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'तुम्हारे पास एक ही दुपट्टा था, जिससे तुम्हें सैकड़ों काम लेने पड़ते थे'

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लेखकों के बारे में

बुंदेलखंड (उ.प्र.) के छोटे से कस्बे कोंच में जन्मे जुड़वां भाई अकबर कादरी और आज़म कादरी का साहित्य और रंगमंच की ओर झुकाव बचपन से ही था. दोनों ने जामिया युनिवर्सिटी दिल्ली से मास मीडिया (ऑनर्स) में स्नातक किया. 2007 में अंतराल थिएटर की स्थापना की, अंतराल में बतौर निर्देशक दोनों ने तकरीबन 20 नाटकों का निर्देशन किया और कई नाटक लिखे. आज़म द्वारा लिखित ‘मौसम को न जाने क्या हो गया’, ‘उड़ने को आकाश चाहिए’ और अकबर द्वारा लिखित ‘फ़्यूचर बाज़ार’ नाटक ख़ासा लोकप्रिय रहे.

जुड़वां कलाकार
जुड़वां कलाकार

2008 में मशहूर रॉक बैंड यूफ़ोरिया का म्यूजिक एल्बम डायरेक्ट किया. दिल्ली दूरदर्शन के लिए तिब्बती शरणार्थियों पर डॉक्यूमेंट्री बनाई. 2011 में बॉलीवुड के डायरेक्टर इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘रॉकस्टार’ में काम किया.

92.7 बिग एफ़एम के चर्चित शो ‘यादों का ईडियट बॉक्स विद नीलेश मिसरा’ के लिए 100 से ज़्यादा कहानियां लिखीं. 2013 में पहली फ़ीचर फ़िल्म ‘शहजादा अली’ का निर्देशन किया। तिग्मांशु धूलिया की आने वाली फ़िल्म ‘यारा’ में दोनों ने अभिनय किया है. तकरीबन दो साल स्टार प्लस से जुड़े रहे. फ़िल्म और रंगमंच की यात्रा जारी है.


किताब के बारे में

जुड़वां लेखकों की दुनिया एक साथ देखना अपने-आप में रोमांच भर देता है. इस कहानी-संग्रह की सबसे बेहतरीन बात यही है कि एक ही किताब में आपको ज़हनी तौर पर दो अलग-अलग शैलियों के रास्ते मिलते हैं. अकबर की कहानियां सरल तरीक़े से अपने किरदारों को बुनते हुए एक ऐसे घर, ऐसे मोहल्ल्ले का लिबास तैयार करती हैं जो लगभग हर किसी का पहना हुआ होता है. चाहे किरदार में कोई बहरूपिया हो, चाहे कोई मौलवी या घर के आख़िरी कौने में बैठी एक औरत. वहीं आज़म की कहानियां आपको ऐसे सरीयल रास्ते पर ले जाती हैं जहां किरदार तो आज के दौर के हैं पर उनका ताना इतिहास से जुड़ा है. शैली में फ़ैक्ट और फ़ेंटसी की इतनी घुमावदार गलियां हैं कि कभी-कभी इतिहास और भविष्य दोनों एक-से लगने लगते हैं. चाहे मामा शकुनी हो, बाबर हो या लैला-सी कोई किवणी. शानदार मंझी हुई नयी क़लम आपको पुराने लेखकों को याद करने का मौका ज़रूर देती है.


नग्गो! तुम मेरी मिस इंडिया!

(आज़म क़ादरी)

दरवाज़े पर जब घंटी बजी, तब मैं मिस इंडिया कॉन्टेस्ट देख रहा था. दरवाज़ा खोला तो सामने कामवाली बाई खड़ी थी, जिसे मैंने कल से ही काम पर रखा है. वो अपने काम में लग गई और मैं फिर से टीवी देखने बैठ गया. अपने काम में मस्त वो पोंछे का कपड़ा घसीटती हुई मेरे कमरे में आ गई. मुझे देखकर उसने गुनगुनाना बंद कर दिया. अपने माथे पर उभर आई पसीने की बूँदों को आस्तीन से साफ़ कर वो फिर से काम करने लग गई. जब उसकी नज़रें टीवी पर पड़ जातीं तो वो नज़रें फेर लेती, उसके कानों के पपोटे लाल पड़ जाते, हया उसके चेहरे पर ऐसे पैबस्त हो जाती, जैसे किसी ने उसके कपड़े उतार दिए हों. उसकी नज़रें अचानक जब झुक गई तो मुझे लगा जैसे मैंने ही उसके कपड़े उतार दिए हों. इससे पहले कि वो मुझे ग़लत समझे, मैंने, ख़्याल आते ही मैंने टीवी बंद कर दिया. घर का सारा काम फटाफट करके उसने झुकी हुई नज़रों से मुझे इत्तला दी, ‘साब मैं जाती…बर्तन धोने का साबुन ख़त्म हो गया है.’

