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स्पेस एजेंसी NESAC से क्यों असम-मिजोरम सीमा विवाद खत्म होने की उम्मीद की जा रही है?

असम-मिज़ोरम सीमा विवाद भड़का और असम के 6 पुलिसवालों की जान चली गई. मामले का निपटारा करने केंद्र सरकार बीच में आई. दोनों राज्यों ने मामला निपटाने पर हामी भरी तो सरकार ने समस्या का तकनीकी समाधान करने का सुझाव दिया. मतलब जमीन पर रह कर नाप-जोख बहुत हो गई, अब आसमान से नापजोख होगी. केंद्र सरकार का सुझाव है कि असम-मेघालय बॉर्डर के निर्धारण के लिए सैटेलाइट इमेजिंग का इस्तेमाल किया जाए. आखिर क्या है सैटेलाइट इमेजिंग (Satellite Imaging) तकनीक जिसके जरिए विवाद सुलझाने की कोशिश की जाएगी? ये काम कौन करेगा और इसका तरीका क्या होगा? सब जानते हैं तफ्सील से.

पहले असम-मिजोरम का विवाद जान लीजिए

26 जुलाई को असम और मिजोरम के पुलिस जवान आपस में भिड़ गए. असम का आरोप था कि मिजोरम घुसपैठ करने की कोशिश कर रहा है तो मिजोरम का कहना था कि मनमानी असम कर रहा है. विवाद इतना बढ़ा कि गोलियां चल गईं. असम के 6 पुलिस जवानों की जान चली गई. ऐसा विवाद कोई नई बात नहीं. असम-मिजोरम बॉर्डर पर रहने वाले ऐसे विवादों के आदी हैं. ये विवाद मिजोरम के भारत का राज्य बनने के बाद से चल रहा है. इसकी जड़ें मिजोरम के इतिहास में हैं.

तकरीबन 150 साल पीछे चलते हैं. 1875 में लुशाई पहाड़ियों की इनर लाइन सीमा असम के कछार जिले की दक्षिणी सीमा पर निश्चित की गई थी. सीमाओं को फिक्स करने का ये अंग्रेजों का तरीका था. हालांकि ये सीमा ‘सटीक’ नहीं थी क्योंकि इसके निर्धारण में बड़े पैमाने पर नदियों और पहाड़ियों जैसे प्राकृतिक चिह्नों का इस्तेमाल हुआ था. मतलब सिर्फ ये बताया गया था कि इस नाले के राइट साइड में फलाना जिला है और इस जंगल के लेफ्ट साइड में ढिमकाना. सब कुछ अनिश्चित था. इसके बाद अंग्रेजों ने 1933 में एक अधिसूचना जारी करके लिशाई पहाड़ी इलाके की सीमा में फिर बदलाव कर दिया. खैर जब तक अंग्रेज रहे तब तक ऐसे ही चला.

आज़ादी के वक्त अलग-अलग सांस्कृतिक पहचानों को एक ही सूबे में बांध दिया गया था. इसने विवाद पैदा किए और 1963 में मेघालय के इलाके को अलग करना पड़ा. 1972 के साल में मेघालय और मिज़ोरम नाम से दो राज्य बनाने पड़े. लेकिन ज़मीन पर सीमाएं स्पष्ट नहीं हो पाईं और विवाद खत्म नहीं हुए. फिलहाल असम और मिजोरम के बीच 165 किलोमीटर लंबी सीमा है जिस पर विवाद चल रहा है. आज जिस इलाके को हम मिज़ोरम कहते हैं, वो 1972 में एक संघ शासित राज्य बना और 1987 में पूर्ण राज्य. लेकिन दो पुरानी अधिसूचनाओं (नोटिफिकेशन) को लेकर विवाद सुलझाया नहीं जा सका. ये हैं-

# 1875 की अधिसूचना, जो कछार हिल्स और लुशाई हिल्स के बीच सीमा निर्धारित करती है.

# 1933 की अधिसूचना, जो लुशाई हिल्स और मणिपुर के बीच सीमा निर्धारित करती है.

कछार आज असम का हिस्सा है और लुशाई हिल्स का इलाका आधुनिक मिज़ोरम है. जब 1972 में सीमा निर्धारित की जा रही थी, तभी कछार, हैलाकांडी और करीमगंज की सीमाओं पर छिटपुट हिंसा की घटनाएं हुई थीं. क्योंकि दोनों राज्य अलग-अलग अधिसूचनाओं को मानते हैं. असम चाहता है कि सीमा 1933 की अधिसूचना से तय हो और मिज़ोरम चाहता है कि सीमा 1875 की अधिसूचना से तय हो.

