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कौन हैं प्रोफेसर राकेश भटनागर, जिन्हें BHU का VC बनाया गया है

कानपुर में एक शुगर इंस्टीट्यूट है. नाम है नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट. 1978 में इस इंस्टीट्यूट के बायोकेमेस्ट्री डिपार्टमेंट से एक शख्स ने अपनी पीएचडी पूरी की. पीएचडी पूरी करने के बाद ये शख्स जर्मनी चला गया. वहां की फ्रीबर्ग यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ बायोकेमेस्ट्री एंड मॉलीकुलर बायोलॉजी डिपार्टमेंट में वैज्ञानिक के रूप में काम करने लगा. करीब तीन साल काम करने के बाद लगा कि अब अपने देश वापस लौटना चाहिए. फिर क्या था. जर्मनी छोड़कर आ गया भारत और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के वीपी चेस्ट इंस्टीट्यूट के डिपार्टमेंट ऑफ बायोकेमेस्ट्री में पूल ऑफिसर की नौकरी शुरू कर दी. एक साल के बाद ही वो चंडीगढ़ में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च में बायोकेमेस्ट्री का असिस्टेंट प्रोफेसर बन गया. इसके बाद से वो लगातार भारत के साथ ही अमेरिका में बड़े-बड़े पदों पर बना रहा.

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कानपुर के नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट से पीएचडी हैं प्रोफेसर भटनागर.

उस शख्स का नाम है प्रोफेसर राकेश भटनागर. उनका जिक्र इसलिए कि वो अब एक और बड़े पद पर पहुंच गए हैं. ये पद है वीसी यानी वाइस चांसलर का. प्रोफेसर राकेश भटनागर को उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित विश्वविद्यालय काशी हिंदू विश्वविद्यालय का नया वीसी नियुक्त किया गया है.

यूं तो बीएचयू की अपनी एक पुरानी परंपरा रही है, जिसपर बनारस ही नहीं पूरे यूपी को गर्व होता है. लेकिन ये बीएचयू पिछले एक साल से ज्यादा चर्चा में रहा है. इस चर्चा के पीछे सबसे बड़ी वजह रहे हैं इसके पूर्व कुलपति प्रोफेसर गिरीश चंद्र मिश्रा, जिनके खिलाफ यूनिवर्सिटी के हजारों छात्रों ने कई दिनों तक सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया था. इस विरोध प्रदर्शन में लाठीचार्ज हुआ, कई लड़कियों को चोटें आईं और उसके बाद इसस मुद्दे पर इतनी सियासत हुई कि वीसी रहे प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी छुट्टी पर चले गए.

बीएचयू के वीसी रहे प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी को हटाने के लिए छात्रों ने कई दिनों तक प्रोटेस्ट किया था.

वो तब तक नहीं लौटे, जब तक उनका कार्यकाल पूरा नहीं हो गया. 26 नवंबर 2017 को गिरीश चंद्र त्रिपाठी का कार्यकाल पूरा होने के बाद यूनिवर्सिटी को एक नए वीसी की ज़रूरत थी. इसके लिए एक सर्च कमिटी बनाई गई. चार महीने बाद भी कमिटी की ओर से कोई नाम तय नहीं हो पाया. विश्वविद्यालय प्रशासन के सूत्रों की मानें तो कोई भी शख्स बीएचयू का वीसी बनने के लिए तैयार नहीं था. इसकी वजह पूर्व वीसी प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी की वजह से पैदा हुआ गुस्सा था, जिसे झेलना सबके बस की बात नहीं थी. चार महीने की कसरत के बाद 23 मार्च की शाम को सर्च कमिटी ने प्रोफेसर राकेश भटनागर का नाम तय कर दिया. इसके बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी प्रोफेसर राकेश भटनागर के नाम को मंजूरी दे दी और फिर उन्हें बीएचयू का वीसी नियुक्त कर दिया गया.

बीएचयू का वीसी बनने के बाद प्रोफेसर त्रिपाठी लगातार विवादों में घिरे रहे.

