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इस बोर्ड के इत्ता लेट एग्जाम चल रहे हैं, बच्चे कह रहे कि हमारा तो साल बर्बाद हो गया

बिहार में इलेक्शन की बहार है, लेकिन स्टूडेंट परेशान हैं. बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन (BBOSE) के 10वीं और 12वीं के 30 हजार से ज्यादा बच्चे यह नहीं जानते कि अब अगले साल वह क्या करेंगे. क्योंकि अभी (3 अक्टूबर से 22 अक्टूबर तक) वो एग्जाम दे रहे हैं, और उन्हें नहीं पता कि वो नीट या जेईई जैसे एग्जाम पास करने के बाद भी एडमिशन ले पाएंगे कि नहीं.

एग्जाम कराने वाली अथॉरिटी बीबीओएसई को न इस बात से मतलब है कि 10वीं और 12 वीं के स्टूडेंट के भविष्य के सपने का क्या होगा. आइए समझते हैं बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग के इस धीमे चलते एग्जाम के पहिए को, जिसमें हजारों स्टूडेंट्स का भविष्य फंसा है.

जब सब जाग रहे थे, यह बोर्ड सो रहा था

देश में कोरोना ने मार्च आते-आते दस्तक दे दी. लोगों को लगा कि वक्त के साथ मामला काबू में आएगा. लेकिन दिन हफ्तों में बदले और हफ्ते महीनों में, और सब कुछ रुक गया. देशभर में बच्चों के स्कूल और एग्जाम भी इसके चलते प्रभावित हुए. सभी बच्चों पर साल बर्बाद होने का संकट आया, तो उसके हिसाब से संबंधित बोर्ड और यहां तक कि यूनिवर्सिटीज ने फैसले लिए. सीबीएससी, आईसीएसी, एनआईओएस के साथ तेलंगाना स्टेट बोर्ड ने 10वीं और 12वीं के सभी बच्चों को इंटरनल असेसमेंट के जरिए अगली क्लास में भेजने का फैसला किया.

लेकिन जब यह सब हो रहा था, बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग सो रहा था. उसे न एग्जाम कराने की चिंता थी, न रिजल्ट देने की. हर बार की तरह स्टूडेंट जुलाई-अगस्त में ट्विटर पर राज्य सरकार और केंद्र सरकार से गुहार लगा रहे थे.

अगस्त बीत गया, उसके बाद सितंबर आ गया. स्टूडेंट ट्वीट पर ट्वीट करते रहे, लेकिन न एग्जाम की कोई कोई दूर-दूर तक तारीख नजर नहीं आई, न रिजल्ट का सहारा.

एक पीआईएल से खुली नींद

सितंबर में बच्चों ने एक एनजीओ (Grassroot Empowerment & Development by Youth) से संपर्क किया, तो पटना हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल की गई. इस याचिका में बच्चों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई थीं. कोर्ट ने एक दिन के भीतर ही इस मामले पर जवाब देने को कहा. कोर्ट में बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग ने सात दिन का वक्त मांगा और दलील दी-

 हमारे सीईओ अभी एकदम नए हैं और उन्हें मामले को समझने के लिए कुछ और वक्त की जरूरत है.

कोर्ट ने इस दलील को मानने से साफ इनकार कर दिया और कहा-

बच्चों के भविष्य को इस तरह से अनिश्चितता में नहीं छोड़ा जा सकता. उन्हें अपने करियर के बारे में सोचना होता है.

कोर्ट ने बिहार के चीफ सेक्रेटरी को आदेश दिया कि बैठकर इस मामले से प्रभावित होने वाले सभी पक्षों को भरोसे में लेकर एक समाधान पेश करें.

आनन-फानन में घोषित की तारीख

सितंबर में बिहार के चीफ सेक्रेटरी ने कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि वह 3 अक्टूबर से लेकर 22 अक्टूबर तक एग्जाम कराकर 20 नबंवर तक रिजल्ट देंगे. इस पर याचिका दायर करने वालों ने कहा कि तब तक तो बहुत देरी हो जाएगी. इस देरी से निपटने के लिए बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूल ने ‘डिमांड पर परीक्षा’ कराने की पेशकश कर दी.

