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क्या आर्यन खान के वॉट्सऐप चैट कोर्ट में सबूत माने जाएंगे?

आपको सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में हुए बवाल और आर्यन खान (Aryan Khan) ड्रग्स केस में एक चीज़ कॉमन नजर आई होगी. वो है वॉट्सऐप (Whatsapp) चैट. एजेंसियां दावा करती रहती हैं कि फलाना के चैट में ऐसा लिखा है, चैट से ये खुलासा हुआ है. लेकिन क्या वाकई इन चैट्स का कुछ मतलब भी है. क्या एक सबूत के तौर पर ये कोर्ट में कहीं टिकती हैं? आइए जानते हैं वॉट्सऐप चैट्स की कानूनी वैधता के बारे में.

कोर्ट में उठा Whatsapp चैट की वैधता का मामला

इंडिया टुडे की संवाददाता अनीषा माथुर के अनुसार जब बॉम्बे हाईकोर्ट में आर्यन खान की बेल का मामला उठा, तब वॉट्सऐप चैट की वैधता पर सवाल उठे. कहा गया कि क्या कानूनन इन चैट्स को प्रथम दृष्टया एक सबूत माना जाए. बुधवार यानी 27 अक्टूबर को आर्यन खान की लीगल टीम ने बहस में कहा कि वॉट्सऐप चैट्स कोर्ट में एक सबूत के तौर पर मान्य ही नहीं हैं.

हालांकि हाईकोर्ट ने 28 अक्टूबर को आर्यन को बेल दे दी, लेकिन लोवर कोर्ट ने आर्यन खान को बेल न देते हुए कहा था कि वो लगातार दूसरे लोगों और ड्रग्स खरीददारों से चैट्स के जरिए संपर्क में थे. ऐसे में भले ही उनके पास से ड्रग्स न मिली हो, लेकिन उन्हें इस बात की पूरी जानकारी थी.

Whatsapp चैट सबूत हैं या नहीं?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम का सेक्शन 65 इस बात पर रोशनी डालता है कि कौन से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कानूनन मान्य हैं. इनमें चैट्स के अलावा ई-मेल और सोशल मीडिया पोस्ट जैसी चीजें शामिल हैं.

भारतीय कानून में एविडेंस एक्ट के तहत दो तरह के साक्ष्य होते हैं. प्राइमरी एविडेंस और सेकेंडरी एविडेंस. किसी भी वॉट्सऐप चैट को तब तक सेकेंडरी एविडेंस माना जाएगा जब तक कि वो डिवाइस कोर्ट में न पेश कर दी जाए जिसके जरिए वो चैट की गई है. सुप्रीम कोर्ट वक्त-वक्त पर प्राइमरी और सेकेंडरी एविडेंस को लेकर स्थिति साफ करता रहा है. मिसाल के तौर पर

सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2020 में अर्जुन पंडितराव खोटक मामले में व्यवस्था दी थी कि,

भारतीय साक्ष्य अधिनियम का सेक्शन 64B(1) साफ फर्क करता है कि जो जानकारी कंप्यूटर या डिवाइस में स्टोर है वो जानकारी डिवाइस के साथ प्राइमरी एविडेंस होगी. उससे निकली कॉपी सेकेंडरी एविडेंस होगी.

17 जुलाई 2020 को सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने स्पष्ट किया था कि जिस पर ये आरोप लगाए जा रहे हैं कि मेसेज करते वक्त डिवाइस उसके पास ही थी, इस बात का ‘सर्टिफिकेट’ होना जरूरी है.. इस तरह का सर्टिफिकेट न होने की हालात में इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेशन को साक्ष्य नहीं माना जा सकता.

हालांकि जस्टिस आरएफ नरीमन ने ये भी साफ किया था कि अगर चैट के साथ उसके धारक की डिवाइस भी पेश की जाती है तो इस तरह के ‘सर्टिफिकेट’ की जरूरत नहीं है.

कोर्ट के दिए गए फैसलों के हिसाब से इलेक्ट्रॉनिक चैट्स को लेकर कोर्ट ने ये व्यवस्थाएं दी हैं.

# जो भी इलेक्ट्रॉनिक रेकॉर्ड पेश किया जाए उसके साथ जरूरी सर्टिफिकेट होना चाहिए. मतलब कोर्ट चाहता है कि चैट और डिवाइस के कनेक्शन की पूरी जानकारी पेश की जाए.

