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'शाहिद हुसैन को जब जिससे जो चाहिए वो निकाल ही लेता है.'

जल्द आ रही है नवीन चौधरी की नई किताब: 'ढाई चाल'

हाल के दिनों में उत्तर भारत के कई राज्यों में लगातार बलात्कार की घटनाएं घटी हैं और कई घटनाओं कोई न कोई राजनीतिक कनेक्शन भी रहा है. ‘ढाई चाल’ उपन्यास की कहानी उनमें से कई की सचाई को छूती हुई दिख सकती है. राजनीति का अपराधीकरण और मीडिया का अंदरूनी होड़, दोनों के कामकाज के बेरहम तौर-तरीके की परतें खोलता उपन्यास. अगर आप क्राइम थ्रिलर के शौकीन पाठक हैं तो ‘ढाई चाल’ को जरूर पढें. यह एक रोमांचक पॉलिटिकल थ्रिलर है. पढ़िए इस उपन्यास का एक अंश…

 

“अबे अमित, चमन की भी गर्लफ़्रेंड बन गई, तू ही रह गया.” राघवेन्द्र ने अमित को छेड़ते हुए चमन पर निशाना लगाया.

“मेरी कौन-सी गरलफ़्रेंड बन गी भेसाब जो मुझे ही नहीं पता.”

“वही जिसे आज बाइक पर रेस्टोरेंट ले गया था. कौन है?”

“अरे नहीं-नहीं…” चमन यादव हँसने लगा और बोला–“वो माधवी है. कॉलेज की लड़कियों में खूब चला करे है उसकी.

“मेरे छात्रसंघ चुनाव प्रचार के लिए मान गी तो लड़कियों के वोट मिल जांगे. और तो और गुज्जर भी है.”

“उसे अपने साथ महासचिव पद के लिए खड़ा कर दे. हर जगह उसके साथ प्रचार करना. लड़कियों के वोट तो आएँगे ही, तेरे साथ घूमेगी तो लड़के भी लड़की देखने के चक्कर में तेरे भाषण सुनने को रुक जाएँगे. तेरा माहौल और ज़बरदस्त हो जाएगा.”

“उसका बाप तो चुनाव प्रचार करने दे वही बहुत, चुनाव ना लड़ने देगा.”

“मैं बात करके देखूँ?”

“आप बात करोगे…धक्के मार के निकालेगा भेसाब आपको. आपकी वजह से उनका डेंटल कॉलेज का प्रोजेक्ट अटक गया.”

“मेरी वजह से?” राघवेन्द्र को समझ नहीं आया कि जिससे आज तक मिला नहीं उसका प्रोजेक्ट उसकी वजह से कैसे अटका पड़ा है.

“और क्या…माधवी गंगाराम गुज्जर की छोरी है.”

“वो जी.जी. पब्लिक स्कूल और जी.जी. इंजीनियरिंग कॉलेज वाला?” राघवेन्द्र ने पूछा.

“हाँ वोई…उसके कागजों में गड़बड़ है. होती तो हमेशा ही है लेकिन पहले शाहिद काम करवा दिया करे था. अब आपकी वजह से शाहिद की कोई सुन ही ना रहा.”

‘ओह! तो ये उस गंगाराम गुज्जर की बेटी है…’ राघवेन्द्र ने सोचा कि श्याम जोशी से कहकर यदि गंगाराम गुज्जर का कॉलेज खुलवा दे तो एक तीर से दो नहीं तीन शिकार हो जाएँगे.

पहला–इलाक़े के प्रभावशाली लोगों में पैठ करने का रास्ता खुलना और अपने चुनाव के लिए फंड का इन्तज़ाम करना. दूसरा–शाहिद हुसैन के सबसे बड़े फाइनेंसर को उससे छीनकर उसे और कमज़ोर करना. तीसरा–माधवी को अपने प्रभाव में लेकर इलाक़े की महिला वोटरों को पक्ष में करना.”

