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अरुण जेटली नहीं होते तो नीतीश कुमार सीएम नहीं बन पाते

अरुण जेटली. बीजेपी के थिंक टैंक का एक अहम हिस्सा थे. उन्हें गए हुए एक बरस हो चुके हैं. मगर खोने वालों में बस बीजेपी नहीं थी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल थे. नीतीश आज जिस मकाम पर हैं, उसकी सड़क में कुछ अहम पत्थरें जेटली की लगाई हुई हैं. ये 2005 के बिहार का क़िस्सा है. जेटली तब बीजेपी के जनरल सेक्रटरी हुआ करते थे. बिहार प्रभारी भी. नीतीश कुमार को जेडीयू और बीजेपी गठबंधन का चेहरा बनाने के पीछे जेटली का बड़ा हाथ था. 2005 में लालू-राबड़ी के मुकाबले में NDA को मिली जीत के एक अहम हिस्से का श्रेय भी नीतीश और जेटली की पार्टनरशिप को जाता है.

अरुण जेटली के जाने पर नीतीश ने एक साल पहले लिखा था-

फरवरी 2005: लालू तो हार गए, लेकिन जीता कोई नहीं

फरवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू हार गए. मगर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. लालू को 243 में से 75 सीटें मिली थीं. बीजेपी और जेडीयू मिलकर बस 92 ला पाए थे. ये जीत तो थी, मगर सरकार बनाने के लिहाज से अभी NDA काफ़ी दूर था. नीतीश ने जेटली से कहा- गठबंधन तो कर लिया था हमने, लेकिन इस पार्टनरशिप को एक चेहरा नहीं दिया. चुनाव से पहले मुख्यमंत्री कैंडिडेट का ऐलान न करने के कारण ही हम बहुमत नहीं ला पाए.

jaitley nitish kumar
नीतीश कुमार को बनाने वालों में अरुण जेटली का नाम पहले नंबर पर आता है.

नीतीश का कहना था कि बिहार की जनता लालू-राबड़ी को हटाना तो चाहती है. मगर उनकी जगह कौन लेगा, ये नहीं बताए जाने के कारण ठीक से निर्णय नहीं ले पा रही है. जेटली सहमत थे इस तर्क से. मगर उस समय जेटली को ज़्यादा ज़रूरी ये लग रहा था कि सरकार बनाई जाए. वो किसी तरह नीतीश के लिए बहुमत जुटाना चाहते थे. बहुत कोशिशें हुईं. मगर आख़िरकार केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने बिहार विधानसभा भंग करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया. इसके पीछे लालू का बड़ा हाथ था. इस फ़ैसले की मुखालफ़त करते हुए NDA सुप्रीम कोर्ट भी गई. मगर नीतीश दिल ही दिल में चाहते थे कि फिर से चुनाव हो जाएं. वो स्पष्ट बहुमत चाहते थे.

अरुण जेटली के जाने पर एक बरस पहले कांग्रेस और पूर्व प्रधानमंत्री ने इस तरह श्रद्धांजलि दी थी-

पहले चुनाव की ग़लती दूसरे में सुधारी

नवंबर 2005 में फिर से चुनाव हुए. इस बार नीतीश अड़े थे. उन्होंने बीजेपी से कहा. अगर बहुमत चाहिए, तो मुझे मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाओ. ऐलान कर दो मेरा नाम. जेटली सहमत थे. उन्हें महसूस हो गया था कि लालू-राबड़ी राज ख़त्म करना है, तो नीतीश को चेहरा बनाना ही होगा. इसका एक बड़ा कारण ये था कि उस समय बिहार में बीजेपी के पास नीतीश के मुकाबले का कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं था. नीतीश का संदेसा जेटली ने बीजेपी हाईकमान तक पहुंचाया. नीतीश को CM दावेदार बनाने को लेकर बीजेपी का बड़ा सेक्शन तैयार नहीं था. ऐसे में जेटली ने नीतीश के नाम पर सहमति बनाने में बड़ी मेहनत की. वाजपेयी और प्रमोद महाजन, दोनों जेटली से सहमत हो गए. और इस तरह जब 2005 के दूसरे विधानसभा चुनाव के लिए NDA ने प्रचार शुरू किया, तो वोट नीतीश की लीडरशिप में मांगा. मगर नीतीश के नाम के आधिकारिक ऐलान की भी मज़ेदार कहानी है.

