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आवाज क्या, शहद कहिए: येसुदास को जन्मदिन मुबारक

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devanshu jha the lallantop

ये आर्टिकल देवांशु झा के कीबोर्ड से निकला है. पत्रकार हैं, सियासत पर खूब लिखा है. लेकिन मन हिन्दुस्तानी संगीत में भी बहुत रमता है. लता मंगेशकर, किशोरी अमोणकर और मेहदी हसन के मुरीद हैं. ये आर्टिकल तो बपतिस्मा भर है, आगे और लिखेंगे. अगर आपके पास भी कायदे का कंटेंट हो, तो हमें lallantopmail@gmail.com पर भेजिए. अच्छा लगा तो हम छापेंगे.


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सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों में जब हिन्दी सिनेमा के दो बड़े गायक रफी और किशोर कुमार ढलान पर थे तब दक्षिण से एक गायक मुंबई आया था. नाम था येसुदास.

हिन्दी गानों से उनका परिचय कराने वाले संगीतकार थे रवींद्र जैन. रवींद्र जैन ने येसुदास की आवाज को मलयालम फिल्मों में परख लिया था. वो मलयालम फिल्मों में संगीत दे चुके थे इसलिए उन्हें पता था कि शराब से बोझिल होती किशोर की कला और उम्र से मात खाते मोहम्मद रफी को सुनने वाले जब येसुदास को सुनेंगे तो निश्चय ही स्तंभित हो जाएंगे, उनकी आवाज के पाश से छूटना आसान नही होगा.

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आवाज क्या, शहद कहिए जो गाने वाले के गले से निकलकर सुनने वालों के मन में उतरता, चिपकता चला जाता था. मैं व्यक्तिगत रूप से उनकी विशुद्ध गायकी का मुरीद रहा हूं. विशुद्ध इसलिए कि वो सुरों की पवित्रता को इमोशंस की नाटकीयता से वर्सटैलिटी देने की कोशिश नहीं करते थे. जैसे सरोज स्मृति में निराला कहते हैं- ‘पर बंधा देह के दिव्य बांध, छलकता दृगों से साध-साध’, वैसे ही उनके सुरों की भोगावती अपार उठी थी, स्रोत से भरपूर, टलमल करती हुई लेकिन गायकी के अनुशासन से बंधी हुई, सुनने वालों के मन के किनारों को शीतल स्पर्श देती हुई.

पहले स्वर से वो हमें बंधन में बांध लेते हैं और फिर हम मुक्त हृदय से उन्हें सुनते हैं. संगीत की शाखा का वन विहंग सुरों के रंग छोड़ता हुआ निस्तरंग उड़ जाता है, नीचे जीवन ही जीवन होता है. हिन्दी सिनेमा के लिए उनके गाए बहुत कम गानों में से अधिकांश गाने अच्छे हैं और कुछ तो बहुत ही अच्छे. एक गाना है, ‘आ आ रे मितवा, जनम-जनम से हैं हम तो प्यासे’, मुझे बहुत प्रिय है. उस गाने के स्वरारोह और अवरोह को नियत भावनाओं और सधे हुए सुर के साथ उन्होंने सृजित किया है. निश्चित तौर पर रचना सलिल दा की है लेकिन पूरी तो येसुदास की आवाज के लालित्य से ही होती है. यह एक आकुल कंठ का गाना है जिसमें विरह की अमिट रागात्मकता है.

उच्चारण में हल्की मलयाली ध्वनियों के साथ वो बेदाग गाते थे. कहीं कोई जबरन का प्रयोग नहीं, कोई ड्रामा नहीं. गाना बस गाना होता था, जिसे वो रूह से गाकर रूह तक उतार देते. उनके गानों की एक छोटी सी सूची है, जब दीप जले आना, मधुबन खुशबू देता है, माना हो तुम बेहद हंसी (इस गाने की विशिष्टिता की चर्चा बाद में होगी), का करूं सजनी, सुनयना, नैया रे, जिद ना करो, कोई गाता मैं सो जाता, माता सरस्वती शारदा, तू जो मेरे सुर में, तुझे देखकर जग वाले पर, चांद जैसे मुखड़े पे, गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, आज से पहले, तेरे बिन सूना मेरे मन का मंदिर आ रे आ..
येसुदास जैसे अचानक आए, वैसे ही एक दिन गुम भी हो गए. वो खुद कहते हैं कि उन्हें अपना घर लौट जाना अच्छा लगा लेकिन सुना तो ये भी जाता है कि उन्हें मुंबई में धमकियां मिली थीं. वजह जो भी हो वैसी आवाज बहुत कम लोगों को नसीब होती है.

