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इस कदर सुकूं जैसे सच नहीं हो सब: दीप्ति नवल की नज्में

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दीप्ति नवल का आज जन्मदिन है. हमारे पास उनकी कुछ नज्में हैं आपसे शेयर करने के लिए. और इन नज्मों के बारे में गुलज़ार क्या कहते हैं, ये भी पढ़ाएंगे. पर उसके पहले एक खत है जो उनके एक प्रेमी ने उन्हें लिखा है. उस प्रेमी ने जिसके लिए दीप्ति बस ‘दी प ती’ भर हैं, रत्तीभर भी कम ज़ियादा नहीं.

Sushobhitयह ख़त सुशोभित सक्तावत ने फेसबुक पर लिखा था. वह कविता, संगीत और सिनेमा में गहरी दिलचस्पी रखते हैं. आपके पास भी कायदे का कंटेंट हो तो हमें lallantopmail@gmail.com पर भेज सकते हैं. ठीक लगा तो हम छापेंगे.

 

सुनो दीप्ति,

मैं ये तो नहीं कहने वाला कि इंतेहा फ़िदा हूं तुम्हारी नायाब ख़ूबसूरती, हुस्नो-नज़ाकत पर. या तुम्हारा लड़कपन भी दिलफ़रेब है. या कि तुम्हारी बेमिसाल अदाकारी से मुतास्सिर रहता हूं बहुत. या अचरज से भरा कि कैसे कर लेती हो इतना कुछ – नज़्में कहना, अफ़साने सुनाना, तस्वीरें उतारना, मुसव्विर का बाना पहनकर खींचना ख़ाके, भरना रंग. या यायावरी के रास्तों को सौंप देना अपने सांझ-सकारे. और इतना करके भी रहना ग़ैरमुमकिन, कि जैसे पानी पर हवा की अंगुली से खींची कोई लकीर हो, जिसके सिरे किसी और दुनिया में छूट रहे.

या कि तुम एक सितारा हो, पर सबसे हसीन सितारा हो, ऐसा कहके तुमसे अपनी रफ़ाकत का एक डौल क्यूं बांधूं, कि वजहों की गठरी बहुत भारी होती है (जबके तुम्हारे कांधों पर पहले ही इतना बोझ, मेरी मिस चमको!)

कोई वजह है भी तो नहीं सिवाय इसके कि तुम अच्छी लगती हो (और ये कोई तफ़्तीश नहीं कि तुम जवाब में कुछ न कुछ कहो, पूछ नहीं रहा तुमसे कुछ, बता रहा हूं).

बस, तुमको देखा तो ये ख़याल आया के छतनार का साया हो, जिसके आग़ोश में गरचे गिरूं तो ही पनाह.

और यह कि तुम दी प ती हो, रत्तीभर भी इससे कम ज़ियादा नहीं, और सिवा इसके तुम्हें और होने को क्या है.

सुनो, तीन फ़रवरी है आज, याद ही होगा. सालगिरह मुबारक हो. :-)

प्यार.

चश्मेबद्दूर. (Touchwood)

(पुनश्च : उस दिन ‘कथा’ में हरी साड़ी पहने देखा था तुम्हें, बालों में गुड़हल का लाल फूल लगाये इंद्रधनुष लग रही थीं. तुम्हारी यादों के कितने मोरपंख सहेज रक्खे हैं मैंने, अब इसका भी क्या बखान करूं)

***

और अब पढ़िए दीप्ति की किताब ‘लम्हा लम्हा’ के कुछ अंश.  लल्लनटॉप ने ये अंश हिंदी बुक सेंटर से साभार लिए हैं. 84 पन्नों की इस किताब की कीमत 150 रुपये है.

दो लफ़्ज़

एक बात जो फौरन लब पर आती है दीप्ति की नज्में पढ़ने के बाद, वो यह है कि दीप्ति अच्छी शायरा हैं और बहुत अच्छी शायरा होने की सलाहीयत रखती है. अगर सिर्फ नज्में पढ़कर कोई शायर की शख्सियत जानने की कोशिश करे तो लगेगा यह शायरा बहुत उदास रहती हैं, जिस्मानी तौर पे बहुत कमजोर होंगी. और अक्सर बीमार रहती हैं या किसी लंबी बीमारी से गुजरी हैं. लेकिन मैं क्योंकि जाती तौर पर जानता हूं उन्हें, इसलिए कह सकता हूं कि दीप्ति बिलकुल इसके बर-अक़्स हैं. सेहतमंद हैं, खुशमिज़ाज हैं, जिन्दगी से बहुत लगाव है, और कभी उदास हों तो उसका उतना ही मज़ा लेती हैं जितना हंसने-खेलने का.

deepti card1

उनकी शख्सियत का चमकीला और शोख़ हिस्सा उनकी नज़्मों में कहीं नज़र नहीं आता. उनकी नज़्में पढ़ते हुए मैं दोनों शख्सियतों को साथ-साथ देखता हूं. हमेशा यही महसूस किया है कि एक दीप्ति अपने अंदर की दूसरी दीप्ति को खुद से अलग करके देख रही है. और फिर नज़्म पढ़ते हुए आहिस्ता-आहिस्ता जैसे कैमरे का फोकस ठीक हो जाता है और एक इमेज दूसरी इमेज में समा जाती है, ठीक उसी तरह दीप्ति के ख़्वाब आहिस्ता-आहिस्ता फोकस में आते हैं और हक़ीक़त नज़र आने लगते हैं.

लफ़्जों का चुनाव और उनका आहंग दीप्ति की शायरी की खुसूसियत है. Images बहुत नाजुक और transparent लगती हैं.

“आसमानों में बुझे हुए ख़्वाबों का धुआं सा”

“जब बहुत कुछ कहने को जी चाहता है ना
तब कुछ भी कहने को जी नहीं चाहता”

“कांगड़ी में आंच अभी बाकी है
और आस-पास . . . कोई नहीं . . .”

अल्लाह करे ज़ोरे-कलम और ज़्यादा.

-गुलज़ार 

***

दीप्ति की नज्में

(1)

सफेद कागज़ पे पानी से

सफेद कागज़ पे पानी से
तुम्हारे नाम इक नज़्म लिखी है मैंने

तिलस्मी रातों पर जब चांद का पहरा होगा
तमाम उम्र सिमट कर जब
इक लम्हें में ढल जायेगी
काशनी अंधेरों के तले
जब कांच के धागों की तरह
पानी की रुपहली सतह पर
ख़ामोशी थिरकती होगी
और झील के उस किनारे पर मचलेंगी
चांद की सोलह परछाइयां

मैं इस पार बैठ कर सुनाऊंगी तुम्हें
सफ़ेद कागज़ पे पानी से
तुम्हारे नाम जो नज़्म लिखी है मैंने

deepti card2

(2)

कोई टांवां-टांवां रौशनी है

कोई टांवा-टांवा रौशनी है, दूर तक पहाड़ों में
चांदनी उतर आयी है बर्फीली चोटियों से नीचे
तमाम वादी गूंजती है बस एक ही सुर में

ख़ामोशी की यह आवाज़
होती है . . .
तुम कहा करते हो ना.

इस कदर सुकून कि जैसे सच नहीं हो सब

यह रात चुरा ली है मैंने
अपनी ज़िन्दगी से, अपने ही लिए

और चुपके से तुम्हारे तसव्वुर में बिता दूंगी इसे

***

और अब सुनिए दीप्ति की ही आवाज में उनकी एक सुंदर नज्म ‘शाम गुजरती है जब’.

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