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क्या कभी तुमने शैतान और ईश्वर को एक साथ देखा है?

सत्य3 अप्रैल को निर्मल वर्मा का बड्डे होता है. निर्मल ने अपनी ज़िन्दगी में खूब लिखा. साहित्य अकादमी से लेकर ज्ञानपीठ जैसे पुरस्कार उनको मिले. निर्मल की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमाचल की पहाड़ी छायाएं दूर तक पहचानी जा सकती हैं. हिन्दी कहानी में आधुनिक-बोध लाने वाले कहानीकारों में निर्मल वर्मा का अग्रणी स्थान है. आज पढ़िए उनकी किताब ‘वे दिन’ के अंश.


वह एक उजला दिन था. सर्दियों में कभी-कभी अचानक ऐसे दिन आ जाते थे, जब लगता, सर्दियां ख़त्म हो रही हैं. बीच का एक गर्म उज्ज्वल दिन-पानी लिखी हुई कॉपी के बीच एक अनलिखा, कोरे पन्ने-सा सफ़ेद और विस्मयकारी. वह सपने-सा लगता. ट्राली बस की तारों पर पक्षियों की काली क़तार लग जाती, धूप में अपने पंख सेंकती हुई.

हम इन्हें ‘झूठे बसंत’ के दिन कहा करते थे. वे ज़्यादा टिकते नहीं थे. लेकिन जब वे आते थे, लोग आतुरता से उन्हें निचोड़ लेते थे- आखिरी बंद तक. शहर की सड़कें लोगों से भर जातीं. एम्बेंकट की बेंचों पर बूढ़ी औरतें, अपने-अपने पैरम्बुलेटर के समय ऊंघती रहतीं.

तब सहसा मुझे वह आवाज़ सुनाई दी थी. आवाज़ भी नहीं-महज़ एक सरसराहट-बर्फ़ और धूप में दबी हुई. मुझे हमेशा यह आवाज़ अचानक अकेले में पकड़ लेती थी, या शायद जब मैं अकेला होता था, तभी उसे सुन पाता था. वह दरिया की ओर से आती थी-किन्तु वह दरिया की ही आवाज़ है, इसमें मुझे सन्देह था. वह सिर्फ़ हवा हो सकती थी-तीख़ी सफ़ेद और आकारहीन. या सिर्फ़ शहर का शोर, जो पुराने मकानों के बीच आते ही अपना स्वर बदल देता था. घरों के बीच एक गिरता हुआ नोट-पेड़ों, छतों, गलियों के ‘की-बोर्ड’ पर सरसराता हुआ बर्फ़ की सफ़ेदी पर एक भूरी-सी आहट-सा.

मैं अब इन पुराने मकानों के बीच चल रहा था. सड़क का नाम था- विनोहरादी – अंगर लताओं का स्क्वायर. बरसों पहले यहां शराब बनाई. जाती थी. फ्रांज़ इस स्क्वायर के अन्तिम छोर पर रहता है- या रहता था, अब उसका एपार्टमेंट खाली है. लेकिन उस दिन वह वहां था और तब कोई. नहीं जानता था कि कछ दिनों बाद वह प्राग में नहीं होगा.

उसके एपार्टमेंट से पहले चेखोवी-गार्डस आते थे और में हमेशा उनके बीच से गुज़रकर सड़क पार किया करता था. सर्दियों में सब पेड़ों के पत्ते झर जाते थे, लेकिन चेखोवी- गार्डंस के पाइन वृक्षों की सूइयां अलग नहीं होती थीं. वे नीचे झुक जाती थीं-एक ठिठुरते जानवर की तरह, जो सर्दी से बचने के लिए अपने सब अंग समेट लेता है; और तब लगता था जैसे बर्फ़ के सफ़ेद सागर के बीच वह एक नीला द्वीप हो-अपनी ही गर्मी में लिपटा हुआ. उस दिन सारा बाग वीरान था. नंगे तोपोल पेड़ों के नीचे पर की बेंचें ख़ाली पड़ी थीं. मझे जलाई-अगस्त की वे रातें याद हो आईं जब यूनिवर्सिटी के छात्र अपनी-अपनी लड़कियों के साथ बाग़ के अंधेरे कोनों में बैठे रहा करते थे. बीचों-बीच कवि चैख़ की काली मूर्ति चुपचाप खड़ी रहती लोग शराब और बियर की बोतलों को मूर्ति के ‘पेडेस्टल’ पर छोड जाते थे-फिर देर रात में ग़रीब बूढ़ी औरतें प्रेतनियों की तरह बाग़ में घुस आती थीं और ख़ाली बोतलों को अपनी स्कर्ट्स की लम्बी जेबों में ठुँसकर अँधेरे में गायब हो जाती थीं.

