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धर्म के नाम पर जितनी मूर्खताएं भारत में होती हैं, उतनी शायद ही कहीं और होती होगी

सत्यसरदार खुशवंत सिंह. तमाम जिंदगी कागज कारे करता रहा. मर गया है, तो क्या हुआ. उसका लिखा तो अभी भी छप रहा है. तो जब तक कोई पढ़ता रहेगा, खुशवंत का नाम लिया जाता रहेगा. सब जतन भी तो इसी का है. 30 से ज्यादा किताबें लिखी. ‘ट्रेन टु पाकिस्तान’, ‘हिस्ट्री ऑफ सिख्स’ और ‘सच प्यार और थोड़ी से शरारत’ प्रमुख किताब रहे. अभी बात ‘सच प्यार और थोड़ी से शरारत’ की. हालिया दिनों में कई लोग बिना किसी प्रमाण के अ-वैज्ञानिक फैक्ट्स को शेयर कर रहे हैं. ज्योतिषविद्या और नक्षत्रों के नाम पर अतार्किक बातें कह रहे हैं. इसको लेकर खुशवंत लिखते हैं-


भारत का नया धर्म, कर्म की नैतिकता पर आधारित होना चाहिए. इसमें फुरसत का इतना समय तो मिलना चाहिए कि आदमी नए काम के लिए अपनी कार्यशक्ति को फिर से बटोर सके, मगर गैर-सर्जनात्मक मनोरंजन को निरुत्साहित किया जाना चाहिए. हमें समय बर्बाद नहीं करना चाहिए. पैगम्बर मोहम्मद की एक हदीस में कहा गया है, ‘ला तसब्बूदहरा हू वल्लाहू’- ‘वक्त बर्बाद मत करो; वक्त ही खुदा है.

ऐसे तमाम रीति-रिवाजों को छोड़ देना चाहिए जिनसे भौतिक समृद्धि पैदा नहीं होती. तपस्या, वानप्रस्थ और संन्यास को जो धार्मिक स्वीकृति मिली हुई है, उसे लौटा लेना चाहिए. जो लोग पुण्य कमाना चाहें, उन्हें एकान्त गुफाओं में या गंगा के किनारे साधना करने की जगह गरीबों और लाचारों के बीच काम करना होगा. सैकड़ों शंकराचार्यों, चिन्मयानन्दों और ऐसे ही तमाम महात्माओं को इकट्ठा कर लिया जाए तब भी मेरे लिए उनके बजाय मदर टेरेसा, भगत पूरन सिंह, एला भट्ट और पी. के. माधवन का महत्त्व कहीं ज्यादा रहेगा. ध्यान के तो एक ही तरीके की मैं सिफारिश कर सकता हूं. हर रात सोने के पहले शीशे में अपना चेहरा देखिए- अपनी ही आंखों में झांकना आसान काम नहीं है- और अपने-आपसे पूछिए, ‘क्या आज मैंने किसी के साथ कोई बुराई की है?’

जिस एकमात्र सिद्धान्त को मैं मानता हूं, वह है- अहिंसा. यह सचमुच परमोधर्मः है. बाकी बातों का विशेष महत्त्व नहीं है.

