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बिसात पर जुगनू: सरहदों के आर-पार की कहानी

Vandana Ragवंदना राग मूलत: बिहार के सीवान जिले से हैं. जन्म इन्दौर मध्य प्रदेश में हुआ और पिता की नौकरी की वजह से भारत के विभिन्न शहरों में स्कूली शिक्षा पाई. 1990 में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. किया. पहली कहानी हंस में 1999 में छपी और फिर निरंतर लिखने और छपने का सिलसिला चल पड़ा. तब से कहानियों की चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- यूटोपिया, हिजरत से पहले, खयालनामा अरु मैं और मेरी कहानियां. इसके अलावा अनेक अनुवाद कर चुकी है जिनमें प्रख्यात इतिहासकार ई. जे. हॉब्सबाम की किताब एज ऑफ़ कैपिटल का अनुवाद पूंजी का युग शीर्षक से किया है. यदा-कदा अख़बारों में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लिखती रहती हैं. बिसात पर जुगनू इनका पहला उपन्यास है.

10 मार्च को वंदना का जन्मदिन होता है. इस मौके पर उनकी किताब बिसात पर जुगनू का अंश पढ़िए.


किताब के बारे में

बिसात पर जुगनू सदियों और सरहदों के आर-पार की कहानी है. हिंदुस्तान की पहली जंगे-आजादी के लगभग डेढ़ दशक पहले के पटना से शुरू होकर यह 2001 की दिल्ली में ख़त्म होती है. बीच में उत्तर बिहार की एक छोटी रियासत से लेकर कलकत्ता और चीन के केंटन प्रान्त तक का विस्तार समाया हुआ है. गहरे शोध और एतिहासिक अंतर्दृष्टि से भरी इस कथा में इतिहास के कई विलुप्त अध्याय और उनके वाहक चरित्र जीवंत हुए हैं. यहां 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की त्रासदी है तो पहले और दूसरे अफीम युद्ध के बाद के चीनी जनजीवन का कठिन संघर्ष भी. इनके साथ-साथ चलती है, समय के मलबे में दबी पटना कलम चित्र-शैली की कहानी, जिसे ढूंढती हुई ली-ना, एक चीनी लड़की, भारत आई है. यहां फिरंगियों के अत्याचार से लड़ते दोनों मुल्कों के दुखो की दास्तान एक-सी है और दोनों जमीनों पर संघर्ष में कूद पड़नेवाली स्त्रियों की गुमनामी भी एक सी है. ऐसी कई गुमनाम स्त्रियां इस उपन्यास का मेरुदंड है. बिसात पर जुगनू कालक्रम से घटना-दर-घटना बयान करनेवाला सीधा (और सादा) उपन्यास नहीं है. यहां आख्यान समय में आगे-पीछे पेंगें मारता है और पाठक से, अक्सर ओझल होते किंवा प्रतीत होते कथा-सूत्र के प्रति अतिरिक्त सजगता की मांग करता है.


पुस्तक अंश

परगासो समझती है कैसे देवता का डर जगाकर शुद्धता की बात कर, लोग मुलाज़िम को मुलाज़िम ही बने रहने पर मजबूर कर देते हैं. पीढ़ियाँ मुलाज़मत में खप गईं. उसने देखा था अपने टोले में. कोई बड़ा आदमी नहीं बनता था. तीरो-तलवार का जबर भी जंगल से शिकार पकड़ पेट भरने के लिए होता था. किसी राजा-महाराजा से लड़ने या बराबरी की बात करने का ख़याल भी नहीं आता था किसी को उस टोले में. सब जैसे अपने छोटेपन में और सिमटकर रह गए थे. कुछ लोग भागकर गए थे इसी कम्पनी के चक्कर में फँसा, नौकर बनने या सिपाही बनने. लेकिन क्या हुआ उससे? ग़ुलाम रहे, हमेशा-हमेशा के लिए ग़ुलाम.

