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तमाम जलसे जुलूसों के बीच रेणु का ये 'जुलूस' हमें खांटी भारत तक ले जाता है

renuरेणु की कहानियों से गुजरते हुए आप सिर्फ किसी साहित्यिक विधा से नहीं गुजर रहे होते बल्कि उन्हें पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे आप कोई फिल्म देख रहे हों. फिल्म के दृश्यों से होकर गुजर रहे हों. उनकी सहजता, भाषा और उस भाषा से उठती मिट्टी की सोंधी महक आपको बरबस अपनी तरफ खींचती है. आज उनके ‘जुलूस’ उपन्यास का एक अंश पढ़िए.


मुसम्मात ठकुराइन से कोई नहीं झगड़ती – सभी को भय है, मुसम्मात डायन है. पांचों पुतोहु अपनी अनुर्वरता का दोष उसी के सिर मढ़ती हैं. सभी उसे प्रसन्न रखना चाहती हैं. जिस दिन ‘ढर’ जाएगी- ‘कोख’ दे देगी वापस!

कारे मंडल मुसम्मात की भैंस चराता है और रब्बी पासमान पंडित रामचन्द्र चौधरी की बची-खुची खेती-बारी करता है. दोनों ‘पालवेत’ उदास हैं आजकल! इधर कई महीनों से दोनों एक नशे में थे. बी. डी. ओ. साहब के किरानी बाबू मुसम्मात ठकुराइन का बहन-बेटा है. उसने एक बार कहा-पुराना नाच-गान जाननेवालों को सरकार ‘पेनसिलन’ बांटेगी. बेहुला-बाला लखिन्दर आज का नाच है?

दोनों पालवेत एक बार समय निकालकर बी. डी. ओ. साहब के पास गए.

बी.डी.ओ. साहब ने कुछ समझा ही नहीं. मुसम्मात के बहन-बेटा की बदली-दूसरे ‘बलौक’ में हो गई-न जाने कहां! कहां-कहां जाएं दोनों पालवेत!…

…बंगला-गान और बंगला बोली जानते हुए भी बंगाली टोला में रब्बी और कारे से किसी ने बंगला में गप नहीं की. जयराम सिंघ ने आकर सुनाया-कोलोनी के कीर्तन में हम सभी बंगाली-बंगालिन को पानी पिलाकर छोड़ दिया! दोनों पालवेत दूसरे दिन सांझ होते ही कोलोनी में पहुंच गए.

– कौन है?

– हामी!

– कौन हामी?

– हाम बोंगला गान करैं याछी. उ खोल बजैंया खुब भालो पारे. वही गान सुनैयाँर जन्नो हामी कोलोनी में आसेछी. कत्तालोक के गान सुनैयां….

– अरे, ई कौन मुलुक का बोली बोलती है?

– बोंगला बाबू, बोंगला!

गोपाल पाइन ने छिदाम को मैमनसिंघ की बोली में बताया- ये लोग ‘आपन-पाटी’ के ‘मानुस’ हैं.

– हें-हें. ओही तो आछेन मास्टर मुसाई. सोहिर दिन चौरस्ते पर भेंट हुइयाछी न. माने नेंही?

– क्या काम है? पहले काम की बात बोलो.

– एही गान!

…सब साला ए खाने गानई सुनते आइसे!

रब्बी ने कान पर हाथ कर शुरू कर दिया-बाला भांसे-भांसे-भांसे सागड़ेरे जोले….ओइ भांसिते-भांसिते बाला रे…!

– थामो बापू, थामो! रात में बेहुला गान मत गाओ.

कीर्तन के सेक्रेटरी कालाचांद ने डांटकर कहा- क्या? कोलोनी को ‘गान-बाजना’ का अड्डा समझ लिया है? जो आता है सब ‘गान-बाजना-नाचना’ शुरू कर देता है!

दोनों पालवेत हतोत्साहित लौटे- पालवेत! इन लोगों में भी ऊंच जाति और नीच जाति का ‘विचार’ है. जयराम सिंघ और सुक्की-बेलाही के बाबू लोगों की ही पैठ यहां हो सकती है.

