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कोविड मरीजों के लिए ऑक्सीजन जुटाने में राज्यों की सांस क्यों फूल रही है?

आज यानी 16 सितंबर को भारत में कोरोना के केस 50 लाख के आंकड़े को पार कर गए हैं. एक्टिव केस हैं करीब 10 लाख. पेशेंट्स या तो अस्पताल में हैं या होम आइसोलेशन में. कहीं भी हों, लेकिन अगर वो गंभीर हैं या उम्रदराज़ हैं तो एक ज़रूरत बड़ी है- ऑक्सीजन की ज़रूरत. और इसका एक ही ज़रिया है- ऑक्सीजन सिलेंडर. लेकिन अचानक से मेडिकल ऑक्सीजन की किल्लत के जुड़ी खबरों की बाढ़ आ गई है.

पहले सरकार की बात सुन लेते हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि देश में मेडिकल ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है. अस्पतालों को ऑक्सीजन के नपे-तुले इस्तेमाल और अच्छे मैनेजमेंट पर ध्यान देना चाहिए. मंत्रालय के सचिव राजेश भूषण ने पूरा गणित गिना दिया-

“देश के कुल कोविड मरीजों में से करीब 6 फीसदी ही हैं, जो ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं. इन मरीजों में से भी 3.69 फीसदी हैं, जिन्हें सिर्फ ऑक्सीजन दी जा रही है. 2.17 फीसदी हैं, जो आईसीयू बेड पर ऑक्सीजन सपोर्ट ले रहे हैं. महज 0.36 फीसदी मरीज वेंटिलेटर पर हैं. हमने राज्यों से बात करके कहा है कि व्यवस्था चुस्त रखें. ऑक्सीजन की कमी न हो.”

लेकिन क्या वास्तव में स्थिति इतनी सरल, सहज है, जितनी सरलता, सहजता से सचिव साब बात कह गए? आइए जानते हैं.

उत्तर प्रदेश

यूपी में कानपुर, लखनऊ जैसे शहरों में ऑक्सीजन सिलेंडर की खपत इधर 3-4 महीने में चार गुना से ज़्यादा बढ़ गई है. दाम भी दोगुने तक हो गए हैं. कानपुर शहर की बात करते हैं. हिंदुस्तान अख़बार में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, शहर में रोज 10 हजार ऑक्सीजन सिलेंडर की खपत हो रही है. पहले ये खपत 2500 सिलेंडर तक ही थी. पहले रोज 2 कंटेनर लिक्विड ऑक्सीजन इस्तेमाल होती थी, जो अब 4 से 5 कंटेनर तक पहुंच गई है. ये ऑक्सीजन पहले 22 से 24 रुपए क्यूबिक मीटर मिल जाती थी. अब दाम 45 रुपए प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच गए हैं. सिलेंडर रीफिलिंग 200 से 250 रुपए महंगी हो गई है.

इसके बाद भी तमाम अस्पतालों से ऐसी शिकायतें आ रही हैं कि जो सिलेंडर पहले 5-5 दिन चलते थे, अब दो दिन में ही खत्म हो रहे हैं. यानी सिलेंडर में कम गैस की शिकायत. कुछ प्राइवेट हॉस्पिटल ऑक्सीजन के नाम पर जमकर चार्ज कर रहे हैं, ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं. हिंदुस्तान अख़बार में ही कानपुर के एक केस का ज़िक्र है, जहां कोविड पेशेंट से 4800 रुपए प्रतिदिन ऑक्सीजन के नाम पर लिए गए.

सरकार होम आइसोलेशन को लगातार बढ़ावा दे रही है. ऑक्सीजन की खपत बढ़ने की एक वजह ये भी है, क्योंकि आर्थिक रूप से सक्षम लोग अब ऐहतियातन घर पर ऑक्सीजन सिलेंडर रख रहे हैं. कथित तौर पर ब्लैक मार्केटिंग के कारण भी सिलेंडर और गैस के दाम बढ़ रहे हैं. इस बात को सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी माना और अधिकारियों को कोविड से जुड़े सभी इक्विपमेंट्स की कालाबाजारी रोकने के निर्देश दिए हैं.

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ऑक्सीजन सप्लाई ऐसा मामला है, जहां स्वास्थ्यकर्मी भी लाचार नजर आ रहे हैं. तस्वीर बेंगलुरू की है. (सांकेतिक फोटो- PTI)

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश से तो अभी 10 सितंबर को ही ख़बर आई थी कि देवास में ऑक्सीजन सप्लाई न मिलने से चार लोगों की मौत हो गई. ऑक्सीजन की किल्लत का आलम यह है कि भोपाल, इंदौर जैसे बड़े शहर भी महाराष्ट्र से आ रही ऑक्सीजन पर निर्भर हैं. कुछ दिन पहले एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा भी था कि उनकी महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे से ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर बात हुई है.

हालांकि राज्य सरकार का दावा है कि प्रदेश में ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता करीब 180 मीट्रिक टन की है और खपत करीब 120 मीट्रिक टन की. ऐसे में अगर कमर्शियल इस्तेमाल कम हो जाए तो डिमांड भर की सप्लाई आराम से हो जाएगी.

