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बिहार में हैं तो अकेले भी हम हो गए हैं

सिनेमा, कला और किताबें, राहें – इश्क और घुमक्कड़ी, जंगल – दरिया और समंदर — इन सबसे गुजरते हुए, इन सबके साथ-संग चलती हुई, देस-परदेस घूमते-घामते निधि सक्सेनाअब बिहार पहुंच गई हैं (और ये लेख जब आप पढ़ रहे हैं तो न जाने फिर कहां बह निकली हैं) और ये फितरतन ऐसी हैं कि जहां पहुंचती हैं, वहीं की हो जाती हैं. मिट्टी, बच्चे, परिंदे, इंसान — सब निधि की अंगुली थामे हंसते-गाते-मुस्कुराते हैं, वक्त-जरूरत रो पड़ते हैं, जैसे इन्हीं के इंतज़ार में अब तक रुके थे. निधि को बिहार से प्यार हो गया है तो पढ़िए, इस दयार के नाम लिखा गया इनका प्रेम पत्र… !


 

ओह! मेरी दिली तमन्ना है. काश! मैं मैथिली, भोजपुरी के कुछ कश ले पाऊं और फिर `एकटा’, `बेरा’, `सूतल’, `रहल’, `लिखल’, `बा’ (अब तक ज्यादा कुछ नहीं सीखा) जैसे शब्दों के छल्ले इश्टाइल से हवा में छोड़ पाऊं. मैं, “मैं” की जगह अकेली ही “हम’ हो जाऊं. सो पूरे ‘होसोहवास’ में, हम सत्येंद्र सत्तू की कसम खाते हैं कि इस लेख को लिखते हुए `मिमियाएंगे’ नहीं, `हमियाएंगे’! वाह क्या मज़ा है कि जब से बिहार में हैं, अकेले भी हम हो गए हैं. बिहार है तो `मैं’ से `हम’ हो पाए हैं, बाहर तो लोग दुकेले भी हम नहीं होते.

बिहार के रास्ते ही में हमारे दिमाग के डिस्को लाइट्स वाले रंगीन बल्ब जलत-बूझत रहे और सारी उमंगें-तरंगें रंगीन नागिन डांस नाच रही थीं. ऐसा क्यों? क्यों? क्यों? कि आने से पहले ही दिल धक-धक उछल रहा है — पक्का कोई दबी-छिपी ख़ास पिच्चर है हमार मन में, जो अचानक लाइमलाइट में आ गई. क्या-क्या-क्या है? रेणु? शारदा सिन्हा? मनोज बाजपेयी? बाबा नागार्जुन? बिस्मिल्लाह खान? रविकिशन, वासेपुर? लौंडा नाच? लाली लाली डोलिया… या बुद्ध? सुजाता? आनंद? या आम्रपाली!

कंसल्टेंटवा नहीं है, नदी – जंगल और नाचती नदी है!

बिहार बहुत दूर जान पड़ा. दूर-दूर. बहुत ही दूर! घुम्मकड़ होकर हम कहां नहीं गईं, लेकिन एक सैलानी को भी बिहार घूमने के लिए बहाने की ज़रूरत पड़ी, जैसे — खालिस बिहार खुद में देखने-समझने-महसूसने को कोई जगह न हो और वहां छुट्टी मनाने की वजह या तो घर में छठ हो या ‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि’! सच्ची में – कोई धूल जमी थी दिमाग के उस हिस्से में, जहां बिहार का नक्शा रखा था. अब वो धूल किस-किसने और क्यों जमाई, ये चर्चा कभी और! ख्याली पुलाव की तरह किसी ने पकाया ख्याली बिहार – कि बिहार ऐसा है, वैसा है और कुछ लोगों ने वो पुलाव खा भी लिया. उनको दस्त हो गए, उसपर कुछ मक्खियां बैठीं, जिनका पेट भरता था और उन्होंने ये बात सारे देश में फैला दी. अब सब भन्न-भन्न करते हुए गाती हैं — बिहार ये, बिहार वो — तोहार इमेजवा का, का होए….

इमेजवा... ऊ की टांग लेके कौन-सा अचरवा डालेंगे जी!

