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क्या तीसरी कसम फिल्म का अंत शैलेंद्र और रेणु बदलना चाहते थे?

सत्य4 मार्च को अनूठे कथा-शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु का हैप्पी बड्डे होता है. उनके चाहने वाले सब जगह उन्हें अपने-अपने ढंग से याद कर रहे हैं. यह इसलिए है क्योंकि रेणु को पढ़ कर उन्हें भुलाना मुश्किल है. उनकी सहजता, भाषा और उस भाषा से उठती मिट्टी की सोंधी महक आपको अपनी ओर खींचती है. अभी पढ़िए उनकी रचनावली से एक रोचक किस्सा.


तीसरी कसमको जानबूझ कर फेल किया गया था

‘तीसरी कसम’ के निर्माण के समय बंबई आया था और अब आया हूं ‘मैला आंचल पर आधारित ‘डागदर बाबू’ के निर्माण के सिलसिले में. अब की बार यहां के फिल्म उद्योग की फिजा ही बदली-बदली-सी या कह लीजिए बदलती-सी नजर आयी. यह कैसा परिवर्तन है कि लेखक शर्ते रखता है और सब उन शर्तों को पूरा करते हैं. हमारी कहानी में हीरो फलां को लेना होगा, हीरोइन फलां.’ बल्कि हीरोइन किस रंग की साड़ी पहनेगी. यहां तक सुना है कि लेखक द्वय सलीम-जावेद ने लेखक की इज्जत को बुलंद कर दिया है. लेखक को उसका स्थान दिलाने का यह जो काम सलीम-जावेद ने कर दिखाया है, उसके लिए लेखक सदा उनके आभारी रहेंगे.

वरना इस उद्योग में लेखक की हस्ती ही क्या थी? लेखक या तो मुंशी होते या पंडित जी. वेतन या पारिश्रमिक नाम का, शायद सबसे कम. इस दीन-हीन प्राणी ने जो संवाद लिख दिया जरूरी नहीं कि हीरो-हीरोइन या अन्य पात्र बोलें ही. जिस शब्द पर अटक गया या उच्चारण नहीं कर पाया तो मुंशी-पंडित दोषी.

यही वजह रही कि प्रेमचंद और अन्य जो भी साहित्यकार यहां आये, निराश होकर लौट गये.

‘तीसरी कसम पूरी हो चुकी थी. शैलेंद्र के बुलावे पर मैं बंबई आया. इस बार मुझे होटल में ठहराया गया, क्योंकि मैं शैलेंद्र का नहीं, फाइनांसर का अतिथि था. शैलेंद्र ने बताया कि वे लोग फिल्म का अंत बदलकर हीरामन-हीराबाई को मिला देना चाहते हैं. शैलेंद्र का रोम-रोम कर्ज में डूबा हुआ था फिर भी वे इसके लिए तैयार नहीं थे. उनका जवाब था कि बंबइया फिल्म ही बनानी होती तो वे तीसरी कसम’ जैसे विषय को लेते ही क्यों? और जब वह विषय लिया है तो उसका मतलब है कि वे कुछ अलग काम कर दिखाना चाहते हैं. दवाब से तंग आकर आखिर उन्होंने कह दिया कि लेखक को मना लीजिए तो वे आपत्ति नहीं करेंगे.

शैलेंद्र ने मुझे सारी स्थिति समझा दी. टक्कर राज कपूर जैसे व्यक्ति से थी, जो न केवल फिल्म के हीरो थे, बल्कि उनके मित्र और शुभचिंतक भी. भाषण शुरू हुआ. उपन्यास क्या है, साहित्य क्या है, फिल्म क्या है, पाठक क्या हैं और दर्शक क्या हैं? कहानी लिखने से पाठक तक पहुंचने की प्रक्रिया क्या है, खर्च क्या है और फ़िल्म निर्माण क्या है, उसका आर्थिक पक्ष क्या है? ऐसे विचार-प्रवर्तक भाषण शायद पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में भी नहीं होते होंगे. इतना ही नहीं तो शैलेंद्र पर चढ़े कर्ज और उसे उबारने की भी दुहाई दी गयी. और तो और, पैसा लगानेवाला मारवाड़ी भी जो आंखें बंद किये बैठा था, कहने लगा, ‘आप यह मत समझिए कि मैं सो रहा था. मैं तो कहानी का एंड सोच रहा था. चेन खींचकर गाड़ी रोक लो और दोनों को मिला दो.

