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जिस ज़हर की वजह से लोगों ने नेपोलियन को भगवान मान लिया, वो पी रहे हैं बिहार के लोग

मनुष्का
मनुष्का

हमें वो टीचर सबसे प्यारा होता है, जो बड़ी-बड़ी बातें चुटकियों में समझा देता है. मनुष्का वही टीचर हैं. वैसे असल में टीचर नहीं, वैज्ञानिक हैं. इज़राइल में कैंसर जीन थेरेपी पर रीसर्च कर रही हैं. लल्लनटॉप की दोस्त हैं और बहुत प्यार से लिखती हैं. इस बार वो नेपोलियन के बहाने बिहार में आर्सेनिक का खतरा बता रही हैं.


तो आज की कहानी शुरू होती है एक खूबसूरत द्वीप कोर्सिका में. वहीं, जहां रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘तमाशा’ शुरू हुई थी. पर ये कहानी आज की नहीं, बल्कि शुरू होती है 1779 में, जब फ्रांस के महान शासक नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म एक इटैलियन फैमिली में हुआ. आगे चलकर इन्होंने पेरिस की सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण लिया. आर्मी में सेनापति बनने के बाद उन्होंने सार्डिनिया, इटली और ऑस्ट्रिया के साथ-साथ एक समय में करीब-करीब पूरे यूरोप पर अपना साम्राज्य फैला लिया.

नेपोलियन बोनापार्ट
नेपोलियन बोनापार्ट

इसी समय नेपोलियन की टीपू सुल्तान के साथ दोस्ती हुई. (यहां क्लिक करके पढ़ें) चूंकि दोनों के कॉमन दुश्मन अंग्रेज़ थे, तो सीक्रेट प्लान बना कि नेपोलियन इजिप्ट पर हमला करके मिडिल ईस्ट में अपना साम्राज्य फैलाएंगे, जिससे भारत और इंग्लैंड के बीच व्यापार पर रोक लगाई जा सके और आगे चलकर टीपू सुल्तान के साथ मिलकर अंग्रेज़ों को भारत से बाहर निकला जा सके.

इजिप्ट में नेपोलियन
इजिप्ट में नेपोलियन

1798 में 35,000 सैनिकों की सेना लिए नेपोलियन ने फ्रांस से कूच की. वो माल्टा, पिरामिड को अपने कब्ज़े में करके आगे बढ़ रहे थे, लेकिन ब्रिटिश नौसेना और सीरिया में स्थित एक्को (जो अब इज़राइल में बसा शहर है) को जीत नहीं पाए. साथ ही, प्लेग फैलने के कारण हज़ारों सैनिकों की मौत हो गई और नेपोलियन के परास्त होने के साथ ही टीपू सुल्तान से संधि का उनका प्लान भी ख़त्म हो गया.

टीपू सुल्तान (बाएं) और हार के बाद नेपोलियन का एक चित्र
टीपू सुल्तान (बाएं) और हार के बाद नेपोलियन का एक चित्र

फ्रांस के लोग आज भी नेपोलियन के दीवाने हैं. अपने राज के दौरान नेपोलियन ने संविधान, शिक्षा और रिसर्च जैसे कई क्षेत्रों में रिफॉर्म्स लाए. 1815 के वाटरलू युद्ध में ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन ने फ्रांस को परास्त किया और नेपोलियन को आत्मसमर्पण करना पड़ा. उन्हें दूर सेंट हेलेना टापू भेज दिया गया, जहां वो अंग्रेज़ों की कड़ी निगरानी में अपना अंतिम समय बिताने लगे. यहां आने के साथ ही उनकी तबीयत ख़राब रहने लगी और छ: वर्षों में 51 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

सेंट हेलेना
सेंट हेलेना

उनके डॉक्टर- Francois Carlo Antommarchi ने मृत्यु का कारण पेट का कैंसर बताया, जिससे अंग्रेज़ों ने राहत की सांस ली (उन पर शक की सुई नहीं गई).