बिहार गरीब था, सो कोई इमेज कंसल्टेंटवा खरीद न पाया. लेकिन बिहार आते ही पहली हवा का झोंका, जमी वो धूल उड़ा ले गया. आखिर चम्पारण की हवा है यहां . आंदोलन शुरू होता है यहां से. बोलने वाले पत्थर हैं यहां, गाने वाले वन और नाचती नदी!

नज़रें देखतीं पर नाग न बनतीं.

अनोखी साज-सज्जा रहित छोटे-से एयरपोर्ट (एक शानदार चकाचौंध एयरपोर्ट होना स्टेट के विकास के पैमाने में हो जैसे) से बाहर निकली. हर एयरपोर्ट से निकलकर आप टैक्सी वालों की भीड़ में डूब जाते हैं. टैक्सी के इस तालाब में कुछ महिला टैक्सी चालक भी थीं, 30 से 35 के आस-पास उम्र और बिना किसी एनजीओ या कंपनी की मदद के. देश के लगभग हर, और कुछ विदेशी एयरपोर्ट पर भी उतर चुकी हूं, लेकिन इस तरह भीड़ में खड़ी स्वतंत्र महिला टैक्सी चालक नहीं मिली थीं. हमारी नज़र में ये एयरपोर्ट विकसित है. यहीं पर हमने अपनी सीट की पेटियां खोल दीं और उतर गईं बिहारी आकाश में मोती ढूंढ़ने.

आकाशगंगा 8 लाइन चौड़ा नहीं है, डामर एकदम चिक्कन नहीं है, गड्ढा है न! ब्लैक होल माफिक नहीं, लेकिन दोनों ओर लइकिन लोग साइकिल पर उड़ रहा है. कुछ अपने भइयन को पीछे बिठा के भी साइकिल पर उड़ रहा है. मैं सब के साथ हो ली. एक डिस्टिक से दूसरा, रास्ते कच्चे-पक्के, तालाब ही तालाब, खूब पुराने घर, बड़े-बूढ़े पेड़, भला-सा आदमी और हम मज़े से कैमरा खट-खट करती घूमती रहीं. कुछ जोड़ा नज़रें हमें चाय के प्याले से निगाह उठाकर देखतीं, लेकिन रस्ते का नाग न बनतीं. अब याद करती रही अपन को तो आना ही था. कितने सारे पसंदीदा लेखक, फिल्मकार, कलाकार बिहार से हैं. लगता था — बिहार में कोई ख़ास रंगीन चश्मा मिलता है, जिससे दुनिया देखूंगी तो कुछ ज्यादा, कुछ और ही देख पाऊंगी!

बिहार आने के अगले दिन ही पटना से निकल एक ब्लॉक में जाना हुआ, हाइवे को छोड़कर कभी कच्चे रास्तों पर, छोटे-छोटे टउन आते-जाते. पुराने मकान, चटख रंगीन साड़ियां, लिट्टी के ठेले, पेड़ और तालाब ही तालाब, सो मखाने वाले तालाब भी और साइकिल और जुगाड़ पर बढ़ता बिहार. रास्ता पूछने पर ज़रा सब्र रखना होता. बताने वाला भी कुछ पूछेगा कि कहां की हो, वहां क्यों जाना है, वगैरा… और जब तक ठीक-ठीक नहीं समझ जाती, आगे बढ़ने नहीं देता. (एक बार अमेरिका में किसी से रास्ता पूछने पर जवाब मिला था – ‘आई एम नॉट गूगल!’) वैसे, यहां गूगल की गुगली है. मैप-वैप ठीक चलता भी नहीं, मानुष लेकिन बढ़िया चलता है. एतना बढ़िया कि जब तक पूरा रस्ता समझा नहीं देगा, जाने नहीं देगा. अब हम बिहार देख रही थीं खुद और दर्ज कर रही थी बिहार होने के मायने. ख़बरों और फिल्मों में ही देखा होगा उनने, जो बात करते हैं! हमार दिल में तो बिहार एक गीत की तरह दर्ज होने लगा, कभी एक दम कच्चा बोले तो ‘रॉ’, उसमें भी कभी सुरीला, कभी ‘ढन चैक’ और कभी इतना मंझा, जैसे एक विनीत-सा बुज़ुर्ग.

