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ख़ालिस्तानियों की बेअंत सिंह से नफ़रत ऐसी कि उनका क़त्ल करने को बम बनकर फट पड़ा पुलिसवाला

आज 31 अगस्त है और आज की तारीख़ का संबंध है एक राजनीतिक हत्या से. हत्या पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की. हत्या, जिसकी मोडस ओपरेंडी क़रीब-क़रीब राजीव गांधी की हत्या सी थी और मोटिव इंदिरा गांधी की हत्या वाला.

शुरुआत करते हैं एक बहुत फ़ेमस कविता से. हालांकि ये पंजाबी में लिखी गई है, लेकिन इसका हिंदी अनुवाद भी उतना ही चर्चित है.

'पाश'
‘पाश’

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

अवतार सिंह संधु, जिनका पेन नेम ‘पाश’ था. पंजाबी में कविताएँ लिखते थे. उनकी हत्या खालिस्तानी एक्सट्रीमिस्ट्स ने की थी. 23 मार्च, 1988 को. यानी ठीक उसी तारीख़ को, जिस दिन कभी भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाया गया था.

खालिस्तानी अलगाववादियों ने सिर्फ़ पाश की ही नहीं, कई आम लोगों और कई हाई प्रोफ़ाइल लोगों की भी हत्याएं की थीं. 23 जून, 1985 को टोरंटो से नई दिल्ली आ रहा एयर इंडिया का कनिष्क विमान भी खालिस्तानी अतिवाद की भेंट चढ़ गया था, जिसमें सभी 329 पैसेंजर मारे गए थे. इसके अलावा गुरबचन सिंह की हत्या 24 अप्रैल, 1980 में की गई. गुरबचन सिंह, संत निरंकारी संप्रदाय के तीसरे गुरु थे, जिन्हें मुख्यधारा के सिखों द्वारा अधर्मी माना जाता था.

पत्रकार लाला जगत नारायण, ‘हिन्द समाचार समूह’ के संस्थापक थे. उन्होंने पंजाब के लोगों खासतौर पर हिन्दुओं, को जनगणना के दौरान पूछे जाने पर हिंदी को अपनी मातृभाषा मेंशन करने को कहा. 9 सिंतबर, 1981 को उनकी भी हत्या कर दी गई. अवतार सिंह अटवाल, पंजाब पुलिस में डीआईजी थे. धर्मयुद्ध मोर्चा का क्रैकडाउन इनकी ही अगुआई में चल रहा था. इनकी हत्या गोल्डन टेंपल की सीढ़ियों पर कर दी गई. और 31 अक्टूबर, 1984 को की गई इंदिरा गांधी की हत्या के बारे में तो पता ही है. यूं अगर आप तारीखों पर गौर करें तो बाकी सारी हत्याओं की तारीख़ अस्सी के दशक की हैं लेकिन बेअंत सिंह, जिनकी हत्या का ज़िक्र हम आज की तारीख़ में कर रहे हैं, उन्हें ख़ालिस्तानियों ने 31 अगस्त, 1995 में मारा.

लेफ़्ट में ‘हिन्द समाचार समूह’ के संस्थापक पत्रकार लाला जगत नारायण. राईट में गुरबचन सिंह, संत निरंकारी संप्रदाय के तीसरे गुरु.
लेफ़्ट में ‘हिन्द समाचार समूह’ के संस्थापक पत्रकार लाला जगत नारायण. राईट में गुरबचन सिंह, संत निरंकारी संप्रदाय के तीसरे गुरु.

अच्छा आगे बढ़ने से पहले एक चीज़ और, हिंसा या नफ़रतें सिर्फ़ एक तरफ़ से नहीं थीं. और न केवल ग़लतियाँ या हत्याएँ.