आखिर मैंने कह दिया कि वे जो चाहें कर लें. मेरा पारिश्रमिक मिल चुका है. हां, अगर कुछ परिवर्तन होता है, तो मेरा नाम लेखक के रूप में न दिया जाये. जब मैं अंतिम निर्णय देकर लौटा तो शैलेंद्र छाती से लगकर सुबकने लगे. ऐसा निर्माता आज तक किस लेखक को मिला होगा?

मुझे पूरा विश्वास है कि अगर शैलेंद्र का निधन न होता और यह फिल्म ठीक से प्रदर्शित हो पाती तो व्यावसायिक दृष्टि से भी सफल होती. लेकिन वह एक साजिश का शिकार हो गयी, जिसमें अपने-बेगाने जाने किन-किन का हाथ था और इसकी वजह यह थी कि उन्हें भय था कि तीसरी कसम’ अगर सफल हो गयी तो बंबइया फार्मूले पर वह बहुत बड़ा आघात होगा.

बंबइया फिल्म का साहित्यिक कृतियों को छूने में हिचकिचाते हैं, क्योंकि साहित्यकार उन्हें कृति को चाहे जिस तरह तोड़ने-मरोड़ने नहीं देता और उन्हें तो हर कहानी में तथाकथित मसाला ठूंसने की आजादी चाहिए. इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं वे दर्शक को. किसी जमाने में ‘मुक्ति’ में पानी में कंकड़ फेंकने के प्रतीक से दर्शक समझ जाते थे कि पात्र के हृदय में उथल-पुथल हो रही है, फिर वह बुद्धि अब कुंद हो गयी है?

हाल में ‘रजनीगंधा’, ‘अंकुर जैसी साहित्यिक रुचि की फिल्में देखने को मिलीं. मन पुलक उठा. इस वर्ष फिल्मफेयर एवार्ड के लिए दर्शकों ने पांच फ़िल्में नामजद कीं, जिनमें से चार विशुद्ध भावनात्मक कृतियां थीं, व्यावसायिक ढर्रे से बिल्कुल अलग-रजनीगंधा, ‘अकुर, ‘गरम-हवा’ और ‘कोरा कागज’. यह मतदान भी दर्शकों का है.

कलकत्ता में सदा से साहित्यकारों की रचनाओं पर फिल्में बनती रही हैं, लेकिन वहां के फिल्म उद्योग को भी बंबइया फार्मूलेबाजी और स्टार सिस्टम ने ग्रस लिया.

बंगालियों की पूजा की खरीदारी में विभिन्न पत्रिकाओं के पूजा विशेषांकों की खरीददारी आवश्यक रूप से शामिल होती है. एक विशेषांक में 3-4 उपन्यास होते हैं. हर कोई अपनी रुचि के अनुसार देख, आनंद, उल्टो रथ, जलसा या अन्य पत्रिका खरीदता है. इन उपन्यासों को देखिए. बड़े-बड़े नामवर लेखक, लेकिन साफ नजर आता है कि यह नायक फलों स्टार को ध्यान में रखकर गढ़ा गया है और फलां नायिका फलां हीरोइन को नजर में रखकर. यह पागलपन इस हद तक बढ़ गया है कि अगर इस वर्ष सुचित्रा सेन लोकप्रिय रहीं तो सभी दुर्गा प्रतिमाओं के चेहरे सुचित्रा जैसे होंगे. सुप्रिया लोकप्रिय हुई तो उसके जैसे और अपर्णा सेन लोकप्रिय हुई तो उसकी अनुकृति.