पगडंडी पर हवा थामने आई आंचल

किसी ने बताया नहीं था कि यहां गंगा समुद्र-सी दिखती है. चौड़े साफ़-सुथरे घाट हैं और अप्रैल में जा रही हो तो जब गांव में जाओगी, आम की खुशबू वाली हवा पगडंडी पर लेने आएगी. अब पेड़ आम से लदे हुए आंख मिलाते हैं, ऐसा लगता है – कुछ दिन में आकाश में भी आम लटके दिखेंगे पर कुछ ही दिन बाद तो आई बहारें लीची की. फिर हर ओर केला, केला, कितना केला. कितना फल, कितना मीठा, बहुत मीठा. बहुत ही!

मईया!!! कैसी उपजाऊ मिट्टी है, गज्जब! अइसन रसीला फल तो कभी खाए ही नहीं थे. हमें कभी, किसी ने भी नहीं बताया था कि बिहार ऐतना खूबसूरत है. गर्मी पटना की ऐंवे ही बदनाम है. यहां तो हवा ने नमी से जुगलबंदी कर रखी है, सो कहां राजस्थान जैसी चिलचिलाती लू, सीला-सीला मौसम, जिसमें सुना कि नींद खूब आती है. दोपहर में खासकर. कच्ची नींद, मौसम के आम-सी खुशबूदार, खट्टी! ओ खट्टे-मीठे लोग. दानापुर से आगे पीपा पुल के पास श्मशान से आगे धूल बिठाने को एक आदमी है, जो टोल लेता है. टोल नहीं दिया, वो चिल्लाया – धूल नहीं बिठाएंगे तो गाड़ी फंसेगा. गाड़ी फंस गई!!! कल फिर जाना है धूल बिठाने का टोल दे दूंगी.

कोई दोस्त फोनवा पर एगो ठौर बताए लिट्टी-चोखा का. इहां वो छौ साल पहले खाए थे. अब हम पहुंचे ऊ गली, सो देखते हैं दसियों दुकान है. सबमें कम्पटीशन चल रहा, सो उधर-इधर चक्कर लगाया, दो ठो – तीन ठो, फिर घुसे एक दुकान में.

– तुमको देखत रहे. सोचे कि बिटिया काहे परेसान हो रही है. एको बार बात हो जाता तो हल निकाल देते और देखो बात करा दिए.
– हमको लिट्टी चोखा खाना है .अब तक खाये नहीं हैं.
– ओ. ओहो बस एतना ही! अर्रे खिलाओ भाई, हमारे यहां घी नहीं है. क्रीम समझती हो? वो लगा के खिलाएंगे.
फिर जैसे खाला का घर हो, वैसे परस-परस, ढेर सारा मनुहार के संग खिलाया गया मीठी बात और नमकीन सवालों की चटनी लगा के.

ध्वनि का बनना धुन और नंगे पैर शांत-सा मुख गुजरता सपने की तरह

बिहार. ध्वनि का गणित हम नहीं जानतीं कि क्या हो जाए, जो वह धुन बन जाता है. बिहार की लय में एक अटकाव है, गर बहार जुड़ जाए या विहार हो जाए तो खूब ताल बनती है, बेसुरा चलता है – बेताला नहीं चलता. बिहार में सच में बहार है. ये शब्द बिहार के भीतर एक कल्पना को जन्म देता है – विहार! शाल वन से गुज़रते बौद्ध विद्यार्थी, लाल चीवर लहराकर उड़ता. वैशाली के किसी तालाब किनारे सो गई आम्रपाली. अमलतास की किसी ओट से क्या कोई भिक्षु निकलेगा? भिक्षु कुछ सवाल लिए!

