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यूपी और बिहार: पिछड़े वोटों को जोड़ने के लिए क्या कर रही है भाजपा?

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बस अगले ही महीने से होने वाले लोकसभा चुनाव की घोषणा होने के साथ ही राजनीति के तमाम समीकरण साधे जाने लगे हैं. और उत्तर भारत के लिहाज से बात करें तो जातीय समीकरण सबसे ऊपर आते हैं. बहुत सारे जातीय समीकरण बनते हैं, उलटते-पलटते हैं और चुनाव के नतीजे तक बदल जाते हैं. पार्टियों को भी इसे समझने और साधने में बेतरह माथापच्ची करनी पड़ती है. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी भी इस माथापच्ची से क्यों दूर रहे?

अब तक भारतीय जनता पार्टी का परंपरागत वोटबैंक माने जा रहे ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा ने पार्टी के भीतर ही लामबंदी शुरू कर दी है, और ये खबर भाजपा के लिए अच्छी नहीं मानी जा रही है.

पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव यूनियन के चेयरमैन उमाशंकर कुशवाहा ने तीन दिन पहले मीडिया में बयान जारी किया कि प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्या के चेहरे पर भाजपा ने चुनाव लड़ा और बाद में योगी आदित्यनाथ को बतौर मुख्यमंत्री बिठा दिया.

हमसे बातचीत में उमाशंकर कुशवाहा ने कहा-

“पार्टी के इस कदम से उसी समय मालूम चल गया कि पार्टी के अन्दर पिछड़ों की क्या स्थिति होने वाली है. उपमुख्यमंत्री के साथ इस धोखे की वजह से कुशवाहा समाज आज भी मर्माहत है.”

बीते कुछ समय में पिछड़े वर्ग का झुकाव भाजपा की ओर देखने को मिला है. चाहे बीता लोकसभा चुनाव हो, या उत्तर प्रदेश और बिहार के बीते विधानसभा चुनाव, पार्टी के पिछड़े नेताओं को भरपूर समर्थन मिला. लेकिन 2018 के उपचुनावों के दौरान भाजपा को यह समझ आया कि कोई भी वोटबैंक स्थायी नहीं होता. ऐसा तब हुआ जब सपा और बसपा ने वोटों का बिखराव रोकने के लिए गठबंधन करने का फैसला लिया.

फूलपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव में पटेल वोटों को एक करने के लिए भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन ने पटेल उम्मीदवार उतारे थे, जीत मिली गठबंधन को. चुनाव में केशवप्रसाद मौर्या ने अपना जोर लगा दिया, लेकिन पिछड़े वर्ग के वोटों को साधने में असफल साबित हुए. अब सपा-बसपा गठबंधन आगे चला आया है और बिहार में भी राजद ने पिछड़ों के साथ-साथ अनुसूचित जातियों के वोटों पर पकड़ मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है. वह भी ऐसे समय में, जब बिहार में पिछड़ों के सबसे बड़े नेता उपेन्द्र कुशवाहा ने एनडीए से अलग रास्ता चुन लिया है.

उपेंद्र कुशवाहा के एनडीए छोड़ने का नुकसान भरने में लगी है बीजेपी.
उपेंद्र कुशवाहा के एनडीए छोड़ने का नुकसान भरने में लगी है बीजेपी.

विधानसभा चुनावों में हार का सामना करने के बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के पिछड़ों की राजनीति समझी. अखिलेश ने प्रदेश के तमाम छोटे-बड़े दलों के साथ बैठकें करना और उनकी सभाओं में शामिल होना शुरू कर दिया. इसमें कई तो ऐसे दल और संगठन थे, जिनके उम्मीदवार चुनावों में अपनी जमानत तक नहीं बचा सकते थे, लेकिन “सोशल केमिस्ट्री” को समझने के लिए अखिलेश यादव यदाकदा ‘चौहान’, ‘बिंद’ और ‘राजभर’ समुदायों की सभाओं में 2018 में खूब दिखे और अब लगभग ये सभी दल सपा और बसपा गठबंधन के साथ शामिल हैं.