परखनली - 1

‘हम्म…’ मैंने कहा और उसे देखने लगा. रंग गहरा था, पर नाक-नक़्श खड़े. पसीने से चिपके हुए उसके कपड़े उसकी उम्र बता रहे थे. उसने अपनी कमर से दुपट्टा निकाला और गले डालती हुई, सररे-सी चली गई. उफ़! बिजली थी जो ज़ेहन पर धड़ाम से गिरी थी. अब मेरी बात का कोई ग़लत मतलब आप निकालना चाहें तो निकालते रहें, वैसे भी सही मतलब तो निकलने से रहा. बिजली हुस्न की नहीं, याद की गिरी थी.

बहुत तेज़ धार होती है याद में, पल में आपका ज़ेहन चाक़ हो जाता है और फेंक देता है, आपको सालों पहले किसी लम्हे में. लम्हें जिन्हें हम भूल आए हैं, छोड़ आए हैं, पर हक़ीक़त तो ये है कि लम्हे कहीं नहीं जाते. वो कभी ख़त्म नहीं होते, वो तो चुपचाप उसी जगह बैठ जाते हैं, किसी के याद करने के इंतज़ार में. लम्हों का ज़िंदा रहना हमारे याद करने पर ही साँस लेता है. ऐसा ही एक लम्हा मुझमें साँस लेने लगा था और जान उस घड़ी को आ गई थी, जिसे नग्गो कहते हैं. कामवाली बाई की पीठ पर सवार होकर आज मैं तुम तक बिजली की गति से भी ज़्यादा तेज़ पहुँच गया हूँ, नग्गो!

ज़ेहन में ये सब था, मैंने टीवी फिर से खोल लिया. मिस इंडिया कॉन्टेस्ट अब भी चल रहा था, सुर्ख़ पोशाँ लिबास में महिला ऐंकर देखने वालों से पूछ रही थी, ‘आपके हिसाब से मिस इंडिया किसे होना चाहिए? आप अपने जवाब हमें यहाँ भेज सकते हैं…’

‘नग्गो!’ बिना रुके ही मेरी ज़ुबाँ पर ये नाम अटक गया.

वही नग्गो जिसका बचपन घर में और खेतों में काम करते हुए बीता, वही नग्गो जिसने अपनी ज़िंदगी की सारी सर्दियाँ बिना स्वेटर के काटीं. वही नग्गो जिसकी पूरी जवानी शादी के इंतज़ार में कट गई. वक़्त ने चूड़ियों की जगह तुम्हारे हाथों में फावड़ा थमा दिया, और देखते ही देखते तुम निराला की कविता बन गईं.

‘वो तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर.’ फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि निराला ने उसे इलाहाबाद के रास्ते में देखा था और मैंने उसे अपने गाँव में. सच बताऊँ, नग्गो, आज तुम्हारी याद मुझे बिलकुल उसी तरह आई है, जैसे छुरी से किसी ने मेरी उँगली काट दी हो. दर्द हो, ख़ून रिस रहा हो और याद हो, इसी को शायद नग्गो हो जाना कहते हैं.

जहाँ तक याद है, किसी ने तुम्हें कभी सुंदर नहीं कहा था. तुम्हारे धूप में गहरे हो गए रंग की किसी ने तारीफ़ नहीं की थी. तुम्हारे धूल-मिट्टी से जकड़े बालों को फिर कौन देखता! आज मैं तुम्हारे लिए दो पल रो लेना चाहता हूँ, नरगिस! हाँ, तुम्हारा असली नाम तो नरगिस ही था, पर लोग तुम्हें प्यार से या दुत्कार कर, पता नहीं कैसे ‘नग्गो’ ही बुलाते थे. तुमसे मुझे प्यार था ये तो नहीं बता सकता, पर इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि तुम मुझे तब भी अच्छी लगती थीं. हालाँकि मैं तुमसे बहुत छोटा था और तुम इतनी बड़ी कि कभी-कभी तुम मुझे गोद में उठा लेती थीं. किसी का अच्छा लगना उम्र तय नहीं करती, उम्र तो वो फ़ोटो है, जो वक़्त की रील पर छपना जानती है. तुम भी मेरे वक़्त की रेखा पर फ़ोटो की तरह छप गई थीं. हाँ, एक बात और है कि मैंने तुम्हें हमेशा एक लड़के की नज़र से देखा है और तुम मेरे लिए एक लड़की ही थीं.

