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मिलिए बीएसपी की बांदा-तिकड़ी से, जो अब बिखर रही है

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बांदा. बुंदेलखंड का एक शहर. इस इलाके में पानी के साथ-साथ राजनीतिक पार्टियां भी सूख चुकी है. बिना कीचड़ के कमल खिलने के बाद सपा-बसपा समेत यूपी की सभी पार्टियों ने इस इलाके से मुंह फेर लिया. वैसे उन्होंने बुंदेलखंड को खास तवज्जो कभी दी भी नहीं थी. खैर, आज बात बांदा की तिकड़ी की.

बांदा की ये तिकड़ी बीएसपी नेताओं नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा और गयाचरण दिनकर की है. इस तिकड़ी का बात इसलिए हो रही है, क्योंकि नसीमुद्दीन सिद्दीकी के तौर पर इसका तीसरा विकेट गिर गया है. लगभग 30 साल पार्टी में रहने के बाद पार्टी सुप्रीमो मायावती ने उन्हें निकाल दिया.

यूपी विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद मायावती ने नसीमुद्दीन को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का प्रभार दिया, लेकिन नसीम लखनऊ में ही रहे. बीएसपी राष्ट्रीय पार्टी है. यूपी के अलावा वह कई राज्यों में चुनाव लड़ती है. दिल्ली नगर निगम चुनाव में भी उसे एक सीट मिली. मध्य प्रदेश न जाने के बाद उन्हें और उनके बेटे अफजल को चुनाव में पैसे लेने के आरोप में पार्टी से बाहर कर दिया गया. नसीम ने इसका ठीकरा सतीश चंद्र मिश्रा पर फोड़ा है, जो इस समय मायावती के सबसे करीबी हैं.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी
नसीमुद्दीन सिद्दीकी

बाबू सिंह कुशवाहा यूपी चुनाव से पहले ही बीएसपी का दामन छोड़ चुके हैं. अब नसीम का पत्ता साफ हो गया. यानी बीएसपी में बांदा तिकड़ी का एक ही सिपाही बचा है. गयाचरण दिनकर. माया अपने पूरे राजनीतिक करियर में इन नेताओं पर काफी हद तक निर्भर रही हैं.इस साल यूपी के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने गयाचरण दिनकर को सदन में विपक्ष का नेता बनाया था. अब देखना है कि बीएसपी का तंबू एक बंबू के सहारे कब तक खड़ा रहता है.

जानिए तिकड़ी के इन तीनों नेताओं के बारे में:

1. नसीमुद्दीन सिद्दीकी

यूपी चुनाव के दौरान बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह के मायावती को ‘वेश्या से बदतर’ कहने के बाद नसीमुद्दीन ही थे, जिनके नेतृत्व में बीएसपी कार्यकर्ता दयाशंकर की मां-बहन-बेटी-बीवी को चौराहे पर पेश करने के नारे लगा रहे थे. बीएसपी में दूसरे नंबर के नेता रहे नसीमुद्दीन राजनीति से पहले वॉलीबॉल के मैदान पर खेलते थे. बांदा के सेवरा गांव में पैदा हुए नसीम पहले सेना में गए और फिर रेलवे में ठेकेदारी की. 1988 में बीएसपी बनने के चार ससाल बाद वह पार्टी से जुड़ गए. तब बीएसपी कांशीराम की थी. वैसे पार्टी जॉइन करने से पहले उन्होंने बांदा नगर निगम का चुनाव लड़ा था, जिसमें वह हार गए थे.

मायावती के साथ नसीमुद्दीन
मायावती के साथ नसीमुद्दीन

1991 में बीएसपी ने उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दिया और उन्होंने अपना चुनाव निकाल लिया. लेकिन बाबरी विवाद के बाद जब दो साल बाद 1993 में चुनाव हुए, तो नसीम विधायकी बरकरार नहीं रख पाए. 1996 के चुनाव में भी वह हार गए थे.  1995 में जब माया पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, तो उन्होंने नसीम को कैबिनेट में जगह दी. इसके बाद मार्च 1997 से अगस्त 1997 तक और मई 2002 से अगस्त 2003 तक नसीम कैबिनेट में रहे. 2007 में जब माया ने आक्रामक जीत दर्ज करते हुए सरकार बनाई, तो नसीम पांच साल मंत्री रहे. पार्टी के मुस्लिम चेहरे के तौर पर.

2017 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने नसीम के 28 साल के बेटे अफजल को खूब प्रमोट किया. इस चुनाव में बीएसपी ने मुस्लिमों को आकर्षित करने की बहुत कोशिश की. 9 अक्टूबर को लखनऊ में रैली करते हुए खुद माया ने मुस्लिमों से कांग्रेस और सपा को वोट न देने के लिए कहा, ताकि बीजेपी का फायदा न हो. अफजल को वेस्ट यूपी के आगरा, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद और बरेली शहरों की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन बीएसपी नाकाम रही. अफजल 2012 से राजनीति में एक्टिव हैं. 2014 में अफजल फतेहपुर सीट से लोकसभा चुनाव भी हार गए थे.

नसीम और उनके बेटे
नसीम और उनके बेटे

इस चुनाव में नसीम बीएसपी के स्टार कैंपेनर थे. उनके अलावा सिर्फ सतीश मिश्रा को ही चुनाव में हेलिकॉप्टर इस्तेमाल करने की इजाजत थी. वेस्ट यूपी में बीएसपी की मजबूत पकड़ रही है और 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने के बाद इस इलाके की जिम्मेदारी भी नसीम के पास ही थी. पार्टी से निकाले जाने पर नसीम ने कहा, ‘मैं तीन दशक से ज्यादा तक पार्टी की विचारधारा से जुड़ा रहा. पार्टी के लिए मैं अपनी बीमार बेटी के पास भी नहीं जा पाया, जो इलाज होने की वजह से मर गई, क्योंकि मायावती को मेरी जरूरत थी.

