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बाबरी विध्वंस केस : BJP के जिन बड़े नेताओं के खिलाफ CBI ने जांच की थी, उसका क्या हुआ?

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6 दिसंबर, 1992. इतिहास की वो तारीख, जब अयोध्या में कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद ढहा दी. इसी दिन राम जन्मभूमि पुलिस थाने में दो एफआईआर दर्ज हुईं. एफआईआर नंबर 197 और एफआईआर नंबर 198. एफआईआर नंबर 197 अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ हुई थी, जबकि एफआईआर नंबर 198 में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, अशोक सिंघल, विष्णु हरि डालमिया, गिरिराज किशोर, विनय कटियार और साध्वी ऋतंभरा के नाम थे.

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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

तो अयोध्या के भूमि विवाद के चर्चे तो बहुत आ रहे, लेकिन इस सीबीआई कोर्ट के केस में क्या हुआ, जिसमें भाजपा, संघ और विहिप के बड़े-बड़े नेता नामज़द हैं.

 एफआईआर नंबर 198 में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, अशोक सिंघल, विष्णु हरि डालमिया, गिरिराज किशोर, विनय कटियार और साध्वी ऋतंभरा के नाम थे.
एफआईआर नंबर 198 में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, अशोक सिंघल, विष्णु हरि डालमिया, गिरिराज किशोर, विनय कटियार और साध्वी ऋतंभरा के नाम थे.

एफआईआर दर्ज होने के 10 दिनों के बाद 16 दिसंबर, 1998 को एफआईआर नंबर 198 को ललितपुर की स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया. इन सभी को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर ललितपुर की जेल में बंद कर दिया गया और वहां से कोर्ट में पेश किया. 27 फरवरी, 1993 को उत्तर प्रदेश की सीबी-सीआईडी ने एफआईआर नंबर 198 के आरोपियों लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और छह दूसरे लोगों के खिलाफ ललितपुर की स्पेशल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी. इसमें आडवाणी और जोशी समेत पांच दूसरे लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147 (दंगा), 149 (गैरकानूनी तरीके से भीड़ इकट्ठा करना), 153 A (दो समुदायों के बीच धार्मिक उन्माद फैलाना), 153 B (देश की एकता के लिए खतरा पैदा करना) और 505 (लोगों को भड़काना) के तहत चार्ज फ्रेम किए गए थे.

फिर 6 जून, 1993 को उत्तर प्रदेश सरकार ने इस केस को ललितपुर से रायबरेली ट्रांसफर कर दिया. 25 अगस्त, 1993 को इस केस में सीबीआई की एंट्री हुई. इस दिन उत्तर प्रदेश सरकार ने दो नोटिफिकेशन जारी किए. पहले में ये था कि अब मामले की जांच सीबी-सीआईडी नहीं, सीबीआई करेगी. और दूसरे में सरकार ने सीबीआई से कहा था कि वो मीडियाकर्मियों पर हुए हमले में दर्ज हुईं दूसरी 47 एफआईआर पर भी अपना काम शुरू करे. अगले ही दिन केंद्र सरकार ने दोनों केसों यानी कि एफआईआर नंबर 198 और दूसरी 47 एफआईआर की जांच सीबीआई को करने की मंजूरी दे दी.

10 सितंबर, 1993 से सीबीआई ने केस अपने हाथ में ले लिया था.
10 सितंबर, 1993 से सीबीआई ने केस अपने हाथ में ले लिया था.

कुछ ही दिनों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से संपर्क किया और फिर लखनऊ में एक स्पेशल कोर्ट बना दी, ताकि सीबीआई इस मामले को लखनऊ में दाखिल कर सके. 8 सितंबर, 1993 को लखनऊ में इस कोर्ट को बनाने की मंजूरी मिल गई. 10 सितंबर, 1993 को सीबीआई ने रायबरेली कोर्ट से एफआईआर नंबर 198 की तफ्तीश की मंजूरी मांगी. कोर्ट ने मंजूरी दे दी. इसके बाद सीबीआई ने सबूत खंगालने शुरू किए. प्रत्यक्षदर्शियों के बयान रिकॉर्ड किए गए, फुटेज खंगाली गई, स्टेटमेंट रिकॉर्ड किए गए और फिर कानून के जानकारों के साथ मिलकर सभी सबूतों को आधार बनाकर आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120 बी और जोड़ दी गई. ये धारा आपराधिक षड्यंत्रों से जुड़ी है. इसके अलावा सीबीआई ने इस केस में कुछ और महत्वपूर्ण लोगों के नाम शामिल कर लिए. सीबीआई ने अपनी एफआईआर में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, वीएच डालमिया और गिरिराज किशोर के अलावा बाल ठाकरे, कल्याण सिंह, मोरेश्वर सवे, पवन कुमार पांडेय, जय भगवान गोयल, फैजाबाद के तत्कालीन डीएम आनंद श्रीवास्तव, तत्कालीन एसपी डीबी राय और 26 दूसरे लोगों के नाम शामिल कर लिए.

अयोध्या में बीजेपी और विहिप नेताओं ने शिलान्यास भी किया था.
अयोध्या में बीजेपी और विहिप नेताओं ने शिलान्यास भी किया था.

