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ब्रेकअप के ऐन पहले मिली जब, तो चिट्ठियों संग आवाज भी दे दी

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यादों को याद करने का एक तरीका ये भी है. उसकी धोती का एक किनारा फाड़ लो. बाकी हवा में उड़ा दो. जो बचे, उसे पेड़ पर बांध लो. इस दिमागी दरख्त की शाखें बहरूपिया हैं. कभी हारमोनियम, कभी वायलिन, कभी तबला तो कभी सेक्सोफोन. जब जो बन पड़े बन जाती हैं. और जो कत्थई खाल है. वे बोल हैं. आवाजों की देह में जीते.

हम लोगों को, उनके साथ बिताए वक्त को, एक गाने को तोता बना बसा देते हैं. जब वो नजर की परिधि में आता है. हमें अपनी जान झलक मारती दिखती है. बीते दिनों की जिंदगी कभी यूं भी जिंदा होने का भरम देती है. याद आती है. याद.

मेरा एक यार है. वय में कुछ बुजुर्ग. मुझसे. वैसे तो हम दोनों ही उस तरफ के लोग होने को हैं. खैर.

प्रभात रंजन
प्रभात रंजन

प्रभात रंजन नाम है. किस्सागो है. या कि एक तारुफ ये भी कि कोठागोई का लेखक है. मैं इधर कुछ दिनों से उनसे कहने लगा हूं. जब आप मरेंगे तो यही हेडिंग लगेगी. कोठागोई वाला प्रभात मर गया. वो हंस देते हैं.

हम हसीन हंसी वाले लोग (उफ ये काइयां आत्ममुग्धता सेल्फी युग की) आपके लिए एक तोहफा लाए हैं.

कैसेट के कान.

यही नाम धरा है हमने अपनी ललमुनिया का.

इसे लिखेंगे प्रभात. कैसेट के दौर में जो जवान हुए थे. सीडी और बाद के दौर में भी हरियाए रहे. पर गोदना तो उसी दौर में हुआ था न.

कैसेट के कान में आप कोई एक गाना सुनेंगे. प्रभात वेला में. रंजन के लिए. रोजाना.

पर सिर्फ गाना भर नहीं. उसे जिस्म देने वाली याद भी.  कहानी भी.

कभी कोई और आशिक भी इस बजरे में भजन गा सकता है गोकि. पर उसके लिए मांझी को मनाना होगा.

– सौरभ द्विवेदी

कभी यूं भी आ मेरी आंख में

प्रभात रंजन
जयपुर से आ गया हूँ. दिल लेकर गया था, लिए वापस आ गया.
जयपुर में मेरे दिल के सोज़ की आवाज है. वहां अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन रहते हैं. जयपुर के कवि-मित्र प्रेमचंद गाँधी का स्थायी वादा साथ रहता है कि आइये इस बार एक शाम हुसैन बंधु से आपकी मुलाकात करवाऊंगा. दिल में इस बात की उम्मीद रहती है कि इस बार जाऊँगा और उनसे इसरार करूँगा कि वे बशीर बद्र की वे ग़ज़ल सुना दें जिसे मैं कभी भूला ही नहीं-

‘कभी यूँ भी आ मेरी आँख में
कि मेरी नज़र को खबर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे
मगर उसके बाद सहर न हो…’

जब भी हुसैन बन्धु की आवाज में यह ग़ज़ल सुनता हूँ. 1993-94-95 के उस दौर में चला जाता हूँ, हिन्दू कॉलेज होस्टल के दिन और उसके बाद शायद मानसरोवर होस्टल के दिन थे. वे एचएमवी, वीनस, टी सीरिज, युनिवर्सल के कैसेट के दिन थे, विडियोकॉन और बीपीएल के टू इन वन के दिन थे. …और प्यार के दिन थे… टू इन वन को याद करते ही मुझे अपनी पहली प्रेमिका प्रिया की याद आ जाती है. असल में दोनों जीवन में लगभग आसपास ही आये थे. अब यह ठीक से याद नहीं आ रहा है कि किसकी किस्मत से कौन आया था या आई थी? उन्हीं दिनों अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन से पहला परिचय हुआ था. तब तक हम गुलाम अली-मेहदी हसन में फँसे हुए थे.
असल में प्रिया हुसैन बंधु की गई यही ग़ज़ल गाती थी. मुझे याद है मल्कागंज के उसके फ़्लैट में जब हम दोनों के सिवा कोई और नहीं होता था तब वह यही ग़ज़ल गाती थी-

तू बड़ा रहीमो-करीम है
मुझे ये सिफत भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ
तो मेरी दुआ में असर न हो…’

