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मिजोरम ही नहीं, नागालैंड से असम का झगड़ा भी खूनी रंग लेता रहा है

8 जून 1985. असम-नागालैंड बॉर्डर. भारी संख्या में नागालैंड पुलिस के जवानों ने असम के गोलाघाट जिले के मीरापानी पुलिस स्टेशन पर हमला बोल दिया. झगड़े की जड़ में नागालैंड और असम के बॉर्डर पर चल रहा बाड़ लगाने का काम था. देखते ही देखते ये पुलिसिया झड़प एक बड़े संग्राम में तब्दील हो गई. 4 घंटे तक भारी हिंसा का दौर चला. 41 लोग मारे गए. 50 से ज्यादा घायल हुए. मारे जाने वालों में 28 असम पुलिस के जवान थे. इलाके में ऐसी दहशत फैली कि 25 हजार से ज्यादा लोग इलाका छोड़कर पलायन कर गए.

ये कहानी असम-नागालैंड बॉर्डर विवाद की बस एक कहानी है. वक्त-वक्त पर ये विवाद हरा हो जाता है. ये मसला इसलिए मौजूं है कि एक दिन पहले ही असम और मिजोरम के बीच सीमा विवाद खूनी रंग ले चुका है. 26 जुलाई को दोनों राज्यों के इस झगड़े में असम के 5 पुलिसवालों की मौत हो चुकी है. दोनों तरफ के कई पुलिसकर्मियों समेत करीब 50 लोग घायल हैं. इसे लेकर असम और मिजोरम के सीएम भी आमने सामने हैं. केंद्र सरकार को दखल देना पड़ा है.

आखिर आज बात करते हैं असम-नागालैंड के सीमा विवाद पर, और ये भी जानते हैं कि इसे सुलझाने के लिए अब तक क्या किया गया है.

असम-नागालैंडः हिंसा का पुराना इतिहास

आपको लगता होगा कि सीमा विवाद पर धक्का-मुक्की और फायरिंग सिर्फ भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान सीमा पर ही होती है तो आपका सोचना गलत है. भारत में नॉर्थ-ईस्ट के कई राज्य भी सीमा विवाद में लंबे अरसे से उलझे हुए हैं. इसमें असम बड़ी पार्टी रहा है. कारण है उसकी खास भौगोलिक स्थिति. असम की सीमा नॉर्थ-ईस्ट के 6 राज्यों से मिलती है. अपने सीमावर्ती राज्यों के साथ इसके विवाद के कई किस्से आपको मिल जाएंगे.

आज बात असम-नागालैंड के झगड़े पर हो रही है, इसलिए उस पर ही फोकस रखते हैं. हमने आपको 1985 का जो किस्सा सुनाया, वो असम-नागालैंड के कई झगड़ों में से मात्र एक है. भारत की आजादी के बाद से ही नागालैंड और असम के बीच रह-रहकर सीमा विवाद हिंसा का कारण बनता रहा है. 1985 से पहले 5 जनवरी 1979 में असम के गोरहाट जिले के नागालैंड सीमा से लगे गांवों पर हथियारबंद लोगों ने हमला किया. इसमें असम के 54 लोग मारे गए. 23,500 लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी. इस जैसे हर टकराव के बाद असम ने दावा किया कि हमला करने वालों में नागालैंड पुलिस के जवान शामिल थे. हालांकि नागालैंड इस बात को नकारता रहा.

नागालैंडः जिसने आजादी के लिए रेफरेंडम करा लिया

भारत की आजादी के वक्त सबका ध्यान पाकिस्तान के देश से अलग होने पर लगा था. लेकिन नॉर्थ ईस्ट के भी कई राज्य ऐसे थे जो अलग हो जाने पर अड़े थे. जवाहर लाल नेहरू ने जैसे-तैसे इनको मनाया. लेकिन फिर भी 1951 में नागा गुटों ने (जिनमें NNC सबसे आगे था) नागालैंड में एक रेफरेंडम करवा लिया. NNC यानि नागा नेशनल काउंसिल. 1946 में NNC की स्थापना करने वाले नागा नेता अंगामी ज़ापू फिज़ो इसे लेकर सबसे मुखर थे. रेफरेंडम में राय ये निकली कि ‘हम हिंदुस्तान से अलग एक आज़ाद मुल्क बने रहना चाहते हैं.’ भारत सरकार (माने नेहरू) ने इस रेफरेंडम को मानने से इनकार कर दिया. कहा गया कि आधिकारिक तौर पर नागा इलाके असम का हिस्सा हैं.