धर्म का सहारा लेकर और भी बहुत से बेतुके विश्वास चलते हैं. इनमें मेरी सूची में सबसे ऊपर है- ज्योतिष, हस्तरेखा, अंकशास्त्र या फिर भृगुसंहिता-जैसे पुराने ग्रन्थों के आधार पर भविष्यवाणी. तमाम हिन्दू बच्चों की जन्म-पत्रियां बनती हैं. जन्म-पत्रियां मिलाकर ही शादियां तय होती हैं. सदियों का अनुभव यह बतलाता है कि सितारों की गति से दुनिया की घटनाओं का मेल बैठाने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मगर फिर भी ज्योतिष में हमारा कट्टर विश्वास हिलता नहीं. पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठे अपने दुश्मन अफगानों से संख्या में दस गुने होने के बावजूद हार गए, क्योंकि उनके सेनापति ने सामान्य समझदारी का इस्तेमाल करने के बजाय राजज्योतिषी की बात मान ली. सन 1962 के अष्टग्रह योग के समय हमारे ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि 3 फरवरी की शाम साढ़े-पांच बजे दुनिया का अन्त हो जाएगा. तमाम रेलें, हवाई जहाज और बसें खाली चल रही थीं. लोग अपने परिवारों के साथ घर में घुसे बैठे थे. देवताओं को तुष्ट करने के लिए हवन में टनों घी जलाया गया. हुआ कुछ भी नहीं. बस हिन्दुस्तान दुनिया की नजरों में निहायत बेवकूफ और पिछड़ा हुआ देश साबित हो गया. एक भी ज्योतिषी ने इन्दिरा गांधी या उनके बेटे राजीव की हत्या की पेशीनगोई नहीं की थी. हालांकि इन हत्याओं के बाद अपनी आदत के अनुसार बहुतों ने ऐसा करने का दावा किया था. मेरे दोस्त चरणजीत सिंह ने अपनी जितनी भी जन्म-पत्रियां बनवाई थीं, उन सबमें उनकी उम्र सत्तर साल से ऊपर बताई गई थी. वे इक्यावन साल की उम्र में गुजर गए. एक मशहूर ज्योतिषी हैं जिनकी भविष्यवाणियां मैं हिन्दुस्तान टाइम्स में छापता था और प्रधानमंत्री और मंत्री भी उनसे सलाह लेते हैं. उनकी बेटी ने अपनी शादी होनेवाले पति की कुंडली से अपनी कुंडली के मिलान के बाद ही तय की थी, पर वह शादी एक महीने भी नहीं चली.

तंत्र-मंत्र में भी लोगों का विश्वास बना ही हुआ है. श्रीमती गांधी दुष्ट शक्तियों को हराने के लिए अपने घर में तान्त्रिक क्रियाएं करवाती थीं. गृहमंत्री बूटा सिंह और लोकसभा के अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने राजीव गांधी को देवरहा बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए राजी किया था. ये बाबा नंगे एक पेड़ पर बैठे रहते थे. इन्होंने उन लोगों के ललाट से अपने पैर का अंगूठा छुआया. कुछ हफ्तों बाद ही राजीव गांधी का प्रधानमंत्री पद छिन गया और बूटा सिंह और जाखड़, दोनों ही संसद का चुनाव हार गए. बहुत-से मुख्यमंत्री तंत्र-साधना करते हैं. उड़ीसा के जानकीबल्लभ पटनायक और आन्ध्र प्रदेश के एन.टी. रामाराव ऐसे ही मुख्यमंत्रियों में से हैं. तमिलनाडु की जयललिता हर रोज अपने ज्योतिषी से सलाह लेती हैं. ज्यादातर हिन्दुस्तानी राजनेता, जिनमें प्रधानमंत्री नरसिंह राव भी शामिल हैं, राहु-काल- अशुभ समय- की धारणा में विश्वास करते हैं, ज्योतिष की पत्रिकाएं बहुत बिकती हैं और बड़े-बड़े ज्योतिषी ढेरों पैसा पीटते हैं. आसानी से बेवकूफ बन जाने वाले लोगों के लालच से पैदा किए हुए रुपये से बढ़कर और हराम की कमाई क्या होगी! मैं तो चाहता हूं कि धार्मिक मंच से ज्योतिष की आलोचना हो.

