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'ट्रांसजेंडर और समलैंगिक दोनों में साफ-साफ भेद है, मुझे नहीं मालूम था'

निर्माता, निर्देशक और लेखक रमा पांडेय द्वारा निर्देशित लल्लन मिस नाटक सच्ची कहानी पर आधरित एक हिजड़े की संघर्ष की दास्तान है. इस नाटक को देश के कई शहरों में मंचित किया गया और रंगमच प्रेमियों से काफी प्यार और सहराना मिली है. यह नाटक अब वाणी प्रकाशन से किताब के रूप में प्रकाशित हुई है जिसका एक अंश आपको पढ़वा रहे हैं.

 सीन – 6

(शोर शराबा. घर का आंगन. हिजड़े आए हैं. घर में लोगों की चहल-पहल है.)

तेरे गोरे-गोरे गालों पे घूंघर वाले बाल,
मखमल का कुर्ता टोपी और जड़े है लाल…

कनक हिजड़ा: अरे बधाई बड़ी बधाई
मुश्किल से ये शुभ घड़ी आयी

आज तो सोना पहने बिना ना लौटूंगी
मेरी बन्नो ने जाए पूत
नज़रिया कोई न लगाए
अनत बधावो दशरथ घर बाजे
कौशल्या ने राम चन्दर जाए
नजरिया न कोई लगाए
लाओ लल्ला मेरी गोदी में देओं

दादी: अरे छठी की रसम चल रही है तू…. लल्ला न दूंगी गोदी में.

कनक: तो बधाई अधूरी रहेगी. मैं लल्ला गोद में लिए बिना न कुछ लूंगी न टलूंगी. – ऐसे ही बैठी रहूंगी. तुम रसम पूरी कर लो.

ननदी: बड़ी जिद्दन है री तू. मान जा देर हो जाएगी.

कनक (जिद से): अरे हिजड़ों को क्या देर सवेर मैं तो दी बैठूंगी. गाऊंगी. तुम्हें गारी दूंगी.
बजाओ रे ढोलक.

ननदिया छिनार कुर्ता टोपी लाई
कुर्ता भी लाई और टोपी भी लाई
वो दर्जी उसका यार, उसे संग ले के आई

ननद: अरे मरी तू खड़ी मर जा क्या …………………… है –

बड़ी भाभी: सही गाया. जरा जिज्जी को दो चार और सुनाओ. ये लो सौ रूपये नज़र के. लगाओ ठुमका. जरा ज़ोर से ननदोई तक आवाज सुनाई पड़े. जिज्जी कौर से यार संगी ……. है

अंदर से बाबा जी आते हैं ये लो 5 सौ रूपये और मज़े करो.

कनक हिजड़ा: अरे ओ बाबाजी किसको दिखाये ये रखो अपनी जेब ये तुम पर वार देती हूं. इतने बरस घर में पोता हुआ. बाबा दिखा रहा है कंजूसी. मैं ग्यारह हज़ार से कम न लूंगी. मेरी सारी टोली को रेशम की साड़ी बोलो देतो हो या नहीं कहकर अपना लहंगा उपर उठा लेती है. इतने में दादी दौड़कर आती है कनक हिजडे को रोकती है. रहने दो रहने दो तमाशा नहीं करो मैं दूंगी सबको जो मांगा सबकुछ दूंगी चलो नाचो गाओ.

बाबा: हम तो बाबा की पालकी निकालेंगे तभी बाबा देगें पैसा (शोर मचा हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाला की) बाबा नीचे उतर आते हैं और दो हजार का नोट देते हैं.

(सारी औरते हंसी में लोट पोट हो रही हैं बच्चा लाया जाता है बधाई गाती हिजड़ों की टोली बच्चे का कुर्ता झांग कर देखती हैं)

जगत में मच गया हल्ला
पान्डे घर हो गया लल्ला
बजी है खूब शहनाई
गा रहे सब भी बधाई

दादी: कनक तुम भी क्या याद रखोगी ये तुम्हारी अंगूठी और ग्यारह हजार रूपये-ये सबकी 5 साड़ी –

कनक: दादी खुश कर दियो और बुआ जी तुम तो बटुआ खोलो – तुमसे 3 हजार से कम न लूंगी – जंगल में सियार बोले हुआ हुआ पेट में से बच्चा बोले बुआ बुआ.

लल्लन मिस
लल्लन मिस

सीन – 7

वही औरत अब शान्त है. दादी बैठी है रमा छोटी सी है फ्राक पहने हिजड़े का डान्स कर रही है. जंगल में सियार बोले हुआ-हुआ. पेट में से बच्चा बोले बुआ-बुआ.

दादी (डांट के): चुप शैतान ये गाना तुम नहीं गाओ.

