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विदेशी लेखक क्रिस्तोफ जाफ्रलो ने आंबेडकर की जीवनी में महार जाति के बारे में क्या लिखा?

भीमराव आंबेडकर. एक ऐसा नाम जिसके बिना भारत के संविधान या मौजूदा राजनीति की परिकल्पना अधूरी है. कई लोग ये मानते हैं कि भारतीय इतिहास में बाबा साहब आंबेडकर का कद महात्मा गांधी के बराबर था. लेकिन आंबेडकर के इतिहास के नाम पर हममें से ज़्यादतर लोगों को सिर्फ इतना पता है कि उन्होंने हमारे देश का संविधान लिखा था. जहां नेहरू, गांधी के बारे में हमें भर-भर के इतिहास मुहैया कराया गया, तो वहीं बाबा साहब के बारे में हमें पढ़ने के लिए अतिरिक्त किताबों की मदद लेनी पड़ती है. लेकिन ऐसा क्या था आंबेडकर में, जो भारत को एक देश के तौर पर खड़ा करने के लिए बने आधरभूत संरचना का एक हिस्सा साबित हुआ?

कहते हैं कि आंबेडकर अपने ज़माने के सबसे ज़्यादा पढ़े लिखे लोगों में शुमार थे. उनकी निजी लाइब्रेरी में करीब 35,000 से ज़्यादा किताबें थीं. जानकारों का कहना है कि जब कोई बाबा साहब को बाहर खाने के लिए आमंत्रित करता तो वो कहते –

“खाना लेकर मेरे घर आ जाओ. बाहर जाने और व्यर्थ की बातें करने में मेरा कम-से-कम एक घंटा जाएगा, जिसे मैं किसी बेहतर काम में ला सकूं तो ज़्यादा अच्छा होगा.”

लेकिन बाबा साहब इन सब विवरणों और किस्सों से कहीं बढ़कर थे. दलितों और पिछड़ों के लिए उन्होंने इतना काम किया कि आज भी आपको आंबेडकर जयंती के मौके पर कइयों के सोशल मीडिया पोस्ट और स्टेटमेंट्स मिल जाएंगे कि आज वो जो भी हैं, सिर्फ़ बाबा साहब की वजह से हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक बुराइयों जैसे छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया. इस दौरान बाबा साहब गरीब, दलितों और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे. स्वतंत्र भारत के वो पहले विधि एवं न्याय मंत्री बने.

आज बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का जन्मदिन है. इस मौके पर आपको पढ़ाते हैं क्रिस्तोफ जाफ्रलो द्वारा लिखित और योगेन्द्र दत्त द्वारा अनुवादित ‘भीमराव आंबेडकर : एक जीवनी’ का एक अंश. इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

भीमराव आंबेडकर : एक जीवनी
जाति उन्मूलन का संघर्ष एवं विश्लेषण

क्रिस्तोफ जाफ्रलो
अनुवाद – योगेन्द्र दत्त

आंबेडकर जिस महार जाति में पैदा हुए वह मांग (रस्सी बनाने वालों) और चमार (चांभार) (चमड़े का काम करने वालों) के बीच पड़ने वाली एक अछूत जाति थी. इस जाति को जो काम करने को दिए जाते थे उनके कारण उन्हें छिटपुट व्यावसायिक कामों की छूट भी मिल जाती थी. खैर, इन सब बातों का फ़ायदा उठाते हुए महार अस्पृश्यों का नेतृत्व धीरे-धीरे अपने हाथों में लेते गए. इसके पीछे आंशिक रूप से उनकी संख्या का भी हाथ था. 1931 में बॉम्बे प्रेजि़डेंसी में अस्पृश्यों की कुल आबादी में से 68.9 प्रतिशत महार ही थे जबकि चांभारों की आबादी 16.2 प्रतिशत और मांगों की आबादी 14.9 प्रतिशत थी. पूरी आबादी में उनकी संख्या मराठों (20.2 प्रतिशत) से कम मगर ब्राह्मणों (4.4 प्रतिशत) से बहुत ज़्यादा थी.

बलूतेदारी व्यवस्था में प्रचलित श्रम विभाजन के तहत उनकी भूमिका ख़ालिस घाटे की भी नहीं थी. महार ऐसे काम भी करते थे जिनकी वजह से उन्हें ऊंची जातियों के सम्पर्क में आने और इस तरह कुछ अलग तरह की जि़म्मेदारियां निभाने का मौक़ा मिल जाता था. इससे भी अहम बात ये रही कि पेशवा की सेना में अपनी पुरानी मौजूदगी का फ़ायदा उठाते हुए महार ब्रिटिश सेना में भी बड़ी संख्या में भर्ती हुए. फलस्वरूप, बहुत सारे महारों के लिए छावनियों में रहना भी सामाजिक गतिशीलता का एक बढ़िया साधन साबित हुआ. किसी ख़ास पेशे में दक्षता या विशेषज्ञता न होने के चलते महार गांव छोड़ने वालों में भी सबसे आगे रहे. फलस्वरूप, शहरों में और आधुनिकता के सम्पर्क में भी सबसे पहले वही आए.