कानपुर के शुगर इंस्टीट्यूट से पीएचडी करके बीएचयू के वीसी तक का सफर तय करने में राकेश भटनागर ने कई ओहदे संभाले हैं. जर्मनी में बतौर वैज्ञानिक काम करने के बाद भारत लौटे राकेश भटनागर ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में शुरुआती नौकरी करने के बाद चंडीगढ़ में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर काम किया. इसके बाद वो फिर से फ्रांस चले गए और वहां एक साल तक केन यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर सेवाएं दीं. फ्रांस के बाद वो अमेरिका गए और वहां एक साल तक विजिटिंग असोसिएट और एक साल तक सीनीयिर एनआरसी असोसिएट रहे. ये दौर 1989 का था. 1989 के अंत में ही वो अमेरिका छोड़कर एक बार फिर से भारत लौट आए. इस बार वो जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर बायोटेक्नॉलजी के असोसिएट प्रोफेसर बने. करीब आठ साल के बाद भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों के मिलकर शोध करने की बात आई तो उन्हें अमेरिका भेज दिया गया. वापस आने के बाद वो फिर से जेएनयू को अपनी सेवाएं देने लगे. जेएनयू में काम करने के दौरान प्रोफेसर राकेश भटनागर कई अहम पदों पर रहे.

प्रोफेसर भटनागर (नीली शर्ट में) जेएनयू में कई अहम पदों पर रहे हैं.

जेएनयू में जो सेंटर फॉर बायोटेक्नॉलजी है, भटनागर उसके चेयरमैन रहे. इसके अलावा जेएनयू के इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी मैनेजमेंट सेल के चेयरमैन के अलावा जेएनयू में और भी कई पदों पर रहे हैं. बीएचयू में वीसी बनने से पहले प्रोफेसर राकेश भटनागर जेएनयू में स्कूल ऑफ बायोटेक्नॉलजी के डीन के रूप में काम कर रहे थे. प्रोफेसर भटनागर बीएचयू के वीसी बनने से पहले कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के भी वीसी रह चुके हैं.

जुड़ा रहा है विवाद

जेएनयू में देश विरोधी नारेबाजी के बाद कन्हैया कुमार और आठ छात्रों को हॉस्टल से बाहर करने की सिफारिश की गई थी. ये सिफारिश प्रोफेसर भटनागर की अगुवाई वाली कमिटी ने की थी.

जेएनयू अपनी पढ़ाई के अलावा भी अक्सर चर्चा में बना रहता है. 2016 में जेएनयू की चर्चा पूरे देश में हुई थी. वजह कथित तौर पर हुई देश विरोधी नारेबाजी थी, जिसमें कन्हैया कुमार, उमर खालिद और कई अन्य छात्रों को आरोपी बनाया गया था. मामले में कन्हैया कुमार को तिहाड़ जेल तक जाना पड़ा था. इस पूरे मामले की जांच के लिए जेएनयू में एक आंतरिक समिति बनी थी. जेएनयू के वीसी के आदेश पर बनी समिति में प्रोफेसर राकेश भटनागर, प्रोफेसर एचबी बोहिदार और प्रोफेसर सुमन के धार शामिल थे. इस समिति को लीड करने वाले प्रोफेसर राकेश भटनागर थे. जब फैसला आया तो समिति की सिफारिश पर कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य, श्वेता राज, अनंत प्रकाश, रामा नागा, ऐश्वर्या अधिकारी और आशुतोष कुमार को हॉस्टल से डिबार करने और सभी के खिलाफ केस दर्ज करने की सिफारिश की थी. समिति की सिफारिश पर सभी के खिलाफ केस दर्ज किया गया था.

और अब बात सम्मान की

2016 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रोफेसर भटनागर को विजिटर्स अवार्ड से सम्मानित किया था.

प्रोफेसर राकेश भटनागर मॉलिक्यूलर बायोलॉजी एंड जेनेटिक इंजीनियरिंग लैब्रोटी के विशेषज्ञ हैं. देश में एंथ्रेक्स जैसी बीमारी का टीका बनाए जाने के पीछे सबसे बड़ा योगदान प्रोफेसर भटनागर को ही दिया जाता है. दुनिया के 10 चुनिंदा शोधकर्ताओं में शामिल प्रोफसर भटनागर के शोधपत्र दुनिया के कई जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं. नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस और इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस के फेलो रहे भटनागर को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी विजिटर्स अवार्ड से सम्मानित भी कर चुके हैं.


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