कारे मंडल भैंस दुहकर ले आया- झुटपुटा होते ही. आज पहलवान काका चाय ही नहीं, रात में भी यहीं खाएंगे- इस उम्र में भी पहलवान काका दो जोड़ा कबूतर खा जाते हैं. मुसम्मात ने कारे से कहा- कारू, जरा धनुकटोली की सुगनी के घर जाकर कबूतर ले आओ. आज पहलवान जेठ ने दिन से ही मुंह में अन्न नहीं दिया है.

पगहिया में बंधे हुए घोड़े की तरह खड़ाऊं खड़बड़ाते लाठी टेकते हुए पहलवान रनबीर सिंघ आए- दीप्पा! कहां रे? ले जा- कामदेव की दुकान में खाक-पत्थर भी नहीं- पाकिस्थनियां टोला से जाकर ले आया. ले! ले जा बेटी-दीपा!

पहलवान लेमनचूस ले आया है दीपा के लिए.

दीपा कहती है- अर्थात् मां की सिखाई हुई बात तोते की तरह दुहराती है- पहलवान बाबा, आपने क्यों कष्ट किया? कारे को पैसा दे देते, वह दौड़कर ला देता.

– बैठे-बैठे गिरह ‘दुखाने’ लगता है बेटी. दस कदम चल लेने से ठीक रहता है. दीपा के मुंह से शुरू करवाने के बाद मुसम्मात स्वयं अपनी बोली तेज कर देती है- महानारायण तेल का पार्सल आ गया क्या?

– ई धनुका जब से पोस्टमास्टर हुआ है तब से न किसी मनिआडर का ठीक है. और न चिट्ठी-पारसल का. डाकपेन से रोज पूछते हैं….पता-उता तो गड़बड़ नहीं लिख दिया गया?

– कहो दीपा कि पता हम अपने हाथ से अंगरेजी में लिखे थे. उस कम्पनी से बराबर दीपा के लिए ‘किशोर-सुधा’ मंगवाती रहती हूं.

– तुम अपने पते से ही क्यों न मंगाया?

– अपने पते से ही मंगाया है. कहो दीपा कि अपने पते पर मंगाने से कमीशन ज्यादा मिलेगा.

दीपा के गुरुजी आ गए. दीपा के गुरुजी- पारसप्रसाद.

पारसप्रसाद ने कहा- आ गया भीपी!

– आ गया. कहो दीपा कि पहलवान काका, भीपी आ गया.

– क्या आ गया?

– पारसल.

कितने का है, पूछा?

– हम ‘इन्टिमेसने’ लेते आए हैं- दस रुपये अस्सी नये पैसे.

दीपा की मां मन ही मन हिसाब जोड़कर बोली- एक सौ पचास नये पैसे कमीशन दिया.

पारस का नाम गांव में पड़ गया है- पारसलप्रसाद! बचपन से ही उसे पारसल मंगाने का शौक है. ओटो दिलबहार के खुशबूदार कार्ड का सेट मुफ्त में पाने के लिए बीस लोगों के नाम लिखकर भेजना पड़ता था. मुसम्मात ने ही पारस का नाम-पता लिख दिया था. पारस को भी एक कार्ड आया और उससे भी बीस नाम मय पता-ठिकाना के साथ मांगा गया- इसके बाद पारस को भी सुगन्धित-रंगीन कार्ड का सेट आया. फिर दुनिया-भर के सूचीपत्र- तरह-तरह की चीजों के- आने लगे पारस के नाम और दीपा की मां के नाम….दीपा की मां उस समय मिडिल-इंगलिश पास करके गांव की कन्या-पाठशाला में पढ़ाती थी- कुमारी सरस्वती देवी, अध्यापिका, रामगंज-पिपरा कन्या पाठशाला.