# सर्टिफिकेट इस बात के बारे में बताए कि इलेक्ट्रॉनिक रेकॉर्ड को कैसे पेश किया गया है. मतलब इसे किस तरह से हासिल किया गया है. कब मिली, कहां मिली आदि.

# सर्टिफिकेट में उस डिवाइस की डिटेल जानकारी हो जिसके जरिए रेकॉर्ड पेश किए गए हैं. डिवाइस का मॉडल क्या है, कंपनी क्या है जैसी जानकारियां.

# सर्टिफिकेट में एविडेंस एक्ट के सेक्शन 65B(2) की शर्तों का भी पालन किया गया हो. ये बताना होगा कि जिस समय की चैट बताई जा रही है उस वक्त डिवाइस आरोपी के पास ही थी आदि जैसी जानकारी.

# सर्टिफिकेट पर उस शख्स के भी हस्ताक्षर होने चाहिए जो आधिकारिक तौर पर उस डिवाइस को चलाने के लिए अधिकृत हो.

कोर्ट ने ये भी व्यवस्था दी थी कि इस बात का सर्टिफिकेट भी दिया जाए कि इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस के बारे में जो व्यक्ति जानकारी दे रहा है वो उसके हिसाब से बिल्कुल सही है. ये सारी व्यवस्थाएं कोर्ट ने इसलिए की हैं ताकि इलेक्ट्रॉनिक रेकॉर्ड के सोर्स और सत्यता को कायम रखा जा सके.

अब आपको लग सकता है कि कोई क्यों अपने खिलाफ ही सर्टिफिकेट देगा. वो तो हमेशा मना ही कर देगा. इसके लिए भी कोर्ट ने इंतजाम किया है. अगर कोई ऐसा सर्टिफिकेट देने से मना करे तो सुप्रीम कोर्ट ने खास व्यवस्था दी है. अगर कोई शख्स अपनी डिवाइस के बारे में बार-बार अथॉरिटी के कहे जाने के बाद भी सर्टिफिकेट न दे तो इस बारे में कोर्ट को बताया जाए. कोर्ट ने कहा है कि,

“इस तरह के सर्टिफिकेट के लिए हमेशा कोर्ट में एप्लिकेशन दी जा सकती है. अगर कोई शख्स सर्टिफिकेट देने से मना करता है तो एविडेंस एक्ट के सेक्शन 65B(4) के तहत उसे मांगा जा सकता है.”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात के सारे सबूत हैं कि मशीनरी ने Fake Encounter के आरोपियों को बचाया. (फोटो- PTI)
सुप्रीम कोर्ट के साथ हाई कोर्ट भी वक्त-वक्त पर ये व्यवस्था देते रहे हैं कि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेशन को साक्ष्य के तौर पर कैसे पेश किया जा सकता है. (फोटो- PTI)

आर्यन खान केस में इसका क्या महत्व है?

अब अगर आर्यन केस की बात करें तो यहां पर भी कथित वॉट्सऐप चैट के सर्टिफिकेशन का मामला बनता है. सवाल ये उठता है कि क्या उस फोन को सीज़ किया गया जिससे मेसेज किए गए? ऐसे में वॉट्सऐप मेसेज के जो प्रिंट आउट दिखाए जा रहे हैं उनकी कोर्ट के सामने कोई वैधता है भी या नहीं?

अब एनसीबी अधिकारियों को इस 65 बी के तहत ये सर्टिफिकेट देना होगा कि उन्होंने किन हालातों में, कहां और किस तरीके से वॉट्सऐप चैट आर्यन के मोबाइल से निकाले.

इसके अलावा एनसीबी को वो पंचनामा भी दिखाना होगा जिसके तहत मोबाइल सीज़ किया गया. एनसीबी को बताना होगा कि डिवाइस की चेन ऑफ कस्टडी क्या थी. मतलब कब किसके पास था आदि. इसके अलावा इस बात की पुष्टि भी करनी होगी कि डिवाइस के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है.

ऐसा नहीं है कि पहली बार वॉट्सऐप चैट को साक्ष्य बनाने की कोशिश हो रही है. पहले भी कोर्ट इसे साक्ष्य के तौर पर स्वीकार करता रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2020 में वॉट्सऐप चैट्स और ईमेल को सबूत माना है. कोर्ट ने कहा था कि,

“वॉट्सऐप मेसेज को तब बातचीत माना जा सकता है अगर उसमें कही गई बात की पुष्टि ट्रायल के दौरान दूसरे सबूतों से भी की जा सके. ईमेल और वॉट्सऐप मेसेज को व्यापक बातचीत के तौर पर देखा जाएगा. इसे संपूर्णता में समझा जाएगा”

कहने का मतलब ये कि ऐसा नहीं कि किसी का भी चैट कहीं से भी उठा कर उसे कोट किया जाए और उसका मनचाहा मतलब निकाला जाए. कोर्ट ये कहने की कोशिश कर रहा है कि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेशन को बाकी सबूतों के साथ ही देख कर साक्ष्य माना जाएगा.