हमारी कल्पना किसी मूर्तिकार की तरह धुंधली कुछ आकृतियां बनाती, 2016 में नालंदा की लाल दीवारों से लिपटकर निकलता कोई चीवर, नंगे पैर कोई शांत-सा मुख सपने की तरह गुज़र गया. कान के ऑडियो सपने में अभी सिंगिंग बॉल ही खनक रहा था कि एक सन्यासी लाल चीवर लहराता रॉयल एनफील्ड पर सर्रर्ररर. वो गया ! हल्दी के रंग सने चीवर में एक बच्चा दुकानदार से कुछ बात करता है, ताली मारते हुए बच्चे से अतिरिक्त दिखता है. ज्यादा नज़रकश. एक चाय वाला एक बौद्ध भिक्षु को पुकारता है – ओ… मंगू जी… और एक नन्हा-सा बौद्ध विद्यार्थी मुंह चिढ़ा के भाग जाता है! ओह!!! विहार नहीं, बिहार. रेस्त्रां में खूब कमउम्र जोड़े इश्क पीते और कोकाकोला फरमाते दिखते हैं. विहार न सही, बिहार ही अच्छा ! लेकिन अब बिहार से कोई विहार को निकाल भी तो नहीं पाएगा. वो तो ऐसे जुड़े हैं, जैसे खाजा की कुरकुरी परतें. खाजा क्या? अर्रे, कब का सुना हुआ है – टके सेर भाजी टके सेर खाजा…. बोले तो ये खाजा क्या है?

नालंदा से पहले ही खाजा की बहार थी. जैसे, लीची की जगह वहां के पेड़ पर खाजा लगता हो. कुरकुरा, परतदार, चाशनीदार, मीठा, स्वादिष्ट. किसी ने ताज़ा खाजा जांचना हो तो उस पर सिक्का गिराओ. वो पार निकल गया तो खाजा ताज़ा. दुकानदार को मैंने कहा, `सुना! ऐसे जांचते हैं’, सो दुकानदार ने मुंह चांद की तरह टेढ़ा करके नमक वाले खाजा की कुरकुरी भाषा में कहा – `ऐसा तो कुछ नहीं होता है’ और खाजा तोल दिया. खालिस बिहारी मिठाई बहुते गज्जब बा, एको होए अमरनाथ (एमरैंथस) ऊ म मावा मिलाय दिए रहिल और क्या स्वाद भई मिठाई.

हमने कुछ तस्वीरें देखीं (क्यूंकि कुछ खींची, कुछ खींचने से छूट गईं) बहुत ड्रामा था उनमें. निरंतर चलता एक मेला हो जैसे, लेकिन उस मेले की जगमग के बीच चेहरे कंट्रास्ट में है, और किन्हीं क्षण तो ये कंट्रास्ट और भी बढ़ जाता है. ये ट्रांसफॉर्मिंग है. मैं सच कहती हूं. ये है, जैसे एक टिकट लिया हो नई दुनिया में घुसने का. ये उतना नया है, नई ज़िंदगी सा नया. ये मेला है और इस मेले का लब्बोलिबास (लब्बाेलुआब नहीं…) अलग है. पुल के इस पार कुछ और, उस पार कुछ और.

नहीं मिली ताड़ी पर घाघरा पहने हुआ था लड़का

शादियों का सीजन था और पीपा पुल से पहले एक ब्लॉक में शूटिंग करते 11 बज गए. जाने लगे तो कुछ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने हमारी गाड़ी में लिफ्ट ले लीं. उन्हें बारात जाना था. इस वक्त, रात के 12 बजे बियाह? ये चलन दिल्ली के अलावा, तो कहीं देखी नहीं. जयपुर ही में 12 बजे तक पतीलों में कुछ नहीं बचता और आसपास के गांव में तो 9 बजे ही घराती तक लम्बे होने शुरू हो जाते हैं.
– अरे अब तो ताड़ी बंद है, सो 11 – 12 बजे पहुंचने लगी है बारात!! जब ताड़ी था, तब तो 2-3 बज जाता था.
– ताड़ी नहीं तो कुछ और मिलेगा?
– फिलहाल कुछ भी नहीं. बैन में बिहार आई हो! लेकिन अच्छा है बहुत अच्छा….
रास्ते भर वो नदी का बढ़ आना बताती रहीं — हर साल कैसे पुल डूबता है और नाव चलने लगती हैं. हमरे मन में समुद्र उमड़ा दुपहरिया में बारात देख कर. तीन गो बैंड वाला संग सब पग पग गए और पग पग ही बैंड बाजा बजाते दुलहिनिया ले आए. अब बस रास्ते में वो देखना बाकी रहा था, जिसका चर्चा सुने थे और जब-जब सुने थे, तब-तब खलबली सा हुआ था कि ये सच भी है या नहीं और है तो इसके होने पर नाक-भौं सिकोड़ें कि मज़ा लें कि बस इसका होना देखें, होने की तरह! ऐन सड़क पर बारात सज़ी थी. लड़का ही लड़का… बूढ़ा ही बूढ़ा, कोई औरत नहीं! सब डीजे वाली गाड़ी के पीछे-पीछे, ऊपर-नीचे. डीजे वाली गाड़ी में एक पिंजरा बना था आदमकद और उस पिंजरे को घेरे लिपटे हुए थे लड़का लोग. किसी सलाख को एक हाथ से पकड़कर लटके हुए नाच रहे थे. कोई दोनों सलाखें पकड़े था. सब एकदम जवान लड़का, नया-नया जवान. ये पिंजरे के बाहर की तस्वीर और पिंजरे के अंदर? उन्हीं का हमउम्र चमकीले-भड़कीले कपड़ों में सुनहरे कपड़े, छिपा-छिपाकर दिखाते कपड़े, पीठ नंगी. वो नाच रहा है, लेकिन उस नाच में कोई कला या कला का माईबाप भी है, ऐसा दावा मैं नहीं कर सकती.

