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आज़ादी के इतिहास से कन्नी काटने वाला पाकिस्तान भगत सिंह को हीरो क्यों मानता है?

पाकिस्तान के साथ एक बहुत बड़ी दिक्कत रही है. उनका अपना कोई इतिहास नहीं है. जब 1947 में अंग्रेज़ मुल्क छोड़ गए तो उससे पहले का सारा इतिहास ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ हो गया. लेकिन आज़ाद तो पाकिस्तान भी हुआ था. अंग्रेजों से लड़ाई में लाहौर, ढाका, रावलपिंडी जैसे शहर भी बग़ावत के केंद्र में रहे थे. जब आज़ादी नसीब हुई तो आज़ादी की सारी लड़ाई का इतिहास ‘भारतीय’ इतिहास बन गया. ऐसा नहीं है कि इसमें भारत का कोई हाथ रहा हो, लेकिन कुछ तो पैरेंट कंट्री होने से और कुछ पाकिस्तान की खुद की हठधर्मी की वजह से पाकिस्तान के पास अपना कहलाने जैसा इतिहास नदारद है.

उनके यहां जो इतिहास पढ़ाया जाता है उनमें प्रमुखता से उन्हीं लोगों का ज़िक्र है जिनकी पाकिस्तान बनाने में भूमिका रही. मुहम्मद अली जिन्ना, अल्लामा इकबाल, मौलाना शौकत अली, मौलाना मुहम्मद अली जौहर, चौधरी रहमत अली वगैरह-वगैरह. कभी-कभार गांधी का ज़िक्र कर देते हैं वो लोग. नेहरू से वैसे ही चिढ़ते हैं जैसे हम भारतीय जिन्ना से.

इस सूरतेहाल के बावजूद भगत सिंह को पाकिस्तान में लोकप्रियता प्राप्त है. ये थोड़ी हैरान करने वाली बात है. हैरान करने वाली इसलिए क्योंकि उनमें पाकिस्तान जैसे मुल्क का हीरो होने के लिए ज़रूरी बुनियादी खसूसियात नहीं थी. जैसे कि वो नॉन-मुस्लिम थे, नास्तिक थे, रशियन क्रांति से हमदर्दी रखते थे. इसके बावजूद भगत सिंह पाकिस्तान में बेहद मशहूर हैं. हर साल 23 मार्च को उन्हें बड़े जोशो-खरोश के साथ वहां याद किया जाता है.

भगत सिंह का पाकिस्तान कनेक्शन है भी बड़ा मज़बूत. वो जिस बंगा गांव में पैदा हुए थे वो आज पाकिस्तान में है. फैसलाबाद जिले में. भगत सिंह ने ‘बहरों को सुनाने के लिए’ जो धमाका किया था, उसके बाद उन्हें लाहौर जेल में ही रखा गया था. उन्हें फांसी भी लाहौर जेल में ही हुई. पाकिस्तान चाह कर भी उनको अवॉयड नहीं कर सकता. एक वजह ये भी रही होगी कि भगत सिंह आज़ादी हासिल होने से काफी पहले शहीद हो चुके थे. शायद इसी वजह से उनको ‘साझा हीरो’ मानने में पाकिस्तान को कोई दिक्कत नहीं होती होगी. उनको फांसी होने की तारीख़ तक तो पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव तक नहीं आया था.

लाहौर के शादमान इलाके में उनके नाम से चौक बनाने की मांग वहां के बाशिंदे काफी वक़्त से कर रहे हैं. 1931 में ये जगह लाहौर जेल का हिस्सा थी और इसी जगह उन्हें फांसी दी गई थी.

पाकिस्तान जैसे कट्टर इस्लामी देश में एक नॉन-मुस्लिम हीरो की स्वीकार्यता अच्छा सिग्नल है. पाकिस्तान के एक मुल्क के तौर पर स्थापित कट्टर चरित्र में आए किसी भी बदलाव को देख कर ख़ुशी होती है. चाहे नवाज़ शरीफ के सामने गायत्री मंत्र का पाठ हो, होली पर एक मुस्लिम की तस्वीर वायरल होने का मामला हो या चौक को भगत सिंह का नाम देने की मांग. ये सभी घटनाएं नाइत्तेफाकियां पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाने की अहमियत को रेखांकित करती हैं.

हमें भी इससे कुछ सीख ले लेनी चाहिए. आज़ादी की लड़ाई के तमाम बड़े नामों के बीच भारत में ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ान का नाम/काम बहुत कम लोग जानते हैं. कुछ वो बदलें, कुछ हम बदलें. आपसी नफरतें, हसद, चिढ़ गायब हो, सहअस्तित्व की भावना बढ़ें. साझी विरासत, साझा इतिहास लेकर चलते दो मुल्क एक दूसरे को सम्मान देते रहें. और क्या चाहिए!


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