राघवेन्द्र ने चमन से कहा–“मेरी मुलाक़ात करवा दे गंगाराम गुज्जर से. उसका डेंटल कॉलेज खुल जाएगा.”

तीन मुलाक़ातें और दो बार राजधानी के चक्कर लगाने के बाद स्थानीय अख़बार में ख़बर छपी कि जी.जी. एजुकेशनल ट्रस्ट को नेशनल हाईवे 8 पर डेंटल कॉलेज खोलने की अनुमति मिली.

इसी अनुमति के मिलने के साथ गंगाराम गुज्जर ने माधवी को चुनाव लड़ने की न सिर्फ़ इजाज़त दी बल्कि प्रचार के लिए गाड़ियाँ भी उपलब्ध करवा दी. राघवेन्द्र ने गाड़ियाँ इस्तेमाल करने से मना कर दिया. राघवेन्द्र का कहना था कि चमन और माधवी आम छात्रों की तरह ही चुनाव लड़ेंगे. उसने दोनों से कहा–“चुनाव लड़ने के लिए कॉलेज में विद्यार्थियों से एक-एक रुपए का चन्दा माँगो. उनको बोलो कि तुम दोनों उनके लिए चुनाव लड़ रहे हो और इसके लिए न घर से पैसा लोगे न ही किसी ऐसे आदमी से जो तुम्हारा इस्तेमाल ग़लत कामों के लिए करे. उन्हें समझाओ कि बाक़ी के प्रत्याशी शहर के अपराधियों और गुंडों से पैसे लेकर चुनाव लड़ते हैं. जो भी तुम्हें एक रुपया देगा वो तुमसे इमोशनली जुड़ जाएगा. उसे लगेगा कि उसने तुम पर निवेश किया है. उसके द्वारा तुम्हें वोट देने की सम्भावना बढ़ जाएगी.”

राघवेन्द्र ने गंगाराम से कहा–“आपकी गाड़ियाँ आज ले जाएँगे तो इनमें और बाक़ियों में फ़र्क़ नहीं रहेगा, लेकिन जिस दिन वोटिंग होगी उस दिन लड़कियों को उनके घर से कॉलेज तक लाने में हम आपकी गाड़ियाँ इस्तेमाल करेंगे.” माधवी और गंगाराम गुज्जर दोनों ही राघवेन्द्र के इस प्लान के कायल हो गए.

प्रचार शुरू हुआ. राघवेन्द्र चमन और माधवी का नामांकन भरवाने गया और पहले दिन उन दोनों का प्रचार भी कॉलेज में किया. राघवेन्द्र के आने से लड़कों को चमन एक मज़बूत नेता के रूप में दिखने लगा. छात्रसंघ का परिणाम पक्ष में आया. यह जीत चमन और माधवी से ज़्यादा राघवेन्द्र की थी. उसने इलाक़े में अपनी ताक़त दिखाई,

इलेक्शन में जीत के बाद जशन मनाती भीड़ (रैंडम फ़ोटो)

कॉलेज से नए कार्यकर्ता खड़े किए और गंगाराम गुज्जर जैसा फाइनेंसर भी मिल गया.

जहाँ इस जीत से राघवेन्द्र, चमन और गंगाराम गुज्जर ख़ुश थे शाहिद हुसैन के माथे पर चिन्ता की लकीरें और गहरी उभर आई थीं.

“बेटी की जीत की बधाई हो.” शाहिद ने गंगाराम गुज्जर को बधाई दी.

“हो हो हो हो हो…लो मिठाई खाओ.” गंगाराम गुज्जर ने सेंटा क्लॉज़ की तरह हँसते हुए मिठाई बढ़ा दी.

मिठाई हाथ में लेते हुए शाहिद ने ताना मारा–“तो हुज़ूर भी उस पंडित के साथ मिल गए.”