वाजपेयी की भूल जेटली ने सुधारी

वाजपेयी की चुनाव रैली थी. भागलपुर में. इस इलेक्शन की उनकी पहली रैली. यहां वाजपेयी को आधिकारिक रूप से ऐलान करना था. कि अगर NDA जीती, तो नीतीश CM बनेंगे. वाजपेयी की उम्र हो चली थी. याद्दाश्त कमज़ोर हो गई थी. ये तय हुआ कि रैली के दौरान वाजपेयी के एक असिस्टेंट अश्विनी वैष्णव उन्हें एक पर्चे में लिखकर ये याद दिलाएंगे. अश्विनी ने तो पर्ची दे दी. मगर वाजपेयी बिना नीतीश के नाम का ऐलान किए भाषण दे आए. अब क्या हो? एक बार फिर जेटली ने प्लानिंग की. अगले दिन सुशील मोदी ने नीतीश के नाम की अनाउंसमेंट की. मगर फिर नया लोचा हो गया. खुद JDU के अंदर नीतीश की उम्मीदवारी का विरोध होने लगा. जॉर्ड फर्नांडिज़ ने बयान दे दिया कि बीजेपी ने नीतीश को उम्मीदवार बनाया होगा, JDU ने नहीं. और तब एक बार फिर अरुण जेटली ने जिम्मेदारी निभाई. फर्नांडिज़ को समझाया. वो राज़ी भी हुए. अगले दिन फर्नांडिज़ ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और नीतीश के नाम पर JDU की भी मुहर लगा दी. और इस तरह नीतीश की राह हुई तैयार.

jaitley with nitish
जेटली और नीतीश के बीच की अंडरस्टैंडिंग गजब की थी.

नीतीश और जेटली में एक अंडरस्टैंडिंग का रिश्ता था

आगे भी जब-जब बीजेपी और JDU के बीच परेशानियां आईं, तब-तब नीतीश से बात करने की जिम्मेदारी जेटली को सौंपी गई. उनके बीच के इक्वेशन का ख़याल करके. बीजेपी और JDU, दोनों की पॉलिटिक्स के हित कई जगह टकराते. ऐसे में भी होनों को एक ट्रैक पर साथ रखने में जेटली का बड़ा हाथ था. कहते हैं कि नीतीश बीजेपी में दो से ही डील करते थे. बिहार में सुशील कुमार मोदी. और दिल्ली में अरुण जेटली. जब नीतीश पर बिहार में बीजेपी पर हावी हो जाने के आरोप लगे. जब कहा गया कि वो अपने आगे बीजेपी को कुछ समझते ही नहीं. तब भी जेटली नीतीश के साथ थे. बीजेपी के कई नेताओं की शिकायतों के बावजूद.

2010: पांच करोड़ रुपये के एक चेक पर गठबंधन टूटने वाला था

फिर वो मौका भी आया. 2010 में. जब कोसी बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए नरेंद्र मोदी के दिए पांच करोड़ की सहायता राशि और इसके बाद हुई पॉलिटिक्स पर गठबंधन के टूटने की नौबत आ गई. संकर्षण ठाकुर की किताब ‘सिंगल मैन’ में बड़े विस्तार से है ये क़िस्सा. मोदी सालों बाद पहली बार बिहार जा रहे थे. पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. पार्टनर होने के नाते नीतीश को बीजेपी नेताओं के लिए भोज देना था. मगर फिर एक सुबह नीतीश ने दो अख़बारों में छपा विज्ञापन देखा. पूरे पन्ने का ऐड. इसमें पांच करोड़ रुपये की मदद के लिए नरेंद्र मोदी को शुक्रिया कहा गया था. नरेंद्र मोदी और नीतीश की एक पुरानी तस्वीर के साथ. गुजरात दंगों के बाद नीतीश किसी भी सूरत में मोदी के साथ असोसिएट नहीं होना चाहते थे. ये बात पूरा बीजेपी जानता था. नीतीश समझ गए, ये विज्ञापन उन्हें चिढ़ाने के लिए छपवाया गया है. बिहार को दी गई मदद का प्रचार करके नीतीश को छोटा बनाया गया है. फिर ये भी था कि बिना नीतीश की जानकारी के ये ऐड छपा कैसे. पैसे वाले विज्ञापनों में जहां मुख्यमंत्री की तस्वीर इस्तेमाल होनी हो, बिना सरकारी अमुमति के नहीं छप सकती.

जेटली के जाने पर पीएम मोदी ने ये लिखा था-

…और तब क्रूज़ पर छुट्टियां बिता रहे जेटली ने जिम्मा संभाला

ज़ाहिर है, नीतीश को ओवरपास किया गया था. बिफरे नीतीश ने भोज न कराने का फैसला लिया. भोज के शामियाने तन चुके थे, मगर उन्हें उतरवा लिया गया. नीतीश ने ऐलान कर दिया. कि मोदी का दिया पांच करोड़ का चेक लौटा दिया गया है. गठबंधन बस टूटा ही समझिए. सुशील मोदी ने नीतीश को समझाने-मनाने की बहुत कोशिश की. मगर वो नहीं माने. और तब फिर से सेवियर बने जेटली. जो उस समय क्रूज़ पर छुट्टियां मनाने गए थे परिवार के साथ. जेटली फोन घुमाने में जुट गए. उनकी मेहनत काम आई और गठबंधन बच गया. नीतीश की कहानी में ऐसे कई मौकों पर जेटली मिलेंगे. जेटली के जाने से यकीनन नीतीश ने अपना एक दोस्त. और बिहार के जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने अपना एक बड़ा हितैषी खो दिया है.


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