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बॉलीवुड की दुखियारी मां, जिन्होंने तब लक्स का ऐड किया जब सिर्फ हॉलीवुड की हीरोइनें करती थीं

हिंदी सिनेमा में यदि महिलाओं को केंद्रीय भूमिकाओं को लेकर कभी फिल्में नहीं बनीं और सिर्फ मर्द प्रधान भूमिकाओं का ही अस्तित्व रहा तो इसमें ऐसा कहीं नहीं है कि अभिनेत्रियों में काबिलियत नहीं रही. हमारी फिल्मों में हीरो के पीछे लट्‌टू होने वाली भोंदू, सजी-धजी हीरोइन के सिवा जो सबसे घिसा-पिटा रोल उनके के लिए लिखा गया है वो है दुखियारी मां का. जो खाट पर पड़ी खांसती रहती है या एक-एक करके दुखों के पहाड़ों का सामना करते-करते अंधी हो जाती है.

मां के ऐसे किरदारों में आज के दौर के दर्शकों को अगर कोई नाम सबसे पहले याद आएगा तो राखी का, जिन्होंने राकेश रोशन की 1995 में प्रदर्शित सलमान खान और शाहरुख खान स्टारर फिल्म में काली के मंदिर में रो-रो कर कहा था “मेरे करण-अर्जुन आएंगे”. उससे ज़रा पीछे जाएं तो हम निरूपा रॉय का नाम लेंगे, जिन्हें लेकर 1975 में आई ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच सिद्धांतों की अलौकिक बहस होती है और शशि का इंस्पेक्टर पात्र कहता है “मेरे पास मां है”. यही निरूपा ‘अमर अकबर एंथनी’ में तीन सुपरस्टार्स की मां बनीं.

लेकिन इन पात्रों में उनसे भी बड़ी या कहें तो भारतीय सिनेमा की सबसे पहली आइकन हैं लीला चिटनिस. ऐसे पात्रों की शुरुआत उन्हीं से हुई थी. चाहे ‘आवारा’ (1951) की बात कर लें जिसमें वो राज कपूर की मां बनीं, ‘गंगा जमना’ (1961) में वे दिलीप कुमार की मां बनीं और ‘गाइड’ (1965) में देव आनंद उनके बेटे थे.

ऐसे पात्रों को करने वाले कलाकारों को हम कोई तवज्जो नहीं देते हैं. क्योंकि ये बिना ग्लैमर वाले होते हैं और हमारी इंद्रियों को ठंडा करने के काम नहीं आते. लेकिन लीला चिटनिस जैसे तमाम कलाकारों की कद्र करने में यहीं पर सबसे बड़ी भूल हुई है. अगर समय के पन्ने कुछ ही पीछे पलट लिए जाएं तो ऐसी भूल न हों.

यदि देखेंगे/देखेंगी तो हिंदी सिनेमा में मांओं या अधेड़ औरतों की ऐसी भूमिकाएं करने वाली ज्यादातर औरतें पढ़ी-लिखी थीं और अभिनय में पूरी तरह दक्ष होकर आई थीं. बस महिलाओं के लिए किरदारों के लिहाज से वो बुरा जमाना था इसलिए वे पूरी तरह दरकिनार हुईं. शायद चिटनिस के बहाने हम उनका मूल्य समझ पाएं और अतीत में झांककर उन सबका पुनर्मूल्यांकन करेंगे.

1909 में 9 सितंबर को जन्मीं लीला कर्नाटक से थीं. मराठी भाषी. काबिलियत के मामले में वे उन सब पुरुष सितारों से बहुत आगे थीं जो उनके बेटों के रोल किया करते थे. वे एक अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर की बेटी थीं और ख़ुद भी अंग्रेजी में पढ़ी-लिखीं थीं. जिन थियेटर गुरु स्टानिसलावस्की की method acting का जिक्र दर्शक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सेलेब्रिटी एक्टर्स या नवाजुद्दीन सिद्दीकी सरीखे मौजूदा आइकनों से अब सुनते हैं उसे चिटनिस ने 1935 से पहले कर-कर के छोड़ दिया.