तो फिज़ो एक कदम और आगे बढ़े. 22 मार्च, 1956 को उन्होंने नागा फेडरल गवर्नमेंट (NFG) की स्थापना कर डाली. ये नागाओं की अंडरग्राउंड सरकार थी. अंडरग्राउंड इसलिए कि ग्राउंड के ऊपर तो भारत सरकार थी, और एक ग्राउंड पर एक ही सरकार चल सकती है. अंडरग्राउंड सरकार के अलावा असल समस्या थी नागा फेडरल आर्मी (NFA). ये एक तरह से नागालैंड की अंडरग्राउंड सरकार की हथियारबंद सेना थी.

जब हथियार की बात आई तो भारतीय सेना मैदान में उतरी, और 1956 में नागालैंड में कार्रवाई शुरू कर दी. दबाव बढ़ा तो फिजो भागकर पूर्वी पाकिस्तान (अब के बांग्लादेश) में जा छुपे. सेना को लगा कि नागा की असंगठित सेना क्या ही टिकेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. द्वितीय विश्व युद्ध का अनुभव रखने वाले नागा सैनिकों ने जंगल और पहाड़ी युद्ध भूमि पर डटकर मुकाबला किया. सेना के हाथों से मामला निकलते देख भारत सरकार ने शांति समझौते की पहल की. असम के कुछ और हिस्से देने की बात कहकर नागालैंड को समझौते की मेज पर लाया गया.

Assam Nagaland Border
असम और नागालैंड 434 किलोमीटर का बॉर्डर (लाल आयत में) शेयर करते हैं. यह सीमा ही विवाद की जड़ में है. नागा अंग्रेजों द्वारा तय की गई सीमा मानने को तैयार नहीं हैं, और असम अपनी जमीन छोड़ने को राजी नहीं है.
(मैप- Center For Land Warfare Studies)

समझौता, जो बना विवाद की फांस

1 दिसंबर 1963 को आधिकारिक तौर पर नागालैंड भारत का राज्य बना. लेकिन इतनी आसानी से नहीं. इसके पहले 1960 में भारत के पीएम जवाहर लाल नेहरू को नागा पीपुल्स कन्वेंशन के नेताओं के साथ 16 बिंदुओं का एक समझौता करना पड़ा.

सीमा विवाद की जड़ में इस समझौते के कुछ बिंदु और नागालैंड के कई दावे हैं. मिसाल के तौर पर-

# 1960 के समझौते में कहा गया कि नागा राज्य का जो हिस्सा ब्रिटेन ने असम में जोड़ दिया था, उसे वापस किया जाएगा. इस काम के लिए 1971 में एक कमीशन का गठन किया गया. इसका नाम था सुंदरम कमीशन. लेकिन इसकी सिफारिशों को नागालैंड ने स्वीकार नहीं किया. नतीजा ये हुआ कि 66 हजार हेक्टेयर की जमीन अब भी विवादित बनी हुई है.

# असम और नागालैंड 434 किलोमीटर का बॉर्डर शेयर करते हैं. इन्हें सहूलियत के लिए 6 प्रशासनिक हिस्सों में बांटा गया है. ये हैं सेक्टर A, B, C, D, E और F. ये हिस्से सिवासागर, जोरहाट, गोलाघाट और कार्बी आंगलॉन्ग जिले में पड़ते हैं. ये सभी असम में हैं. नागाओं की मांग है कि उन्हें A, B, C और D सेक्टर की 12, 883 स्कवॉयर किलोमीटर की जमीन सौंप दी जाए. उनका कहना है कि ये जमीन ऐतिहासिक रूप से उनकी जनजाति की है और 16 पाइंट के समझौते में इसे सौंपने का वादा किया गया है.

इस पर असम का रुख पूरी तरह से साफ और सख्त है. वह कहता है कि ये 6 इलाके 100 साल से असम में हैं. पिछले 100 साल से असम ही प्रशासनिक तौर पर इन्हें चला रहा है. इसके अलावा उसे केंद्र सरकार की तरफ से इन पर हक छोड़ने को लेकर कभी कुछ कहा भी नहीं गया है. ऐसे में वो ऐसा क्यों करें. इतना ही नहीं, असम ये आरोप भी लगाता है कि नागाओं ने सिवासागर, जोरहाट, गोलाघाट और कार्बी आंगलॉन्ग जिलों में 660 स्कवॉयर किलोमीटर जमीन पर अतिक्रमण कर रखा है. इसमें से 420 स्कवॉयर किलोमीटर की जमीन तो सिर्फ गोलाघाट जिले में ही है. असम का कहना है कि नागालैंड ने तीन सबडिवीजन असम के क्षेत्र में बना लिए हैं. नागालैंड कह रहा है कि उसकी अभी और जमीन है जो असम ने दबा रखी है.

