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औरंगज़ेब, जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ता था और भाइयों का गला काट देता था

(ये आर्टिकल ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है)


एक साहब बता रहे थे कि औरंगज़ेब कितना सेक्युलर था, कितने मंदिरों के लिए उसने ज़मीनें दान में दी. कितने मंदिर बनवाए. वो हर कहीं से घुमा-फिरा के इस बात को साबित करना चाह रहे थे कि औरंगज़ेब से बड़ा सेक्युलर शायद ही कोई बादशाह हुआ हो हिंदुस्तान में.

उन साहब से जब मैंने अकबर के बारे में पूछा तो अकबर को भला-बुरा बोलने लगे. कहने लगे कि वो तो  ‘नौज़्बिल्लाह’ अपने आपको पैगंबर समझने लगा था. दूसरा धर्म ही चला दिया था.

मैंने पूछा, “वो सेक्युलर था कि नहीं आपकी नज़र में?”

कहने लगे, “नहीं, वो सेक्युलर नहीं था, ढोंगी था.”

मैं सोच में पड़ गया कि किस हिसाब से औरंगज़ेब इनके लिए धर्मनिरपेक्ष है और अकबर ढोंगी. औरंगज़ेब जिसने अपने भाइयों को गद्दी के लिए मौत के घाट उतार दिया. और उम्र भर इस्लाम के नाम पर कट्टरता को ओढ़े रहा. उसे ये भाई साहब किस मजबूरी से सेक्युलर बनाने पर तुले हैं? और ये ही नहीं, जाने कितने लोग हैं, जो औरंगज़ेब को सेक्युलर साबित करने में जी तोड़ मेहनत करते हैं. क्या वजह है ऐसा करने की?

एक बात का ध्यान हम सबको रखना चाहिए. वो ये कि हम जैसे होते हैं भीतर से, बाहर से उसी तरह के इंसान को अपना आदर्श बनाने की कोशिश करते हैं. औरंगज़ेब को सेक्युलर साबित करने में वही लोग जी जान लगाए रहते हैं जिनकी सोच ‘औरंगज़ेब’ के आसपास ही होती है. जिनका आदर्श इस ढोंग से परिपूर्ण होता है. जो ये कहता है कि बादशाह होते हुए ‘टोपी’ बुन के अपनी जीविका चलाओ, खूब नमाज़ पढ़ो, ख़ूब योगा करो, मगर राजगद्दी के लिए लोगों का खून बहाने से डरो मत. अपने भाई का गला काट दो.

दारा शिकोह, वो शख्स जो अगर हिंदुस्तान का तख़्त संभालता तो शायद सूरतेहाल कुछ जुदा होती.
दारा शिकोह, वो शख्स जो अगर हिंदुस्तान का तख़्त संभालता तो शायद सूरतेहाल कुछ जुदा होती.

इसे धर्मनिरपेक्षता नहीं कहते हैं और इसे आप किसी भी समझदार इंसान के सामने साबित नहीं कर पाएंगे. कोई समझदार जब-जब आपसे इस पर तर्क करेगा तो आप धराशायी हो जाएंगे. औरंगज़ेब को सेक्युलर बताना वैसा ही है, जैसे हिटलर और मुसोलिनी को आदर्श पुरुष साबित किया जाए. कुछ लोग हैं जो ये भी कहने से नहीं हिचकिचाते हैं कि हिटलर का ह्रदय बहुत प्रेमपूर्ण था और वो अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था. ये बात कहकर वो ये साबित करते हैं कि हिटलर के ह्रदय में प्रेम भरा था. ये कुतर्क है और कुतर्क की कोई सीमा नहीं होती है.

ऐसे ही सेक्युलर लोग कहीं फंसते हैं और उनसे कोई ये कह देता है कि मुसलमान सेक्युलर नहीं होते हैं. फिर वो परेशान हो कर असली सेक्युलर मुसलमानों का उदाहरण देना शुरू कर देते हैं. वो झल्ला कर बताएंगे आपको कि देखिए उस्ताद बिस्मिल्लाह खां कैसे गंगा किनारे बैठकर शहनाई बजाते थे. उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, शाहरुख़ खान, सलमान खान, अब्दुल कलाम साहब आदि-आदि.

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान.
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान.

और जिन्हें ये अब सेक्युलर मुसलमान बता रहे होते हैं, उन्हें दरअसल ये पीठ पीछे गाली देते हैं. जैसे अकबर को देते हैं. मगर इनकी अंतरात्मा जानती होती है कि असल सेक्युलर कौन होता है. फिर भी औरंगज़ेब को फ़र्ज़ी सेक्युलर बनाने में अपनी जी जान लगा देते हैं. क्योंकि इन्हें अपने को भी सेक्युलर साबित करना होता है. जबकि ये जानते हैं भीतर से कि ये कहीं से कहीं तक सेक्युलर नहीं हैं.

असल धर्मनिरपेक्ष कौन होता है, धर्मनिरपेक्षता के हमारे क्या आदर्श होने चाहिए, ये हमें और आपको भली भांति पता है. नमाज़ पढ़ना और फिर दूसरे की पूजा को भी उसी इज़्ज़त से देखना धर्मनिरपेक्षता है. जो अपने को ही सर्वोपरि न समझे उसे धर्मनिरपेक्ष कहते हैं. बिस्मिल्लाह खान की गंगा किनारे शहनाई और अब्दुल कलाम का किसी हिन्दू संत के चरणों में बैठना धर्मनिरपेक्षता होती है.

इसे आप चाटुकारिता और जाने क्या-क्या नाम देते हैं, मगर ये असल सेकुलरिज़्म है. अकबर का जोधा को धर्मपरिवर्तन के लिए बाध्य न करना और जन्माष्टमी में उसके साथ बैठ के कृष्ण का पालना झुलाना धर्मनिरपेक्षता है. शाहरुख़ खान का अपनी पत्नी को उसके धर्म के साथ स्वीकार करना, पूजा घर में गीता के साथ क़ुरान रखना, अपने बच्चों को पूजा और नमाज़ दोनों के लिए प्रेरित करना, दोनों की समान रूप से इज़्ज़त करवाना धर्मनिरपेक्षता कहलाती है.

संत के चरणों में अब्दुल कलाम.
संत के चरणों में अब्दुल कलाम.

आपको किसी के धर्म से कोई परेशानी न हो और किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति को आप उसका धर्म मानने दें, इसे धर्मनिरपेक्ष होना नहीं कहते हैं, इसे सहिष्णु होना बोलते हैं. औरंगज़ेब सहिष्णु भी अगर था, तो वो भी मजबूरियों में था. दाराशिकोह का दूसरे धर्मों में रुचि लेना, उसे फूटी आंख न भाता था. पूरा कलमा न पढ़ने पर सूफ़ी सरमद का सर क़लम कर देना बताता है कि औरंगज़ेब किस जूनून की हद तक कट्टर था. अगर आप उसे सपोर्ट करते हैं तो इसका मतलब यही निकलता है कि आप उसकी इन धर्मांध करतूतों को भी अपना मौन समर्थन देते हैं. आप उसी जैसे सेक्युलर हैं और उसी जैसे सेक्युलर बने रहना चाहते हैं.


20196805_10213145238562576_712062070_nताबिश फेसबुक पर बहुत फेमस हैं. आसपास के कट्टर धार्मिक विचारधारा वाले लोगों के निशाने पर रहते हैं. फेसबुक पर फॉलोअर्स और विरोधक समान मात्रा में हैं इनके. 


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