रामगंज-पिपरा पोस्ट ऑफिस में दो ही नाम से पार्सल आते- सरस्वती देवी अथवा पारसप्रसाद के नाम. सरस्वती देवी तरह-तरह की किताबें मंगवातीं. कभी हिमसागर तेल और कभी बालों की जूं मारने की दवा! किन्तु पारस तो पार्सल का व्यापार ही करने लगा. गांव में किसी को कोई रोग हो- सीधे पारस के पास हाजिर. सब कुछ ‘खुलासा हाल’ चिट्ठी में लिखकर लुधियाना-पंजाब के हबीबुल हक हकीम को भेजते ही वाजिब दवा का पार्सल आ जाता!

…कलकत्ता, बनारस, लखनऊ, अलीगढ़, मथुरा, बम्बई की कई कम्पनियों से वह माल मंगाता था. कलकत्ता से कल-पुरजेवाली चीजें, बनारस से सुर्ती-जर्दा, लखनऊ से काला पत्ती जर्दा, अलीगढ़ से ताला और सरौता, मथुरा से नाटक का सामान!…किन्तु माल के साथ वह व्यक्तिगत अनुरोध भी लिख भेजता- प्रिय महाशय, आप तो जानते ही हैं कि हम आपका पुराना गाहक हैं. माल के साथ यदि कालीघाट-काली-माई के मन्दिर के आंगन में गिरे हुए- कुचले हुए भी हों हर्ज नहीं- अड़हुल के फूल भेज दें तो भगवान-कसम आपकी कम्पनी को छोड़ कलकत्ता की किसी कम्पनी से कोई माल नहीं मंगाउंगा. बनारस से गंगाजल और विश्वनाथ जी का प्रसाद!

अपने नाम का एक साइनबोर्ड भी मंगवाया एक कम्पनी से. पारस एंड फ्रेंड कम्पनी, रामगंज-पिपरा. गांव के लड़कों ने चिढ़ाया तो साइनबोर्ड उतारकर रख दिया पारस ने. लेकिन कारबार बन्द नहीं किया. मशहूर हकीम, वैद्य और डॉक्टर के अलावा उसे असली-नकली चीजों का पारखी समझते लोग. सभी उससे सलाह लेने आते- जमाई को घड़ी देनी है, किस कम्पनी की घड़ी दें? लड़की की जन्म-पत्री काशीजी के पंडित से बनवाना चाहते हैं- कैसे होगा?

एक बार गांव के एक खोये हुए लड़के का बाप रोता-कलपता हुआ आया- पारस बाबू! कैसे क्या होगा? पारस ने कुछ सोच-समझकर- ‘पूॢणयां समाचार’ में एक विज्ञापन लिखकर भेज दिया. बोला- तीन रुपये का मनीआर्डर भेजना होगा आज ही. दूसरे ही सप्ताह ‘पूॢणयां समाचार’ में खबर छप गई. भगेलूप्रसाद उर्फ भोगेन्द्र मंडल, उम्र बारह साल, होंठ के ऊपर कटा हुआ, तुतलानेवाला, सांवला लड़का- 12 ता. से ही लापता है! भगेलू, तुम जहां भी हो घर चले आओ- बाबूजी डांटेंगे नहीं, मां रो-रोकर अन्धी हो रही है.

एक सप्ताह बाद ही भगेलू घर वापस आ गया. उसी बार गांव के नौजवानों ने नाम रख दिया- यह पारसप्रसाद नहीं- सचमुच पारसलप्रसाद…

एक बार पारस चूक गया, किन्तु! गर्भनिरोधक बटी पार्सल से मंगवाने-वाले नौजवान ने अपनी भाभी के लिए नहीं, किसी और के लिए मंगवाई थी. बटी की छपी हुई सेवन-विधि में ‘सावधान’ लिखकर चेतावनी दी हुई थी- गर्भवती स्त्रियों को यह दवा मत दो! तिस पर कोई गर्भवती को खिला दे यह बटी- डबल खुराक- तो उसका दोष किसे दिया जाए? पंचायत में दोष पारस के मत्थे ही मढ़ा गया. किसी लड़की को ‘असली कोकशास्त्र’ मंगवा देने का इलजाम किसी ने लगाया. लेकिन वह प्रमाणित नहीं हो सका.

