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'द्रविड़ ने बहुत नाजुक शब्दों से मुझे धराशायी कर दिया था'

रामचंद्र गुहा ने जब 1965 में इस खेल को फॉलो करना शुरू किया था, तब विश्व क्रिकेट में भारत का कद बहुत छोटा था. देश ने तब तक विदेशी धरती पर एक भी टेस्ट मैच नहीं जीता था. कुछ 50 साल बाद जब वो बीसीसीआई में शामिल हुए, भारत इस खेल पर एकछत्र राज कर रहा था. क्रिकेट का कॉमनवेल्थ इस बदलाव की कहानी है. इस किताब के जरिये आप भारत में स्कूल, कॉलेज, क्ल, राज्य और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले क्रिकेट की नस-नस से वाकिफ हो सकते हैं. ये किताब स्थानीय नायकों, प्रांतीय उस्तादों और अंतर्राष्ट्रीय सितारों की चमकदार तस्वीर पेश करती है.


अगर मेरी याद्दाश्त ठीक है तो मैंने द्रविड़ से पहली बार इंडिया और पाकिस्तान के बीच 2005 में हुए टेस्ट मैच से एक शाम पहले हाथ मिलाया था. उस वक़्त तक रिटायर हो चुके जवागल श्रीनाथ ने एक छोटी-सी स्पीच दी थी और जिसे वो ‘जीता जागता लेजेंड’ कहते थे, उससे उन्होंने अगले दिन अपने शहर के दर्शकों के सामने शतक मारने को कहा. द्रविड़ ऐसा नहीं कर सके. उनका चिन्नास्वामी पर रिकॉर्ड एकदम वैसा ही है जैसा सचिन का लॉर्ड्स पर है. लेकिन उन्होंने दुनिया भर में इतने शतक मारे हैं कि वो हमेशा इस शहर के प्यारे रहे.

एक अजीब इत्तेफ़ाक के चलते द्रविड़ से मेरी सभी मुलाक़ात हवाई अड्डों पर ही हुई हैं. एक बार जब वो कर्नाटक और इंडिया, दोनों के कप्तान थे, मैंने एक एयरलाइन स्टूअर्डेस के सामने (बेहद सौम्यता के साथ) उलाहना दिया कि फ्रेंड्स यूनियन क्रिकेट क्लब के एक बेहतरीन ऑल-राउंडर पर सेलेक्टर्स ध्यान ही नहीं दे रहे थे. एक और मौके पर हम जिस दिन चेक-इन काउंटर पर मिले, एक ऐसे लेखक को पद्म भूषण मिला था जिसे हम दोनों जानते थे. द्रविड़ को इस बात का आश्चर्य हुआ कि उस लेखक को उससे पहले पद्म श्री क्यों नहीं मिला था (ये एक ऐसी चीज़ है जो शायद कोई और भारतीय क्रिकेटर नहीं पकड़ पाता).

उस दिन हम एक ही फ़्लाइट में थे. लेकिन मैं बिज़नेस क्लास में था और द्रविड़ इकॉनमी क्लास में. ऐसा इसलिए हुआ था क्यूंकि जहां मैं कुछ कम्पनी एग्ज़ीक्यूटिव्स को सम्बोधित करने जा रहा था, वहीं द्रविड़ कर्नाटक की रणजी टीम के साथ यात्रा कर रहे थे. मुझे बड़ा ही अजीब लगा और जैसे ही जहाज़ की पेटी बांधे रखने वाला निशान बुझा, मैं उठकर पीछे गया. मैंने देखा कि फ़ास्ट बॉलर आर विनय कुमार अपनी सीट में बैठे हुए उछल रहा था, क्यूंकि उसके कानों में रॉक म्यूज़िक बज रहा था. वहीं उसके ठीक बगल में मेरे राज्य या मेरे देश के लिए खेलने वाला सबसे अक्लमन्द खिलाड़ी बैठा हुआ नंदन नीलेकनी की हाल ही में छपी किताब इमेजिनिंग इंडिया के पन्नों में डूबा हुआ था.