मलयालम सिनेमा में उनका ऐसा एकाधिकार था कि दशकों तक कोई नया गायक उस जादुई आवाज से खुद को अलग कर ही नहीं सका. वहां गायकों की मौलिकता जाती रही थी. रफी और किशोर को सुनते हुए जब हम येसुदास को सुनते हैं तो एक अलग अनुभव होता है. रफी की आवाज भी रेशम सी है, उसमें कुदरती स्टीरियोफोनिक प्रभाव है, बड़ा रेंज हैं. उनके स्वरों की आवृत्तियां देर तक, दिनों तक भीतर उथल-पुथल मचाती हैं. लेकिन उनमें एक दुर्गुण भी है, वो कई बार नाटकीयता की हदें पार कर जाते हैं. वैसे उनके नाटकीय गानों के मुरीद बहुत ज्यादा हैं लेकिन मेरे हिसाब से रफी तब बहुत बेहतर थे जब वो गानों को अपनी प्रकृति प्रदत्त कला से संवारते सहेजते थे. किशोर कुमार खिलंदड़ी और मौजमस्ती वाले बिंदास गायक के रूप में जाने गए लेकिन किशोर की पहचान उनकी आवाज में विन्यस्त दर्द है.

अपनी तरह की एक अनूठी, अभूतपूर्व पुरुष आवाज, जिसमें महान कुंदन लाल सहगल की स्वाभाविक उपस्थिति है तो बंगाल की लोकधुनों का अदृश्य लेकिन श्रव्य लोक भी है. किशोर की आवाज का अपरिष्कृत होना ही उसकी विशेषता है. वह वर्षों के रियाज से तैयार आवाज नहीं बल्कि प्रतिभा की त्वरा से चकित कर देने वाला स्वर है.

येसुदास इन दोनों बड़े गायकों से जरा हटकर हैं. वो गायन में कुछ हद तक रफी के करीब हैं, आवाज की गुणवत्ता के हिसाब से लेकिन कला में अलग. उनकी आवाज में गंभीरता भी है, सरसता भी, सुर भी और भावनाओं से भरा संस्कार भी. उनके स्वर में भी एक स्टीरियोफोनिक एको इफेक्ट है जो पहले सुर के साथ हमें गुलाम बना लेता है. वो दिखावे के प्रयोगधर्मी गायक नहीं थे क्योंकि गाने को विशुद्ध सुर के कठोर अनुशासन और सधे हुए भावावेश के साथ गाते थे लेकिन ‘माना हो तुम बेहद हंसी’ गाने को सुनते हुए उनका प्रयोग सामने आ जाता है. चूंकि येसुदास कर्नाटक संगीत के गंभीर शिष्य होने के साथ पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत की भी समझ रखते थे इसलिए इस गाने में वो कुछ वैसा कंपन ला सके जो आजकल के गानों का पारंपरिक चलन है.

येसुदास ने हिन्दी सिनेमा के लिए बहुत कम गाया लेकिन जितना भी गाया श्रेष्ठ गाया. मुझे व्यक्तिगत तौर पर, कोई गाता मैं सो जाता, तेरे बिन सूना, आ आ रे मितवा, जब दीप जले आना, बहुत प्रिय है. मैं निस्संदेह कह सकता हूं कि अमिताभ पर फिल्माए गए दस श्रेष्ठ गानों में से एक गाना फिल्म ‘आलाप’ का जरूर होगा. वो कभी सितारों के गायक नहीं रहे लेकिन गायकी का लिरिकल टच ऐसा कि अमोल पालेकर से लेकर अरुण गोविल तक को पहचान दी तो अमिताभ के दमकते एकाधिकारी स्टारडम में सो रहे एक कोमल कलाकार को नई कांति दे दी. जैसे किशोर कुमार के कुछ यादगार गानों से अमिताभ पूरे होते हैं वैसे ही ऋषिकेश मुखर्जी के उस संवेदनशील किरदार की आवाज के लिए येसुदास अपनी पात्रता प्रमाणित करते हैं.

येसुदास ने गिने चुने संगीतकारों के साथ गाने गाए. सलिल दा, राजकमल, रवींद्र जैन, बप्पी लाहिड़ी और खय्याम ने उनसे गाने गवाए. येसुदास की महानता रवींद्र जैन की एक ख्वाहिश से समझ में आती है. उन्होंने एक बार कहा था कि अगर ईश्वर ने मुझे दृष्टि दी तो सबसे पहले मैं येसुदास को ही देखना चाहूंगा. आज कल गाने वाले बहुत हैं लेकिन बहुत कम आवाजें हमारे मन में बैठ पाती हैं, शायद एक भी नहीं. उसकी बड़ी वजह मौलिकता की कमी और जल्दबाजी है. गायकी प्रदर्शन तब है जब उसे प्रदर्शित करने के लायक कोई बना सके, वह तो स्वांत:सुखाय कला है, जिसे गायक गाते हुए सुन लेता है और परख भी लेता है. इसीलिए हिंदी सिनेमा के तमाम गायक-गायिकाओं की कतार में लता सबसे ऊपर हैं, क्योंकि अपनी अप्रतिम आवाज को उन्होंने शुद्ध सुरों की दमक दी, दिखावे का रंग नहीं दिया. येसुदास भी गायकी की उसी पाठशाला के छात्र रहे हैं, और शिक्षक-मार्गदर्शक भी.

 

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