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पाक फ़ौज की खाल खींचता वो लेख, जो पाकिस्तान में सेंसर कर दिया गया

मोहम्मद हनीफ पाकिस्तानी जर्नलिस्ट और लेखक हैं . उनका अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में कॉलम छपता है. 5 मई को भी छपा, मगर पाकिस्तान के एडिशन ‘एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ में उस लेख को सेंसर कर दिया गया. उसकी जगह खाली स्पेस छाप दिया गया. क्योंकि ये लेख आर्मी के रवैये को लेकर लिखा गया था. लेख का हेडिंग था ‘पाकिस्तान की नफरत का ट्रायंगल.’ इस लेख में हनीफ ने तालिबानी प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान की फ़ौज को दी जाने वाली गिरफ्तारी और उसके बाद जारी होने वाले वीडियो को निशाना बनाते हुए डॉन लीक्स पर अपने ख्यालात पेश किए थे. ये लेख पाकिस्तानी फ़ौज की वो सच्चाई था, जिसे फ़ौज शायद ही बर्दाश्त कर पाती. इसलिए उसे पाकिस्तान में छापा ही नहीं गया. हम आपको उस लेख का तर्जुमा पढ़वा रहे हैं, जो न्यूयॉर्क टाइम्स में मोहम्मद हनीफ ने लिखा है. पढ़िए:

मोहम्मद हनीफ
मोहम्मद हनीफ

पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ कभी ख़त्म न होने वाले युद्ध के लिए नया साथी ढूंढ लिया है. और वो इन्तहाई बेरहम कातिल है, जो क्रूर हत्याओं का सार्वजानिक चेहरा है. नाम है लियाक़त अली, जो एहसानुल्लाह एहसान के नाम से अच्छी तरह पहचाना जाता है.

वो पाकिस्तान की नेशनल मीडिया के लिए दहशत का सिंबल था. लेकिन अब लग ये रहा है कि जो तमाम ज़ुल्म पाकिस्तानी तालिबान या तहरीक-ए-पाकिस्तान (टीटीपी) ने किए, उसके बाद अब ये (एहसानुल्लाह एहसान) अपने विजयी अंदाज़ से अपने बयान या खून जमा देने वाले वीडियो के ज़रिए पाकिस्तानी मीडिया और लोगों के लिए खुदा के खौफ का प्रचार करते हुए पाकिस्तान के लोगों का ध्यान हटाने के कोशिश करेगा.

पाकिस्तान में छपा खाली स्पेस
पाकिस्तान में छपा खाली स्पेस

जनवरी 2014 में जिस दिन टीटीपी ने एक्सप्रेस टेलीविजन के दो मुलाज़िम को क़त्ल किया तो उसी दिन एक्सप्रेस टेलीविजन ने एहसानुल्लाह एहसान को टेलीफोन के जरिए लाइन पर लिया. उसने बड़े ही आराम और सुकून के साथ दोनों मुलाज़िम के क़त्ल करने की वजह को बताया. उसका इंटरव्यू करने वाला उससे रहम की भीख मांगते हुए उससे बार बार सम्मान के साथ वादा कर रहा था कि वो उसे टीवी पर काफी वक़्त देगा, शर्त ये है कि वो और हमले न करे.

न्यू यॉर्क टाइम्स में छपे लेख का स्क्रीन शॉट
न्यू यॉर्क टाइम्स में छपे लेख का स्क्रीन शॉट

इसके बाद एहसानुल्लाह एहसान ने लाहौर में उस वक़्त हमला कराया था, जब ईसाई ईस्टर मना रहे थे. इस खूनी हमले में पार्क में दर्जनों बेगुनाह ईसाई मारे गए थे. इससे पहले उसने मलाला युसुफजई पर जानलेवा हमले की भी ज़िम्मेदारी ली थी. मलाला को स्कूल जाते वक़्त गोली मार दी गई थी. तब उसने ये भी कहा था कि गोली लगने से बचने वाली मलाला को ख़त्म करने के लिए उसका पीछा करता रहेगा.