121 साल बाद साल 1961 में स्वीडिश डेंटिस्ट Sten Forshufvud ने एक नई रिसर्च के बारे में पढ़ा कि कैसे एक मृत शरीर के बालों में आर्सेनिक धातु का पता लगाया जा सकता है. ये रिसर्च एक अंग्रेजी प्रोफेसर हैमिल्टन स्मिथ ने की थी. तो Sten Forshufvud ने उन्हें डीटेल दिए बिना नेपोलियन के बालों के सैंपल भेजे. वैसे सवाल ये भी उठता है कि नेपोलियन के बालों के ये सैंपल आए कहां से थे.

प्रो. Sten Forshufvud और उनकी लिखी किताब
प्रो. Sten Forshufvud और उनकी लिखी किताब

बताते हैं कि नेपोलियन ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनकी मौत के बाद उनके खासमखास लोगों को उनके बाल तोहफे में दिए जाएं. ऐसा ही किया भी गया, जिसके बाद बाल पाने वाले परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी ये बाल संभालकर रखे थे.

नेपोलियन के बाल
नेपोलियन के बाल

यही बाल डॉ. Sten Forshufvud ने अंग्रेज़ी प्रोफेसर हैमिल्टन स्मिथ को भेजे थे. स्मिथ की जांच में पता चला कि नेपोलियन के बालों में नॉर्मल से करीब 38 गुना ज़्यादा आर्सेनिक था.

आर्सेनिक, जिसका असर कुछ ऐसा हो सकता है
आर्सेनिक, जिसका असर कुछ ऐसा हो सकता है

एक और सबूत भी है. 1840 में जब नेपोलियन का मृत शरीर सेंट हेलेना से पेरिस में दफनाया जा रहा था, तो देखा गया कि उनके शरीर का ज़रा भी क्षय नहीं हुआ है. वजह ये थी कि शरीर में इतनी मात्रा में ज़हर था कि उसमें कोई कीटाणु लगा ही नहीं. उस समय तो लोगों ने इसे चमत्कार और नेपोलियन को भगवान तक मान लिया था, लेकिन ये किसी जादू की वजह से नहीं, बल्कि शरीर में फैले ज़हर की वजह से हुआ था.

मृत नेपोलियन का एक चित्र
मृत नेपोलियन का एक चित्र

सेंट हेलेना से दीवारों पर लगाए जाने वाले कुछ वॉलपेपर मंगाए गए. इन वॉलपेपर से पता चलता है कि उस समय जिस हरे रंग की डाई का इस्तेमाल होता था, वो आर्सेनिक से बनती थी. डाई बनाने के समय इसकी भाप सांसों में जा सकती है. हालांकि, इन सबूतों से ये तो साबित नहीं हुआ कि नेपोलियन को अंग्रेज़ों ने मारा था, लेकिन आर्सेनिक धातु उनकी कातिल ज़रूर थी.

CNN की रिपोर्ट में बिहार के सारण में रहने वाले गणेश राय का ज़िक्र है, जिनकी 58 साल की उम्र में आर्सेनिक की वजह से किडनी में हुए कैंसर से मौत हो गई थी.
CNN की रिपोर्ट में बिहार के सारण में रहने वाले गणेश राय का ज़िक्र है, जिनकी 58 साल की उम्र में आर्सेनिक की वजह से किडनी में हुए कैंसर से मौत हो गई थी.

अब आते हैं आज के समय में. बिहार में गंगा नदीं के किनारे स्थित करीब 17 जिलों में पानी में आर्सेनिक भारी मात्रा में पाया जाता है. (यहां क्लिक करके पढ़ें) जहां सरकारी आंकड़े 50ppb को सुरक्षित मानते हैं, वहीं बक्सर के हैंडपंप में इससे 30 गुना ज़्यादा आर्सेनिक पाया जाता है. यही वजह है कि यहां के लोगों में स्किन, किडनी और फेफड़ों का कैंसर हो रहा है. उम्मीद है कि सरकार और लोग मिलकर ऐसे हैंडपंपों को ब्लॉक करेंगे, ताकि आम जनता ये ज़हरीला पानी न पिए.


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