आप बिहार की कोई भी छवि अपने मन में मुंह बिगाड़कर गाड़ने से पहले अपने शहर के क्लब्स और दफ्तर और बारातें, बल्कि अपने-अपने मन, अपने इनबॉक्स, मैसेज बॉक्स, वाट्सअप वगैरा मैसेज जांच लें. और ये भी कि मौका मिलता तो आपने क्या किया होता. फिर एक और मंडप देखा. 100-150 आदमी पंक्ति में पालथी लगाकर बैठे हैं और तख्तों के स्टेज पर एक लड़का घाघरा पहने नाच रहा है.

पैसा मिलने पर शाहरुख खान भी बारात में नाचता है

मैंने महिला सरपंचों से खूब नाटक करवाए हैं और उन्हें पल्लू की पगड़ी बनाकर मज़े से मर्द बनते देखा है. बड़े-बड़े शो में महिला पतलून पहनकर नाचती हैं. पैसा मिलने पर शाहरुख खान भी बारात में नाचता है, इसलिए आप लौंडा नाच पर हल्ला करने से पहले जान लीजिए कि आपको ऐतराज़ किस बात का है? पुरुष के महिला के कपड़े पहनने पर या मनोरंजन के लिए पैसा लेकर नाचने पर. मुझे ऐतराज है चेहरों पर. इतने जवां चेहरे उदास क्यों हैं?

हमने पूछा – आप नहीं देखत हैं नाच? छिपकर भी नाहीं? बचपन में भी नाहीं? जवानी में भी नाहीं?
– न ना न की लम्बी रेल – हम लोग के इहां लड़की लोग को ये सब मना रहता है एकदम,ये कोई लड़की लोग का देखने का चीज थोड़े बा !
– क्यों?
तभी उनका फोन बजा और फुल वॉल्यूम में साउंड आया – दिल में मेरे है दर्दे डिस्को
सब हंसने लगे – हम हमारा अलग से डिस्को बजवाता है.
फिर एतना हंसते हुए बोलीं कि डर लगता था कि दांत निकलकर गोदी में ना गिर जाएं – अब लौंडा सब लड़की बनके नाचने से आदमी लोग ही को मज़्ज़ा आता है. औरत लोग क्या औरत को देख के करेगा.