महार भक्ति आन्दोलन के ऐतिहासिक महत्त्व से भी बहुत गहरे तौर पर प्रभावित थे. महाराष्ट्र में यह आन्दोलन महान कवि तुकाराम के नेतृत्व में सत्रहवीं शताब्दी में अपने शिखर पर पहुंच गया था. भक्ति परम्परा ने न केवल ब्राह्मणों द्वारा तय किए गए अनुष्ठानों बल्कि स्वयं ब्राह्मणों से भी दूर रहते हुए केवल ईश्वर भक्ति के माध्यम से मोक्ष का सन्देश दिया. भक्ति परम्परा के अनुयायी ईश्वर के समक्ष मनुष्यों की समानता का सन्देश देते रहे हैं. वे जातिगत ऊंच-नीच को चुनौती देते हैं, भक्ति सम्प्रदायों और फलस्वरूप, समतापरक मूल्यों को अपनाने वाले पन्थों व सम्प्रदायों के विकास को बढ़ावा देते हैं.

महाराष्ट्र में बहुत सारे महार तेरहवीं शताब्दी में शुरू हुए महानुभाव पन्थ से भी जुड़े रहे हैं. हिन्दू धर्म के कर्ताधर्ताओं ने इस पन्थ का बहिष्कार कर दिया था क्योंकि यह पन्थ जातिगत भेदों को नहीं मानता था. इस पन्थ से जुड़ाव की बदौलत कुछ महार अपने अलग अनुष्ठान और विश्वास क़ायम करने में कामयाब हुए. मगर, भक्ति आन्दोलन महारों को जाति व्यवस्था के खिलाफ़ बगावत के लिए प्रेरित करने की बजाय उन्हें अस्तित्व की सामाजिक परिस्थितियों को समाप्त करके जाति व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता था. ब्राह्मण उत्पीड़न की इतनी हाय-तौबा ही क्यों जबकि अस्तित्व का मुख्य उद्देश्य ही है इस जगत के परे मिलने वाले जीवन में मोक्ष प्राप्त करना. महार जाति में जन्मे कवि चोखामेला भी तेरहवीं शताब्दी के एक मुख्य व्यक्ति थे जिन्होंने अपने शानदार दोहों में इस तर्क के बेहतरीन उदाहरण दिए हैं. आंबेडकर को न केवल यह समृद्ध विरासत मिली थी बल्कि वह अपना मुक्तिकामी सन्देश रचने में भी कामयाब रहे.

महार, अन्तिमों में पहला

महाराष्ट्र के समाज में महारों की एक ख़ास, बिलकुल अनूठी हैसियत रही है. जैसा कि ऊपर जि़क्र किया गया था, उनके पास बलूत का जि़म्मा होता था, और वे गांव के सबसे महत्त्वपूर्ण बलूतेदारों में भी गिने जाते थे. यह बात उन्हें मिलने वाले भुगतानों से समझी जा सकती है. फ़सलों की कटाई के समय प्रत्येक काश्तकार बलूतेदारों को भुगतान के लिए अपने खलिहान में पेंढी/अनाज की पूलियां क़तार में रख देता था. पेंढियों को तीन क़तारों में रखा जाता था. हैसियत के हिसाब से प्रत्येक क़तार एक बलूतेदार के लिए होती थी. महारों को हमेशा पहली क़तार में से पेंढी उठाने का मौक़ा मिलता था. न केवल महारों को कटाई में एक अहम हिस्सा मिलता था बल्कि उनके वतन (बिना राजस्व वाली ज़मीन का टुकड़ा) अधिकार को भी पाटिलों और कुलकर्णियों की तरह मान्यता मिली थी. यह सुविधा बाकी बलूतेदारों के लिए नहीं थी.

जैसा कि त्राउदे पिल्लई-वेट्शरा ने बताया है,

‘महार वतन या हडोला प्राय: बढ़िया गुणवत्ता का होता था’