तुमने कभी कोई खिलौना नहीं ख़रीदा. हाँ, ईद के मेले से तुम हर बार एक गुल्लक ज़रूर ख़रीद लातीं और बाद में अपने भाई-बहनों की शादी में ख़ुशी-ख़ुशी ख़ुद फोड़ देतीं. (सांकेतिक इमेज: गेट्टी)
तुमने कभी कोई खिलौना नहीं ख़रीदा. हाँ, ईद के मेले से तुम हर बार एक गुल्लक ज़रूर ख़रीद लातीं और बाद में अपने भाई-बहनों की शादी में ख़ुशी-ख़ुशी ख़ुद फोड़ देतीं. (सांकेतिक इमेज: गेट्टी)

माँ बताती है कि तुम जब बहुत छोटी थीं, तब से ही अपने अब्बा के साथ बाग़ीचे में निराई-गुड़ाई के लिए जाती थीं. इसमें तुम्हारा क्या क़ुसूर था कि वक़्त ने तुम्हारे हाथों में सुनहरी गुड़िया की जगह खुरपी थमा दी और तुम खुरपी को खिलौना समझ उससे खेलने लगीं. मुझे अच्छे से याद है, जब मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा होता, तब तुम अपने सिर पर अमरूदों की डलिया रखकर बेचने के लिए बजरिया निकल जातीं. तब भी तुम्हारे चेहरे पर एक मुस्कान रहती थी. फिर जैसे वो मुस्कान भी तुम्हारी तरह सख़्त पड़कर होंठों पर जम गई थी.

तुमने कभी कोई खिलौना नहीं ख़रीदा. हाँ, ईद के मेले से तुम हर बार एक गुल्लक ज़रूर ख़रीद लातीं और बाद में अपने भाई-बहनों की शादी में ख़ुशी-ख़ुशी ख़ुद फोड़ देतीं. इसमें तुम्हारा क्या क़ुसूर था कि तुम्हारे नौ भाई-बहन थे और तुम सबसे छोटी, कि उन्होंने कभी कोई गुल्लक क्यों नहीं ख़रीदी, जिसे तुम्हारी ख़ुशियों के लिए फोड़ा जा सके. वक़्त से पहले तुम जवान हो गई थीं. जो दुपट्टा तुम्हारे गले में होना चाहिए था, वो फिर भी तुम्हारी कमर में कसा रहा. तुम्हें याद हो कि अक्सर सर्दियों में मैं गाजर खाने के लिए तुम्हारे खेतों में आ जाता, तुम कितनी नज़ाक़त से गाजरें हैंडपंप पर धोकर मुझे देतीं और फिर फावड़ा उठाकर गाजरें खोदने लग जाती थीं. तुम्हारे सुते हुए बदन पर पसीने से जब कपड़े चिपक जाते तो मेरी नज़रें बस तुम्हें ही देखा करती थीं. खोट मेरी नज़रों में हो सकता है, पर तुममें कोई खोट नहीं था, तुम बिना खोट की मिट्टी से बनी थीं. नग्गो, सच में तुम बहुत ही ख़ूबसूरत थीं. अब भी होगी, मेहनत से कमाई गई ख़ूबसूरती कभी ख़त्म नहीं होती.

एक बार अगर तुम शहर आ जाओ तो अमेरिकन एक्सेंट में होंठ गोल करके ‘हेल्लोज़’ कहने वाली इन औरतों को मैं समझाऊँगा कि मिस इंडिया की तलाश में तुम जिन्हें खोज रही हो, उनमें ‘मिस’ तो हो सकता है, लेकिन इंडिया उनमें दूर-दूर तक कहीं नहीं दिखता. पूरे का पूरा इंडिया तो तुममें समाया है, नग्गो. तुम्हें सामने खड़ा करके तब मैं मिस इंडिया के लिए चयनित लड़कियों से पूछूँगा कि कभी उनमें से मिट्टी की ख़ुशबू आ सकती है! अपने चेहरों पर फर्ज़ी मुस्कान ओढ़े खड़ी उन लड़कियों से तब मैं पूछूँगा कि परेशानियों और क़ुर्बानियों के वक़्त भी क्या वो मुस्करा सकती हैं! क्या वो तुम्हारी तरह हर हाल में ख़ुश रहने का सरवत रखती हैं! जवाब उनसे क्या मिलेगा, मैं ही देता हूँ. नहीं नग्गो, वो ऐसा बिलकुल नहीं कर सकतीं, बुरे वक़्त में उनको शराब का सहारा लेना पड़ता है. फ्रस्ट्रेशन को पीना उन्हें नहीं आया. हर हाल में ख़ुश रहने की कला एक-दो दिन नहीं, सालों की तपस्या से पैदा होती है, नग्गो.