‘मांग पर परीक्षा’ का शिगूफा

सितंबर में ही बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग ने वेबसाइट पर ‘मांग पर परीक्षा’ कराने के नए सिस्टम के नियम-कायदे के साथ ही इसकी खास फीस के बारे में भी बताया. इसमें लिखा गया कि यह ‘मांग पर परीक्षा’ जल्दी रिजल्ट चाहने वालों के लिए है. इसकी तारीखें भी 3 अक्टूबर से 22 अक्टूबर तक होने वाले एग्जाम से अलग होंगी और 10 दिनों के भीतर ही रिजल्ट निकाल दिया जाएगा.

फिर मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

बीबीओएसई के बार-बार बदलते नियमों से परेशान होकर सुप्रीम कोर्ट में दूसरी याचिका फाइल की गई. इस याचिका में ‘मांग पर एग्जाम’ वाले सिस्टम की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए गए थे. इसमें कहा गया कि स्पेशल एग्जाम देने के लिए बच्चों को दूर-दराज के सेंटरों पर जाना होगा, जो मुश्किल है. सुप्रीम कोर्ट ने भी समस्या पर विचार किया और ‘मांग पर एग्जाम’ वाले सिस्टम को अव्यावहारिक पाया. कोर्ट ने कहा कि कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि बच्चों का रिजल्ट जल्दी से जल्दी आ जाए.

अब हुई ‘मांग पर रिजल्ट’ की एंट्री

इस पर बीबीओएसई ने 14 अक्टूबर को ‘मांग पर रिजल्ट’ का एक नोटिस जारी कर दिया. इसमें लिखा कि जो भी बच्चा रिजल्ट जल्दी चाहता है, वह 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे तक अपने एडमिट कार्ड के साथ जरूरी डॉक्यूमेंट ईमेल कर दे. उनका रिजल्ट बाकी बच्चों से जल्दी यानी 28 अक्टूबर (एग्जाम खत्म होने के 6 दिन के भीतर) वेबसाइट पर डाल दिया जाएगा.

इन सवालों के जवाब कौन देगा

# सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिर्फ 48 घंटे के नोटिस पर पूरे बिहार में मौजूद स्टूडेंट कैसे ‘मांग पर रिजल्ट’ के लिए ईमेल कर सकेंगे.

# इसे सिर्फ वेबसाइट पर डाला गया है. किसी भी स्टूडेंट को न इसे लेकर कोई पत्राचार किया गया है, न ही किसी तरह का मैसेज भेजा गया है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि कितने बच्चे हैं, जो इस तरह के सिस्टम का फायदा उठा सकेंगे.

# बाकी जिन बच्चों का रिजल्ट 22 नवंबर को निकाला जाएगा, उनके भविष्य का क्या होगा? तब तक न तो किसी यूनिवर्सिटी में एडमिशन का दरवाजा खुला होगा, न ही किसी बड़े कॉलेज का.

# क्या कोई भी स्टूडेंट यह मानकर एग्जाम देगा कि उसका रिजल्ट इतनी देर में आए कि वह अगले एक साल तक किसी जगह दाखिला लेने लायक ही न रह जाए. ऐसे में ‘मांग पर रिजल्ट’ का तर्क कितना व्यावहारिक है, यह बीबीओएसई ही बता सकता है.

क्या कहना है बीबीओएसई का

बिहार स्कूल ऑफ ओपन स्कूलिंग से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन किसी ने भी फोन नहीं उठाया. बीबीओएसई के सीईओ से लगातार बात करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन संपर्क नहीं हो पा रहा है.

अगर बीबीओएसई में कम वक्त मिलने या वक्त पर पता न चल पाने की वजह से ‘मांग पर रिजल्ट’ पाने में असफल रहे हैं, तो हमें लिख सकते हैं.

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