शाहिद हुसैन अपने गैंग पकड़े जाने या धंधे रुक जाने से उतना चिन्तित नहीं था जितना गंगाराम के राघवेन्द्र से मिल जाने से हुआ. वह जानता था कि आज नहीं तो कल उसके सब धंधे फिर से शुरू हो जाएँगे लेकिन गंगाराम गुज्जर का राघवेन्द्र के साथ होना शाहिद के लिए राजनैतिक तौर पर चिन्ता का विषय था. शाहिद गुज्जर वोटों से ही जीतता रहा था. गंगाराम गुज्जर के राघवेन्द्र के साथ मिल जाने से न सिर्फ़ गुज्जर वोट खिसक सकते थे बल्कि इलाक़े के और बड़े व्यवसायी भी पाला बदल सकते थे.

“मिल गया मतलब?” शाहिद की बात में छुपे ताने को गंगाराम गुज्जर ने सुन लिया था. “बिजनेसमैन हूँ भाई, धंधा करना है. काम के आदमी से तो मिलकर ही रहूँगा ना?”

“राघवेन्द्र को तुम्हारे बिज़नेस से कोई मतलब नहीं. उसको तो सिर्फ़ गुज्जरों के वोट चाहिए.”

“वो तो तुम्हें भी चाहिए…तुम भी तो इसीलिए मुझसे दोस्ती रखते हो. है कि नहीं?” गंगाराम गुज्जर को पहले शाहिद की ज़्यादा ज़रूरत थी किन्तु अब उसके पास दूसरा विकल्प भी था. उसने अपने तेवर कड़े करते हुए शाहिद को कहा–“देख शाहिद, न मैं गुज्जर जानता न पंडित. मैं व्यापारी हूँ. तुमने कहा सुभाष रास्ते का काँटा है, उसे हटा दिया फिर भी मेरा काम तो नहीं हुआ. तुम्हारी पार्टी सत्ता में भी नहीं है.”

“कल थी, आज नहीं है, कल फिर आएगी. तब क्या करोगे? वैसे भी हज़ारा से पंडित तो जीतने से रहा.”

गंगाराम गुज्जर ने इधर राघवेन्द्र की पहुँच देखी थी. राघवेन्द्र नया होने के बावजूद शाहिद से ज़्यादा काम का था, फिर भी राजनीति में किसी को शत्रु बनाना ठीक नहीं. राघवेन्द्र के हारने और शाहिद की पार्टी के दुबारा सत्ता में आने की स्थिति की कल्पना करके गंगाराम कुछ नर्म पड़ा और बोला–“शाहिद, मुझे अपने काम से मतलब है, उसके जीतने-हारने से नहीं. वो मुख्यमंत्री का ख़ास है और काम करवा सकता है. उसके साथ काम करने का ये मतलब नहीं कि मैं तुमसे अलग हो रहा हूँ. तुम मेरे पुराने दोस्त हो. तुम्हें भी इलेक्शन फंड मेरी तरफ़ से मिलता रहेगा. चिन्ता मत करो.” कहते हुए गंगाराम गुज्जर हँस दिया.

हँसी ग़लत समय पर आ जाए तो महाभारत करा देती है. गंगाराम न हँसना चाहता था न हँसने की कोई वजह थी मगर शाहिद को यह हँसी अपना मज़ाक़ उड़ाती लगी. वह उठकर खड़ा हुआ और गंगाराम को नमस्ते करते हुए बोला–“चिन्ता में आप न पड़ें हुज़ूर. आप सब राघवेन्द्र को दे दें क्योंकि शाहिद हुसैन को जब जिससे जो चाहिए वो निकाल ही लेता है.”

पुस्तक ढाई चाल (Dhhai Chal) | लेखक – नवीन चौधरी | मूल्य 199/-

पिछले वीडियो देखें – बुक रिव्यू: लिंकन इन द बार्डो

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