मगर पेशवाओं ने व्यवस्था दी थी कि इस ज़मीन को न तो बेचा जा सकता है और न ही यह वतनदार से छीनी जा सकती है. अपनी वतनदारी हैसियत के बावजूद महार कई तरह की दूसरी भूमिकाएं भी निभाते थे. उनमें से कुछ काम ख़ासतौर से दूषित श्रेणी के होते थे. पिल्लई-वेट्शरा ने महारों द्वारा किए जाने वाले कामों की एक सूची दी है जो सबसे बढ़कर अपनी विविधता के लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण दिखाई पड़ती है. इस सूची के अनुसार, महार न केवल चौकीदार और पहरेदार हुआ करते थे बल्कि चोरी-चकारी होने पर पुलिस के सहायक की भूमिका निभाते थे, कुली का काम करते थे, एक गांव से दूसरे गांव तक लोगों को ले जाने वाले गाइड होते थे, गांव की सीमा तय करने वाले रेफ़री होते थे, लगान वसूलते थे और भूस्वामियों को लगान का सम्मन भेजते थे, सरकारी खज़ाने के साथ पहरे पर चलते थे, सड़कों को साफ़ करते थे, मौत की खबर पहुंचाते थे, दूसरे गांवों में खबर पहुंचाते थे, श्मशान में लकड़ी लाने और मरे हुए मवेशियों को उठाने के काम करते थे.

इन सारे कामों में से अन्तिम काम स्वाभाविक रूप से सबसे दूषित दिखाई पड़ता है. ख़ासतौर से इसलिए भी क्योंकि इसके साथ मरे हुए मवेशियों का मांस खाने की महार परम्परा भी जुड़ी हुई थी.

महार जाति के लोग अस्पृश्यता के जिस कलंक से जूझ रहे थे उसकी सघनता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई जगह तो उन्हें अपने गले में घड़ा लटकाकर भी चलना पड़ता था ताकि उनका थूक उस ज़मीन को दूषित न कर दे जिस पर ब्राह्मणों के पैर पड़े हैं.

अपने पांवों के निशानों को मिटाने के लिए उन्हें अपने पीछे की ज़मीन को भी बुहारते हुए चलना पड़ता था. कम से कम उन्हें ब्राह्मणों से अच्छा-ख़ासा फ़ासला तो रखना ही पड़ता था ताकि अपनी परछाईं से भी वे उनको दूषित न कर दें. पिल्लई-वेट्शरा के मुताबिक़, महारों पर इस तरह की पाबन्दियां पेशवाओं के ज़माने में थोपी गई थीं.

महार गांव के बाहर, महारवाड़े में रहते थे. यह एक अलग मोहल्ला होता था. अगर महारों को वतन (ज़मीन के टुकड़े पर मिलने वाला पैतृक अधिकार) और बलूत (गांव की सेवा के बदले वस्तु के रूप में मिलने वाला भुगतान) की सुविधा मिली हुई थी तो उन्हें अपनी मज़दूरी के लिए भीख भी मांगनी पड़ती थी. बेबी कांबले ने अपने संस्मरणों में घर-घर जाकर भाखरी (जूठन) इकट्ठा करने के अनुभवों को भी दर्ज किया है :

“पूरे परिवार द्वारा किए जाने वाले इस दैनिक श्रम के भुगतान के लिए पूरे परिवार को भाखरी के लिए भीख मांगनी होती थी. परिवार के महार मुखिया के पास छड़ी पर लटकी छोटी-छोटी गोल घंटियां होती थीं जिनको सुनकर गांव के लोग दूर हट जाते थे. जो महार भीख मांगने निकलता था वह महारवाड़े से निकलते समय अपनी छाती फुलाता था, मूछों को ताव देता था और एक मर्द की तरह अपना गला खंखारते हुए इतरा कर चलता था. वह अपनी छड़ी और उस पर बंधी छोटी-छोटी घंटियों की तरफ़ ऐसे देखता था मानो किसी सम्राट का राजदंड हो! वकील के लबादे की तरह कन्धे पर काला ऊनी कम्बल डालकर चलता था. मगर, जैसे ही वह गांव में दाखिल होता, उसकी कद-काठी सिकुड़ जाती, वह कुबड़े की तरह झुक जाता और घोंघे की तरह घिसटकर चलने लगता. किसी के दरवाज़े पर पहुंच कर वह अपना मुंह खोले बिना बस तीन बार अपनी घंटियों को टनटनाता था. तब सड़े-बुसे खाने के कुछ टुकड़े उसके कम्बल में
फेंक दिए जाते थे. गांव का चक्कर पूरा होते-होते उसके कम्बल की झोली आधी से ज़्यादा भर जाती थी. महार अपने कन्धे पर भाखरी लादे ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आता था. फिर पूरा परिवार पेट भर कर यही भाखरी खाता था.”