सभी 49 केसों में सप्लिमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर दी. 9 सितंबर, 1997 को सीबीआई के स्पेशल जज ने सीबीआई की ओर से दाखिल चार्जशीट के आधार पर सभी 49 लोगों के खिलाफ आरोप तय कर दिए गए. इन 49 आरोपियों में से 33 आरोपियों ने तो इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में चार अलग-अलग रिव्यू पिटिशन दाखिल की, लेकिन लाल कृष्ण आडवाणी ने रिव्यू पिटिशन फाइल नहीं किया. 12 फरवरी, 2001 को हाई कोर्ट ने सभी 33 लोगों का रिव्यू पिटिशन स्वीकार कर लिया. 4 मई, 2001 को सीबीआई की ट्रायल कोर्ट ने 49 आरोपियों में से 26 लोगों के खिलाफ केस चलाने की मंजूरी दे दी. बचे हुए लोगों में विजय राजे सिंधिया की मौत हो गई थी, बचे हुए लोग हाई कोर्ट से स्टे ऑर्डर लेकर आ गए थे.

24 जुलाई, 2001 को ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया. मोहम्मद असलम भूरे नाम का एक आदमी हाई कोर्ट के 12 फरवरी के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. 20 अगस्त, 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार और सीबीआई को भूरे के एफिडेविट का काउंटर एफिडेविट पेश करने का आदेश दे दिया. 19 नवंबर, 2001 को पत्रकार कुलदीप नैयर और चार दूसरे लोगों ने 21 आरोपियों के खिलाफ केस न चलाने वाले हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी. 29 नवंबर, 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एफआईआर नंबर 198 का ट्रायल रायबरेली की स्पेशल कोर्ट में ही होगा. मार्च, 2003 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दाखिल हुआ. 30 मई, 2003 को सीबीआई ने रायबरेली कोर्ट में सप्लिमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर दी, जिसमें आडवाणी, जोशी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार और अशोक सिंघल के नाम थे. लेकिन सीबीआई ने इन सबपर से आपराधिक षड्यंत्र की धारा 120 बी हटा दी थी.

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है.
सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या टाइटल सूट की सुनवाई पूरी हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने ही बाबरी विध्वंस मामले का केस सीबीआई कोर्ट को जल्दी पूरा करने का आदेश दिया है.

5 जुलाई, 2003 को स्पेशल जज वीके सिंह के सामने सीबीआई के जज एसएस गांधी ने दलीलें देनी शुरू कीं. इसमें उन्होंने वीडियो फुटेज के जरिए आडवाणी और दूसरे लोगों को बरी करता हुआ दिखाया. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि केंद्र में बीजेपी की सरकार है, इसलिए बीजेपी के नेताओं को बचाया जा रहा है. अभी ये सब हो ही रहा था कि 7 अगस्त, 2003 को मोहम्मद असलम भूरे फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. और कहा कि सीबीआई ने जो सप्लिमेंट्री चार्जशीट दाखिल की है, वो गलत है. ये चार्जशीट आडवाणी और सात दूसरे लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है. 1 सितंबर, 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने आडवाणी और दूसरे लोगों को इस याचिका की सुनवाई करते हुए नोटिस जारी कर दिया. 19 सितंबर, 2003 को स्पेशल कोर्ट के जज वीके सिंह ने मुरली मनोहर जोशी और दूसरे लोगों पर 147 (दंगा), 149 (गैरकानूनी तरीके से भीड़ इकट्ठा करना), 153 A (दो समुदायों के बीच धार्मिक उन्माद फैलाना), 153 B (देश की एकता के लिए खतरा पैदा करना) और 505 (लोगों को भड़काना) के तहत चार्ज फ्रेम कर दिए, लेकिन लाल कृष्ण आडवाणी को बरी कर दिया.

स्पेशल जज ने आडवाणी को बरी कर दिया था. वहीं अशोक सिंघल की मौत हो चुकी है. अब इस मामले में फैसला आना बाकी है.
स्पेशल जज ने आडवाणी को बरी कर दिया था. वहीं अशोक सिंघल की मौत हो चुकी है. अब इस मामले में फैसला आना बाकी है.

इसके बाद सीबीआई ने फिर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की. 19 अप्रैल, 2017 को आदेश दिया. कहा कि सभी आरोपियों के खिलाफ केस चलाया जाए और दो साल के अंदर सुनवाई पूरी कर ली जाए. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि एफआईआर नंबर 197 की सुनवाई भी इसी के साथ पूरी की जाए. इस आदेश के दौरान कल्याण सिंह राज्यपाल बन गए थे, तो उनके खिलाफ केस नहीं चल सकता था. वहीं इस केस के तीन आरोपियों गिरिराज किशोर, अशोक सिंघल और विष्णु हरि डालमिया की मौत हो चुकी थी, तो उनके खिलाफ भी कोई केस नहीं बनता था. फिलहाल लखनऊ की स्पेशल सीबीआई कोर्ट में इस मामले का ट्रायल चल रहा है. कल्याण सिंह भी अब राज्यपाल नहीं रहे हैं, तो सीबीआई ने उनके खिलाफ भी केस चलाने की परमिशन ले ली है और कल्याण सिंह को समन किया जा चुका है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश ये भी दिया है कि जब तक इस मामले में फैसला नहीं आ जाता, सीबीआई कोर्ट के स्पेशल जज एसके यादव का कार्यकाल जारी रहेगा. जस्टिस एसके यादव का कार्यकाल 30 सितंबर, 2019 को पूरा हो गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जस्टिस एसके यादव का कार्यकाल बढ़ा दिया गया है और इस मामले की सुनवाई चल रही है. इसका फैसला कब तक आएगा, नहीं पता. लेकिन सुप्रीम कोर्ट टाइटल केस का फैसला 9 नवंबर को सुनाने वाला है.


अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दिन के पीछे की क्या गणित है?

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