रमा: क्यूं नहीं गाऊं? अभी हिजड़ा आन्टी जो गा के गयी तो तुमने खूब पैसे दिए. वो खूब खुश होकर गई. तुम तो ताली बजा-बजा कर हंस रही थी बुआ.

दादी: चुप शैतान. ये गाने सिर्फ वो लोग ही गाते हैं हम नहीं गा सकते. वो हिजड़े हैं.

रमा: तो हम क्यो नहीं हिजड़े हो सकते. दादी मुझे हिजड़ा बनना है.

दादी: चुप हो जा नासपिटी. जुबान है कि तलवार. बड़ी मुश्किल से 7 बेटियों के बाद कुल दीपक हुआ है तो ये मेरी कुलछिनी हिजड़ा होने को तैयार बैठी है. चुप नहीं तो चिमटा खींच कर मारूंगी.

रमा: अच्छा एक बात बताओ बच्चा हुआ तो हिजड़ों ने गाया, जब हिजड़े पैदा होते हैं तो कौन बधाई देने जाता है.

दादी: इन नासपीटे अभागों के घर कोई नहीं जाता. वो तो रात के अंधेरे में अपना बच्चा कूढे के डेर पर फैंक आते हैं. जैसे उनके घर कभी बच्चा पैदा ही नहीं हुआ.

सीन – 8

रमा: वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था. उस दिन के बाद मैंने कभी ज़िन्दगी में दुबारा तब तक इस हिजड़ा कहलायी जाने वाली कौम से दो चार नहीं हुई. जब तक मैंने अपनी एक झुग्गी झोपड़ी बस्ती की शूटिंग के दौरान इन्हें भी वहां एक कोने में अलग-अलग बसे देखा. तो मन में कौतूहल जागा कि यार इनके बारे में डॉक्यूमेंट्री बनाये तो शायद अवॉर्ड विनिंग डॉक्यूमेंट्री बन ही जाए. मसूदपुर की बात है. जी हां. तब तक मैं बड़ी हो गयी थी हॉलेन्ड से टीवी प्रोडयूसर की ट्रेनिंग लेकर लौटी थी और दूरदर्शन में नौकरी कर रही थी. हिजड़ा तो नही बनी पर प्रॉड्यूसर-डायरेक्टर ज़रूर बन गई थी. सरकारी संस्थानों में आप सब कुछ बॉस की हां पर ही कर पाते हैं. और अपने स्टेशन डायरेक्टर से कहा. सर ये बहुत क्रियेटिव और धांसू आईडिया है. मुझे इजाजत दे और बजट ग्रांट करे.

रमा: सर ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा. बोले, “मालूम है ये कौन हैं? समाज इन्हें कैसे देखता है?”

रमा: मैनें कहा नहीं सर तभी तो जानना चाहती हूं समझना चाहती हूं समाज को दिखाना चाहती हूं. सर दिस विल क्रिएट हिस्ट्री, सर बोले. हिस्ट्री तो क्रिएट हो ही जायेगी जब तुम इनकी बॉडी की जॉग्रफी जनता को बताओगी, इनके शरीर का भूगोल सामने लाओगी. We are a social television. Family watch it together. तुम क्या समझती हो कोई भी परिवार के साथ बैठकर ये प्रोग्राम देखेगा. Silly girl & this is India. No such investigative Journalism is allowed on Doordarshan where a family cannot watch it together. मेरी अवॉर्ड विनिंग डॉक्यूमेंट्री का ख्वाब वैसे ही कूड़े पर फैंक दिया गया. जैसे इन जैसे, लल्लन जैसे, इस जैसे, उस जैसे – हजारों बच्चे कूड़े पर फैक दिए जाते हैं. क्या आपको यह मालूम है कि हिन्दुस्तान में एक लाख से ऊपर की तादाद में ट्रांसजेंडर बसते हैं?

रमा: क्या ये भी मालूम है क्या ट्रांसजेंडर और समलैंगिक दोनों में साफ-साफ भेद है मुझे तो कुछ भी नहीं मालूम था. मैं फिल्मों गीत सपना भूलने का यत्न करने लगी. “मैं तो एक ख्वाब हूं/इस ख्वाब से तू प्यार न कर/भूल जा जाने रे/तकदीर से तकरार न कर/कि एक दिन हो गयी सोनल से टक्कर/ऽऽऽ ड्राईवर से मेरी हो गयी टर्र टर्र.”


पुस्तक: लल्लन मिस | लेखिका: रमा पांडे | प्रकाशक: वाणी प्रकाशन | मूल्य – 175 रूपये


वीडियो देखें: एक कविता रोज (जब वहां नहीं रहता)-

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