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ये किस तरह के लोग हैं जो मरती दिल्ली पर हंस रहे हैं?

7 नवंबर 2017 की सुबह यूं तो आम सी थी, लेकिन दिल्ली के लिए दहशतभरी रही. इस साल की पहली ऐसी सुबह जब हवा में तैरता ज़हर नंगी आंखों से दिखाई दिया दिल्ली वालों को. कुछ खुशफहम इसे गुलाबी सर्दी का फॉग समझ के रोमांटिक होने ही वाले थे कि न्यूज़ चैनलों ने चेता दिया. भैया ये फॉग नहीं स्मॉग है. स्मॉग माने ऐसा फॉग जिसमें स्मोक (धुआं) मिला हुआ हो. नहा-धोकर सड़क पर निकले फ्रेश चेहरों को कुछ ही मिनटों में पता चल गया कि ये जो हवा में तैर रहा है वो विशुद्ध ज़हर है. आंखें जलने लगीं, सांस लेने में दिक्कत होने लगी. मुंह के रास्ते अंदर जाती हवा गले में अटकने लगी. हवा का भारीपन तो साफ़ महसूस हो रहा था. ज़ाहिर सी बात है तुरंत दिल्ली की हवा ‘ट्रेंडिंग टॉपिक’ हो गया.

ये दिन की रौशनी में ली गई तस्वीर है.
ये दिन की रोशनी में ली गई तस्वीर है.

अब थोड़ा फ्लैशबैक. लगभग महीना भर पहले का सीन. 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर बैन लगाया. 1 नवंबर तक. आइडिया ये था कि दिवाली पर दिल्ली की हवा में कम से कम पटाखों का बारूद न घुले लेकिन जो हुआ वो अभूतपूर्व था. कोर्ट के इस फैसले को धर्म की बेइज्ज़ती करार दिया गया. कितने ही समझदार कहलाने वाले लोग तर्कों (!) के साथ कोर्ट के फैसले का विरोध करने लगे. पटाखों को हिंदू अस्मिता से जोड़ दिया गया. मुस्लिमों के तुष्टिकरण के जुमले हवा में खूब तैरे. लोग कहते रहे कि दिल्ली में गाड़ियों से प्रदूषण होता है, कारखानों से होता है वगैरह-वगैरह. ये नहीं बताया कि खुद पटाखे जलाकर पहले से मौजूद प्रदूषण में इज़ाफ़ा करना क्यों ज़रूरी है?

देश की राजधानी देश में बढ़ते प्रदूषण को मापने का थर्मामीटर बन गई है. हम हैं कि फिर भी चेत नहीं रहे हैं.
देश की राजधानी देश में बढ़ते प्रदूषण को मापने का थर्मामीटर बन गई है. हम हैं कि फिर भी चेत नहीं रहे हैं.

बहरहाल दिवाली आई. छोटी दिवाली तो निर्विघ्न गुज़र गई लेकिन लक्ष्मी-पूजन की रात आते-आते दिल्ली वालों ने कहर ढा दिया. वही जाना-पहचाना नज़ारा था. आसमान धुएं में गर्क हो चुका था. कालिख ही कालिख. शोर ही शोर. कई लोग ख़ुशी में नहीं विद्वेष की भावना से पटाखे फोड़ रहे थे. कुछ ज़्यादा ज़िम्मेदार लोग सुप्रीम कोर्ट के आगे भी फोड़ आए. हिंदू धर्म की जय-जय हो गई.

अब लगभग 20 दिन बाद जब हवा में वो बारूद नज़र आ रहा है तो लोग चेत तो रहे हैं लेकिन मान नहीं रहे. अब भी व्यंग्य सूझ रहा लोगों को. मज़ाक बना रहे कि अब तो पटाखे नहीं फूट रहे फिर क्यों हवा ऐसी है? बाकी चीज़ों की रोकथाम के लिए क्या किया गया? इन लोगों को बिठाकर समझाने का मन करता है कि भई शरीर में ज़हर जाने के दस बहाने हैं. तो क्या ग्यारहवें को नज़रअंदाज़ कर देंगे? खुद बढ़-बढ़ के ज़हर चाट लेंगे? जो टाला जा सकता है, उसे टालने में क्या समस्या है? ये कैसी ज़िद है कि अपनी ही प्रजाति के दुश्मन बन जाओ?

फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुंआ भी स्मॉग के लिए जिम्मेदार है.
फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुंआ भी स्मॉग के लिए जिम्मेदार है.

दिल्ली की हवा दर्जनों वजह से ज़हर हुई है. ये सही बात है. उन दर्जनों वजहों में पटाखे भी एक वजह है ये भी सही बात है. जब समझदार समझे जाने वाले लोगों को व्यंग्य कर के खुश होते देखता हूं तो अजीब लगता है. भैया, दिल्ली इतनी ज़हरीली हो ही गई है. लोगों का बुरा हाल है. सांस लेने में तकलीफ है, आंखों में जलन है, खांस रहे हैं. आप मार लो व्यंग्य. आम आदमी इंडस्ट्रीज़ पर लगाम नहीं लगा सकता, पराली की समस्या का समाधान नहीं कर सकता, गाड़ियों से होते प्रदूषण को थाम नहीं सकता लेकिन अपने अहाते में पटाखे जलाने से तो तौबा कर ही सकता है. इतना बेसिक योगदान देने में क्या समस्या है? पहले से मौजूद बीमारी को रोकने की कोशिश करेंगे या एक नया रोग और बढ़ा लेंगे? लॉजिक क्या कहता है?

पराली जलाने से स्मॉग बनता है, लेकिन यही इकलौती वजह नहीं है.
पराली जलाने से स्मॉग बनता है, लेकिन यही इकलौती वजह नहीं है.

दिल्ली में पटाखों पर बैन अपने आप नहीं लगा था. कुछ बच्चों के अभिभावक कोर्ट गए थे पटाखों के खिलाफ़. उनके बच्चों को हॉस्पिटलाइज्ड करना पड़ा था प्रदूषण की वजह से. आपको लगता है कि प्रदूषण के बाकी और बड़े कारकों पर लगाम लगे तो आप भी जाइए कोर्ट. सरकारों से शिकायत कीजिए. मुखालफत में लिखिए. आवाज़ उठाइए. जो मुमकिन हो कीजिए लेकिन पटाखों की हिमायत में व्यंग्य न मारिए.

आपका व्यंग्य आप पर ही हंस रहा है. व्यंग्य मारकता की जगह मूर्खता का मुज़ाहिरा करे, तो उस पर हंसी नहीं, रोना आता है. किस पर हंस रहे हैं आप? उन लोगों पर जो रोज़गार की वजह से खुले गैस चेंबर में कदम रखने के लिए अभिशप्त हैं? या उन 30,000 अनाम लोगों पर जो बकौल एम्स के डॉक्टर रणदीप गुलेरिया, इस प्रदूषण की मार से मर जाने वाले हैं. और कौन जानता है उन 30,000 लोगों में आपका, हमारा कोई अज़ीज़ भी हो! ज़हरीली हवा फेफड़े का धर्म थोड़े ही चेक करेगी! हमारे बच्चे, हमारे बूढ़े ज़्यादा बड़े ख़तरे में हैं.

जल्द ही वो दिन आने वाला है कि दिल्ली में बिना मास्क के बाहर निकलना नामुमकिन हो जाएगा. क्या इस बदलाव का स्वागत भी पटाखे जलाकर किया जाएगा!

सोचिए! सोचने पर अब तक टैक्स नहीं लगा है.


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