महारों द्वारा किए जाने वाले कुछ परम्परागत कामों को सम्मानजनक भी माना जाता था क्योंकि उनकी वजह से वे ऊंची जातियों के सम्पर्क में आते थे. गांव के पहरेदार की हैसियत से उन्हें मेहमानों की पहचान दर्ज करनी होती थी और उनके आने का कारण दर्ज करना होता था. मगर, उन्हें सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठा जिस काम से मिलती थी उसका ब्योरा रॉबर्टसन ने बहुत सटीक ढंग से दिया है. बीसवीं शताब्दी के पहले तीन दशकों के दौरान महाराष्ट्र में मिशनरी के तौर पर काम करने वाले रॉबर्टसन बताते हैं :

“महार के लिए सबसे ज़्यादा फ़ख़्र का काम है सरकारी हरकारे (सन्देशवाहक) का काम करना. इस काम में अकसर उसे बहुत सारा धन भी जि़ला कोषागार तक पहुंचाना होता है. ऐसी जि़म्मेदारियों के निर्वहन के लिए उसे अपने पुरखों से वफ़ादारी की एक रिवायत मिली है. जब हूकूमत के अफ़सरों को गांवों की सीमाओं के बारे में सटीक जानकारियों की ज़रूरत होती है तो महार से ही वह जानकारी मिलती है. बड़ी संजीदगी से खेत की सीमा पर चलते हुए वह सीमा तय करता है. बंटाई और बक़ाया लगान की वसूली के लिए आए राजस्व अधिकारी के सामने हाजि़री के लिए किसानों को बुलाने का जि़म्मा भी महारों को ही सौंपा जाता है.”

इससे पता चलता है कि कुछ कामों को करते हुए महार होने में एक गर्व का भाव महसूस किया जा सकता था. इस बात की बहुत सारे लोगों ने तस्दीक़ की है. पिल्लई-वेट्शरा का कहना है कि
‘अपनी निम्न जाति के बावजूद महार एक बहुत सम्मानजनक हैसियत रखते थे’.

जबकि जयश्री गोखले ने बताया है कि

‘गांव की सीमाओं को निर्धारित करने और गांवों के बीच सीमाओं से सम्बन्धित विवादों के समाधान में महारों की भूमिका से उनको एक ऐसा क़द मिल जाता था जो और किसी जाति के पास नहीं था.’

कुछ महारों में एक निश्चित क़‍िस्म का आत्मविश्वास भी दिखाई पड़ता था. दया पवार बताते हैं कि वह जिन महारों को जानते थे, ‘उनको देखकर ऐसा नहीं लगता था कि वे भीख मांगते हैं. अपने भुगतान (बलूत) को वे एक अधिकार की तरह देखते थे. पीढ़ियों से उनको ये मालूम था कि उनके पुरखों को 52 अधिकारों की फेहरिस्त दी गई थी (प्रत्येक महार इस परम्परा में गौरव महसूस करता था).’

महार अन्तिमों में सबसे पहले जो प्रतीत होते थे, यह तथ्य काश्तकारों के रूप में उनकी भूमिका का नतीजा थी. और यह भूमिका वतनदार की उनकी हैसियत का परिणाम थी जिससे उन्हें ज़मीन रखने और उसको जोतने का अधिकार मिल जाता था.

सेना में महारों की बड़ी संख्या में भर्ती से भी उन्हें बहुत फ़ायदा हुआ. महारों के सैन्य गुणों को देखते हुए अंग्रेज़ों ने अपनी नियमित सेना में बहुत सारे महारों को भी भर्ती किया था. उन्हें हथियारों के कारख़ानों में भी नौकरी दी गई थी. बल्कि इन कारख़ानों में उनकी अच्छी-ख़ासी संख्या होती थी. एक समय तो इन्फेंटरी की 20 रेजिमेंटों और महार नेवल रेजिमेंट में लगभग 70 ग़ैर-कमीशन महार अधिकारी थे जोकि महारों में एक छोटे-मोटे आभिजात्य तबके के निर्माण के लिए बड़ी अनुकूल स्थिति थी. 1857 के ग़दर के वक़्त बम्बई कमान के अन्तर्गत ईस्ट इंडिया कम्पनी की रेजिमेंटों में से छठा हिस्सा महारों का ही था. इलिएनर ज़ीलियट के मुताबिक़,

‘एकदम शुरुआती दौर में फौजी नौकरियां मिलने से उन्हें (महारों को) चारों ओर पश्चिमी संस्कृति के प्रसार से बहुत पहले ही ब्रिटिश संस्थानों में आने का मौक़ा मिल गया था. इस तरह के एक्सपोज़र की बदौलत वे नई राजनीतिक व्यवस्था के साथ तेज़ी से परिचित हुए, फलस्वरूप जैसे ही नए अवसर और विकल्प सामने आए, वे उन अवसरों का लाभ उठाने के लिए दूसरे समूहों के मुक़ाबले ज़्यादा तैयार स्थिति में थे.’


 

पुस्तक : ‘भीमराव आंबेडकर : एक जीवनी’
लेखक – क्रिस्तोफ जाफ्रलो
अनुवाद – योगेन्द्र दत्त
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
मूल्य : हार्डकवर 650/-, पेपरबैक 225/-


 

वीडियो – आंबेडकर को गए 63 साल हो गए, भीम जन्मभूमि पर स्मारक पूरा नहीं बन पाया

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