शांति के लिए क्या किया गया?

स्ट्रैटजिक थिंक टैंक Center For Land Warfare Studies (CLAWS) के मुताबिक, मामले को सुलझाने की शुरुआत 1971 में सुंदरम कमिटी बनने के साथ ही हो गई थी. लेकिन इसकी सिफारिशें सिर्फ असम को मंजूर थीं. इस कमेटी का उद्देश्य था कि इलाके में शांति और बॉर्डर पर यथास्थिति बनी रहे. दोयांग रिजर्व फॉरेस्ट में 1979 में हुई हिंसा के बाद नागालैंड और असम ने अंतरिम शांति समझौता साइन किया. इससे कुछ वक्त लिए शांति आई भी.

केंद्र सरकार ने भी हिंसा रोकने के कुछ प्रयास किए. मामले को सुलझाने के लिए 1985 में शास्त्री कमीशन का गठन कर दिया. कमीशन ने असम-नागालैंड सीमा को चिन्हित करने के लिए कई सिफारिशें कीं. इसमें दोनों राज्यों के दावों का ध्यान भी रखा गया. लेकिन इसमें असम सरकार ने पेच फंसा दिया. वो बॉर्डर समस्या को हल करने के लिए कानूनी विकल्पों- जैसे कोर्ट में जाने पर विचार की बात करने लगा. 1988 में असम सरकार ने प्रदेश की सीमा तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सितंबर 2006 में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में तीन सदस्यों का लोकल कमीशन गठित कर दिया. इस कमीशन को यह तय करना था कि असल बॉर्डर की स्थिति क्या है. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी है लेकिन अभी तक इस पर कोई फाइनल फैसला नहीं आया है.

अभी क्या स्थिति है?

असम-नागालैंड सीमा पर लगातार तनाव बना रहता है. ताजा घटना मई 2021 की है. कांग्रेस के विधायक रूपज्योति कुर्मी असम-नागालैंड सीमा से लगे दिसाई घाटी आरक्षित वन क्षेत्र पहुंचे, और उन पर गोलीबारी कर दी गई. मरियानी विधानसभा क्षेत्र के विधायक रूपज्योति अपने सुरक्षा कर्मियों की टीम के साथ स्थानीय ग्रामीणों से सीमा विवाद की स्थिति का जायजा लेने पहुंचे थे. उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गईं. वो बालबाल बच गए. बाद में उन्होंने आरोप लगाया कि गोलीबारी नागा उग्रवादियों ने की. मामले पर असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने संज्ञान लेते हुए पुलिस के स्पेशल डायरेक्टर जनरल जीपी सिंह को मौके पर भेजा.

स्ट्रैटजिक थिंक टैंक CLAWS की रिपोर्ट भी बताती है कि असम-नागालैंड की सीमा पर लगातार झड़पें होती रहती हैं. सबसे ताजा घटना 2020 में आर्थिक नाकेबंदी की है. इसमें असम के लोगों ने नागाओं को आने से रोक दिया था. इस तरह से दोनों ही राज्य के लोग एक दूसरे के आमने-सामने आते रहते हैं.

असम के स्वतंत्र पत्रकार राजन पांडे नागालैंड और असम सीमा विवाद को एक दूसरे एंगल से भी देखते हैं. उनका कहना है कि

“नागालैंड इस लिहाज से नॉर्थ-ईस्ट के बाकी राज्यों से अलग है कि वहां पर अब भी विद्रोही हैं. NSCN जैसे गुट भले ही समझौता कर चुके हैं लेकिन अब भी पूरी तरह से सक्रिय हैं. ऐसे में उन्हें भी इस समस्या का एक हिस्सा मानकर चलना होगा. जहां तक बात सरकार की है तो नागालैंड की नेफ्यू रियो सरकार का केंद्र सरकार से अच्छा तालमेल है. किसी भी तरह की दिक्कत होने पर केंद्र सरकार बीच-बचाव करा सकती है. लेकिन इससे विवाद खत्म नहीं हो जाता. नागालैंड में सरकार के अलावा भी दूसरी ताकतें मजबूत हैं.”

फिलहाल असम-मिजोरम की सीमा पर हुआ विवाद भले ही चर्चा में है लेकिन नागालैंड और असम की सीमा के विवाद को सुलझाने की कोशिशें भी अब तक नाकाम ही रही हैं.


वीडियो – केंद्र ने नागालैंड को फिर से ‘डिस्टर्ब्ड एरिया’ क्यों घोषित किया है?

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