परगासो को बचपन से कोफ़्त होती रही कि टोले में क्यों उसके सवालों का जवाब देनेवाला कोई नहीं. बस जब भी टोले के लोगों से सवाल करती, वे भगत के सामने उसे ले जाकर खड़ा कर देते. और भगत का क्या, कहता था, ‘देवता ही जवाब देंगे एक दिन.’ वह तो बस देवता को पकड़, उसकी चाकरी कर, टोले वालों और दूर-दराज़ से आए परेशान लोगों को शान्त कर देता था लेकिन परगासो को कभी कोई जवाब नहीं मिला. इसीलिए बहुत बचपन में उसने भगत जी के झूठ को पकड़ हमेशा के लिए देवता का दामन छोड़ दिया था. वह अपनी मालिक ख़ुद बन गई थी. अपना मालिक हो जाने में कितनी आज़ादी थी इसका सुख टोले वाले नहीं जानते थे न जानने की ललक उनमें दिखती थी. ओह कितने बरसों से वे ऐसे ही रह गए थे, लेकिन अब मौक़ा आ चुका है….

मोहब्बत में आरास्ता हो सुमेर सिंह उससे कहा करते थे—‘मेरी चाय…मेरी नूरजहाँ….’

वह तो बहुत बाद में उसे चाय का मतलब समझ में आया था.

चाय और चीन का.

चाय और सूर्य दरबार का.

चाय और व्यापार का.

चाय और कम्पनी बहादुर का.

चाय और लालच का.

चाय और धुन्ध का.

चाय और अफ़ीम का.

अफ़ीम और ग़ुलाम का.

चीनी क़ौम के नशे में डूब जाने की दास्तानों का, जो फ़तेह अली ख़ान के मार्फ़त उस तक पहुँची.

और सुमेर सिंह की ग़ुलामी का भी, जो धुन्ध में उभर गए बचपन के उनके मीतों के मार्फ़त उस तक पहुँची और जिसे धीरे-धीरे साफ़ करने की क़वायद में वह बहुत शिद्दत से जुटी हुई थी. ठीक तबसे, जबसे उसने सुमेर सिंह के सोना जैसे खरे मन को जान उनकी छाती पर अपना माथा रखा था और फिर खदबदाती उत्तेजना के समन्दर को हेलती हुई उनके होंठों तक पहुँची थी.

और फिर जाने कितने भूगोल नापते हुए वह लम्बी साँस ले पलट गई थी उन अनमोल बची हुई साँसों को सदा के लिए अपने दिल में बसा लेने के लिए क्योंकि ऐसे परम क्षणों का मोल तो बिरलों को ही मिलता होगा, उसे अपनी अनुभवहीन जवानी के बावजूद यह यक़ीन हो गया था. एक पुख़्ता और मज़बूत यक़ीन कि ऐसे क्षण जहाँ उत्तेजना का समागम लबालब भरे मोहब्बत के सागर में होता है, वहाँ उसके बाद दुनिया में और कुछ हासिल करना बचा नहीं रह जाता है, बल्कि जो हासिल है उसे बचाने में एक ज़िन्दगी खप भी जाए तो भी कुछ उज्र कभी नहीं होता.

कभी कोई ग़म नहीं होता.

ऐसा भरोसा. ऐसा ही यक़ीन जिसे न फानी ताक़तें डोला सकती थीं न ग़ैर फानी. और वैसे भी यह फानी क्षण था. वह फानी औरत थी. ग़ैर फानी के मसले पर वह कोई राय नहीं रखती थी क्योंकि वह उन्हें मानती ही नहीं थी.

उसी दिन वह समझ गई थी कि सुमेर सिंह को गन्ध क्यों पसन्द है?

सुमेर सिंह को चाय की गन्ध क्यों पसन्द है?

उसी दिन वह यह भी समझ गई थी कि सुमेर सिंह उन पचास-सौ औरतों में क्या ढूँढ़ते रहे थे जिनके साथ वे हर रात सोते थे और फिर भी कुछ नहीं पाते थे.

