Submit your post

Follow Us

कहानी 'असुरों' की, जिन्होंने अपनी भाषा बचाने के लिए अपना रेडियो स्टेशन खोल लिया

एक फिल्म है ‘बर्फी’. रनबीर कपूर की. हीरो का असली नाम ‘मर्फी’ है. मां ने ‘मर्फी’ नाम इसलिए चुना था कि पिता दिन भर ‘मर्फी’ का रेडियो सुनते रहते थे. हीरो बोल नहीं पाता. अपना नाम बड़ी मुश्किल से ‘बर्फी’ ले पाता है. ‘मर्फी’ रेडियो की कंपनी है जो अब रेडियो नहीं बनाती. क्यों? क्योंकि समय देखने का है. सुनने से ज्यादा लोग देखना पसंद कर रहे हैं. देख कर दुनिया को जानने का चलन है. देख कर सीखने, समझ जाने का चलन है.

रेडियो अब चलन में नहीं है. अब लोग रेडियो नहीं खरीदते. लेकिन खुद को बनाए रखने की कोशिश में रेडियो अब भी लगा हुआ है. अपनी सबसे नई तकनीक ‘पॉडकॉस्ट’ के माध्यम से. आप अपने फोन में ‘पॉडकॉस्ट’ सुन सकते हैं. जिसे रेडियो का डिजिटल वर्ज़न कहा जा सकता है.

इसी तकनीक के दम पर झारखंड के ‘असुर’ आदिवासी समुदाय ने अपना रेडियो स्टेशन खोल लिया है. ये लोग स्थानीय स्तर पर रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण करते हैं. साथ ही साउंड क्लाउड और यू-ट्यूब पर भी अपने कार्यक्रम अपलोड करते हैं. 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस होता है. इस मौके पर हमने असुर समुदाय के इस मोबाइल रेडियो स्टेशन के बारे में डिटेल में जानने की कोशिश की.

हाट में एक साउंड बॉक्स पर आवाज गूंजती है, ‘दाहा-दाहा तुर…. धनतिना धन तुर… नोआ हेके असुर अखरा रेडियो..ऐनेगाबू, डेगाबु सिरिंग आबू ‘ (आओ, गाओ, नाचो, बोलो.. ये है असुर अखड़ा रेडियो). हाट में रेडियो के आस-पास लोग जुटते जाते हैं और फिर प्रसारण शुरू होता है. एक गरबीली सी आवाज आती है और फिर समसामयिक मुद्दों पर एक बुलेटिन आता है. आखिर में इतिहास और सामाजिक मुद्दों पर रिपोर्ट सरीखा कुछ-कुछ.और फिर सबसे आखिर में असुर भाषा का कोइ लोकगीत जिसे वहीं की नई पीढ़ी नहीं समझ पाती. झारखंड के गुमला और लातेहर जिलों के गांवों में होने वाले साप्ताहिक बाज़ारों में, जिसे हाट कहा जाता है, में इस रेडियो स्टेशन की टीम पहुंचती है, अपना कार्यक्रम सुनाती है और अगले दिन अगले हाट में जाती है.

कौन हैं असुर आदिवासी
झारखंड में 32 आदिवासी समुदाय हैं. इनमें से लगभग 9 अब एकदम हाशिये पर हैं. असुर आदिवासी समुदाय उनमें से एक है. गुमला और लातेहर जिलों के बीच नेतरहाट पठार है. रांची से 150 किलोमीटर दूर. यह समुदाय यहीं रहता है. असुर इस पठार को ‘पाथ’ कहते हैं. यूनेस्को के आंकड़े के हिसाब से फिलहाल इनकी संख्या लगभग 7,000 है. ये समुदाय जो भाषा बोलती है उसे असुर भाषा कहा जाता है. यूनेस्को ने इस भाषा को भी वर्ल्ड एटलस ऑफ एंडेंजर्ड लैंग्वेजेज में रखा है. Definitely Endangered (निश्चित रूप से खतरे में) की श्रेणी में. असुर भाषा पर खतरे का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि समुदाय की नई पीढ़ी इसे नहीं बोल पाती. वो या तो नागपुरी बोलती है या फिर हिंदी.