इस साल जनवरी में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक ऐसे शख्स को बेल दे दी थी जिसे वॉट्सऐप मेसेज के आधार पर एनडीपीएस एक्ट के तहत आरोपी बनाया गया था. कोर्ट ने कहा कि वॉट्सऐप मेसेज की एविडेंस के तौर पर तक तक कोई वैल्यू नहीं है जब तक उसे एविडेंस एक्ट की धारा 65B के तहत सर्टिफाई न किया जाए.

हालांकि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने कहा है कि ये सर्टिफिकेट ट्रायल के किसी भी स्टेज पर पेश किए जा सकते हैं. आईटी कानून के एक्सपर्ट सीनियर एडवोकेट विवेक सूद ने इंडिया टुडे को बताया कि वॉट्सऐप चैट इस बात का सीधा सबूत नहीं हो सकता कि किसी ने ड्रग्स लिया है. उनका कहना है कि,

“वॉट्सऐप चैट अपने आप में ड्रग्स लेने का सबूत नहीं हो सकती जब तक कि आप ये न साबित कर सकें कि इसके बाद ड्रग्स आया. वॉट्सऐप चैट को सिर्फ इस बात का सबूत है कि दो लोगों के बीच बातचीत हुई. इसे सेकेंडरी सबूत के तौर पर जरूर पेश किया जा सकता है.”

NCB के ऑफिसरों के साथ जाते आर्यन खान.
NCB के अधिकारियों को आर्यन खान के मामले में भी ये बताना होगा कि उन्होंने किस तरह से आर्यन खान के मोबाइल से ये चैट हासिल किए.

क्या है आर्यन खान का मामला?

शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को ड्रग्स केस में 3 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया था. आर्यन को 2 अक्टूबर को एक क्रूज़ से हिरासत में लिया गया था. क्रूज़ से कुल 8 लोगों को हिरासत में लिया गया था. इनके ऊपर नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया. इसके बाद से लगातार एनसीबी आर्यन खान की जमानत अर्जी का विरोध कर रही है. एनसीबी का दावा है कि उसके पास आर्यन खान और एक्टर चंकी पांडे की बेटी अनन्या पांडे के बीच हुए वॉट्सऐप चैट के स्क्रीनशॉट्स हैं. इन चैट के आधार पर अनन्या से तीन बार पूछताछ हो चुकी है. एक स्क्रीनशॉट ग्रुप चैट का भी है, जिसमें आर्यन को “कोकेन टुमॉरो” का प्रस्ताव देते हुए देखा गया है.

वहीं, एक चैट में आर्यन ‘एनसीबी’ के नाम पर अपने दोस्तों को धमकाते भी दिखे हैं. 19 अक्टूबर को मुंबई की विशेष NDPS अदालत ने आर्यन खान, मुनमुन धमेचा और अरबाज़ मर्चेंट की ज़मानत याचिका को खारिज कर दिया था. आर्यन खान को लेकर अदालत ने तब कहा था कि आर्यन जानते थे कि उनके दोस्त अरबाज़ मर्चेंट के पास 6 ग्राम चरस है. इसीलिए चाहे नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को आर्यन के पास कोई ड्रग्स न मिली हों, ये माना जाएगा कि आर्यन खान के पास ड्रग्स का कॉन्शियस पज़ेशन था. आसान भाषा में कहें तो अदालत ने 2 अक्टूबर की घटनाओं को इसी तरह देखा कि आर्यन के पास ड्रग्स और उनकी जानकारी दोनों थीं.

हालांकि हाई कोर्ट से आर्यन को बेल मिल गई है.आर्यन के अलावा मुनमुन धमीचा और अरबाज मर्चेंट को भी जमानत मिल गई है.हालांकि अदालत से आदेश की कॉपी न मिलने के कारण तीनों को शुक्रवार या शनिवार तक जेल से रिहा किया जाएगा.


वीडियो – ड्रग्स केस में गिरफ्तार किए गए शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को बेल कब मिलेगी?

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