पार्टी से निकाले जाने के अगले दिन जब नसीम मीडिया के सामने आए, तो उन्होंने माया की कार्यशैली और उनकी हत्या के इरादेे जैसे कई खुलासे किए, जिस पर मायावती को भी सफाई देने आना पड़ा.

2. बाबू सिंह कुशवाहा

27 सालों तक बीएसपी से जुड़े रहे बाबू सिंह कुशवाहा की कहानी 1995 से शुरू होती है. उस साल गयाचरण दिनकर ने ही बांदा में चल रही IRD और स्पेशल कंपोनेंट योजना में धांधली के चलते कुशवाहा की जांच कराई थी. इस दौरान नसीम ने बाबू को बचा लिया. नसीम ने कुशवाहा को मायावती के ऑफिस में टेलीफोन अटेंडेंट की नौकरी दिलवा दी. यहां से कुशवाहा ने ऐसा चक्कर चलाया कि माया कैबिनेट तक पहुंच गए. एक जमाने में बैंक दलाल की छवि वाले कुशवाहा राजनीति में बहुत तेजी से उठे और उतनी ही तेजी से नीचे भी आए.

बाबू सिंह कुशवाहा
बाबू सिंह कुशवाहा

कुशवाहा की राजनीति इस चीज से समझी जा सकती है कि ये बीएसपी से निकाले गए, बीजेपी में शामिल किए गए, इनके कांग्रेस में आने की बात खुद राहुल गांधी से हो रही थी और इनके परिवार के दो सदस्य सपा में हैं. मायावती सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक कुशवाहा पर सबसे बड़ा दाग NRHM घोटाले का है, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की संदिग्ध हालात में मौत हुुई. 2007 से 12 के बीच केंद्र सरकार के नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के लिए यूपी को करीब 8,657 करोड़ रुपए का फंड मिला, जिसमें से हजार करोड़ का नेताओं-अफसरों में बंदरबांट हुआ. इस मामले में CBI लंबे समय तक कुशवाहा पर हाथ नहीं डाल पाई. इस मामले में बाबू सिंह जेल भी जा चुके हैं.

पुलिस के घेरे में बाबू सिंह
पुलिस के घेरे में बाबू सिंह

कुशवाहा का बचाव करने में जब बीएसपी कमजोर हो गई, तो 2011 में इनसे जबरन इस्तीफा दिलवाया गया और अगले ही साल ये बीजेपी में शामिल हो गए. उत्तर प्रदेश में अति पिछड़े वर्ग में अच्छी पकड़ होने की वजह से ये माया के करीबी रहे. पार्टी को खूब फायदा भी कराया, लेकिन बीएसपी से बाहर होते-होते इनके माया के साथ रिश्ते खराब हो गए थे.

2017 के विधानसभा चुनाव का माहौल बनते ही बाबू सिंह ने अपनी खुद की पार्टी ‘जन अधिकार मंच’ की घोषणा की. कहा कि उनकी पार्टी यूपी की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. पार्टी बनाते ही बाबू ने सबसे पहले आरक्षण का मुद्दा उठाया था. कहा था कि यूपी में पिछड़ों की संख्या सिर्फ 60% है, जबकि आरक्षण सिर्फ 27% लोगों को मिलता है. उनकी पार्टी बाकियों को आरक्षण दिलाएगी. चुनाव में कौन जीता-कौन हारा, सभी जानते हैं.

अपनी पार्टी के पोस्टर में बाबू
अपनी पार्टी के पोस्टर में बाबू

3. गयाचरण दिनकर

इस तिकड़ी के आखिरी विकेट गयाचरण दिनकर 2012 में बांदा की नरैनी सीट से विधायक बने. 2016 में जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ दी थी, तो मायावती ने गयाचरण पर भरोसा जताते हुए उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया था. इससे पहले वह विधायक दल के उपनेता भी रहे. कांशीराम के साथ काम कर चुके दिनकर दलित वर्ग से हैं और इसी वजह से माया के लिए कीमती हैं.

नेता विपक्ष बनाए जाने के दौरान गयाचरण
नेता विपक्ष बनाए जाने के दौरान गयाचरण

बांदा के गौरीखानपुर में पैदा हुए दिनकर ने अपना पहला चुनाव 1991 में जीता था. दो साल बाद हुए 1993 के चुनाव और फिर 2002 में भी विधायकी उनके खाते में आई. 2002 से 2003 के बीच वह माया की कैबिनेट में ग्राम विकास मंत्री रहे. 2012  में वह चौथी बार विधायक बने थे. तीन बार सामान्य सीट से जीतने वाले दिनकर संसदीय मामलों के जानकार बताए जाते हैं.

अपनी बयानबाजी से दिनकर कई बार पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर चुके हैं. बीएसपी में महिलाओं को कम टिकट क्यों दिए जाते हैं, इस सवाल के जवाब में दिनकर ने कहा था कि बहुजन समाज की महिलाएं पढ़ी-लिखी नहीं हैं और दूसरे वर्ग की महिलाओं से बीएसपी को कोई फायदा नहीं होता है, इसीलिए बीएसपी में महिलाओं को कम टिकट दिए जाते हैं.

बीएसपी के दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ गयाचरण
बीएसपी के दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ गयाचरण

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