इन्हीं दिक्कतों को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने 15 सितंबर को आदेश जारी किया कि कोविड की स्थिति सामान्य होने तक कमर्शियल इस्तेमाल के लिए ऑक्सीजन नहीं दी जाएगी.

महाराष्ट्र

इंडियन मेडिकल असोसिएशन (महाराष्ट्र) के डॉक्टर अविनाश भोंडवे ने एनडीटीवी से बात करते हुए क्या कहा? देखिए–

“महाराष्ट्र को जितनी ऑक्सीजन की ज़रूरत है, उसका 60 फीसदी ही मिल पा रही है. ख़ासकर ग्रामीण इलाके बहुत दिक्कत में हैं. पुणे, सोलापुर, सातारा, उस्मानाबाद, ठाणे, कोल्हापुर जैसे जिलों में सप्लाई बिल्कुल ही कम है.”

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक- महाराष्ट्र की रोज की ऑक्सीजन की ज़रूरत है- 1200 मीट्रिक टन. प्रदेश के सारे ऑक्सीजन प्लांट्स मिलकर रोज 1210 मीट्रिक टन ऑक्सीजन तैयार कर सकते हैं. आप कहेंगे कि फिर दिक्कत क्या है? दिक्कत तब आती है, जब हम ये जानते हैं कि इसमें से 40 फीसदी ऑक्सीजन इंडस्ट्रियल इस्तेमाल में चली जाती है. मेडिकल इस्तेमाल के लिए सिर्फ 60 फीसदी बचती है. फिलहाल सरकार ने इंडस्ट्रियल इस्तेमाल के लिए दी जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा घटाकर 20 फीसदी कर दी है. यानी 80 फीसदी ऑक्सीजन मरीजों को मिलेगी.

साथ ही, महाराष्ट्र सरकार ने सप्लायर्स से ये भी कह दिया है कि दूसरे राज्यों को भेजे जाने वाले सिलेंडरों में कमी लाएं. लेकिन अब इससे मध्य प्रदेश जैसे राज्य, जो ऑक्सीजन के लिए महाराष्ट्र पर निर्भर हैं, उनके लिए दिक्कत होगी.

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जबलपुर के एक अस्पताल का कोविड वार्ड. जितने मरीज दिख रहे हैं, सबने ऑक्सीजन मास्क लगा रखे हैं. वृद्ध मरीजों को ऑक्सीजन की काफी ज़रूरत पड़ रही है. (फोटो- PTI)

राजस्थान

9 सितंबर की बात है. जोधपुर के महात्मा गांधी हॉस्पिटल से ख़बर आई थी कि एक ऑक्सीजन सिलेंडर 5 मिनट से भी कम समय में खाली हो गया. दरअसल यहां करीब 100 कोविड मरीजों को हाई प्रेशर पर ऑक्सीजन दी जा रही थी. ऐसे में खपत बढ़ना लाज़िमी है. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोटा में तो रोज की ऑक्सीजन ख़पत 30 लाख लीटर तक पहुंच चुकी है.

राजस्थान में ऑक्सीजन सप्लाई की किल्लत भी है और दाम भी बढ़े हैं. दरअसल यहां अधिकतर ऑक्सीजन सप्लाई गुजरात से होती है. लेकिन वहां भी कोरोना केस तेजी से बढ़े हैं. इस वजह से पूरी निर्भरता प्रदेश में हो रहे ऑक्सीजन उत्पादन पर ही आ गई है. दाम डेढ़ गुना तक बढ़ चुके हैं.

दिल्ली-एनसीआर में होम आइसोलेशन के पेशेंट तेजी से बढ़े हैं. अब तक राजस्थान से भी यहां ऑक्सीजन सप्लाई होती रही थी. लेकिन अब एक तरफ तो गुजरात से सप्लाई कम हो गई, दूसरी तरफ दिल्ली में डिमांड बढ़ गई. ऐसे में राजस्थान सरकार ने अगले आदेश तक प्लांट्स को कह दिया है कि फिलहाल दूसरे राज्यों में सप्लाई न की जाए. जो प्लांट बाहर सप्लाई करें तो वो भी तभी, जब वो दिन की 50 हजार लीटर ऑक्सीजन राजस्थान में भेज चुके हों.

ये तो चार प्रदेशों का हाल है. इसके अलावा बिहार में हाल में ऑक्सीजन बैंक का उद्घाटन किया गया, लेकिन यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार सवालों में रही है. गुजरात में भी ऑक्सीजन की किल्लत है, इसीलिए उसने मध्य प्रदेश को दी जाने वाली ऑक्सीजन में कटौती कर दी है. बेंगलुरू से भी कुछ दिन पहले ख़बर आई थी कि एक अस्पताल में रात में ऑक्सीजन खत्म हो गई तो सारे मरीजों को आनन-फानन में दूसरे अस्पताल में शिफ्ट कराना पड़ा. इन तमाम केसों को जानने-समझने के बाद लोग स्वास्थ्य मंत्रालय के दावों पर यकीन करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे. ऑक्सीजन का इंतजाम करने में राज्यों की सांस फूल रही है.


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