यहां तक कि उन्होंने उस दौर में ख़ुद अपनी रेपरटरी बनाई थी जो टर्म हमने तीस-चालीस साल पहले सुननी शुरू की है. एक महिला होते हुए ऐसा करना तब के दौर के लिहाज से बड़ी बात थी. और इसमें भी खास ये था कि अभिनय की दुनिया में उन्होंने प्रवेश तब किया जब उनके चार बच्चे थे. उन्होंने 15-16 की उम्र में ही शादी कर ली थी. जल्दी ही बच्चे हो गए. आज़ादी की लड़ाई में पति के साथ हिस्सा लिया. फिर दोनों में तलाक हो गया. घर चलाने के लिए लीला पढ़ाने लगीं. उसके बाद उन्होंने अभिनय में प्रवेश किया.

जैसे वे असल जीवन में एक शिक्षित, प्रगतिशील, कामकाजी महिला की मिसाल थीं, वैसे ही फिल्मों में भी उन्होंने प्रभावशाली जगह बना ली. वे अपनी ही तरह शिक्षित दोस्तों के साथ मिलकर सार्थक फिल्में बनाने की कोशिश कर रही थीं. जैसे 1935 में उन्होंने ‘धुंआधार’ जैसी फिल्म बनाई जो नहीं चली. बाद में वे फिल्में करती गईं. चार साल बाद आई ‘संत तुलसीदास’ ने उन्हें स्थापित कर दिया. उसके बाद बॉम्बे टॉकीज़ के हिमांशु राय ने उन्हें तीन साल के लिए साइन कर लिया. इस दौरान चिटनिस ने प्रमुख भूमिकाओं में ‘कंगन’ (1939), ‘बंधन’ (1940) और ‘झूला’ (1941) जैसी फिल्में कीं. एक दो अन्य फिल्मों समेत ये तब की ब्लॉकबस्टर्स साबित हुईं.

चिटनिस की कास्टिंग हीरो जितनी ही प्रमुखता से होती थी. अशोक कुमार जैसे बड़े एक्टर ने कहा था कि उन्होंने अभिनय की कुछ बारीकियां चिटनिस से सीखीं.

उन्होंने हिमांशु राय की पत्नी व अभिनेत्री देविका रानी के बराबर मुकाम पा लिया था. 1953 में दिए एक दुर्लभ इंटरव्यू में लीला चिटनिस ने कहा था:

“हिमांशु राय की ख़ूबसूरत अदाकारा पत्नी देविका रानी ने मेरी बहुत मदद की. वे बहुत ही चार्मिंग और प्यारी महिला थीं. उन्होंने मूझे ग्रूम किया और बहुत कुछ सिखाया.”

उन्होंने अपनी तब की फिल्मों के बारे में भी कहा:

“उसके बाद मेरी बहुत सी फिल्में बहुत नहीं चलीं. फिर ‘शहीद’ आई और उसके बाद ‘मां’ आई जिसमें मेरा रोल बहुत ख़ूबसूरती से बनाया गया था. पूरी फिल्म बहुत उम्दा थी और बिमल रॉय ने उसे अद्भुत तरीके से डायरेक्ट किया था.”

चिटनिस बहुत ही मृदुभाषी, सरल और परिष्कृत व्यक्तित्व वाली महिला थीं. वे अपने समय से काफी आगे की औरतों में से थीं. फिल्मों में आई सबसे शुरुआती शिक्षित महिलाओं में वो एक थीं और कई मायनों में पहली थीं.

एक बार 1937 में एक प्रमुख अंग्रेजी अख़बार में पुरुषों के परिधान में चिटनिस की तस्वीर छपी जो बड़ी चर्चित हुई. तब उन्हें महाराष्ट्र की ग्रेजुएट सोसायटी की पहली महिला कहा गया. कुछेक बरसों बाद उनका प्रभाव इतना हो चुका था कि उन्होंने तब लक्स साबुन का विज्ञापन किया जो तब तक सिर्फ हॉलीवुड की एक्ट्रेस ही किया करती थीं.

(जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने अपने बड़े बेटे के साथ अमेरिका के कनेक्टिकट में गुजारे.) 

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