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अयोध्या: शिया 24,964 दिन लेट पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, इसलिए ख़ारिज हुआ दावा

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9 नवंबर, 2019 को अयोध्या मामले का फैसला आया सुप्रीम कोर्ट में. पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से फैसला दिया. विवादित ज़मीन पर रामलला का दावा माना गया. ये ज़मीन केंद्र सरकार के मार्फ़त राम मंदिर के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट को दी जाएगी. कोर्ट ने तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया है. इस केस में शिया वक़्फ बोर्ड भी पार्टी बनना चाहता था. उसकी याचिका को अदालत ने ख़ारिज़ कर दिया. इसका आधार ये बताया गया कि शिया वक़्फ बोर्ड ने अपनी याचिका डालने में देर कर दी. देर मतलब बहुत देर. कुल 24,964 दिनों की देरी.

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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

क्या लिखा है सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिए गए अपने एक पन्ने के आदेश में कहा-

30 मार्च, 1946 को फ़ैजाबाद के सिविल जज द्वारा दिए गए निर्णायक फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश की शिया वक़्फ बोर्ड ने जो स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की, उसमें 24,964 दिनों की असामान्य देरी हुई. इस विलंब का कारण उचित तरीके से स्प्षट भी नहीं किया गया. ऐसे में ये स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) डिसमिस की जाती है.

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इस आदेश के नीचे 9 नवंबर, 2019 की तारीख हैं. सुप्रीम कोर्ट की बेंच का हिस्सा रहे पांचों जजों- CJI रंजन गोगोई, जस्टिस SA बोबड़े, जस्टिस धनंजय चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर का नाम है इस ऑर्डर पर. फैसले के ऊपर SLP (सिविल) का नंबर दर्ज़ है- 22744/2017. याचिकाकर्ता के नाम की जगह लिखा है UP शिया सेंट्रल बोर्ड ऑफ वक़्फ. रेस्पॉन्डेंट के नाम की जगह है सुन्नी सेंट्रल बोर्ड ऑफ वक़्फ.

ये सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का टेक्स्ट है, जिसमें उत्तर प्रदेश शिया वक़्फ बोर्ड की अपील को ख़ारिज कर दिया गया.
ये सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का टेक्स्ट है, जिसमें उत्तर प्रदेश शिया वक़्फ बोर्ड की अपील को ख़ारिज कर दिया गया.

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क्या है ये SLP?
ये स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) क्या होता है, जिसके अंतर्गत ये याचिका दायर हुई थी? ये समझने के लिए हमने बात की विजया लक्ष्मी से. जो कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में एडवोकेट हैं. उन्होंने बताया कि हाई कोर्ट का कोई ऑर्डर, जिसे आप सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हैं वो SLP के अंतर्गत फाइल होती है. ये कोर्ट की ‘अपीलेट ज्यूरिस्डिक्शन’ है, जो कि आर्टिकल 136 के अंदर दायर की जाती है. अगर ये मंज़ूर होती है, तो मतलब कि कोर्ट में आपकी SLP ग्रांट हो गई. ग्रांट होने के बाद केस के नेचर को देखते हुए तय होता है कि SLP सिविल अपील है कि क्रिमिनल अपील. चूंकि अयोध्या केस का ये मामला ज़मीन विवाद का था, ऐसे में यहां SLP सिविल थी.

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रिट पिटीशन क्या होता है?
SLP के अलावा भी एक तरीका है अपील का. रिट पिटीशन. ये डायरेक्ट याचिका होती है. कोर्ट का ऑरिजनल ज्यूरिस्डिक्शन. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, दोनों जगहों पर फाइल होती है. अगर कई स्टेट्स का मामला है, तो सीधे सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर सकते हैं. लेकिन अगर किसी विशेष राज्य से जुड़ा है, तो बेस्ट प्रैक्टिस होती है पहले हाई कोर्ट में जाना. होने को तो सीधे सुप्रीम कोर्ट में भी रिट पिटीशन दाखिल करने का कानून है. लेकिन माना जाता है कि पहले हाई कोर्ट में अपील कीजिए. अगर वहां डिसमिस हो जाती है या एंटरटेन नहीं की जाती, तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचिए.

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शिया वक़्फ बोर्ड ने क्या दावा किया? कब किया?
बाबरी मस्जिद का निर्माण बाबर की सेना के एक जनरल ने करवाया था. नाम था मीर बाक़ी ताशकंदी. बताया जाता है कि बाबर को खुश करने के लिए मीर बाक़ी ने मस्जिद का नाम बाबर के नाम पर रख दिया था. मीर बाक़ी शिया मुसलमान थे. इस वजह से शिया वक्फ बोर्ड ने फ़ैजाबाद सिविल कोर्ट में अपील की. इनका कहना था कि बाबरी मस्जिद पर इनका दावा बनता है. मगर शिया बोर्ड की ये अपील 1946 में ख़ारिज हो गई. बाबरी मस्जिद के ऊपर सुन्नी वक़्फ बोर्ड का अधिकार माना गया. इसके बाद 1950 में गोपाल सिंह विषारद की याचिका के साथ अयोध्या की उस विवादित ज़मीन पर नया कानूनी मसला शुरू हुआ. ये केस निचली अदालत से बढ़कर इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा. फिर सुप्रीम कोर्ट. और 1946 के बाद साल 2017 में आकर शिया वक़्फ बोर्ड पहुंचा सुप्रीम कोर्ट. फिर से ये दावा करने कि बाबरी मस्जिद सुन्नी वक़्फ बोर्ड नहीं, बल्कि शिया वक़्फ बोर्ड की है.


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