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टीम का फ़नकार जिसे बुरी चीज़ों के लिए याद करते हैं

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क्रिकेट में स्विंग बॉलिंग कोई खेल नहीं होता. ये एक कला होती है. इसके लिए आपके अंदर हुनर होना चाहिए. इसी स्विंग बॉलिंग में एक और कैटेगरी होती है. बनाना स्विंग. बनाना यानी हिंदी में केला.


हाथ से छूटने के बाद केले के शेप में रास्ता नापती हुई पहुंचती गेंद. इस बनाना स्विंग के लिए आपको खिलाड़ी नहीं फ़नकार होना पड़ता है.


इंडिया में ऐसे ही एक फ़नकार का नाम था मनोज प्रभाकर. प्रभाकर का नाम भले ही कुछ ग़लत कारणों से ज़ेहन में धंसा हुआ है. लेकिन स्विंग बॉलिंग करने वाले अहम इंडियन प्लेयर्स में इनका नाम ज़रूर आता है. आता रहेगा भी. वो गेंद जो बैट्समैन ऑफ स्टम्प के बाहर देखकर छोड़ने का मन बना चुका होता था, अगले ही पल अपने ऑफ-मिडल स्टम्प पर गेंद को पाता था. सेकण्ड के कुछ हिस्से के भीतर. ज़रा सोचिये, राईट आर्म ओवर द विकेट से दाहिने हाथ से फेंकी गयी गेंद, ऑफ स्टम्प के बाहर जाती दिख रही होती है. और जैसे ही आधी पिच पार करती है, बैट्समैन की तरफ़ आने लगती है. और उसका सफ़र खतम होता है लकड़ी के एक टुकड़े पर. या तो स्टम्प, या बैट्समैन के बल्ले का किनारा. मनोज प्रभाकर के तरकश में रखा ये एक तीर था.

मनोज प्रभाकर ने अपने एकदम शुरुआती दौर में चैंपियंस ट्रॉफी में खेला था. 1989-1990 सीज़न में. मैदान था शारजाह का. वो शारजाह जो मन आने पर गेंदबाजों की कब्र बन जाता था. सामने थी वेस्ट इंडीज़ की टीम थी. वो भी सीधे विव रिचर्ड्स. तपती दोपहर में प्रभाकर रिचर्ड्स को गेंद डालने के लिए दौड़ पड़े. बेहतरीन आउटस्विंग. लेकिन जितनी देर प्रभाकर ने अपने रन-अप में लगायी थी. उससे कम देर में गेंद रिचर्ड्स के बल्ले को छूकर बाउंड्री तक पहुंच गयी. ये पहली गेंद थी. अगली गेंद इनस्विंग. रिचर्ड्स ने एक और चौका मारा. यहां से हर किसी को मालूम चल गया था कि प्रभाकर समेत सभी इंडियन बॉलर्स का क्या हाल होने वाला था. प्रभाकर के लिए ये एक बड़ा सबक था. उन्हें इंटरनेशनल और डोमेस्टिक क्रिकेट के लेवल के बीच के अंतर के बारे में सब कुछ मालूम चल चुका था.


लेकिन मनोज प्रभाकर की एक फितरत थी. वो जिद्दी था. हार न मानने वाला. उसे ये अहसास हो गया कि बड़े लेवल पर सिर्फ़ स्विंग ही नहीं लेट स्विंग की ज़रुरत है.


इसलिए वो जुट गया. अपनी शुरूआती स्विंग को काटने में. हमारे-आपके लिए ये एक सवाल है कि कैसे स्विंग के समय को भी घटाया-बढ़ाया जा सकता है? लेकिन प्रभाकर इसके जवाब को ईज़ाद कर रहा था. अब गेंदें ज़्यादा सीधी फेंकी जाने लगीं. जिससे लेट मूवमेंट मिलने लगा. और पुनर्जन्म हुआ उसका जिसका आज जन्मदिन है. मनोज प्रभाकर. 15 अप्रैल 1963. गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश की पैदाइश.

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मनोज को मैंने हाल ही में टीवी पर देखा. क्रिकेट की ड्रेस में. एक पाकिस्तानी क्रिकेटर के साथ. दोनों की ही ड्रेस एक सामान थीं. लेकिन दोनों की ड्रेस किसी और ही देश की थीं. अफ़ग़ानिस्तान. मनोज प्रभाकर अफ़ग़ान टीम के बॉलिंग कोच थे. टी-20 वर्ल्ड कप तक. साथ ही पाकिस्तानी धांसू बैट्समैन इंज़माम उल हक़, अफ़ग़ानिस्तान के हेड कोच. इसके पहले मनोज दिल्ली रणजी टीम के कोच रहे. अपने आइडियाज़ को उस टीम में काम में न लाये जाने पर मुंह फाड़ के बोल दिया. बीसीसीआई ने निकाल बाहर कर दिया. वही बीसीसीआई जिसने 2000 में इन्हें बैन कर दिया था. मैच फ़िक्सिंग के आरोप में.