चाय और चीन. चाय और सागर की लहरें.

चाय और मासूमियत. चाय और जन्नत.

चाय और अलहदगी.

चुपके से आनेवाली.

चीन से चुपके से आनेवाली.

रेशमी कपड़ों और महफूज़ डब्बों में आनेवाली.

थोड़ी और बहुत थोड़ी आनेवाली.

एक नायाब गन्ध. एक नायाब स्वाद. एक नायाब चस्का. नायाब चस्के की ख़्वाहिश. जिसे इस देश में अभी बन्द मुट्ठियों और ज़बानों की गिरफ़्त में रखा गया था.

इसी के लालच में ‘सूर्य दरबार’ को पीछे छोड़ने पर आमादा थे फ़िरंगी. उन्हें भी यह नायाब चस्का लग चुका था फ़तेह अली ख़ान ने इस चस्के के बदले सफ़ेद ज़हर के क़हर को चीन में फैलते अपनी आँखों से देखा है. फ़िरंगी का गुनाह सिर्फ़ यह नहीं था. चीन के ज़्यादा मर्द उस ज़हर की आगोश में जान देने को उतारू थे. उन्हें अब लड़ना-भिड़ना नहीं आ रहा था. उनकी दुनिया धुन्ध की दुनिया हो चुकी थी. अफ़सोस वहाँ कोई परगासो नहीं थी और कई सुमेर सिंह रह गए थे जिन्हें रौंदकर फ़िरंगी बहुत कुछ अपने देश में भेज रहे थे. चाय और रेशम पर उनकी गिद्ध निगाहें थीं और वे नोचने में बहुत उस्ताद थे.

चश्मदीद हैं फ़तेह अली ख़ान उस गुनाह के जिसे फ़िरंगी चीन में अंजाम दे रहा है. चीन, जहाँ के लोग प्यारे हैं. मिची आँखोंवाले. मुलायम बालोंवाले. मेहनतकश और ईमानदार. उनके गालों पर पीले माखन-सी आभा है. फ़तेह अली ख़ान की इन बातों को अपने ज़ेहन में बसा चुकी थी परगासो और अपने दूर देश में बसे हमक़दमों से एक ज़हनी रिश्ता भी जोड़ चुकी थी.

“वहाँ युद्ध करने वाले कौन हैं, कैसे रहे?”

फ़तेह अली ख़ान ने बहुत सोचकर जवाब दिया था, “हुए हैं बीबी, ऐसे लोग भी हुए हैं वहाँ जो अब हारे हुए और दर-बदर हैं.”

इसके बाद फ़तेह अली ख़ान एकाएक चुप हो गए थे, जैसे देखी गई तकलीफ़ों को महसूस कर रहे हों.

कलकत्ता जर्नल अख़बार

बृहस्पतिवार,9 अप्रैल,1857

8 अप्रैल, 1857 को 34वीं बंगाल इन्फेंट्री बैरकपुर के बाग़ी सिपाही मंगल पांडेय को फाँसी दे दी गई है…ख़बर मिल रही है कि मंगल पांडेय के अंग्रेज़ अफ़सर को गोली से उड़ा देने के बाद, देश के बहुत सारे हिस्सों में बदमाशी से बग़ावत फैला दी गई है. कम्पनी के सिपाहियों ने महारानी विक्टोरिया को सारी बातों की जानकारी दे दी है.

पुलिस सुपिरिंटेंडेंट ने बयान दिया है कि जल्द ही बाक़ी बाग़ियों को पकड़कर सज़ा दी जाएगी.

लॉन्ग लिव द क्वीन

कलकत्ता जर्नल अख़बार

सोमवार,11 मई,1857

10 मई को मेरठ के सदर कोतवाली में तैनात कोतवाल धनसिंह गुर्जर ने बग़ावत की है. मेरठ की शहरी जनता, आसपास के गाँव के लोग, सिपाही, किसान और पुलिस भी शामिल हो गए हैं. उनका मक़ाम फ़िरंगी को हताहत करना है.