…सरस्वती का विवाह हुआ. ससुराल चली आई. पार्सल मंगाने का शौक लगा रहा. दीपा के बाबू की बीमारी में पार्सल से ही दवा मंगाई गई थी. उनकी मृत्यु के बाद बहुत दिनों तक सरस्वती देवी ने कोई पार्सल नहीं मंगवाया. दीपा के लिए ‘किशोर सुधा’ मंगवाने लगी. पुरानी आदत कहां जाए? हर महीने कोई न कोई चीज आती ही रहती है- फूल के बीज, अष्टधातु की अंगूठी! जादुई आईना!

…अजब संयोग! पारस का भी विवाह गोडिय़र में हुआ. सरस्वती देवी के विधवा होने के बाद पारस भी अपनी सास के यहां ‘घरजमाई’ होकर आ गया.

…दीपा को रोज सुबह पढ़ाने के लिए पारस को मास्टर रख लिया है. शाम को एक चक्कर रोज दे जाता है. किसी पार्सल का इंटिमेशन, कोई सूचीपत्र अथवा किसी कम्पनी की बेईमानी की बात लेकर पारस जरूर आ जाएगा. किसी रात को देर हो जाती है, कारे साथ जाता है पहुंचाने- मुनकीवाली लाठी बजाता हुआ.

…गोडिय़र गांव के पंचायत का फैसला है- सांझ को कितना भी अंधेरा क्यों न हो, गांव में चलते-फिरते कोई टॉर्च नहीं जला सकता. गांव की ‘लाज’ की बात है.

आज पारस अधिक देर तक नहीं ठहरेगा.

पारस चला गया. पहलवान ने इधर-उधर देखकर पूछा- दीपा? सो गई क्या दीपा?

– सोई नहीं है. मास्टर के डर से चुप थी.

– दीपा की मां, कोई ऐसी दवा नहीं किसी कम्पनी में कि खिलाते ही….

कारे मंडल कबूतर ले आया- एक ही मिला. सभी कबूतर तालेवर गोढ़ी के लिए ‘रिजरब’ हैं. कल काली मन्दिर की ईंट पड़ेगी- गांव-भर की कबूतरवालियों को दाम धरा दिया है रामजी बाबू ने.

– एक से क्या होगा?

पहलवान रनबीर सिंघ ने सन्तोष की सांस लेते हुए कहा- ठीक है. तरद्दुद करने की जरूरत नहीं. पोस्तादाना के ‘बड़े’ बना देना. लेकिन दीपा की मां, यह छोटकी सचमुच कामदेव के घर चली गई है. दुकान चला रही है. अब बोलो, इसको क्या कहा जाए!

पहलवान जेठ को भोजन कराने में एक अद्भुत सुख का अनुभव करती है- दीपा की मां. विशालकाय आदमी के सामने भात की ढेरी. एक-एक अन्न को बहुत प्रेम से मुंह में डालते हैं पहलवान जेठ. एक दाना भी बरबाद नहीं करते.

– दीपा, पहलवान बाबा से कहो कि लोग जो कुछ कहें, मैं दीपा को लड़के का लिबास पहनाती हूं. पहनाउंगी. बनस्थली विद्यापीठ में भेजकर लाठी, भाला, घुड़सवारी की ट्रेनिंग दिलवाऊंगी. अब लोग जो भी बोलें.

– लोक साला क्या बोलेगा? मारते झापड़ से ‘थूथना’ झाड़ देंगे.

पहलवान को खिला-पिलाकर बिदा किया दीपा की मां ने. अब कारे को समझाने लगी- पाकिस्तानी टोला में क्या है? तुम और तुम्हारे पालवेत- एक अन्धा और दूसरा कोढ़ी!

कारे का पालवेत रब्बी- नाम लेते ही हाजिर.

– खाए पालवेत?

– बैठिए दरवाजे पर, आ रहे हैं.

दीपा की मां ने कहा- खाने-पीने में हड़बड़ी कभी नहीं करनी चाहिए. अपने पालवेत को अन्दर आंगन में ही बुला लो. खाओ और बात भी करो- कोई नहीं सुनेगा तुम्हारी गप.

