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राम तो राम हैं, फिर अयोध्या विवाद में रामलला का नाम ही क्यों आता है?

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राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद. 134 साल पुराना ज़मीन विवाद. इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है. सुप्रीम कोर्ट ने विवादित ज़मीन सरकार को सौंप दी है और मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने के निर्देश दिए हैं. साथ ही मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही किसी और जगह पर 5 एकड़ ज़मीन देने का फैसला दिया है.

अयोध्या की 2.77 एकड़ ज़मीन पर विवाद था. इसके तीन दावेदार थे. रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ़ बोर्ड.

इस मामले में शुरुआत से ही दलील दी जाती रही है कि अयोध्या में राम का मंदिर था जिसे तुड़वाकर बाबर ने मस्जिद बनवाई थी. हालांकि, मस्जिद बाबर ने नहीं, उनकी सेना के एक जनरल मीर बाक़ी ने बनवाई थी.

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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

दावा था- राम का मंदिर तोड़ा गया. उसके बाद उसी जगह पर बाबरी मस्जिद बनी.

लेकिन जब भी हम अयोध्या विवाद के बारे में पढ़ते-सुनते हैं तो राम मंदिर से ज्यादा रामलला का जिक्र आता है. राम तो राम हैं. भगवान राम, जिनके मंदिर की जमीन को लेकर विवाद था. ऐसे में राम के साथ ‘लला’ शब्द कैसे ज़ुड़ गया?

पहले समझ लेते हैं लला शब्द का मतलब क्या होता है?

अजीत वडनेरकर वरिष्ठ पत्रकार हैं. 28 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. शब्दों का सफर नाम का ब्लॉग चलाते हैं, जिसमें वो शब्दों की शुरुआत, उनके मतलब बताते हैं. राजकमल प्रकाशन शब्दों का सफर पर तीन किताबें प्रकाशित कर चुका है. अपने ब्लॉग में लाल, लल्ला शब्द के बारे में वडनेरकर ने लिखा है,

‘संस्कृत की लल् धातु में लगाव, जुड़ाव और वात्सल्य का भाव है. बच्चों के लिए लाल, लाली जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं. लल् धातु में मूलतः क्रीड़ा, खेल, इठलाना, अठखेलियां करना आदि अर्थ छुपे हैं. पुचकारना, प्यार करना, चूमना, आलिंगन करना जैसे भाव भी इसमें हैं जो वात्सल्य से जुड़ते हैं. लाल शब्द का अभिप्राय संतान और खासतौर पर पुत्र भी होता है. संतान के अर्थ में ही लल्ला, लल्ली, लल्लन जैसे शब्द इसी मूल से उपजे हैं, जिनसे लाड़ किया जाता है.’

लल्ला शब्द से आया है लला शब्द. हिंदी भाषी क्षेत्रों में छोटे लड़कों को अक्सर लला, लल्ला कहकर संबोधित किया जाता है. लोगों के नाम के आगे भी लाल शब्द जोड़ा जाता है.

अब लौटते हैं रामलला पर.

इस मामले में राम के नाम के साथ लला कैसे जुड़ गया? ये समझने के लिए हमें जाना होगा 1949 में. तब बाबरी मस्जिद वहां हुआ करती थी. 22 दिसंबर की रात मस्जिद के गुम्बद के ठीक नीचे राम की प्रतिमा रख दी गई. ये प्रतिमा राम के बाल रूप की थी. अगली सुबह पूरे इलाके में खबर फैला दी गई कि राम लला प्रकट हुए हैं. मूर्ति रखने वाले चूंकि गुंबद के नीचे राम के जन्म की बात को बल देना चाहते थे, उन्होंने राम के साथ ‘लला’ लगाया. संदेश ये कि ‘प्रकट’ हुए राम छोटे बालक हैं, लला हैं.

अब प्रतिमा मस्जिद से निकाली जाए, या न निकाली जाए. इस पर खासा विवाद हुआ. प्रतिमा मस्जिद में ही रही. साल बीतते रहे, केस चलता रहा. कि जिस जमीन पर मस्जिद बना है वो राम की जन्मभूमि है. और जमीन के मालिक राम हैं. मामला फैज़ाबाद हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा. 1987 में.

1989 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई. रिटायरमेंट के बाद अग्रवाल विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष बन गए थे. याचिका में उन्होंने मांग की कि अयोध्या विवाद से जुड़े मामलों में उन्हें रामलला के दोस्त के रूप में शामिल किया जाए. हाईकोर्ट ने उनकी बात मान ली.

अयोध्या मामले में फैसला आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के बाहर कुछ ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जो सुकून देता है कि शांति बनी रहेगी.
अयोध्या मामले में फैसला आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के बाहर कुछ ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जो सुकून देता है कि शांति बनी रहेगी.

अब सवाल ये उठता है कि राम जो कि खुद भगवान हैं उन्हें अपने प्रतिनिधि की जरूरत क्यों पड़ी? क्योंकि 1949 में राम नहीं रामलला प्रकट हुए थे. लला मतलब बच्चे, बालक, अवयस्क. और अदालत में कोई अवयस्क तभी केस लड़ सकता है जब कोई वयस्क उसके गार्जियन के तौर पर कोर्ट में मौजूद हो. ऐसे में इतने साल से भगवान राम नहीं, राम लला केस लड़ रहे हैं, अपनी जन्मभूमि के लिए. और कानूनी तौर पर विश्व हिंदू परिषद उनका गार्जियन है.

अग्रवाल की मौत के बाद 2002 में VHP के ही टीपी वर्मा को रामलला का प्रतिनिधि बनाया गया. उनके बाद त्रिलोकीनाथ पांडे रामलला के प्रतिनिधि बनाए गए जो अभी तक कोर्ट में रामलला की तरफ से मौजूद रहते आए हैं.

इसीलिए अयोध्या विवाद से जुड़ी खबरों में हमें राम मंदिर से ज्यादा राम जन्मभूमि और भगवान राम से ज्यादा रामलला पढ़ने-सुनने को मिलता है.


वीडियो– अयोध्या पर राम मंदिर के पक्ष में फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के 5 जज ये हैं

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