ये जंगल, पहाड़ और नदी वाली बाउंड्री सेट करना ही सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है. जमीन पर प्राकृतिक चिह्नों के जरिए खींचे बॉर्डर बदलते रहते हैं. 1875 के बाद से 2021 तक बहुत कुछ बदला है. कहीं जंगल थे तो वहां मैदान हो गया. जहां मैदान था वहां पानी भरा और छोटी झील बन गई. ऐसे में सीमा पर ये तय ही नहीं हो पा रहा है कि आखिर कौन सा इलाका किस राज्य में आता है. इस समस्या के समाधान के लिए ही सैटेलाइट का सहारा लिए जाने की तैयारी हो रही है.

Assam Mizoram Border
असम-मिजोरम की 165 किलोमीटर की सीमा का सही से निर्धारण न होना दोनों राज्यों के बीच विवाद का कारण बना रहता है. (मैप-Center For Land Warfare Studies)

कौन करेगा सैटेलाइट से नापजोख?

हालिया असम-मिजोरम झगड़े के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नॉर्थ-ईस्ट में राज्यों की सीमाओं पर जंगलों और दूसरे प्राकृतिक चिह्नों की मैपिंग के लिए सैटेलाइट का सहारा लेने का सुझाव दिया. गृह मंत्री शाह ही उत्तर पूर्व परिषद के चेयरमैन हैं. उन्होंने इस काम का जिम्मा NESAC को सौंपने की बात कही है.

NESAC मतलब North Eastern Space Applications Centre. ये ISRO का एक रीजनल स्पेस सेंटर है. इसका हेडक्वॉर्टर मेघालय के उमियाम (Umiam) में है. NESAC पहले ही नॉर्थ ईस्ट के इलाकों में बाढ़ प्रबंधन पर नजर रखता है. साल 2000 में इस सेंटर को इसलिए बनाया गया कि इलाके में स्पेस तकनीक के जरिए बेहतर तरीके से संसाधनों को मैनेज किया जा सके. इलाके में बाढ़ से लेकर मौसम पर नजर रखने जैसे काम इसके जिम्मे हैं. ये सेंटर प्रशासन को बहुमूल्य जानकारी उपलब्ध कराता है.

सैटेलाइट में लगे सोलर पैनल इसे ऊर्जा देते हैं.
सैटेलाइट से मैपिंग की जम्मेदारी नॉर्थ स्पेस एप्लिकेशन सेंटर को दी गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कैसे होती है सैटेलाइट से मैपिंग?

किसी भी इलाके का नक्शा बनाने का पारंपरिक तरीका है कि उस इलाके का ग्राउंड सर्वे कराया जाए और इलाके दर्ज किए जाएं. बाड़ लगा दी जाए और बाड़ पर दर्ज कर दिया जाए कि कौन सा इलाका किस राज्य में पड़ता है. ऐसा करना मैदान पर तो मुमकिन है, लेकिन जहां पहाड़, जंगल और नदियां हों वहां ये काम बहुत मुश्किल और कभी-कभी नामुमकिन भी रहा है. हालांकि अब तकनीक ने ये काम आसान कर दिया है. सैटेलाइट के जरिए इलाके का एक मैप तैयार किया जा सकता है.

सैटेलाइट मतलब इंसान का बनाया गया एक ऐसी डिवाइस जो धरती का चक्कर लगाती रहती है. आपको ऐसा लग सकता है कि सैटेलाइट से तो ये बहुत आसान हो जाएगा. बस फोटो खींचो और उस पर लकीरों से मैप बना दो. लेकिन असल में ये इतना आसान भी नहीं है. सैटेलाइट से खींची गई तस्वीरों में उतनी क्लिएरिटी नहीं होती. लेकिन सैटेलाइट के जरिए कई लेयर में तस्वीरें ली जा सकती हैं. मिसाल के तौर पर इंफ्रारेड तस्वीरें- इनसे ये तय हो सकता है कि जमीन पर कहां पहाड़, जंगल और नदी है. रियल टाइम इमेजिंग- इनसे ये पता चल सकता है कि कुछ घंटे पहले जमीन पर क्या कंडीशन थी. ये तो कुछ लेयर हुईं. ऐसी तरह-तरह की लेयर में इमेजिंग या तस्वीरें खींची जा सकती हैं.