असुर समुदाय नाम क्यों
आदिवासी खुद को प्रकृति के पूजक कहते हैं. असुर आदिवासी भी प्रकृति-पूजक होते हैं. ‘सिंगबोगा’ असुर आदिवासियों के प्रमुख देवता है. ‘सड़सी कुटासी’ इनका प्रमुख पर्व है. इस त्योहार के दिन ये अपने औजारों और लोहे गलाने की भट्टियों की पूजा करते हैं. असुर आदिवासी खुद को महिषासुर का वंशज मानते हैं. हिन्दू धर्म में महिषासुर को एक राक्षस (असुर) के रूप में देखा जाता है जिसका वध दुर्गा ने किया था. पश्चिम बंगाल और झारखंड में दुर्गा पूजा के दौरान असुर समुदाय के लोग शोक मनाते हैं. इस समुदाय का नाम असुर भी इसी कारण पड़ा है.

Untitled Design (1)
इस मोबाइल रेडियो का पहला प्रसारण 19 जनवरी को हुआ. आप इसे फेसबुक, युट्युूब और सांउड क्लाउड पर भी सुन सकते हैं. तस्वीर साभार- फेसबुक

कौन लोग हैं इसके पीछे

‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ एक कम्युनिटी बेस्ड संस्था है. अखड़ा गांव की उस जगह को कहते हैं समुदाय के लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए इकट्ठा होते हैं. हमारी बात इस संस्था के जनरल सेक्रेटरी और रेडियो प्रोग्राम की कन्वेनर वंदना टेटे से हुई. वह कवियत्री हैं. जन आंदोलनों से सरोकार रखती हैं. राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर से समाजकार्य में M.A. करने के बाद वंदना ने आदिवासी साहित्य की कई किताबें लिखी और अब इस संस्था के साथ काम कर रही हैं. वंदना अपने साहित्य को ‘ऑरेचर’ कहती हैं. मतलब ओरल लिटरेचर. वंदना कहती हैं,

“विलुप्त हो रही झारखंड की कई भाषाओं में से एक ‘असुर’ भाषा अब बेहद खतरे में है. हम पिछले 15 सालों से इसके लिए काम कर रहे हैं. हर नई तकनीक से इस भाषा को जोड़ने की कोशिश करने के बाद यह मोबाइल रेडियो की तकनीक बेहद कारगर साबित हो रही है. अपनी भाषा को मोबाइल और साउंड बॉक्स में सुनकर समुदाय के लोगों का आत्मविश्वास देखते बनता है. पहले दिन जब हम सबने यह प्रसारण हाट में शुरू किया तो लोगों ने उसे कम से कम दस बार बजवा कर सुना. लोग मोबाइल पर डाउनलोड करना सीख रहे हैं. वॉट्सऐप से भेज रहे हैं. यह काफी सुखद है.”

इसी संस्था से जुड़े और दो दशकों से इनके साथ काम कर रहे प्रो. महेश अगुस्टीन कुजूर ने बताया,

“यह एक दिन का प्लान नहीं है. हम सब विलुप्त हो रही जनजातियों के साथ पिछले दशक से जुड़े हुए हैं. यूनेस्को की घोषणा के बाद हमने अपनी तरफ से कई प्रयास किये. इंटरनेट के चलन के आम होने के बाद भी हमने उन्हें जोड़ने की कोशिश की मगर यह कारगर नहीं हो सका. क्योंकि ये समुदाय असुर के आलावा कोई और भाषा न तो समझ पाता है और न ही बोल पाता है. ऐसे में यह रेडियो बेहद काम का है. वह बहुत आसानी से समझ जाते हैं और मोबाइल में डाउनलोड करके सुनते हैं.”