छोटे-छोटे समझौते कर लेखक भी अपनी स्थिति कमजोर बना लेते हैं. बंबई आते हुए मैंने जगह-जगह ‘आंधी’ के होर्डिंग देखे. उन पर लिखा हुआ था रिटेन एंड डायेक्टेड बाई गुलजार. गुलज़ार लेखक कैसे हो गये? और वे तो तुम्हारे मित्र हैं, कल ‘रेणु’ के साथ भी यही व्यवहार होगा. मार्कडेय आयेंगे तो या और कोई साहित्यिक आयेगा तो उसके साथ भी यही सलूक होगा.

मुझे याद है ‘तीसरी कसम’ के होर्डिंग बन रहे थे. निर्माण विभाग का आदमी आकर शैलेंद्र से कहने लगा, ‘फणीश्वरनाथ रेणु’ तो बहुत लंबा नाम है, बहुत जगह घेर लेगा. इसे पी. एन. रेणु कर देते हैं. शैलेंद्र ने उसे डांटा कि नाम पूरा जायेगा. हां, अपने नाम में से शंकर कटवा कर सिर्फ शैलेंद्र लिखने को कह दिया.

अंत में इन दिनों बन रही फिल्मों की शैलियों के बारे में. एक शैली है विशुद्ध बम्बइया व्यावसायिक फिल्म शैली. इसके बारे में तो कुछ कहना ही बेकार है.

दूसरी शैली है मणि कौल, कुमार साहनी जैसे निर्देशकों की, जो अपने प्रयोगों में किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हैं. उनके लिए उनका विषय और उनकी चित्रांकन शैली ही सर्वोपरि है. लोग उनकी शैली से भले ही सहमत न हों, उनकी प्रतिभा के बारे में तो कोई आशंका नहीं उठायी जा सकती.

बाबूराम इशारा ने एक नया रास्ता अख्तियार किया. स्टूडियो के नकली वातावरण से फिल्मों को उठाकर वास्तविक स्थानों पर खींच लाया. छोटी-सी लागत में कड़वे सच को उजागर करने लगा, क्योंकि उसकी मान्यता है कि इस विषय पर कोई कुछ नहीं कर रहा है. इधर उसकी कई फिल्में असफल हुई हैं, इसका कारण शायद यह भी है कि वह जीवन से छोटे-छोटे सच उठाकर अपनी फिल्म में एक साथ नत्थी करने लगा और यह जोड़ इतना भयानक लगने लगा कि दर्शक अपने-आपको एकदम नंगा पाने लगा. उसकी फिल्मों से कतराने लगा लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि वह चुका नहीं है, हारा नहीं है. उसने बहुत महत्त्वपूर्ण काम किया है. बस उसे चाहिए कि अब वह लेखन का दायित्व किसी और पर सौंप दे. उससे बहुत आशाएं हैं. और चौथा रास्ता अपनाया हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार जैसे निर्देशकों ने व्यावसायिक सिनेमा में अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं. कोई यह कहने की हिम्मत तो नहीं कर सकता कि इन्हें साहित्य की समझ नहीं है, लेकिन उन्होंने इस तथ्य को स्वीकारा है कि दर्शकों का बड़ा वर्ग स्टार्स के नाम से पीछे आता है और अगर अपनी बात ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचानी है तो इस दर्शक वर्ग को जीतना, उसे सिनेमाघर तक खींच लाना जरूरी है. उसकी रुचि अच्छी, यथार्थवादी, समांतर सिनेमा में जगाना जरूरी है. वे यह काम बखूबी कर रहे हैं.


किताब का नाम – रेणु रचनावली : भाग 1-5

लेखक – फणीश्वरनाथ ‘रेणु’

प्रकाशन –  राजकमल प्रकाशन

पेज संख्या – 2913

कीमत – 4320/- रुपये


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