वो आसान नहीं था. मैं एक लड़का था और मुझमें जो कला थी, वो ‘औरत’ की थी. और इसी वजह से समाज की नजर में मैं कलाकार न होकर ‘बायक्या’ था… नाचने वाला था.

लेकिन हैरत तो यह थी कि मैं भी तो सचमुच एक औरत जैसा था. मेरा स्वभाव, मेरा बोलना, मेरा चलना औरतों के जैसा ही था. पर वो वैसा क्यों है, ये समझने के लिए मेरी उम्र काफी नहीं थी. लोगों के इस तरह चिढ़ाने से पहले से ही खुद में खोने वाला मैं और अकेला हो गया.

अकेला था, तो भी अपने पास रहने वाले कुछ गिने-चुने लोगों में मैं खुलता था. उनमें थे मेरे स्कूल के कुछ दोस्त, सहेलियां और ‘दाढ़ीभैया’ मौसेरा भाई विजय प्रताप. हमारे ही घर में रहता था. हमसे उम्र में काफी बड़ा था. हम तीनों भाई-बहनों से वो सगे भाई की तरह प्यार करता था. जैसे हमारा सगा बड़ा भाई ही था. उसकी दाढ़ी काफी बड़ी थी, इसलिए हम उसे दाढ़ी भैया कहते थे. जब हम छोटे थे, तब हमें स्कूल छोड़ना, घर लाना, हमारे डिब्बे पहुंचाना. उसके इन कामों से मां को काफी मदद मिलती थी, और काफी सहारा रहता था. मैं भी उससे बातें करता था. जब भी मैं बीमार पड़ता था, तब वो मेरा बहुत ख़याल रखता था. मुझे वक्त पर दवाइयां देना उसका ही काम था.

‘दाढ़ीभैया’ की शादी के बाद उसकी पत्नी छाया भी हमारे ही घर में रहती थी. बाद में उसके एक लड़की भी हुई सोनू. बहुत प्यारी बच्ची थी, गुलगूले-जैसी. हमारा खिलौना ही था वो. हम लोग बहुत मस्ती करते थे. उससे बहुत प्यार करते थे. शशि तो इतना बदमाश था, सोनू को उठाकर धीरे-से नीचे छोड़ देता था. वो झट से गिरती थी और हम बहुत हंसते थे.

बाद में दाढ़ी भैया को पीलिया हो गया और उसकी मौत हो गई. मुझे बहुत दुख हुआ. दाढ़ी भैया मुझे काफी हद तक समझता था… पर सबके साथ मेरा ऐसा अनुभव नहीं था. जब मैं सात साल का था, तब पहली बार मेरा यौन-शोषण हुआ.

मैं अभी-अभी बीमारी से ठीक हुआ था. चचेरे भाई की शादी थी, इसीलिए गांव गया था, जल्दी-जल्दी दवाइयां लेकर. घर के सभी लोग गये थे. शादी का घर था. भाग-दौड़ मची हुई थी. आसपास के गांवों से, शहर से, बम्बई से ढेर सारे रिश्तेदार आए हुए थे. भरा-पूरा घर था. बड़े लोग काम में मशगूल थे और हम बच्चे खेल-कूद में मशगूल. ऐसे ही एक दिन खेलते-खेलते एक रिश्तेदार का लड़का मुझे अंधेरे कमरे में लेकर गया, और…

वो क्या कर रहा है, ये समझने के लिए मैं बहुत छोटा था. पहले से ही कमजोर, उसमें अभी-अभी बीमारी से उठा हुआ. दवाइयां जारी ही थीं, इस वजह से थोड़ी दवाइयों की मदहोशी भी थी. मैंने उसका प्रतिकार किया या नहीं, पता नहीं. मुझे कुछ याद नहीं; पर उसने जब मेरे अंदर घुसेड़ा तो मुझे बहुत तकलीफ हुई और चक्कर आ गया. बस इतना-सा कुछ-कुछ याद है. उस ने बहुत प्रयासों के बाद मुझे जगाया और धमकाया कि अगर किसी को कुछ बताया तो देख लेना!

मैं पहले से ही शान्त स्वभाव का था. बीमारी की वजह से सब कुछ सहन करने की मुझे आदत हो गई थी. उस पर ये धमकी. मैं किसी को कुछ बताऊं, इसका सवाल ही पैदा नहीं होता था. मां को भी नहीं. उसके बाद उस शादी के घर में इस तरह की घटनाएं बार-बार घटीं. और सिर्फ वही लड़का नहीं, और भी कई लड़के मेरा फायदा उठाते रहे. बहुत तकलीफ हो रही थी. शारीरिक और मानसिक भी. फिर भी मैंने किसी को कुछ नहीं बताया. तब भी नहीं और उसके बाद भी नहीं. सब कुछ सहन करता रहा, मन ही मन कुढ़ता और घुटता रहा.