कब से चल रहा प्रसारण

इस मोबाइल रेडियो का पहला प्रसारण 19 जनवरी को हुआ. रेडियो प्रसारण गांव के हॉट में भी हुआ और रेडियो के सबसे नए माध्यम यानी पॉडकॉस्ट पर भी. यूट्यूब का चैनल भी है. फेसबुक का पेज भी है और साउंडक्लाउड पर भी एक चैनल के साथ यह प्रसारण जारी है. इन्होंने एक वेबसाइट भी बनाई है. सप्ताह में चार दिन अलग-अलग हाट में रेडियो कार्यक्रम का प्रसारण होता है. और दो दिन इसकी तैयारियां की जाती हैं. इस छोटे से मोबाइल रेडियो स्टेशन को चलाने के लिए लगता है एक लैपटॉप, एक माइक्रोफोन, 50 वॉट का एक सोलर पैनल और एक साउंड बॉक्स. इन चीज़ों को पब्लिक फंडिंग से खरीदा गया है. सोलर पैनल इसलिए कि उन इलाकों में बिजली की हालत अब भी बेहद खराब है.

जाते-जाते पढ़ लीजिए, असुर रेडियो के पहले रेडियो कार्यक्रम के शुरुआती हिस्से का हिंदी अनुवाद-

असुर अखड़ा रेडियो की शुरुआत आज हम लोग कोटेया बाजार से कर रहे हैं. अब से हर बाजार में असुर अखड़ा रेडियो सुनने को मिलेगा. यह रेडियो हम ‘जोभीपाट’ और ‘सखुआपानी’ दो गांव की मदद से कर रहे हैं. असुर अखड़ा रेडियो का उद्देश्य अपनी भाषा-संस्कृति और पुरखा अधिकारों को बचाना है. इस रेडियो को आप बाजार में तो सुनेंगे ही, इसे आप घर बैठे अपने मोबाइल पर इंटरनेट के द्वारा साउंडक्लाउड, यूट्युब और फेसबुक पर भी सुन सकेंगे. इसमें हम आपको समाचार, गीत-गाना के साथ ही देश-दुनिया का हालचाल और अपना सुख-दुख भी सुनाएंगे

 


वीडियो देखें:  रांची में पुलिस स्पेशल ब्रांच के ड्राइवर ने पत्नी और बच्चों को हथौड़े से मार दिया

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'हिटमैन' रोहित शर्मा को आप कितना जानते हैं, ये क्विज़ खेलकर बताइए

आज 33 साल के हो गए हैं रोहित शर्मा.

क्विज़: खून में दौड़ती है देशभक्ति? तो जलियांवाला बाग के 10 सवालों के जवाब दो

जलियांवाला बाग कांड के बारे में अपनी जानकारी आप भी चेक कर लीजिए.

मधुबाला को खटका लगा हुआ था इस हीरोइन को दिलीप कुमार के साथ देखकर

एक्ट्रेस निम्मी के गुज़र जाने पर उनको याद करते हुए उनकी ज़िंदगी के कुछ किस्से

90000 डॉलर का कर्ज़ा उतारकर प्राइवेट जेट खरीद लिया था इस 'गैंबलर' ने

उस अमेरिकी सिंगर की अजीब दास्तां, जो बात करने के बजाए गाने में ज़्यादा कंफर्टेबल महसूस करता था

YES Bank शुरू करने वाले राणा कपूर कौन हैं, जिन्होंने नोटबंदी को 'मास्टरस्ट्रोक' बताया था

यस बैंक डूब रहा है.

सात साल पहले केजरीवाल ने वो बात कही थी जो आज वो ख़ुद नहीं सुनना चाहते

बरसों पुरानी इस बात की वजह से सोशल मीडिया पर घेर लिए गए हैं.

क्या भारत सरकार से पूछे बिना पाकिस्तान चली गई इंडियन कबड्डी टीम?

अब ढेरों खेल-तमाशा हो रहा है.

बजट का कितना ज्ञान है, ये क्विज़ खेलकर चेक कर लो!

कितना नंबर पाया, बताते हुए जाना. #Budget2020

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.

क्रिकेट के पक्के वाले फैन हो तो इस क्विज़ को जीतकर बताओ

कित्ता नंबर मिला, सच-सच बताना.