हर धर्म अपने समय की मांग से पैदा हुआ है और अपने समय की सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के हिसाब से पनपा है. धर्मों को हमेशा-हमेशा के लिए चिरन्तन सत्य घोषित करना विशुद्ध बकवास है. जब दुनिया की जनसंख्या बहुत कम थी और इसमें से भी बहुत बड़ा हिस्सा लड़ाइयों, अकाल और महामारियों की भेंट चढ़ जाता था, तब धर्मगुरुओं के इस आदेश में कुछ तर्क था कि लोग दुनिया में आकर फूलें-फलें- आबादी बढ़ाएं. जब आदमियों के लड़ाइयों में मारे जाने के कारण औरतों की आबादी मर्दों से ज्यादा हो गई थी, तब बहुविवाह की इजाजत देने का कोई औचित्य था. आज दुनिया के बहुत-से हिस्सों में- सबसे बढ़कर तो हिन्दुस्तान में- आबादी बेइंतहा बढ़ गई है और मर्द-औरतों का अनुपात लगभग वही है. (ऐसे में) दो शादियों पर मजहबी एतराज होने चाहिए और किसी जोड़े के एक से ज्यादा बच्चे होने पर भी. एक-दूसरे के प्रति वफादार रहने की शपथ से भी ज्यादा जरूरी उन्हें यह कसम दिलाने की कोशिश करना है कि पहले बच्चे के जन्म पर वे दोनों अपनी मर्जी से अपने को नसबन्दी के लिए पेश कर देंगे. जो धार्मिक समुदाय जन्म-नियन्त्रण को अधर्म मानते हैं, उन्हें भी कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए. हिन्दुस्तानी किसी भी मजहब के हों, देश के भविष्य की चिन्ता किए बगैर परिवार बढ़ाते जाते हैं. राष्ट्रपति गिरि के सोलह बच्चे थे, प्रधानमंत्री नरसिंह राव के आठ हैं और बिहार के मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव तो अभी भी जवां मर्द बने हुए हैं. उनके नौ बच्चे हैं. इन लोगों में से कोई भी कैथोलिक या मुसलमान नहीं है जिन पर अन्धाधुंध बच्चे पैदा करने का इल्ज़ाम लगा करता है.

सिर्फ एक बच्चे के आदर्श को मैं विवाह की प्रतिज्ञाओं का हिस्सा ही नहीं बनाऊंगा, बल्कि लड़की के मां-बाप को बढ़ावा दूंगा कि दहेज में उसे शादी करवानेवाले पंडितजी से उस पर स्वस्तिवाचन करवाके कंडोम जरूर दें.

एक और परंपरा है जिसे धार्मिक स्वीकृति मिली है और जिसमें भारी बदलाव की जरूरत है. वह है- हिन्दुओं, सिखों, जैनों और बौद्धों में प्रचलित मृतक संस्कार. पुराने जमाने में इसके दो तरीके चलन में थे- चितादाह और जल-प्रवाह. अधजले शरीर को आज भी चोरी-छिपे नदी में बहा दिया जाता है. पर सबसे ज्यादा प्रचलित तरीका है, उन्हें चिता पर जलाना. गैस या बिजली के शवदाह यंत्र गिने-चुने बड़े-बड़े शहरों में ही हैं. हमेशा इनका इस्तेमाल पढ़े-लिखे अमीर ही करते हैं या फिर उनमें भिखमंगों की लावारिस लाशें जलाई जाती हैं. एक चिता में एक लाश जलाने के लिए औसतन दो क्विंटल लकड़ी की जरूरत पड़ती है. दिल्ली में हर रोज सौ से ऊपर हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध मरते हैं. बम्बई और कलकत्ता-जैसे दूसरे बड़े शहरों में मौत की दर और भी ऊंची है. हिसाब लगाया गया है कि हर साल इंसानी मुर्दों को जलाने में दो करोड़ क्विंटल लकड़ी बर्बाद होती है. जिस देश में पहले ही जंगलों की कमी खतरे की हद तक पहुंच गई है, जिससे मिट्टी कटने लगी है और बांधों में गाद भर गई है, वहां रोज जंगल-के-जंगल जलकर राख हो जाते हैं. इसका इलाज और ज्यादा गैस और बिजली के शवदाह यंत्र बनाकर नहीं हो सकता क्योंकि हमारे पास इसके लिए साधन नहीं हैं, बल्कि हर गांव, कस्बे और शहर के नजदीक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध कब्रिस्तान बनवाकर हो सकता है. इनमें से किसी भी धर्म में लकड़ी की चिता पर ही शवदाह करने का कोई निर्देश नहीं है. दक्षिण भारत में बहुत-से हिन्दू समुदायों में मुर्दों को दफनाया जाता है. अन्नादुरै और सी. रामचन्द्रन को दफनाया गया था. संसद-सदस्य और गीता के महान व्याख्याता स्वामी चिन्मयानन्द को कुर्सी पर बैठी अवस्था में दफनाया गया था. कई जैन मुनियों को भी दफनाया ही गया है. इन कब्रिस्तानों में ईसाई और मुसलमान कब्रिस्तानों की तरह पक्की कब्रें न हों. जगह बचाने के लिए मुर्दों को सीधे खड़ी हालत में दफनाया जाए और ऊपर स्मारक-पट्ट भी न लगाए जाएं. इसके बदले उस जगह पर निशानी के लिए एक पेड़ रोप दिया जाए या फिर हर पांचवें साल हल चलाकर वह जमीन खेती में ले ली जाए. समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग अपने मृतकों को किनारे से कुछ दूर समुद्र में विसर्जित कर सकते हैं.

