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वो क्यूट लबड़हत्था, जिसे ऑस्ट्रेलिया का ग़ुरूर तोड़ने में रस मिलता था

भारत vs ऑस्ट्रेलिया । वर्ल्ड कप-2011, क्वॉर्टर फाइनल । अहमदाबाद

वर्ल्ड कप भारत में ही हो रहा था. लिहाजा अपनी तो आन-बान-शान टिकी थी. धोनी ने एक बार कहा भी था-

‘उस वक्त (2011 वर्ल्ड कप के दौरान) होटल के रिसेप्शन से लेकर लॉन्ड्री वाला, हर कोई यही कह रहा था कि सर इस बार तो वर्ल्ड कप इंडिया में हो रहा है, तो हम ही जीतेंगे न? इसका बड़ा प्रेशर होता है.’

लेकिन इस अभियान में क्वॉर्टर-फाइनल में सामने पड़ गया ऑस्ट्रेलिया. जिसने पिछली तीन बार लगातार वर्ल्ड कप जीता था. एक बार तो (2003 में) हमें ही फाइनल में हराकर. टारगेट मिला- 261 रन का. लेकिन जी धुकुर-पुकुर तब हो गया, जब 37.3 ओवर में भारत का स्कोर हो गया 5 विकेट पर 187 रन. आउट होकर जा रहे थे महेंद्र सिंह धोनी. स्टैंड्स में झक्क सन्नाटा. लेकिन मैदान पर अंदर कूदा एक क्यूट लबड़हत्था. नाम, सुरेश रैना.

अगली कुछ गेंदों में सन्नाटा रहा. ब्रेट ली ने 40वें ओवर की पहली गेंद शॉर्ट डाली. रैना ने अपना वजन हल्का सा पीछे डालते हुए मिडविकेट पर चौका जड़ा और यहां से खेला शुरू हो गया. रैना-युवी ने जमकर भागा-दौड़ी मचाई. मौके-मौके बाउंड्री निकाली. युवी को साथ चाहिए था. रैना ने दिया. बैटिंग पावरप्ले आया तो ली को लॉन्ग ऑन के ऊपर से छक्का मारा.

भारत ने 47.4 ओवर में टारगेट चेज़ किया. रैना ने 28 गेंदों में 34 रन बनाए. युवराज के साथ 61 गेंदों में 74 रन की पार्टनरशिप की. ऑस्ट्रेलिया वर्ल्ड कप से बाहर. भारत सेमीफाइनल में था.

भारत vs ऑस्ट्रेलिया । तीसरी टी20, 2016। सिडनी

भारत पहले ही तीन मैच की टी20 सीरीज 2-0 से अपने नाम कर चुका था. लेकिन जो टीम वनडे सीरीज 1-4 से हारकर आ रही हो, उसे 3-0 ही कुछ राहत दे सकता था. ये राहत तब दूर होती दिखने लगी, जब टारगेट मिला 198 रन का. जवाब में भारत का स्कोर हुआ 124 पे 2 और क्रीज़ पर आए सुरेश रैना.

ख़ैर, 14.5 ओवर के बाद स्कोर- 147 फॉर 3. आउट कौन हुआ? विराट कोहली. 50 रन करके. अब फिर वही जोड़ी मैदान पर रैना और युवी. लेकिन आज हालात 2011 से अलग थे. रैना टीम में जगह नक्की करने के लिए जूझ रहे थे. युवी भी कैंसर से उबरने के बाद पहले जैसे नहीं रहे थे. चाहिए थे 31 गेंदों में 51 रन.

युवी स्ट्रगल कर रहे थे. तो रैना ने तड़ातड़ मारना शुरू किया. टाई के ओवर में चउवा. वाटसन को चउवा. फिर टाई को दो चउवे. लेकिन फिर भी इक्वेशन टंग गई 6 गेंदों में 17 रन पर. युवी ने पुराने चावल वाला दम दिखाते हुए एक चौका-एक छक्का मारा. जब रैना स्ट्राइक पर आए तो टीम को चाहिए थे 3 गेंदों पर 6 रन.

एंड्रयू टाई की गेंद पर पैड पर, फ्लिक किया, दो रन. अगली गेंद फिर पैड पर फुलटॉस, फिर फ्लिक, फिर दो रन. आखिरी गेंद बाहर निकलती हुई थी, रैना ने रिस्टी पंच लगाया, पॉइंट के ऊपर से. चार रन और इंडिया ने सीरीज 3-0 से निकाल ली थी. रैना ने बनाए 25 गेंद पर 49 रन और फिर से अपनी क्यूट स्माइल लिए मैदान पर फुदक रहे थे.

