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अयोध्या से पहले यहां ट्रस्ट बनाकर मंदिर बनवाया गया था

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अयोध्या भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने फैसला सुना दिया है. इस फैसले में पांचो जज- CJI रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, और जस्टिस एसए नज़ीर एकमत रहे हैं. Ayodhya Verdict के अनुसार विवादित ज़मीन पर रामलला विराजमान का हक है. अदालत ने केंद्र से मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाने को कहा है. इसके अलावा अयोध्या में ही किसी और जगह पर मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ ज़मीन देने के आदेश भी हुए हैं.

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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीनों के भीतर एक बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टी बनाने को कहा है. ट्रस्ट का काम होगा मंदिर का निर्माण और मंदिर की देखरेख. कोर्ट ने ये भी साफ़ किया है कि इस ट्रस्ट में मामले के तीसरे पक्ष निर्मोही अखाड़े को भी रखा जाएगा. ट्रस्ट के निर्माण तक सारे अधिकार केंद्र के पास रहेंगे. अयोध्या एक्ट 1993 के तहत चैप्टर 2 सेक्शन 6 ये कहता है कि केंद्र सरकार अगर चाहे तो अपनी शर्तों पर प्रबंधन की ज़िम्मेदारी किसी ट्रस्ट को दे सकती है.

लेकिन जिस तर्ज पर अयोध्या का ये मंदिर बनाने की बात हो रही है, ये कोई नयी व्यवस्था नहीं है. गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का ट्रस्ट भी इसी तरह बना और कार्यरत है. तो क्या है ये ट्रस्ट का चक्कर, जिसके तहत अयोध्या में मंदिर का निर्माण किया जाने की योजना है.

सोमनाथ मंदिर का इतिहास जान लीजिए पहले

दंतकथाएं कहती हैं कि सोमनाथ मंदिर सबसे पहली बार भगवान चंद्रदेव ने खुद बनाया था. माने चंदा मामा ने. पूरी तरह सोने से. सोमनाथ मंदिर अपनी संपन्नता के चलते आक्रमणकारियों के निशाने पर रहा. 1026 में महमूद गज़नी भारत आया. सोमनाथ मंदिर पर हमला किया. लूटपाट हुई. मालवा के परमार राजा भोज और गुजरात के सोलंकी राजा भीम ने उसे फिर से बनवाया. आखिरी हमला मुग़ल शासक औरंगजेब का. 1706 में.

आजादी के बाद बंटवारा हुआ. सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की बात चली. सरदार पटेल और केएम मुंशी महात्मा गांधी के पास गए. कहा, उसी स्थल पर मंदिर बनवाना चाहते हैं. गांधी ने कहा कि मंदिर को दुबारा बनवाने में सरकारी पैसा खर्च नहीं होना चाहिए. जनता भले ही मिलजुलकर जीर्णोद्धार के लिए पैसे इकठ्ठा कर ले. कुछ होता, उससे पहले ही गांधी और पटेल दोनों की मृत्यु हो गयी. केएम मुंशी ने मंदिर के जीर्णोद्धार का जिम्मा उठाया.

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सोमनाथ मंदिर (तस्वीर: विकिमीडिया कॉमन्स)

लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु मंदिर निर्माण से सरकार को दूर रखना चाहते थे. उनका मानना था एक बड़े हिंदू मंदिर को बनवाने में सरकार का हस्तक्षेप भारत की आधुनिक धर्मनिरपेक्ष छवि के विपरीत होगा. लिहाजा केएम मुंशी ने नया रास्ता निकाला. बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट (1950) के तहत इस मंदिर की देखभाल के लिए ट्रस्ट बनाया गया, ताकि सरकार धर्म के मामलों से खुद को दूर रख सके. उस समय गुजरात बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा था. जहां मंदिर हुआ करता था वहां से उसके भग्नावशेष हटाकर उसका पुनर्निर्माण किया गया. साल था 1951. तब से यह ट्रस्ट सोमनाथ मंदिर की देखभाल कर रहा है.

क्या है सोमनाथ मंदिर के ट्रस्ट का लेखा-जोखा?

# ये आठ सदस्यों का ट्रस्टी बोर्ड है. इस वक़्त सात सदस्य हैं. इनमें शामिल हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल, लालकृष्ण आडवाणी, गृहमंत्री अमित शाह, हर्षवर्धन नेवतिया, पीके लहेरी, जी डी परमार. ये सारे लोग ट्रस्ट में व्यक्तिगत क्षमता में शामिल हैं.

# एक चेयरमैन और एक सेक्रेटरी का पद होता है. चेयरमैन पद के लिए सभी सदस्य मिलकर हर साल वोट करते हैं. इस वक़्त केशुभाई पटेल हैं.

# इनमें से चार सदस्य राज्य सरकार नॉमिनेट करती है, और चार केंद्र सरकार.

# इस ट्रस्ट के सदस्यों की सदस्यता आजीवन है, अगर वे स्वेच्छा से इस्तीफ़ा न दें या फिर उन्हें बोर्ड खुद न हटा दे, तो.

# श्री सोमनाथ ट्रस्ट ही प्रभास पाटन में मौजूद दूसरे 64 मंदिरों का प्रबंधन देखता है. और इसके अलावा ट्रस्ट के पास 2,000 एकड़ जमीन भी है.

श्री सोमनाथ ट्रस्ट चंदा इकट्ठा करता है. इस आवक के लिए कर नहीं चुकाना होता. सरकार भले ट्रस्ट में सदस्यों को मनोनीत करती हो, लेकिन वो ट्रस्ट के काम में दखल नहीं कर सकती. ट्रस्ट अपना पैसा भी अपने विवेक से ही खर्च करता है.

अयोध्या में मंदिर बनाए जाने के लिए जिस ट्रस्ट को जिम्मेदारी दी जाएगी, उसमें कितने मेंबर होंगे और क्या ढांचा होगा, ये सब तय करने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी. कयास लगाए जा रहे हैं कि इस ट्रस्ट का ढांचा सोमनाथ ट्रस्ट से मिलता-जुलता हो सकता है.


वीडियो: राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 9 नवंबर को 

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