लुधियाना में जन्मे कपूर सिंह, जिन्होंने लाहौर से पोस्ट ग्रेजुएशन किया और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से नैतिक विज्ञान में पढ़ाई पूरी की. वापस आकर आईसीएस ज्वाइन किया. उन्होंने एक बार दावा किया था:

1947 में पंजाब के राज्यपाल सीएम त्रिवेदी ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल की इच्छाओं का सम्मान करते हुए भारतीय पंजाब के सभी उपायुक्तों को कुछ निर्देश जारी किए. ये इस आशय के थे कि देश के कानून को ध्यान में रखे बिना, सामान्य तौर पर सिखों और विशेष रूप से सिख प्रवासियों को ‘आपराधिक जनजाति’ माना जाए. उन्हें कठोर प्रताड़नाएं मिलें. इस हद तक कि उन्हें गोली मार के क़त्ल कर दिया जाए ताकि वे राजनीतिक वास्तविकताओं से वाकिफ हों और जानें कि – कौन शासक हैं और कौन प्रजा.

हालांकि कपूर सिंह की इस बात पर कितना विश्वास किया जाए? क्यूंकि उनका ये बयान तब आया था जब पंजाब के तत्कालीन गवर्नर चंदू लाल त्रिवेदी ने भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उनको बर्खास्त कर दिया था. लेकिन उनका ये बयान ऐट्रोसिटीज़ से जुड़ा कोई इकलौता कथित इन्सीडेंट नहीं बताता है. एशियन गेम्स में दिल्ली आने वाले सभी रास्तों पर  सिखों की ऐसी तलाशी ली जाती थी कि सिखों को काफ़ी शर्मिंदगी महसूस होती थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के साथ जो हुआ, वो भी हमें पता है. टी ईयर ऑफ़ इंप्यूनिटी नाम की किताब में दावा किया गया है:

सरकारी बसों का उपयोग दंगाइयों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाने लगा था. पुलिसवालों का नाकारापन बढ़ कर दंगाइयों की सहायता करने के स्तर तक जा पहुंचा था. अगर सिख अपने बचाव के लिए कहीं इकट्ठा होते तो ये पुलिसवाले उनके हथियार ले लेते और घर वापस भेज देते, ताकि ये अपनी सुरक्षा न कर सकें. कई बार तो इन्होंने भी दंगे और हत्याओं को अंजाम दिया. इसके बाद ये फैला दिया गया कि सिखों ने पानी की सप्लाई को ज़हरीला बना दिया है. फिर फैलाया गया कि पंजाब से दिल्ली आने वाली ट्रेनों में हिंदुओं को क़त्ल किया जा रहा है.

इंदिरा गांधी की शव यात्रा
इंदिरा गांधी की शव यात्रा

कुछ साल पहले ही एच एस फूलका ने राजीव गांधी के उस कथित विवादास्पद बयान वाला वीडियो जारी किया था जिसमें सिख दंगों को जस्टिफाई करते हुए कहा गया था कि:

जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती डोलती ही है.

# 31 अगस्त, 1995 को क्या हुआ था?

तो कुल मिलाकर ये डॉमिनो इफ़ेक्ट या ‘An eye for an eye’ पूरे पंजाब को अपनी जद में ले चुका था. कहा जाता है कि इस आग को बुझाने में काफ़ी हद तक बेअंत सिंह का भी योगदान था. लंबे समय के राष्ट्रपति शासन के बाद 25 फ़रवरी, 1992 को कांग्रेस के बेअंत सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे. बेअंत सिंह जो 23 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए और फिर दो वर्षों तक सेना में रहे. पाँच बार पंजाब विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए. 1986 से 1995 तक पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्‍यक्ष रहे. 25 फ़रवरी, 1992 से लेकर जीवनपर्यन्त पंजाब के मुख्यमंत्री रहे. आज़ादी के बाद से तब तक पंजाब में आठ बार राष्ट्रपति शासन लग चुका था. अतिवादियों को कंट्रोल करने में बेअंत सिंह मुख्यमंत्री के रूप में कितने सफल रहे थे, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके बाद से अब तक पंजाब को एक बार भी राष्ट्रपति शासन की ज़रूरत नहीं पड़ी है. इस बारे में बेअंत सिंह के पोते गुरकीरत सिंह कोटली ने एक बार लल्लनटॉप को बताया कि-