हालात बहुत तेज़ी से ख़राब हो रहे हैं. मेरठ जेल से कई सौ क़ैदियों को भी बाग़ियों ने छुड़ा लिया है. आगजनी और भगदड़ चारों ओर है और जंगल में आग की तरह बग़ावत फैलती ही जा रही है. झाँसी, कानपुर, अवध और भोजपुर के कई इलाक़े, बग़ावत की गिरफ़्त में आ गए हैं. हालाँकि सिख रेजिमेंट अपने सिपाहियों को कम्पनी के सैनिकों के साथ मिलकर लड़ने को भेज रही है फिर भी कब हालात और बिगड़ जाएँ पता नहीं चल रहा है. इसलिए प्रशासन को जल्द से जल्द सख़्त क़दम उठाने की ज़रूरत है.

लंदन में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इस मुद्दे पर गहरी चिन्ता जतलाई गई है और कम्पनी बहादुर प्रशासन को हिन्दुस्तान में रह रहे अंग्रेज़ों की हिफ़ाज़त के उपाय करने को कहा गया है.

लॉन्ग लिव द क्वीन

रोज़नामचा

आसिन भी बरसा सा है,1857

आज हवा में कुछ अजीब सी खुनकी है. बारिश का मौसम तो ख़त्म हुआ. और ठंड भी फ़िलहाल दूर है. फिर ऐसी रहस्य से भरी खुनकी क्यों?

चाँदपुर में अजीब चुप्पी पसरी हुई है. जंगल, खेत-खलिहान में भी कोई हलचल नहीं. मैं अभी कुछ देर पहले गढ़ी पहुँचा हूँ. हरिया ने मुझे मेहमानख़ाने तक पहुँचा दिया है. वह और लँगड़ा रहा था. कह रहा था वात ने उसको तोड़ दिया है. उसकी आँखें ख़ाली हैं. कहता रहा था—“हुज़ूर चारों ओर विषैली हवा फैल गई है. ऐसे में मुझ पर यह आफ़त तो आनी ही थी.” उसकी आँखों में न चाहते हुए भी मैं परगासो बीबी का अक्स देख लेता हूँ. वही विषैला ज़हर है उसके लिए जिसने उसे बाबू से अलग कर दिया. हरिया एक ऐसी माँ है जिसे बेटे का छिन जाने का ग़म है. एक जलन-सी भरी माँ है वह. अपनी हर तरह की कमतरी का इल्ज़ाम परगासो बीबी पर लगाता है.

मैं भी यह देख और समझ रहा हूँ, लोग मानें या न मानें परगासो बीबी ने गढ़ी को बदल दिया है. ऐसे वक़्त में वह गढ़ी आई जब सब टूटकर गिर जाने को था. उस नाज़ुक जान ने सब थाम लिया. एक वह दिन भी था जब मालकिन ने बड़े राजा को उसे अपनी तरह ही मान जाने के लिए कहा था, जिस पर बड़े राजा ने अपनी तलवार निकाल कहा था—इस दुसाधन का ख़ून इस राजपूत के माथे.

सुमेर सिंह यह देख ज़रा भी नहीं घबराया था और इत्मीनान से परगासो का हाथ पकड़ अपने कमरे की ओर चल दिया था. मालकिन ने ज़ोर से चिल्लाकर अपना घूँघट और बड़ा कर लिया था मानो इस बेपर्द तमाशे को ढक रही हों.

बड़े राजा कुर्सी पर भहरा गए थे.

सबका आँखों देखा हाल है मेरे पास.


पुस्तक- बिसात पर जुगनू
लेखक- वन्दना  राग
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
भाषा- हिंदी
पृष्ठ- 296
प्रकाशन वर्ष- 2020
कीमत (पेपरबैक)-  299 रुपये


विडियो- किताबवाला: कश्मीर में छह सौ साल पहले संस्कृत में लिखा गया हजरत मुहम्मद पर सच

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