शादी हो गई. हम लोग अपने ठाणे के घर में वापस आ गये, पर ये सिलसिला खत्म नहीं हुआ. दो-तीन साल तक ये जारी रहा. हम कभी-कभी गांव जाते थे. परिवार का कोई कार्यक्रम हो तो इकट्ठा होते थे. उस वक्त मौका पाकर ये चंद लड़के मेरा फायदा उठाते थे. जैसे मेरे शरीर पर इनका हक था. उन्हें उसी में खुशी मिलती थी, पर मुझे सिर्फ तकलीफ, तकलीफ और सिर्फ तकलीफ. पर ये बताऊं किसे ? कौन भरोसा करेगा मुझ पर?

इस सबकी वजह से मेरी जिन्दगी बिल्कुल बदल गई थी. अपनी जिन्दगी में घटने वाली बहुत-सी बातें मैं घरवालों से, दोस्तों से छिपाने लगा. सब के साथ होते हुए भी अकेला तो था ही, अब अपनी उम्र से बहुत बड़ा होने का एहसास होने लगा. एक तरफ शशि भी बड़ा होने लगा था. वो मेरे से बिल्कुल अलग था. बहुत शैतान, बहुत बदमाश. उन सभी बड़े लड़कों से वो घुलमिल जाता था, उनके साथ खेलता था. अच्छा था वो, इस वजह से सभी लोग उस से प्यार करते थे. पर मुझे ‘उसी’ का डर लगने लगा था. ये प्यार, ये दुलार. इस सबसे कुछ अलग ही हो गया तो….? जो मेरे साथ हुआ वो उसके साथ भी हो गया तो…? फिर मैं उस पर नजर रखने लगा. वो किसके साथ जाता है, किसके साथ खेलता है, क्या करता है. इस तरह से मैं उसके पीछे-पीछे घूमने लगा. मेरे साथ जो बीत रहा है, वो वैसे ही जारी रहे, तो ही शशि सुरक्षित रहेगा, ऐसा मुझे लगने लगा. फिर मुझे चाहे कितनी भी तकलीफ होती तो भी वो सब वैसे ही जारी रहा. कभी-कभी मैं खुद ही आगे बढ़कर….

पर कितने दिन, कितने सालों तक सहन करूंगा ये सब ? मेरे मन के खिलाफ हो रहा था ये सब. दुख, तकलीफ, दम घुटने लगा. उस उम्र में मैंने इन सारी भावनाओं का अनुभव किया. उस वक्त मेरे साथ क्या हो रहा है, ऐसा क्यों लगता है, ये समझ नहीं आ रहा था. अब पता चलता है, लेकिन उस वक़्त मेरे पास कोई चारा नहीं था. इसलिए सब होने देता था. वो भी छुप-छुपकर घर के लोगों को कुछ पता नहीं चलेगा, इस हिसाब से. पर धीरे-धीरे इन सबसे मैं ऊब गया. थोड़ा बड़ा हो गया था. खुद के विचार बनने लगे थे. इन सब बातों को मैं फिर खुद ही टालने लगा. पहले तो थोड़ा-सा डरता था, लेकिन बाद में मना करने लगा.

पहली बार जब मैंने इन सब बातों को मना किया, तो ये लड़के गुस्सा हो गए. उन्होंने मुझे थोड़ा समझाने की कोशिश की. कुछ ब्लैकमेल भी किया. मैं डर गया और फिर वो होने दिया. इसके बाद एक बार फिर मैंने उनकी बात नहीं सुनी, उनकी धमकी से भी नहीं डरा. फिर उन्होंने जबरदस्ती की. पर मेरी समझ में आ गया था, कि अगर मैंने भी उनके जैसी दादागिरी की तो शायद ये लड़के मेरा पीछा छोड़ देंगे. मैं अब उनकी बात नहीं सुनूंगा, इसका एहसास उन लोगों को हो गया था. मुझे भी लगा कि थोड़ा और अग्रेसिव हो गया तो वो मुझसे पंगा नहीं लेंगे. फिर मैंने वैसा ही किया. ‘ए मुझे हाथ नहीं लगाना कोई’ ऐसा धमकाने पर वो लड़के दूर हो गए.

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