– आइए पालवेत, आंगन में ही आ जाइए.

रबिया ने आते ही सूचना दी- एक खबर जानते हैं? कल तालेवर गोढ़ी के पोधर पर ‘पुरोहिताई’ करने आवेगी- वही पाकिस्थनियां टोला की गोरी सरदारनी- दीदी ठकुराइन!

– अच्छा?

– और पाकिस्थनियां टोले से ही कीर्तन-पाटी आएगी.

– यह अन्याय की बात है. गांव की कीर्तन-पाटी, चाहे जैसी भी हो, टूटी-फूटी, फिर भी अपने गांव की है.

– गांव की पाटी भी रहेगी…और सुनोगे?

– क्या?

तालेवर मूलगैन हम लोगों को ‘बिसरे’ नहीं हैं. कहा है, तुम लोगों को ‘बेहुला बाला लखिन्दर’ का नाच, जैसे भी हो- करना पड़ेगा. नहीं कोई मिले, मैं ही मूलगैनी करूंगा.

बेहुला-नाच के पुराने मूलगैन हैं तालेवर गोढ़ी.

– रहिए! आप घबराइए मत मीता. इसी बार बंगलिया कीर्तनियों का छक्का नहीं छुड़ा दिया तो कारे नाम नहीं. बेहुला और सावित्री- दोनों ‘पाला’ एक साथ गाएंगे. देखें, पकड़ सकता है या नहीं!

– दोनों पाला कैसे गाओगे मीता?

– इसका ‘दिष्टान्त’ उसमें देंगे और उसका ‘दिष्टान्त’ इसमें. है न मालकिन?

दीपा की मां ने कहा- मालकिन से क्या पूछते हो. मालकिन क्या तुम्हारे नाच की मूलगैन है?

– आप ही ने कहा कि इसका ‘दिष्टान्त’ उसमें…

दीपा की मां हंसी- मुझे क्या दोगे? मैं क्यों बताऊं?

रबिया ने मन ही मन कहा- पालवेत तकदीर का सिकन्दर है, ऐसी भली मालकिन मिली है. यहाँ कामदेव बाबू के मुँह से कभी एक मीठी बोली भी नहीं निकलती….बनिया-बाभन!

रबिया बोला- मालकिन, हम लोग गरीब हैं. हम लोगों के पास क्या है जो देंगे….देह है सिर्फ! अगले साल से हल-बैल कीजिए अपना- रबिया आपके ‘खिजमत’ में हाजिर है.

– दृष्टान्त देकर पाला करना चाहते हो? दीपा के मास्टर को पकड़ो.

– दीपा दाई के मास्टर के पेट में इतना गुन है!

– दीपा दाई मत कहो- दीपा बाबू, कुलदीप सिंघ कहो. दीपा बेटी नहीं, बेटा है. रबिया अवाक् होकर कारे की ओर देखने लगा- पालवेत, यह बात आपने कभी बताया नहीं. हम लोगों को तो मालूम है कि लड़की है. मगर असल में लड़का ही है क्या?

दीपा की मां हंसने लगी- कारे, तुम्हारा पालवेत पड़मान नदी के उस पार का रहनेवाला है क्या?…जो बेटी वही बेटा! नेहरू जी को नहीं जानते? एक ही बेटी है, मगर एक सौ बेटे का मुकाबला कर रही है. जानते हो?

– हम लोग क्या जानें, मालकिन. नया-नया सब कानून होते रहता है.

दीपा के मास्टर फिर आए!…दीपा की मां जानती थी, पारस फिर लौटकर आवेगा. पहलवान जेठ की बोली सुनकर उसकी बोलती बन्द हो जाती है.

– बैठो मास्टर. भोजन करोगे?

– नहीं. भोजन मैं कर चुका हूं. मैं एक प्रस्ताव लेकर आया हूं.

दोनों पालवेत कुछ देर तक मास्टर से कुछ ‘विनती’ करने के लिए हाथ जोड़े खड़े रहे. फिर दोनों आंगन से बाहर चले गए.