पापाजी (गुरकीरत अपने दादा बेअंत सिंह को पापाजी ही कहते थे) हर उस घर में ज़रूर जाते थे, जहां लोग मरते थे, जिन घरों को आतंकवादियों का शिकार होना पड़ा था. उनको लोगों का दर्द पता था. वह बड़े बुरे दौर में पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे. उनके मुख्यमंत्री बनने के तक़रीबन डेढ़ साल में राज्य में शांति आनी शुरू हो गई. उसके बाद पंचायतों के, ब्लॉक समिति, ज़िला परिषद के चुनाव करवाए गए जो क़रीब एक दशक से नहीं हुए थे.

गुरमीत
गुरमीत

लेकिन उनके इसी क्रैकडाउन से खालिस्तानी सिंपेथाईज़र उनसे ख़ासे ख़फ़ा चलने लगे थे और उनकी हत्या का प्लान बनाने लगे थे. इस प्लान का मास्टरमाइंड था खालिस्तान टाइगर फोर्स का कमांडर जगतार सिंह तारा. उसकी गिरफ़्तारी एक दूसरे केस के चलते 2005 में जाकर हो पाई. लेकिन 31 अगस्त को क्या हुआ था?

बेअंत सिंह पंजाब-हरियाणा सचिवालय के बाहर अपनी कार में मौजूद थे. तभी एक खालिस्तानी सुसाइड बॉम्बर वहां पहुंचा और अपने आप को उड़ा लिया. इसलिए ही हमने शुरू में कहा था कि इस हत्या की मोडस ओपरेंडी भी काफ़ी हद तक राजीव गांधी की हत्या सरीखी थी. इस घटना में मुख्यमंत्री समेत 18 लोगों की मौत हो गई. विस्फोट में शामिल मानव बम का नाम दिलावर सिंह था और वो पंजाब पुलिस का एक कर्मचारी था. बलवंत सिंह राजोआना, जिसे घटना के तुरंत बाद गिरफ़्तार किया गया, वो भी घटनास्थल पर मानव बम बनकर तैयार था. कि अगर कहीं दिलावर से कोई चूक हुई या ऑरिजनल प्लान में कोई दिक्कत आई तो भी बेअंत सिंह न बच पाएँ. बलवंत सिंह भी पंजाब पुलिस का सिपाही था.

घटना के समय वहीं मौजूद रहे बेअंत के पोते गुरकीरत बताते हैं-

मैं बाई चांस उन्हीं के दफ़्तर में था यानी सचिवालय में. बेअंत सिंह के OSD थे त्रिलोचन सिंह. उनके कमरे में बैठे थे हम. अचानक बहुत ज़ोर से आवाज़ आई. हमने बाहर देखा तो दरवाज़े, खिड़कियाँ, शीशे बाहर आए हुए थे. हमने दूसरी खिड़की से देखा तो तीन-चार गाड़ियाँ आग में जल रही थीं. फिर हमें पता चला कि बहुत बड़ा कोई ब्लास्ट हो गया है. हम नीचे आए. नीचे आकर देखा तो सर बेअंत सिंह की जो गाड़ी थी, वो बिल्कुल जल चुकी थी. बहुत से लोग जो उनके साथ सिक्योरिटी गार्ड में थे, जो उनका निजी स्टाफ़ था, उनकी डेडबॉडीज़ पड़ी हुई थीं. अभी शोर नहीं हो रहा कि हमारे ग्रैंडफादर कहां हैं. बाद में फिर घंटे-डेढ़ घंटे के बाद ये क्लियर हुआ कि उनकी भी उसमें डेथ हो गई है.

तस्वीर 2012 की है. बेअंत सिंह की पुण्य तिथि मनाते ऑल इंडिया टेरेरिस्ट फ़्रंट के सदस्य.
तस्वीर 2012 की है. बेअंत सिंह की पुण्यतिथि पर फूल चढ़ाते फ़्रंट के सदस्य.