यादवों के साथ-साथ पिछड़े वर्गों का एक बड़ा हिस्सा अब धीरे-धीरे भाजपा से दूर हो रहा है. इसका सीधा-सा कारण यह है कि भाजपा में पिछड़ी जाति के नेताओं को पार्टी में जगह दी तो गयी, लेकिन उन्हें ढंग से सम्मान और वरीयता नहीं दी गयी. 2011 में पार्टी के ही टिकट पर आजमगढ़ से सांसद रहे रमाकांत यादव ने गोरखपुर में तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की सभा में मंच से कह दिया था कि भाजपा को यदि प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत बनानी है तो उसे अपने पिछड़े नेताओं को भी सम्मान देना चाहिए.

हमसे बातचीत में रमाकांत यादव ने कहा-

“बिना शक भाजपा ने मेरी शिकायत पर समस्या को समझा है और पिछड़ा समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत की है. पिछड़ों का बड़ा हिस्सा भाजपा से जुड़ा है, लेकिन बचे हिस्से को पार्टी से जोड़ने के लिए पार्टी को अभी कुछ और काम करना होगा. और मेरा पार्टी पर पूरा भरोसा है कि पार्टी ऐसा कर दिखाएगी.”

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी सुभासपा के नेता ओमप्रकाश राजभर भी बीते लम्बे समय से अपने बयानों से पार्टी की नाक में दम किए हुए हैं. अपने बेटे की शादी में वे अपने गांव की सड़क गमछा-फावड़ा लेकर बनाने लगते हैं क्योंकि बकौल राजभर, प्रदेश की भाजपा सरकार पिछड़ों के इलाकों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है. राजभर समुदाय, जिसकी गिनती पिछड़ी जातियों में होती रही है, के प्रति भेदभाव और उसे आरक्षण न देकर उनका ‘विकास रोकने’ का आरोप ओमप्रकाश लगाते रहे हैं.

बातचीत में ओमप्रकाश कहते हैं-

“जिस तरह सपा-बसपा जातीय समीकरणों का इस्तेमाल करते रहे हैं, वैसे भी भाजपा अब राष्ट्रवाद का सहारा चुनाव जीतने के लिए कर रही है. पिछड़ी जातियों के लिए कुछ भी करने के पुख्ता कदम सरकार के पास नहीं मौजूद हैं.”

राजभर आगे कहते हैं-

“आप ही बताइये, पिछड़ों की इतनी बड़ी संख्या है. कोई गरीब, जो दो वक़्त का खाना मुश्किल से जुटा पाता है, कैसे राष्ट्रवाद को समझेगा. पेट भरा हो तो सबकुछ समझ आएगा.”

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि भाजपा पिछड़ों के वोटों को साधने के लिए कोई ख़ास कदम नहीं उठा रही है. बिहार में ही भाजपा का ओबीसी मोर्चा ताबड़तोड़ बैठकें कर रहा है. इसी फरवरी में कर्पूरी ठाकुर जयंती के मौके पर हुई ओबीसी मोर्चे की तमाम बैठकों में पिछड़े समुदायों को फिर से पार्टी से जोड़ने की रणनीति पर विचार किया गया.

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने अनुप्रिया और राजभर को मना लिया है.
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने अनुप्रिया और राजभर को मना लिया है.

लोकसभा उपचुनावों में हार के बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में पिछड़े नेताओं के साथ बैठकें कीं और नई रणनीतियों पर काम किया. एनडीए के एक और घटक अपना दल (सोनेलाल) की अध्यक्ष और सांसद अनुप्रिया पटेल ने सीटों के बंटवारे को लेकर झगड़ा कर लिया, लेकिन कुछ ही दिनों के भीतर भाजपा ने अनुप्रिया पटेल को राजी कर लिया. भाजपा ने कई धड़ों पर छोटे-बड़े पदों पर अनुप्रिया और राजभर की पार्टी से जुड़े लोगों को बिठाया, जिससे पार्टी का पिछड़ा गुट थोड़ा मजबूत होता देखा गया है.

पार्टी से जुड़े नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, “भाजपा को अखिलेश का गेम समझ में आ गया. उसे अब जाकर समझ में आया है कि पिछड़ों को जोड़कर ही जीत पायी जा सकती है. अब पार्टी इस फ्रंट पर थोड़ी समझदारी दिखा रही है.”


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