एहसानुल्लाह एहसान के सामने आने के बाद ये लगने लगा है कि पाकिस्तानी फ़ौज अब ये पैगाम देना चाहेगी कि बेशक तुम हज़ारों पाकिस्तानियों को क़त्ल कर सकते हो. लेकिन अगर तुम सिर्फ इतना कह दो कि तुम भारत से बहुत नफरत करते हो जैसा कि हम (फ़ौज) करते हैं तो फिर हम सबकुछ भुला देने वाले हैं. लेकिन फ़ौज को एक झटका उस वक़्त ज़रूर लगा, जब सरकारी मीडिया ने एहसानुल्लाह एहसान का डिटेल इंटरव्यू चलाने से मना कर दिया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि तालिबान के सताए हुए लोगों ने इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था.

तालिबान ने आर्मी स्कूल में करीब 140 लोगों को बेरहमी से क़त्ल कर दिया था, इनमें ज़्यादातर स्कूल के बच्चे थे. उनके मां बाप ने विरोध करते हुए मांग कि एहसानुल्लाह एहसान को मौत की सज़ा दी जाए. फिर भी फ़ौज टीवी कैमरों के सामने उसे जीत वाली मुस्कुराहट के साथ पेश करती रही. टीवी के जरिए उसकी कामुक कहानियों को सुनाया जाने लगा कि किस तरह उसके तालिबान साथियों ने तीन तीन बीवियां रखी हुई हैं. और किस तरह टीटीपी लीडर ने अपने ही उस्ताद की बेटी को ज़ोर ज़बरदस्ती से अपने पास रखा हुआ है.

इसको दिखाने का उद्देश्य ये है कि पाकिस्तानी समाज में गहरी जड़ें रखने वाला तालिबान डरावनी और वहशी फ़ोर्स नहीं है. बल्कि वो पाकिस्तान के दुश्मन देश भारत के जाल में फंसे लोग हैं, जो सेक्सुअली प्रताड़ित करने वाले गुंडे हैं, जिन्हें भारत ने मदद देकर पाकिस्तान के खिलाफ कर दिया है. भारत हमेशा से हमारे अस्तित्व का दुश्मन है.

इसके भी सबूत हैं कि भारत, पाकिस्तान के दुश्मन समूहों को वित्तीय मदद पहुंचा रहा है ताकि कश्मीर में पाकिस्तान को जवाब दे सके. लेकिन क्या ये ज़रूरी है कि महज़ भारत से दुश्मनी के चलते हम अपने बच्चों के कातिलों को माफ़ करके उनको अपने साथ रखें.

पाकिस्तानी समाज इस वक़्त दो धड़ों में बंटा है. एक तालिबान के मुखालिफ है तो दूसरा तालिबान का हिमायती. समाज का एक तबका उन्हें वहशी दरिंदा मानता है, जिन्होंने हमारी चूलें हिला दीं. और ऐसा कत्लेआम मचाया कि लोग उनके खौफ से दुबके बैठे रहे. दूसरा तबका वो है, जो तालिबानियों को राह से भटका हुआ अपना भाई मानता है. वो ये तर्क देते हैं कि तालिबान एक ऐसी सोसाइटी चाहता है, जो उनकी सोच के मुताबिक हो. बस उनके अंदाज़ गलत हैं. ये तबका उन्हें बहुत बहादुर मानता है. और उनपर फख्र महसूस करता है. कहते हैं कि अफगानिस्तान में हमारे ही भाई हैं, जो आज तक अमेरिका के सामने डटे हुए हैं. लेकिन जब वो बहादुर पाकिस्तान में लड़ाई लड़ते हैं तो हम पीछे हट जाते हैं.

भारत के खिलाफ ऐतिहासिक झगड़ों में तालिबान को ये एक कीमती संपत्ति मानते हैं, क्योंकि जब साल 2008 में पाकिस्तान और भारत दूसरे युद्ध की कगार पर थे तो तालिबानी लीडर्स ने पाकिस्तानी जवानों के साथ मिलकर लड़ने की कसम खाई थी.