द्रविड़ ने एक बार मेरी भी किताब पढ़ी थी जिसके बारे में मुझे बेहद मज़ेदार तरीक़े से मालूम पड़ा था. 2007 में इंडिया इंग्लैंड में एक वन-डे सीरीज़ खेल रही थी. द्रविड़ हमारे कप्तान थे, लेकिन वो अब विकेटकीपिंग नहीं करते थे (धोनी करते थे). आप द्रविड़ से स्लिप में खड़े होने की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन उन्होंने ख़ुद को मिड-ऑफ़ पर रखा हुआ था. शायद उन्हें बॉलर से बात करने में आसानी होती होती थी और मैदान पर जो चल रहा था, उसकी एकदम साफ़ तस्वीर देख सकते थे. एक ऐसे मैच के बाद, जिसमें स्लिप्स में दो या तीन कैच गिरे थे, मैंने बैंगलोर में अपने घर से भारतीय कप्तान को ख़त लिखा :

प्रिय राहुल,

आप भारतीय क्रिकेट के इतिहास में शायद सबसे कमाल के टेस्ट बैट्समैन हैं और बिना शक किसी भी फ़ॉर्मैट में स्लिप्स में खड़े होने वाले सबसे बेहतरीन फ़ील्डर हैं. आपको वहीं फ़ील्डिंग करनी चाहिए. मुझे ये समझ में आता है कि अपनी गेंदबाज़ी में कुछ अस्थिरता के चलते आप गेंदबाज़ों के नज़दीक रहते हुए उन्हें समझाना पसन्द करते हैं. लेकिन इन सभी बातों को देखते हुए भी मुझे यही लगता है कि स्लिप ही आपके लिए सबसे अच्छी जगह है. उस पोज़ीशन पर फ़ील्डिंग करने के मामले में भारत में कोई भी आपके आस-पास भी नहीं आता है और इसीलिए शुरुआती ओवरों में इतने कैच छूटते हैं.

शुभकामनाओं के साथ
राम

India Vs New Zealand Test Series
अब भारतीय टीम के कोच हैं राहुल द्रविड़. (तस्वीर- पीटीआई)

दो या तीन दिन में उनका जवाब आया. जवाब मेरे अनुरोध के बारे में नहीं था बल्कि मुझे ये बताया गया था कि उन्होंने मेरी वो किताब पढ़ी है जो हाल ही में मैंने स्वाधीन भारत के इतिहास पर लिखी थी. भारतीय कप्तान ने लिखा था,

‘आप एकदम ठीक कह रहे थे. हमारा इतिहास गांधी पर रुका हुआ मालूम होता है और असल में तब से लेकर अभी 60 साल बाद तक इतना कुछ हो चुका है जिसकी बदौलत हम जहां हैं, वहां हैं. मैंने करीब 180 पन्ने पढ़े हैं और अभी बहुत कुछ पढ़ना है. मुझे अच्छा लगेगा अगर कभी हम इसके बारे में बात करें.’

द्रविड़ को मेरा भेजा गया मेल बगैर उनकी जानकारी के, बगैर किसी ठोस वजह के भेजा गया था. क्रिकेटीय शब्दों में बात करूं तो यूं समझिये कि किसी मध्यम गति के गेंदबाज़ ने बाउंसर डाली हो और बल्लेबाज़ ने कलाइयों के सहारे उसे बाउंड्री की राह दिखा दी हो. उन्होंने जिस तरह से मुझे धराशायी किया था, वो लाजवाब था. लेकिन इसके लिए उन्होंने बेहद नाजुक शब्दों का चुनाव किया था. उन्होंने मुझे बेहद सौम्य तरीके से ये बता दिया था कि मुझे क्रिकेट की रणनीति के बारे में अपना मुंह बन्द रखना चाहिए और इतिहास की किताबें लिखने की ओर लौट जाना चाहिए. (मैंने ऐसा ही किया भी.)

पुस्तक – क्रिकेट का कॉमनवेल्थ
लेखक – रामचंद्र गुहा
अनुवाद – केतन मिश्रा
प्रकाशक – हार्पर कॉलिन्स
भाषा ‏-‎ हिंदी
मूल्य – किंडल एडिशन 339 रुपये; पेपरबैक 399 रुपये

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