मधुबनी पेंटिंग सुन कर किसी पट ही की कल्पना की थी – कागज़ या कपड़ा केवल! मधुबनी तो जीता जागता शहर निकला. 16 नंबर गुमटी पर मिलना, हमारा भाई बैठता है वहां. वो घर ले आएगा आपको. 16 नंबर गुमटी पर पान मिलता है,पेड़ा और चाय भी! सो चौपाल है, बूढ़ों और उनकी नज़रों से भरा, नज़रें सहज हैं, बस उत्सुक हैं. उत्सुक होना भी चाहिए नज़र को. पान की दुकान में खड़ा भाई जीप में बैठ गया. चौड़े-चौड़े पत्ते वाले पेड़ के बगल में है गुमटी और पेड़ के नीचे है, बस क्या जीप स्टॉप. इसमें चढ़कर मधुबनी इधर से उधर होता है. इस गुमटी और पेड़ के बीच में है नीची ढलान वाली गली! गली सो ऐसे लगा नदी. इतने-इतने तालाब देख रही थी कि हर ओर कि अब जहां देखो, उददहर पानी दिखता, सो नदी में हमारी जीप उतर गई. डुगडुगी बही चली जा रही है. नदी के बाजू और आजू वाले घरों की शक्लो-सूरत अलग है, सो सीरत भी. एक जगह रुक गई जीप. वहां से आगे जाने को जीप के पांव नहीं उठ पाएंगे. हम पैदल हैं नदी की कमर के हर बल पर मुड़ते हुए. यहां दुनिया बदल गई है. एकदम बदल गई, फंतासी लैंड है ये तो. मछलियां दीवारों पर तैर रही हैं. एक रंगीन जंगल बढ़ आया है दीवारों पर.

उफ़, इस रोटी पकाती, स्कूल जाने को बाल बनवाती दुनिया के अलावा भी एक दुनिया है यहां. दीवारों की दुनिया. ईंट-पत्थर के अलावा, इन दीवारों को दिल रख दिया गया है. और उस दिल में कहानी है किसी श्रीराम के होने की, उनकी ब्याह के उत्सव में वन के बाग-बाग होने की, किसी कृष्ण के होने की. बुद्ध को खीर खिला रही है सुजाता और कहीं दीवार पर चिपका केकड़ा और एक राजा सलहज के होने का भी आख्यान. मधुबनी गलियों से गुज़रते जाना कि मेरी कल्पना की हद के पार शुरू होती है मधुबनी. कच्ची मिटटी का रास्ता और शायद सलवार को टखने तक खींचना हो, लेकिन दीवार सजी है. हर मोड़ अलग रंग में डूबा, रंग बदला और बदल जाएगी दिल की दुनिया की भी तस्वीर. ये बाएं हुए कि सुहाने हरे से निकले और नीले समंदर में डूब गए. टोले का चौपाल या चूल्हे की चौकी, घर की चौखट क्या – बरामदे का खम्बा… सब मीठे मधु की चाशनी से रंग बने. दीवार की दुनिया ज्यादा सच्ची, ज्यादा अनोखी जान पड़ती. खुद धरती से उठ दीवार में बस जाने का मन बनता. अब, जब भी दुनिया के किसी भी हिस्से में मधुबनी पेंटिंग देखूंगी तो उसमें उतरकर शामिल हो पाऊंगी, क्यूंकि वो तो नगर है. कागज़ तो बस उस नगर का दरवाज़ा भर है एक. उस कागज़ के पीछे एक जीता-जागता, टहलता नगर है. सुने, ये आर्ट गोदने से शुरू हुआ और पूरे शहर पर मंढ गया. फिर नगर ने खुद को कागज़ पर अंकित कर दिया, चिट्ठी की तरह दूर-दूर दुनिया में भेज दिया और दुनिया जान गई हालचाल मधुबनी के.

बहार के तलाब में बिहार लबालब पर याद की झालर नदारद

चाल तो पूरे बिहार की बांकी है, भले ही गंगाघाट पर हारमोनियम लेके गाती 80 साल की लइकिन हो या सब्जबाग में आधा किलो के गिलास में सुलगती षीर चाय. मॉरिसन बिल्डिंग की चाय पर चर्चा भी लबालब और बहार के तलाब में हम होते बिहार लबालब. हम अपनी स्मृति में खंगाल रहे थे कि पहली बार बिहार कब आया और कैसे आया, जो यादें खोज पाए, उनमें से एक भी ऐसी नहीं, जिसकी झालर बनाकर बिहार पहुंच पाते. उन यादों के सहारे तो न यहां पहुंचते, न वहां. क्या कड़वी वाली याद की बात भी बांटना ठीक होगा?

मुझे नहीं पता था बिहार के बारे में कुछ भी, फिर दो बातें लगभग साथ हुईं. वनस्थली में बिहार की लड़की खूब आती हैं, सो मिलना हुआ. साथ पढ़ना हुआ और पटना, दरभंगा जैसे नाम पहली बार एक कान में घुसे और दूसरे से निकले नहीं. फिर कहीं से कान में पड़ा कि बिहार से ढेर सारे लड़के IAS बनते हैं. बहुत मेहनती, जो होते हैं.