वह सबके सामने नहीं गाती थी. पता नहीं कभी उसने किसी और एक सामने गाया कि नहीं. वह मेरे लिए अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन की गाई यह ग़ज़ल गाती थी. तब मेरा जूनून हो गया था हुसैन बंधु की गई एक-एक ग़ज़ल जमा करना. उनके हर कैसेट के रिलीज होने का इन्तजार करते थे हम. दरअसल उनकी गायकी का सुनहरा दौर भी वही था- ‘पुरकैफ हवाएं हैं मौसम भी सुहाना है..’ या ‘दो जवान दिलों का गम दूरियां समझती हैं..’ या ‘पत्थर के जिगर वालों गम में वो रवानी है/खुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है…’ या ‘डंस न जाए मुझको जुल्फें कालियां/खूब तूने नागिनें ये पालियां…’ या… ‘मेरी नाजनीं तू मुझे भूल जाना…’, ‘मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा…’
वे उनकी अलबमों के दिन थे- रिफाकत, गुलदस्ता, हमख़याल, रहनुमा…’ लेकिन जो बात बशीर बद्र की उस ग़ज़ल में थी वह किसी में नहीं थी. आखिरी बार शिमला के होटल काटजू में प्रिया ने सुनाई थी यह ग़ज़ल-

‘कभी दिन की धूप में झूम के
कभी शब को फूल को चूम के
यूँही साथ-साथ चलें सदा
कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो…’

उसके ठीक बाद हम जुदा हो गए थे. वह मुंबई चली गई थी. मैंने मुम्बई न जाने और दिल्ली में एम. फिल. करने का फैसला लिया था.
मुझे याद है दिल्ली में किदवई नगर के उसके फ़्लैट में जब मैं आखिरी बार मिलने गया था तो उसने चिट्ठियों की संदूकची के अलावा जो अमानत मुझे वापस सौंपी थी वह अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन के गज़लों का कैसेट था- रिफाक़त! बशीर बद्र की लिखी यह ग़ज़ल उसी में है. इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह ने भी गाया है लेकिन जिस तरह से हुसैन बंधु ने इसे गाया है उस तरह से किसी ने नहीं गाया. सिवाय प्रिया के.
मुझे याद है कि उस दिन प्रिया ने काले पके अंगूर सी आँखों में गहरा काजल लगाया था. माथे पर बड़ी सी बिंदी. मुझे अच्छा लगता था न! मुझे काजल लगाने वाली सुन्दर लड़कियां अच्छी लगती हैं. लेकिन वैसी आँखें मैंने आज तक किसी की नहीं देखी. क्या हुआ जो उसकी आँखों के नीचे काले धब्बे थे. वे उतनी ही वीरान दिखाई देती थीं, जितनी जीवंत. आज भी… शाम गहरा गई थी इसलिए उसकी आँखों में क्या था दिखाई नहीं दे रहा था…
उस दिन उसने कुछ नहीं सुनाया था. बीस सालों में 2-4 बार हम जब भी मिले उस ग़ज़ल की बात नहीं हुई. लेकिन वह ग़ज़लें पढ़ती थी, सुनती थी. मुझे पता चलता था. हम दोनों को उर्दू शायरी का बड़ा शौक था. आज भी है…
उसके जाने के बाद न मैंने न जाने कितनी बार अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन की उस ग़ज़ल को सुना. मैं चाहता था कि हुसैन बंधु के सामने बैठकर उनको गाते हुए सुनूँ. प्रेमचंद भाई ने वादा किया था. मिलवाने का. सुनवाने का. लेकिन सच बताऊँ जितना मैं उनकी आवाज में यह ग़ज़ल सुनना चाहता था उतना ही किसी और की आवाज में मैं यह ग़ज़ल सुनना नहीं चाहता था.
इस ग़ज़ल से मुझे प्रिया की याद आती है-

‘मेरे बाजुओं में थकी-थकी
अभी महवे ख्वाब है चांदनी
न उठे सितारों की पालकी
कभी आहटों का गुज़र न हो…’

जब तक यह ग़ज़ल है तब प्रिया मेरे साथ है. वह देश-दुनिया में कहीं भी रहती है इस ग़ज़ल के बजते ही मेरे पास आ जाती है. इतने पास की की उसके दिल की तेज-तेज धडकनें सुनाई देने लगती हैं. एक बार वह गा रही थी कि बाहर अचानक उसकी मम्मी आ गई थी. मैं दूसरे कमरे के बाथरूम में छिप गया था. मम्मी बहुत देर तक हैरानी के साथ घर में घूमती रहीं कि आखिर उनकी कभी न गाने वाली बेटी ग़ज़ल क्यों गा रही थी. वह भी अकेले में. उस बाथरूम पर उनकी नजर नहीं पड़ी थी. या शायद उन्होंने देखकर अनदेखा कर दिया था…
इस ग़ज़ल को सुनते ही मैं अपने वक्त से आजाद हो जाता हूँ और हिन्दू कॉलेज होस्टल और मानसरोवर होस्टल चला जाता हूँ. जहाँ के कमरों में यह ग़ज़ल इतनी बार बजाई गई थी कि हो सकता है इसकी गूँज अब भी वहां बाक़ी हो…’
और कहीं हो न हो मेरे कानों में प्रिया की आवाज की गूँज अब भी बाक़ी है-

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में!

बोल बशीर बद्र के. आवाज मोहम्मद और अहमद हुसैन की.

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