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ये आदमी 18 सालों से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर रहा है

बिहार में एक जिला है गोपालगंज. यहां रहते हैं नवीन श्रीवास्तव. एक कोचिंग क्लास चलाते हैं. बहुत ही कम फीस में बच्चों को सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी कराते हैं. साथ ही एक दूसरा काम भी करते हैं. वो काम है लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना. पिछले 18 साल से नवीन ये काम कर रहे हैं. अब तक 200 से ज्यादा लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं.

‘दी लल्लनटॉप ‘की टीम ने नवीन से बात की. पूछा कि उन्होंने ये काम कैसे शुरू किया, और किस तरह की दिक्कतें आईं. नवीन ने जो भी हमें बताया, हम आगे बताने जा रहे हैं-

साल 2001 की बात है. नवीन इलाहाबाद में रहते थे. सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी कर रहे थे. उनका मौसेरा भाई भी उनके साथ रहता था. वो 20 साल का था, वहां बीए कर रहा था. उसी साल इलाहाबाद में कुंभ मेला लगा. नवीन का भाई गंगा नदी में नहाने चला गया, जहां वो डूब गया, और नदी की तेज़ धारा में बह गया. नवीन को जब ये पता चला, तब उन्होंने अपने भाई को बहुत खोजा. वो रोज़ गंगा घाट पर जाते और अपने भाई को खोजते थे. गंगा नदी में बहते शवों को रोककर उन्हें पलट-पलटकर देखते. इस उम्मीद से कि उनके भाई का शव मिल जाएगा. ऐसा वो 32 दिन तक करते रहे.

एक दिन ऐसे ही एक शव नदी में तैर रहा था. शव की पीठ आसमान की तरफ थी. नवीन ने उसे पलटकर देखा, वो उनका भाई नहीं था. वो उस शव को वापस नदी में बहाने लगे, तभी नाव चलाने वाले एक आदमी ने उनसे पूछा, कि अगर वो शव उनके भाई का होता तो वो क्या करते? ये सवाल सुनकर नवीन सोचने लगे, ‘सवाल तो सही है, अगर ये शव मेरे भाई का होता तो मैं उसका अंतिम संस्कार करता. भले ही ये शव अब लावारिस है, लेकिन कहीं न कहीं इसका परिवार तो होगा ही, कभी न कभी तो रहा ही होगा.’ उसके बाद नवीन ने वो शव नदी से निकाला और वहां बने एक टापू में उसका अंतिम संस्कार किया.

नवीन ने 'शताक्षी सेवा संस्थान' नाम से एक संस्था भी खोली है, जो लावारिस शवों को उठाकर अंतिम संस्कार करने का काम करती है.
नवीन ने ‘शताक्षी सेवा संस्थान’ नाम से एक संस्था भी खोली है, जो लावारिस शवों को उठाकर अंतिम संस्कार करने का काम करती है.

जब इलाहाबाद से वापस गोपालगंज लौटे

उसके बाद भाई की खोज में नवीन को जब भी लावारिस शव मिलता, वो उसका अंतिम संस्कार करते. वो साल 2005 तक इलाहाबाद में रहे. उसके बाद अपने शहर गोपालगंज वापस आ गए. जब तक इलाहाबाद में थे, उन्होंने लावारिस शवों को ठिकाने लगाया. गोपालगंज लौटकर भी उन्होंने ये काम जारी रखा.

नवीन बताते हैं,

‘लावारिस लाश का भी तो कभी न कभी कोई परिवार रहा ही होगा. मैंने जब पहली लाश का अंतिम संस्कार किया, तभी मैंने सोच लिया कि मैं ये करता रहूंगा. इलाहाबाद में कई सारे घाट थे, जहां अंतिम संस्कार होते थे. मैं वहां लावारिस लाश लेकर जाता था. पहले तो लोग मना करते थे. लेकिन मैं उन्हें समझाता था, कि इन लाशों का भी कोई अपना रहा होगा. अंतिम संस्कार नहीं करेंगे, तो जानवर इसे खा जाएंगे. समझाने पर लोग मान जाते थे. फिर उन घाटों में जो अंतिम संस्कार होते थे, उनकी बची हुई लकड़ियों को मैं इकट्ठा करता था, और उससे लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करता था. गोपालगंज लौटा, तब लोगों ने सवाल किया कि मैं ये क्यों कर रहा हूं. इससे मुझे मिलेगा क्या? क्यों मैं लावारिस लाशों को छूता हूं. लोग मेरे से भेदभाव करने लगे. अछूत जैसा बर्ताव करने लगे. किसी शादी फंक्शन में मुझे बुलाना बंद कर दिया गया. लेकिन मैंने अपना काम बंद नहीं किया. अब धीरे-धीरे लोगों का बर्ताव बदल रहा है. लोग ये समझ रहे हैं कि लावारिस शव भी अंतिम संस्कार पाने का हक रखता है.’

गोपालगंज में सदर अस्पताल में शवों को रखने के लिए मोर्चरी नहीं थी, इसलिए लाशों को बगल के नाले में फेंक दिया जाता था. बदबू आती थी, लोग परेशान होते थे. नवीन ने इन शवों का अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया. वो पोस्टमार्टम हाउस के बगल की जमीन पर ये काम करते हैं. शुरू में तो उन्हें कोई जगह भी नहीं देता था, कब्रिस्तान में भी नहीं. ऐसे में फिर नवीन को अपनी ही जमीन पर अंतिम संस्कार करना पड़ता था.

उन्होंने ‘शताक्षी सेवा संस्थान’ नाम की संस्था बनाई. ये संस्था लावारिस लाशों को उठाकर उनका अंतिम संस्कार करती है. नवीन कहते हैं,

‘लावारिस शव का 72 घंटे बाद ही अंतिम संस्कार किया जा सकता है. और अस्पताल में शव को सुरक्षित रखने का कोई इंतजाम नहीं है. इसलिए तब तक लाश सड़ जाती है. हमें कई बारी बुरी तरह से सड़ हुई लाश मिलती है. कई लाशों पर तो कीड़े भी लग जाते हैं.’

नवीन श्रीवास्तव एक लावारिस शव का अंतिम संस्कार करते हुए.
नवीन श्रीवास्तव एक लावारिस शव का अंतिम संस्कार करते हुए.

सड़क पर रहने वाले लोग भरोसा करते हैं

नवीन बताते हैं कि अब गोपालगंज की सड़क पर रहने वाले लोग भी उन्हें जान चुके हैं. लोग खुद अपने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उनको सौंप रहे हैं. कहते हैं कि जब वो मर जाएं, तो नवीन उनके शव का अंतिम संस्कार कर दें.

नवीन ने एक किस्सा भी सुनाया. उन्होंने बताया कि 6 मई के दिन उनकी बहन का तिलक था. और उसी वक्त उन्हें पता चला कि एक शव का अंतिम संस्कार करना है. वो पहले शव का अंतिम संस्कार करने गए, उसके बाद बहन के तिलक का कार्यक्रम अटेंड किया. नवीन के मुताबिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करना बहुत पवित्र काम है.


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