तभी घर से बाहर निकली तो पूना गई. वहां पता चला कि पूना बंबई में हो तो रेस्टोरेंट में वेटर को `भइया’ मत बुलाओ, मार पड़ेगी. उन्हें बहुत ही बुरा लगेगा, जैसे गाली दी हो. क्या! किसी को भइया सुनना कैसे बुरा लग सकता है? उन्हें लगेगा कि तुम उन्हें बिहारी समझ रही हो. अगर बिहारी भी समझ और कह रही हूं तो इतना बुरा लगने वाली क्या बात है?

अपने घर में जब तक थी, तब तक बस इतना सा पता था कि ये देश खूब बड़ा है, जिसमें ढेर सारी जगहें हैं. इन्हें स्टेट्स कहते हैं और वहां – यहां पहनावे, भाषा-रंग-वंग की खूब विविधता है और विविधता में एकता है. हेंस प्रूव्ड है – मेरा भारत महान है.

… तो इस वेटर को भइया मत बुलाओ पर पहला सवाल था – क्यों? मेरे लिए ये समझना कतई नामुमकिन था कि जब नाम नहीं पता तो करूं क्या… तो क्या कहकर बुलाऊं? क्या कहकर बुलाऊं का जो भी जवाब रहा हो, मेरी स्मृति के किसी भी ओने-कोने में नहीं मिल रहा. शायद वो मेरे लिए इतना अस्वाभाविक था कि मेरी बुद्धि उसे पचा नहीं पाई. राजस्थान में भी लड़की होने के नाते हम हर लड़के को भइया ही कहकर बुलाते रहे. यहां तक कि अगर पड़ोस के किसी लड़के में या सहेली के भाई में `वैसी’ वाली दिलचस्पी है, तब भी भइया बोलने के अलावा कोई दूसरा चारा ही नहीं था. तो बिहार आने से पहले, बिहार के जो माने हमें समझाए गए और जो चित्र हमारे दिमाग की डिस्को लाइट्स वाले कोनों में बिठाए गए, उनमें से एक भी अच्छा नहीं था. बिहार हमेशा खूब दूर रखा गया, पर जो दूर है – वो आकर्षक है, ऐसा समीकरण हमेशा-हमेशा से है और हम तो ठहरे मन के मर्ज़, सो पहुंच गये बिहार. और सच बताएं, देखा है बिहार में बहार है और झंकाड़ है तो उतनी ही, जितनी देश के हर राज्य में – न कम न ज्यादा.

अब देखिए सुबह जो आंख खुली है तो अलार्म की जगह कोयल कूक रही है और जिस दिशा में जा के जम जाओ तो उधर भी कूक रही है, चुन्हु और कुन्हु….

बूझे?

—– निधि सक्सेना (इक बंजारन की आवारा डायरी)

(संक्षिप्त परिचय: निधि सक्सेना. दिल्ली में जन्म. राजस्थान स्कूल ऑफ आटर्स जयपुर, वनस्थली, भारतीय विद्या भवन, फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट पूना, लॉस एंजेलिस वगैरह से कला-पत्रकारिता-टीवी की पढ़ाई, लिखाई. फ़िलहाल, जयपुर में निवास पर उससे ज्यादा दुनिया भर की घुमक्कड़ी. कम उम्र की समझदार और मौलिक रचनाकार हैं. स्कल्पचरिस्ट और पेंटर होने की वज़ह से कला की परख तो उन्हें है ही, वे दूरदर्शन-नेशनल के कला परिक्रमा कार्यक्रम से भी जुड़ी रही हैं. उनकी कलाकृतियों का बहु-बार प्रदर्शन हुआ है. नारी-विमर्श की पैरोकार निधि डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाती हैं और जयपुर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक राग रेगिस्तानी का स्वतंत्र निर्माण, लेखन और निर्देशन कर चुकी हैं. छिटपुट नौकरियां भी की हैं. `दैनिक भास्कर’, `अहा! ज़िंदगी’ और `पायनियर’ समेत कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए आवरण कथाएं और सिनेमा पर लेख / स्तंभ रचे हैं.)

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