दीपा की मां ने अपनी चचेरी सास से कहा- आप भोजन कर लीजिए. मैं आज भोजन नहीं खाऊंगी. क्या प्रस्ताव है मास्टर?

– गांव में औरतों को बहुत तरह की गुप्त बीमारी है. मैं कहता हूं कि एक पर्चा छापकर हर हाट में बंटवाकर, एक साइनबोर्ड लगाकर, आप डॉक्टरी शुरू कर दीजिए.

– क्या-क्या सोचते रहते हो मास्टर? मैं क्या जानती हूं…?

– आपके जानने और नहीं जानने से क्या होता है. असल चीज है- प्रचार. आप तैयार होइए, मैं सब कुछ कर दूंगा. हर मंगलवार या हर महीने में पूॢणमा के दिन दमा या किसी असाध्य रोग की जड़ी मुफ्त देने का एक बार ठिकाने से ऐलान हो जाए- फिर देखिएगा, आपके दरवाजे पर लोगों को जगह नहीं मिलेगी.

– लेकिन मुफ्त में जड़ी देने से आमदनी कहां से आएगी डाक्टरनी को? उसका इन्तजाम भी हो जाएगा.

इसके बाद पारस मास्टर ने अंगरेजी में कहा- आइ एम योर ओबिडियेंट सर्वेंट- औलवेज! बोलिए- रुपये जब बरसने लगेंगे, तब मुझे क्या दीजिएगा?

दीपा की मां धीरे से चिकोटी काटकर मुस्कराती हुई बोली- जो कभी नहीं दिया- वही दूंगी.

– सच?

– लेकिन तुम्हीं भाग जाओगे.

– कभी नहीं.

…बचपन की दोस्ती!

…अपाहिज और अपंग पति से मुक्ति भी पारस ने ही दिलाई है- सरस्वती को. चांद-सूरज को भी नहीं मालूम. लूले ने विवाह के बाद ही बाएं हाथ से पेट टटोलकर कहा था- चालाकी? यह ‘सनेशा’ कहां से लेती आई हो?

…किन्तु दीपा के बाबू देवता आदमी थे. दीपा की मां ने सब कुछ बता दिया- खुलासा करके! कुछ भी नहीं छिपाया. सारी जिन्दगी की कमाई मशीन में हाथ कटने का हर्जाना मिलाकर- पांच हजार रुपये नगद देकर सरस्वती को खरीदा था दीपा के बाबू ने. दीपा के बाबू ने सब कुछ माफ कर दिया. लेकिन घर में घुसे तो बाहर नहीं हुए. उनकी लाश ही निकली.

…पापी स्कूल इन्स्पेक्टर ने फिर कभी खबर भी नहीं ली. पारस नहीं होता तो दीपा की मां पागल हो जाती. बुखार से देह तेपी हो या खांसी से परीशान- दीपा के बाबू कभी अपनी देह से अलग नहीं होने देते. नरक में बीते आठ महीने- दीपा की मां को अब भी मितली आने लगती है. रात-भर- जानवर! कहता- मैं ‘मशीन मैन’ था जूट मिल में, सो जानती ही हो. तुम मेरे लिए मशीन ही हो- हे-हे-हे-हे! इतना रूप मैं कैसे समेटूं- एक हाथ से ‘हीन’ हूं- हे-हे-हे-हे!…

– पारस?

– हूं.

– मैं डाक्टरनी नहीं, लीडरानी होना चाहती हूं.

– लीडरानी?

– हां जी, हां! क्या मैं भाषण नहीं दे सकती? मीटिंग में जाने के योग्य मेरा चेहरा नहीं?

– भला कहिए! लीडरानी बनने के लिए चेहरा? आप कभी-कभी ऐसी बातें करती हैं! किस पाटी में भर्ती होने का इरादा है? आजकल सभी पाटी का भाव मन्दा ही है.

– देश का काम करना सबसे बड़ा काम है. नेहरू जी की पार्टी ही असली पार्टी है.

– कौमनिस्ट?