आज बात इसी खिलाड़ी की करेंगे. क्यूट किलर, जिसने 15 अगस्त को इंटरनेशनल क्रिकेट से रिटायरमेंट ले लिया. उसी दिन जिस दिन एमएस धोनी ने बल्ला टांगा.

क्या आपको ज्ञानेंद्र पांडेय याद हैं?

हीरो की कहानी आज से शुरू हो तो मजा देती है. लेकिन हीरो की कहानी फ्लैशबैक से शुरू हो, तो सीटीमार मजा देती है.

1999 तक क्रिकेट बड़े शहरों का खेल था. क्योंकि बड़े शहरों के खिलाड़ी ही इंडियन टीम में दिखते थे. छोटे शहरों के ‘खिलाड़ियों’ को सिर्फ नौवीं तक ही क्रिकेट खेलना अलाउड था, वो भी संडे-संडे. काहे कि दसवीं में बोर्ड आ जाता था. ज़रा तब की टीम का लाइन अप देखिए.

सौरव गांगुली (कोलकाता), सचिन तेंडुलकर (मुंबई), राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले (कर्नाटक), विनोद कांबली (मुंबई), अजित आगरकर (मुंबई). वगैरह.

लेकिन सबसे बड़ा प्रदेश नेशनल क्रिकेट के नक्शे पर गुम था. उत्तर प्रदेश. रणजी में भी यूपी की मौजूदगी थी. अच्छे खिलाड़ी भी आ रहे थे, लेकिन नेशनल टीम में नहीं आ पा रहे थे. ऐसे में एक नाम उभरा- ज्ञानेंद्र पांडेय. लखनऊ, यूपी के खिलाड़ी.

1999 में पेप्सी कप के लिए ज्ञानेंद्र पांडेय का इंडियन टीम में सेलेक्शन हुआ. ज्ञानेंद्र ने भारत के लिए 2 मैच खेले. टीम से बाहर हो गए. फिर नेशनल टीम में वापसी नहीं हुई. लेकिन टीम इंडिया में यूपी के दरवाजे खुल चुके थे.

अगली ही साल, यानी कि 2000 में टीम इंडिया में यूपी का एक और खिलाड़ी आया. और ऐसा आया कि फिर यूपी ने एक के बाद एक धड़ाधड़ टीम इंडिया को खिलाड़ी देने शुरू कर दिए. नाम था मोहम्मद कैफ. नीड्स नो इंट्रोडक्शन.

2005 का साल, दांबुला का मैदान

अब अपने आज के हीरो की बात.

2005 में भारतीय टीम श्रीलंका गई थी. इंडियन ऑयल कप खेलने. पहला मैच था दांबुला में. इस मैच में भारत के लिए दो खिलाड़ियों ने डेब्यू किया- आंध्र प्रदेश के वेणुगोपाल राव और गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश के सुरेश रैना.

डेब्यू मैच में रैना पहली ही गेंद पर आउट हो गए. मुरलीधरन ने एलबीडब्ल्यू कर दिया. टीम मैनेजमेंट ने मौके दिए, रैना कुछ मैच खेल गए. लेकिन असली खेला तो शुरू हुआ 14वें मैच में. इंग्लैंड के ख़िलाफ फरीदाबाद वनडे. 227 का टारगेट चेज़ करते हुए टीम का स्कोर हो गया था- 25 ओवर में 92 रन पर पांच विकेट.

यहां से जोड़ी जमी दो नए लड़कों की. महेंद्र सिंह धोनी और सुरेश रैना. दोनों ने शानदार साझेदारी की. धोनी जीत से कुछ पहले आउट हो गए, लेकिन रैना 81 रन पर नाबाद लौटे.

2006 में रैना का T20 डेब्यू भी हो गया. 2007 वर्ल्ड T20 की टीम में उन्हें जगह नहीं मिली, लेकिन कालांतर में सानू (रैना का घर का नाम) मास्टर अच्छे T20 खिलाड़ी भी कहलाए. मिस्टर आईपीएल का नाम भी मिला.

कैफ, और फिर रैना का टीम इंडिया में आना इस लिहाज़ से भी अहम साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद उत्तर प्रदेश के खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ा कि हमारे बीच से भी लोग टीम इंडिया में जा रहे हैं. प्रदेश में खेलों का इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हुआ. इसके बाद यूपी ने तड़ातड़ पीयूष चावला, प्रवीण कुमार, भुवनेश्वर कुमार और कुलदीप यादव जैसे खिलाड़ी दिए. यही वो दौर रहा, जब छोटे शहरों का भी टीम इंडिया में प्रतिनिधत्व बढ़ा. फिर रांची के धोनी तो थे ही.