पाकिस्तानी तालिबान के प्रवक्ता मौलवी उमर ने कहा था, ‘अगर भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया तो तालिबान पाकिस्तान के लोगों के साथ हर दुःख और हर ख़ुशी में बराबर के शरीक रहेंगे.’ उसने ऐलानिया कहा था, ‘हम पाकिस्तानी आर्मी से दुश्मनी और झगड़ों को पीछे छोड़कर सेना के साथ मिलकर लड़ेंगे और अपने हथियारों से पाकिस्तानी सरहदों की हिफाज़त करेंगे.’

आज जब पाकिस्तान के लोग इस कश्मकश में है कि कल के दरिंदे आज वतन से मोहब्बत करने वाले हीरो बनाए जा सकते हैं तो ऐसे माहौल में पाकिस्तानी फ़ौज पहले ही ये क्लियर कर देने में लगी है कि उनका कहा हुआ हर लफ्ज़ खुदा का फरमान है.

पिछले दिनों इंग्लिश न्यूज़पेपर डॉन ने एक रिपोर्ट छापी कि इस मसले पर सरकार और आर्मी अलग अलग राय रखे हुए है कि उन दहशतगर्द ग्रुप के साथ क्या किया जाए जो पाकिस्तान में दहशतगर्दी फैला रहे हैं, मगर वो भारत के भी सख्त खिलाफ हैं. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद पाकिस्तानी आर्मी ने इसे नेशनल सिक्योरिटी का मसला बता दिया और उन दोनों लोगों के खिलाफ सख्त एक्शन लेने की बात कही, जिसने ये बात लीक की और जिसने इसको छापने की हिम्मत दिखाई. एक उच्चस्तरीय जांच बैठा दी गई कि डॉन लीक्स मामले में शामिल लोगों के साथ क्या किया जाए.

पिछले हफ्ते, प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने जांच रिपोर्ट के आधार पर दो लोगों को उनके पद से हटा दिया. और पत्रकार को न्यूज़पेपर की नुमाइंदगी करने वाली कमेटी के सुपुर्द कर दिया गया कि वो उसका फैसला करे. इसके बाद आर्मी प्रवक्ता ने ट्वीट कर जानकारी दी कि (पीएम नवाज़ शरीफ के फैसलों के) नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया गया है. और कहा गया कि पाकिस्तानी फ़ौज सरकार के साथ होने वाली किसी बहस को मानने के लिए पाबन्द नहीं है कि कौन अच्छा और कौन बुरा दहशतगर्द है. या कौन अच्छा पाकिस्तानी और कौन बुरा पाकिस्तानी है.

आज भी बहुत से पाकिस्तानी, पाकिस्तान फ़ौज से मोहब्बत करते हैं और बहुत से राजनीतिक लोग उससे सहमे रहते हैं. और अपने मुखालिफ राजनीतिक धुरंधरों को हटाने के लिए फ़ौज की तरफ देखते हैं. एक दूसरे को देश की सुरक्षा के खिलाफ बड़ा खतरा बताते हैं. शुक्र है कि गद्दार करार नहीं देते. कुछ राजनेता तो ऐसे भी हैं जो ये कहते हैं कि नवाज़ शरीफ ने बंद दरवाज़े के पीछे ऐसे फैसले लिए जो आर्मी के अच्छे और बुरे दहशतगर्द वाले फैसले से टकराते हैं. इस बात का शोर कर रहे लोगों का कहना है कि नवाज़ शरीफ का सिर तन से जुदा कर देना चाहिए.

आजकल एक कहावत चलन में है कि दुनिया के बहुत से मुल्क फ़ौज रखते हैं, लेकिन पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जिस की फ़ौज मुल्क रखती है. अगर राजनेता मुल्क को वापस लेना चाहते हैं तो उन्हें पाकिस्तानी फ़ौज को खुश करने के लिए एक दूसरे को गद्दार कहना बंद करना होगा.

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