– कौमनिस्ट पार्टी ‘कमसिन’ है अभी. स्कूल के लड़के-लौंडों की पार्टी है….पारस, तुम एक काम करोगे? फारबिसगंज के छोटन बाबू को जानते हो न?…स्कूल इन्स्पेक्टर के साथ ‘जीप’ पर वह भी आता था- वहां.

कौन नहीं पहचानता उसको!

…वहां, अर्थात् रामगंज-पिपरा में.

– हां-हां. पहचानता हूं.

– तुम उससे मिलकर महिला-मेम्बर बनने की नियमावली ले आओ. पूछे तो कहना- याद कर लो क्या कहना है…

– ठहरिए, मैं लिख ही क्यों न लूं. बोलिए.

– कहना- मीठी-मीठी बातों से फुसलाकर, रामगंज-पिपरा के कांग्रेस डेलिगेट चुनाव के समय जिस मास्टरनी से घर-घर प्रचार करवाया. स्कूल-इन्स्पेक्टर से मिलकर प्रधान अध्यापिका बनवा देने का लोभ.

– छोडि़ए. उन बातों को उठाने से क्या फायदा!

– नहीं पारस. तुम नहीं जानते उसको. सीधी बातों से वह कुछ नहीं सुनता. मुंह पर बात बनाकर तुमको सोलह आने विश्वास दिला देगा- फलाना काम? वह तो मेरी चुटकी में है. कल ही हो जाएगा. मगर उसने सच नहीं बोलने की कसम खा ली है. रामदेव बाबू लोकल बोर्ड के चेयरमैन और यह शैतान उसका दलाल. कितनी मास्टरनियों को ‘डाक बंगला’ तक भुलावे में डालकर ले गया- इसका हिसाब उससे किसी दिन भगवान ही पूछेंगे.

– लीडर तो मगर ‘जब्बड़’ हो गया है.

– ऊपर अमीन बाबू और नीचे रामदेव नारायण- छोटन के दो पाये हैं. जो भी हो, उससे काम लेना है. उसको बाप भी कहना पड़े- सरस्वती कहेगी. तुम कल जा सकोगे?

– कल?…कल…एक पार्सल मेरा भी आनेवाला है.

– पार्सल आनेवाला है, आएगा!

– पारस कुछ सोचने लगा. कुछ ही क्षण पहले सरस्वती उसके दिल के जितना निकट थी, लीडर-लीडरानी की बात करते समय उतनी ही दूर चली गई. हाथ से निकल गई सरस्वती.

– क्या सोच रहे हो, पारस? मैं समझ गई. इस गोडिय़र गांव में आकर तुम्हारी बुद्धि पर भी गोबर पड़ गया है. क्या चाहते हो तुम लोग? मेरे रहते इस गांव में एक बंगालिन आकर लीडरी करेगी? मीटिंग में जाती है पूॢणयां- हाथ में चमड़े का थैला लटकाकर. लोग क्या कहते होंगे? गोडिय़र गांव में कोई बिहारी औरत पढ़ी-लिखी नहीं है क्या? सो इस गांव पर तो राज है गोढ़ी और गुडाम् का. लाज आवे तो किसे?…हुंह! दीदी ठकुराइन!…मेरा भी नाम सरस्वती ठकुराइन है!

…पारस के सामने चुनाव के कई पोस्टर नाच गए- वोट दो! ठकुराइन सरस्वती को वोट दो!! या, सरस्वती ठकुराइन को?

पारस बोला- सरस्वती ठकुराइन नहीं- श्रीमती सरस्वती ठकुरानी.

एक नहीं, दो. गोडिय़र गांव में दो पढ़ी-लिखी औरतें हैं- अव्वल, श्रीमती सरस्वती ठकुरानी और श्रीमती हरिमाया पारसप्रसाद! लेकिन ठकुरानी बहुत ‘फौरवर्ड’ है, पारस की स्त्री हरिमाया- बैकवार्ड!


किताब का नाम – जुलूस
लेखक – फणीश्वरनाथ रेणु
प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन
विधा – उपन्यास
कीमत- 399 रुपये


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