यह पिछली गर्मियों में था. और उससे पिछली गर्मियों में जो इस शहर में मेरी पहली गर्मियां थीं. उन्हीं दिनों पहली बार में फ्रांज से मिला था. प्राग-स्प्रिंग का एक कन्सर्ट था, जिसमें मैं और टी.टी. गए थे. वही कन्सर्ट-हॉल के गलियारे में टी.टी. ने मेरा परिचय फ्रांज़ से कराया था. उसी शाम उसने मुझे और टी.टी. को अपने ‘स्टूडियो’ में आमन्त्रित किया था. मैंने सोचा, यह पेंटर है. वह लग भी रहा था. उसकी बड़ी ऑलकोहलिक आंखें, लम्बा जिप्सी-टाइप स्वेटर और लम्बे मैले नाख़ून. उसने अपना एक हाथ बहत ही सीधी-सादी लडकी के कन्धे पर रखा था. “यह मेरी लडकी है,” उसने हमसे कहा. वह हंसने लगी थी. वह मारिया थी, यह हमने बाद में जाना था. हम बाद में उससे कई बार मिले थे, फ्रांज़ के स्टूडियो में ही.

वह स्टूडियो नहीं था और न फ्रांज़ पेंटर ही. उस शाम जब हम उसके कमरे में गए तो सिर्फ़ एक बड़े पियानो और सोफ़ा के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दिया. कमरे के बीच में ही एक तार लगी थी जिस पर उसके मोज़े और अंडरवियर सूख रहे थे. पियानो के सामने दीवार पर नियिन्सकी का एक चित्र था…पेत्रोश्का के वेश में…उसके साथ ही स्त्राविन्सकी खड़े थे.

“क्या कभी तुमने शैतान और ईश्वर को एक साथ देखा है?’ उसने. पाइप सुलगाते हुए मेरी ओर देखा. फिर उस फ़ोटो की ओर इशारा किया. “मैं दोनों को ही अपने स्टूडियो में रखता हूं,” उसने हंसते हुए कहा.

यह हमारे परिचय की शुरुआत थी.

सारी शाम वह अपने बारे में ही बोलता रहा था. उसे अपन बार ही बोलना अच्छा लगता था-एक ईगोइस्ट की तरह नहीं; एक बच्चे की तरह, जो अपने स्टैम्प-एलबम हर आदमी को गर्व से दिखाता है. यह कहने की बजाय कि देखो, यह अर्जनटाइना का टिकट है, यह ग्रीनलैंड का वह सिर्फ़ यह कहता था कि देखो, यह मेरा प्रेम है, यह मेरी घृणा. मैं इस पर मर सकता हूं. मैं उस पर थूकता भी नहीं. उसके पास शब्द ज़्यादा नहीं थे. वह जर्मन था और अंग्रेजी बहत कम आती थी. चेक उससे भी कम. वास्तव में सिनेमाटोग्राफी के छात्रों को चेक सीखने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी. (फ्रांज़ को पूर्वी जर्मन से यहाँ सिनेमा-स्कूल में अध्ययन करने का स्कॉलरशिप मिला था.) जब कभी बोलते हुए उसे अंग्रेज़ी का शब्द नहीं मिलता था, वह उसका जर्मन शब्द मारिया को बता देता था और मारिया हमारे लिए उसका अनुवाद चेक में कर देती थी. मारिया को अंग्रेज़ी आती थी, पर वह बोलती थी चेक में. फ्रांज़ को चेक नहीं आती थी. मुझे और टी.टी. को जर्मन. और कभी-कभी हम जल्दी में बोलते हुए हड़बड़ा जाते थे कि किसके साथ हमें किस भाषा में बोलना चाहिए. यह सिर्फ़ पहले ही दिन हुआ था. बाद में हम आदी हो गए थे.


पुस्तक अंश – वे दिन

लेखक – निर्मल वर्मा

प्रकाशक – वाणी प्रकाशन

पेज – 210

कीमत – 195 (पेपरबैक)


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