असल में सैटेलाइट सेंसर के जरिए सारा काम करते हैं. ये सेंसर भांप लेते हैं कि जमीन पर कहां कौन सा धरातल है. मतलब कहां पहाड़ है, कहां जंगल और कहां नदी. सैटेलाइट ये काम सूरज की रोशनी में बेहतर करते हैं. सूरज की रोशनी हर धरातल पर पड़ कर अलग तरह का असर करती है. मिसाल के तौर पर जंगलों पर पड़ती है तो धरातल तक नहीं पहुंचती. इसलिए वहां बहुत गर्मी नहीं होती. मैदान पर पड़ कर सूरज की रोशनी गर्मी के साथ चमक पैदा करती है.

सैटेलाइट के सेंसर रोशनी के पैटर्न से जगह का एक खाका तैयार करते हैं. ये जमीन पर मौजूद हर चीज को अलग-अलग रंग से दिखाते हैं. जैसे जंगल को हरे रंग से, पानी को गहरे काले और पहाड़ों को पीले आदि. रिमोट सेंसिंग तकनीक से ये भी पता चल जाता है कि किसी इलाके में पहले नदी थी या जंगल. भले ही कई साल गुजर गए हों. एक बार पुख्ता मैपिंग हो जाने पर वो हमेशा ही रिकॉर्ड्स में दर्ज हो जाती है. किसी विवाद के हालात में इस सैटेलाइट इमेजिंग मैप को रेफर किया जा सकता है. इसके साथ रियल टाइम तस्वीरें भी ली जा सकती हैं. दोनों का मिलान करके सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है.

सैटेलाइट इमेजिंग से इलाके में लोगों के जमा होने और अतिक्रमण की स्थिति पर भी नजर रखी जा सकती है. इससे इलाके में भारी भीड़ के जमा होने से लेकर संदिग्ध गतिविधियों पर अलर्ट भी भेजा जा सकता है

आपके मन में ये सवाल उठ सकता है कि सेटेलाइट इमेज तो पहले से ही गूगल पर उपलब्ध है तो इतनी मशक्कत काहे हो रही है. असल में गूगल जैसी प्राइवेट कंपनियों पर राज्य सरकारें भरोसा नहीं करतीं. फिर हर अपडेट के लिए उन पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. ऐसे में अपनी सैटेलाइट पर भरोसा करना ही बेहतर ऑप्शन साबित होगा.

क्या बोले NESAC के कार्यकारी निदेशक?

लल्लनटॉप ने NESAC के कार्यकारी निदेशक डॉक्टर केके शर्मा से बात की और उनसे रिमोट सेंसिंग, सैटेलाइट इमेजिंग को लेकर सवाल किए. उन्होंने हमें बताया,

“रिमोट सेंसिंग के जरिए किसी भी जगह की नेचुरल बाउंड्री को तय किया जा सकता है. मिसाल के तौर पर अगर दो राज्यों के बीच कोई नदी एक नेचुरल बाउंड्री है तो उसे सैटेलाइट इमेजिंग के जरिए तय किया जा सकता है. बाद में अगर नदी रास्ता बदल भी देती है तो हमारे पास सैटेलाइट इमेज से पता लगा सकते हैं कि असल बाउंड्री कौन सी है. इस तरह की इमेजिंग से नेचुरल बाउंड्री को निर्धारित करना आसान हो जाता है.”

अब सबकुछ निर्भर इस बात पर करता है कि जो मैप सैटेलाइट इमेजिंग के जरिए बनाया जाएगा वो असम और मिजोरम को मंजूर होगा या नहीं. अगर तकनीक बरसों से चले आ रहे विवाद का हल बन जाती है तो ये कमाल पूरे पूर्वोत्तर भारत के तमाम जमीनी विवादों को हल कर सकता है.


वीडियो- असम-मिजोरम सीमा विवाद में राहत की खबर के बीच अभी भी एक पेंच फंसा हुआ है!

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