पहले ही टेस्ट में शतक

पहला टेस्ट खेलने के लिए रैना को 5 साल और 98 वनडे तक इंतज़ार करना पड़ा. लेकिन फल मीठा रहा. पहले ही टेस्ट में शतक. और इसी के साथ रैना पहले ऐसे बल्लेबाज हो गए, जिन्होंने तीनों फॉर्मेट यानी- टेस्ट, वनडे और T20 में शतक जड़े.

छठे नंबर पर आकर उन्होंने कई मैच अपनी बैटिंग से फिनिश किए. कमाल की साझेदारियां की. चीते की तरह मैदान में उछलते-कूदते अपनी फील्डिंग से जाने कितनी बार भारत को बचाया. फील्डिंग में तो माय डियर फ्रेंड रैना के लिए दो शब्द कहना चाहूंगा- नेचुरल, एफर्टलेस. हालांकि शॉर्ट बॉल्स ना खेल पाने के लिए अक्सर रैना को कोसा जाता था. शॉर्ट बॉल्स, सीम और स्विंग के सामने रैना बुरी तरह एक्सपोज हो जाते थे और इसी के चलते उनका टेस्ट करियर लंबा नहीं चला. अपने डेब्यू टेस्ट में ही सेंचुरी मारने वाले रैना सिर्फ 18 टेस्ट ही खेल पाए.

हालांकि लिमिटेड ओवर्स में वह सालों तक भारतीय टीम के अहम प्लेयर रहे. खासकर बड़े मैचों में रैना का खेल कमाल ही हो जाता था. वह 2011 वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीम के अहम सदस्य थे. इस वर्ल्ड कप के क्वॉर्टर-फाइनल और सेमी-फाइनल में वो रैना ही थे जिनकी बदौलत भारत को जीत मिली थी. 2015 वर्ल्ड कप तक रैना लिमिटेड ओवर टीम का अहम हिस्सा बने रहे.

कमाल के फिनिशर

रैना ने भारत के लिए 2015 का वर्ल्ड कप भी खेला. वर्ल्ड कप में उनके आंकड़े शानदार हैं. दो वर्ल्ड कप में कुल 9 पारियां खेलने वाले रैना कुल तीन बार नॉटआउट लौटे हैं. इन पारियों में उनके नाम 107.51 की स्ट्राइक रेट और 59.67 के ऐवरेज के साथ 358 रन हैं. रैना ने इस दौरान दो विकेट और नौ कैच भी लिए हैं. सुरेश रैना टीम इंडिया के उन सिपाहियों में से एक थे जिन्हें उनका ड्यू कभी नहीं मिला.

ना जाने कितने मैच फिनिश करने वाले इस प्लेयर को बेस्ट फिनिशर्स की लिस्ट में भी नहीं लिया गया. तमाम मैचों के उदाहरण हैं जब मैच रैना ने बनाया लेकिन बेस्ट फिनिशर नहीं कहे गए. रैना ने अपने करियर की ज्यादातर यादगार पारियां धोनी के साथ खेलीं. इन दोनों के क्रीज़ पर रहते हुए कभी किसी को संदेह नहीं हुआ कि मैच भारत नहीं जीतेगा.

हमारे खेल वाले दद्दा सूरज लिखते हैं कि-

‘फील्ड के बाहर भी रैना और धोनी के ब्रोमांस पर काफी कुछ लिखा जा सकता है. ब्रोमांस की बात होती है तो मुझे ज़्लाटन इब्राहिमोविच और मैक्सवेल याद आते हैं. नीदरलैंड्स से शुरू हुई उनकी दोस्ती, इटली, स्पेन, फ्रांस के कई फुटबॉल क्लबों तक चली और चलती ही जा रही है. साल 2001 से दोनों बेस्ट फ्रेंड्स हैं. धोनी और रैना की दोस्ती भी इस कैटेगरी में रखी जा सकती है. साल 2005 से लेकर अब तक इन दोनों की दोस्ती चली आ रही है.’

2019 के वर्ल्ड कप में हमारे पास अच्छी टीम थी. लेकिन कमज़ोर मिडिल ऑर्डर ले डूबा. वहीं 2011 में रैना ने ही युवराज और धोनी के साथ मिलकर वो मिडिल ऑर्डर तैयार किया था, जिसने कप दिलाया.

गुड लक रैना.


इंडियन क्रिकेट टीम के ‘लालबहादुर शास्त्री’ बन गए सुरेश रैना!

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