मैंने अपने वसीयतनामे में लिख दिया है कि मुझे किसी भी धार्मिक क्रिया के बगैर बहाई कब्रिस्तान में दफनाया जाए. बहाइयों ने मेरा अनुरोध इस शर्त पर मंजूर कर लिया कि वे मेरी आत्मा के लिए प्रार्थना करेंगे. चूंकि आत्मा को मैं मानता ही नहीं इसलिए मुझे इस बात की परवाह भी नहीं है.

हमें पेड़ों की पूजा का रिवाज फिर से शुरू करना चाहिए- धार्मिकता के लिहाज से नहीं, बल्कि आनेवाली पीढ़ियों के लिए उन्हें महफूज रखे जाने की खातिर. चिपको आन्दोलन को धर्म का सहारा मिलना चाहिए. इसके बदले सिन्थेटिक सामग्री का उपयोग हो सकता है जो अब बहुतायत से मिलने लगी है. हरियाणा और राजस्थान के बिश्नोइयों- जैसे भी समुदाय हैं जिनमें पेड़ काटने और जानवरों को मारने की मनाही है. उनके इस रिवाज को सभी पर लागू किया जाना चाहिए. जानवरों के शिकार पर धार्मिक प्रतिबन्ध लग जाना चाहिए. जानवर तो एक-दूसरे को खाकर ही जीते हैं, लेकिन इंसानों के पास तो खाना जुटाने के और भी साधन हैं. उन्हें अपने शरीर को जानवरों का कब्रिस्तान बनाने से विमुख किया जाना चाहिए.

पेड़ रोपना हमारी धार्मिक रीति और शिक्षा व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बना दिया जाना चाहिए. हर मुंडन, जनेऊ या विवाह संस्कार में एक निश्चित संख्या में पेड़ लगाना जरूरी बना दिया जाना चाहिए. छात्र जब तक एक निश्चित संख्या में पेड़ लगाने और उन्हें पाल-पोसकर स्वस्थ बनाने का सबूत न दें, उन्हें डिग्री या डिप्लोमा नहीं दिए जाने चाहिए. लोग मरते समय दान के तौर पर जो रकम छोड़ जाते हैं, उससे मन्दिर, मस्जिद, स्कूल या अस्पताल बनाने के बजाय पेड़ लगाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. वृक्षारोपण एक राष्ट्रव्यापी जन-आन्दोलन बन जाना चाहिए. तभी हम अपने देश को वैसा ही हरा-भरा स्वास्थ्यकर और तन्दुरुस्त बना सकेंगे जैसा यह हमारे पुरखों के समय में था. यह अकेले सरकार के किए नहीं होगा. अगर आज धर्म के कोई मानी हो सकते हैं तो वह तभी, जब वह ऐसे आन्दोलनों को अपना नैतिक आधार दे. मुझे लगता है कि जब तक मैं अपने विचारों को ज्यादा विस्तार से सामने न रखूं, मेरी जिन्दगी की कहानी पूरी नहीं होगी.


किताब का नाम – सच प्यार और थोड़ी से शरारत

लेखक – खुशवंत सिंह

प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन

पेज संख्या – 387

कीमत – 360/- रुपये


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