# कैसे पकड़ में आए आतंकवादी?

हत्या के कुछ दिनों बाद चंडीगढ़ पुलिस ने दिल्ली नंबर की लावारिस एंबेसडर कार बरामद की. इससे कुछ लीड्स मिलीं और लखविंदर नामक एक शख्स को गिरफ्तार किया गया. लखविंदर से पूछताछ के बाद बीपीएल कंपनी में काम करने वाले एक शख़्स गुरमीत सिंह की भी गिरफ़्तारी हुई. इंडिया टुडे ने इसके बाद की टाइमलाइन कुछ यूं बताई है:

# 19 फरवरी, 1996 को चंडीगढ़ सत्र न्यायालय में तीन NRI भगोड़ों समेत 12 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई. भगोड़ों में मनजिन्दर ग्रेवाल, रेशम सिंह और हरजीत सिंह शामिल थे.

# 30 अप्रैल, 1996 को अदालत में 9 लोगों के खिलाफ वाद दायर किया गया जिनमें से महाल सिंह, वधवा सिंह और जगरूप सिंह को फरार घोषित किया गया था.

# 27 जुलाई, 2007 को अदालत ने 6 आरोपी- बलवंत सिंह राजोआना, जगतारा सिंह, गुरमीत सिंह, लखविंदर सिंह, शमशेर सिंह और नसीब सिंह को दोषी करार दिया. एक आरोपी नवजोत सिंह को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया.

# 31 जुलाई, 2007 को दोषी करार दिए गए बलवंत सिंह राजोआना और जगतारा सिंह हवारा को कोर्ट ने सजा-ए-मौत सुनाई. गुरमीत सिंह, लखविंदर सिंह और शमशेर को उम्रकैद की सजा दी गई. एक दोषी नसीब सिंह को 10 साल कैद की सजा सुनाई गई.

# 12 अक्तूबर, 2010 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जगतारा की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया. लेकिन बलवंत सिंह राजोआना की सजा-ए-मौत को बरकरार रखा. अन्य तीनों आरोपियों शमशेर, गुरमीत और लखविंदर की उम्रकैद की सजा भी हाई कोर्ट ने बरकरार रखी.

# 6 जनवरी, 2014 को इंटरपोल की मदद से भारतीय एजेंसियों ने बेअंत सिंह हत्याकांड के एक भगोड़े को थाईलैंड से गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में पहले से गिरफ्तार जगतारा, आतंकी संगठन खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (केएलएफ) और बब्बर खालसा का सदस्य था.

वैसे इस पूरी घटना की सिल्वर लाइनिंग ये है कि बेअंत सिंह की ये हत्या ख़ालिस्तानी मूवमेंट से जुड़ी आख़िरी हाई प्रोफ़ाइल हत्या कही जाती है. इसके बाद इक्का दुक्का घटनाओं को छोड़कर पंजाब शांत बना हुआ है. सभी समुदाय के लोग यहां मिलजुल कर रहते हैं. ख़ालिस्तान की माँग भी कमजोर पड़ चुकी है. अगर कभी मुखरित होती भी है तो देश के बाहर किसी ऐसी डेमोक्रेटिक कंट्री में जहां भारत की तरह ही हर विचार को व्यक्त होने की पूरी स्वतंत्रता है.

और इसी उम्मीद के साथ कि हर पुराने युद्ध का अंत अंततः एक नई शांति की शुरूआत से होगा. हम आज का तारीख़ यहीं समाप्त करते हैं. कल फिर मिलेंगे. जाते-जाते एक अपडेट ये है कि 5 सितंबर से हमारा 10 एपिसोड का एक नया शो आ रहा है. नाम है, ‘एक नया पैसा’. जिसमें हम आपको क्रिप्टोकरेंसी से जुड़ी हुई हर बात आसान भाषा में समझाएँगे. तो बने रहिए हमारे साथ. और देखते रहिए दी लल्लनटॉप. अभी के लिए विदा.


वीडियो देखें: जब पहली ही कोशिश में भारत ने चांद पर तिरंगा फहरा दिया था-

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