सांकेतिक इमेज (रॉयटर्स)
सांकेतिक इमेज (रॉयटर्स)

बिना क्रीम-पाउडर के जो चमक तुम्हारे चेहरे पर है, क्या वो कभी उनके चेहरे पर आ सकती है? हाँ, मुझे पता है कि तुम्हारे हाथ इन लड़कियों की तरह नर्म नहीं, बल्कि कुदाल चला-चलाकर सख़्त पड़ गए हैं. तुम्हारी एड़ियों में दरारें हैं, जिनमें कभी-कभी तुम रुपए-दो रुपए का मोम भर लेती हो.

मैं शुक्रगुज़ार हूँ तुम्हारा नग्गो कि तुमने किसी महानायक के विज्ञापन के झाँसे में आकर कोई क्रीम नहीं ख़रीदी. तुम कितनी स्मार्ट हो, नग्गो. नेताओं की बात क्या कहूँ, सब फर्ज़ी हैं, एक तुम ही हो जो मेक इन इंडिया का खुरदुरा सपना बचा सकती हो. महानगरों में आजकल लोग लड़कियों के टैलेंट की ख़ूब चर्चा करते हैं, मीडिया चिल्ला-चिल्लाकर वुमन पावर के बारे में बात कर रहा है. सच कहता हूँ नग्गो, तुम्हें एक बार शहर ज़रूर आना चाहिए. शायद तुम डरती हो कि तुम्हारे अंदर कोई टैलेंट नहीं… मैं तुम्हें याद दिला दूँ. तुम्हें ख़ुद के बच्चे जनने का मौक़ा कभी नहीं मिला, लेकिन तुमने अपने भाई-बहनों के बच्चों को सीने से लगाकर पाला है. आजकल बच्चे पालना भी एक कला है, जिसे शहरी औरतें सीखती हैं. अपने भाइयों के बच्चों को सीने से लगाकर जब तुम गाती थीं…

चादर ले उड़ैले रीनी झीनी आना, रीनी झीनी आना,
न मैं आरी न मैं होरी पूत जना जन हारी
रामा पूत जना जन हारी
सौ सौ बच्चा गोद खिलावे अब लौ रही कुँवारी
रीनी झीनी आना…

…तो बच्चे तुम्हारी गोद में सो जाया करते थे. और हाँ, नग्गो, मैं तुम्हें एक बात और बता देना चाहता हूँ. इस डर में बिलकुल मत रहना कि तुम गँवार हो. हो सकता है कि लोग तुम्हारी कमर पर दुपट्टा देखकर तुम्हारे ड्रेसिंग सेंस पर नाक-भौंह सिकोड़ें. मैं उन्हें बताऊँगा कि कभी-कभार जुमेरात की शाम जब तुम नहा-धोकर ख़ुर्रम शाह की मज़ार पर जाया करती थीं तो दुपट्टा तुम्हारी कमर से निकलकर बड़ी अक़ीदत के साथ सिर पर आ जाता था. अब इसमें तुम्हारा कोई क़ुसूर नहीं था कि तुम्हारे पास एक ही दुपट्टा था और तुम्हें उससे सैकड़ों काम लेने पड़ते थे.

बस, मुझे तुमसे एक ही शिकायत है नग्गो कि तुमने कभी कोई शिकायत नहीं की… कि तुमने कभी अपने अब्बा से स्कूल जाने के लिए ज़िद क्यों नहीं की… कि तुमने कभी अपने भाइयों को कोई गुल्लक ख़रीदने के लिए नहीं कहा. और एक बात को लेकर तो मैं तुमसे बेहद नाराज़ हूँ नग्गो कि तुमने कैसे मुस्कराते हुए अपने से बीस साल बड़े आदमी से शादी के लिए रज़ामंदी दे दी. या तो तुम बहुत समझदार हो, या फिर बेवकूफ़ …पर जो भी हो तुम मेरे लिए मिस इंडिया हो, नग्गो… मेरी मिस इंडिया!


किताब का नाम: परखनली

लेखक: अकबर कादरी, आज़म कादरी

प्रकाशक: हिंद युग्म

मूल्य: 120 रुपए 

यहां से खरीदें: अमेज़न


Video देखें:

फिल्म रिव्यू: अंधाधुन

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Book Excerpt of Parakhnali (Short story – Naggo Tum Meri Miss India) written by Akbar Quadri and Azam Quadri

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