मैच फ़िक्सिंग जो मनोज के मुताबिक़ इंडियन टीम में घुस के बैठी थी. जिसे मनोज ने एक्सपोज़ करने की सोची थी. मनोज का मेन निशाना थे कपिल देव. जिन्होंने प्लेयर्स को मैच में ख़राब खेलने के लिए पैसे ऑफर किये थे. तहलका के साथ मिलकर स्टिंग ऑपरेशन किये. रवि शास्त्री, सुनील गावस्कर, किरण मोरे, सिद्धू जैसे बड़े नामों को कैमरा पर लाये. अदालत को रिकॉर्ड्स दिए. टेप दिए. लेकिन चाल उल्टी पड़ गयी. मनोज को खुद ही मैच फ़िक्सिंग में शामिल पाया गया. मिला पांच साल का बैन. 2006 में बैन हटा.


ये इंडियन क्रिकेट का सबसे काला दौर था. 2007 में बांग्लादेश से ग्रुप मैच में हारकर टूर्नामेंट से बाहर आने से भी काला दौर.


प्रभाकर ने वन डे मैचों में 2 और टेस्ट मैचों में 1 सेंचुरी मारी. आखिरी वन डे सेंचुरी की शायद ही इन्हें कोई खुशी हो. इस सेंचुरी के बाद इन्हें टीम से ड्रॉप कर दिया गया था. टीम वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ खेल रही थी. 9 ओवर में 63 रन चाहिए थे. नयन मोंगिया और प्रभाकर क्रीज़ पर थे. प्रभाकर ने कुल 102 रन बनाये. इंडिया मैच हार गयी. आखिरी 9 ओवरों में मात्र 16 रन आये. 54 गेंदों में 16 रन. मोंगिया ने 21 गेंदों में 4 रन बनाये. मैच खतम होने के बाद उनसे पूछा गया कि ऐसी परफॉरमेंस की वजह क्या थी तो उल्टा उन्होंने ही सवाल पूछ लिया. कहने लगे – क्या आज से पहले कभी इंडिया ने 9 ओवरों में 63 रन बनाये हैं?

1996 के वर्ल्ड कप में सनथ जयसूर्या ने प्रभाकर को बेदर्दी से मारा था. ऐसा लग रहा था उस दिन जयसूर्या मन बना के आये थे कि आज मनोज को ही मारना है. 4 ओवरों में 47 रन दिए. इस मैच के बाद मनोज ने रिटायरमेंट ले लिया.

2000 में प्रभाकर ने एक बम फोड़ा. कहने लगे कपिल देव ने उन्हें 25 लाख रूपये ऑफर किये थे. बीसीसीआई के पूर्व प्रेसिडेंट इन्दरजीत सिंह बिंद्रा ने सीएनएन के एक प्रोग्राम में ये कहा भी कि मनोज ने उन्हें कपिल देव के पैसे ऑफर करने के बारे में चेताया भी था. मनोज से सबूत मांगे गए तो फ़ास्ट बॉलर प्रशांत वैद्य का नाम आया. प्रशांत उस कमरे के बगल में था जिसमें कपिल देव ने मनोज को पैसे देने की बात कही थी. दोनों कमरों के बीच एक दरवाजा था जो उन्हें जोड़ता था. लेकिन प्रशांत केस में बहुत इट्रेस्टेड नहीं थे और मुकर गए.

प्रभाकर अपनी आदत से मजबूर थे. ज़िद की आदत. अपनी देह पर ख़ुफ़िया कैमरे चिपका कर खुद ही सबूत इकठ्ठा करने निकल पड़े. तहलका के साथ मिलकर उन्होंने इस स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया. वीडियो टेप्स को पब्लिक कर दिया गया. अदालत को दिए गए. एक किताब आई. नाम था – Fallen Heroes. इस किताब में इस पूरे वाकये का इत्मिनान से बखान है. देश को सन्न करने वाला वाकया.

वीडियो टेप्स में वो सब कुछ था जो ये बता सकता था कि कुछ तो ऐसा था जो इंडियन क्रिकेट में गड़बड़ चल रहा था. उस दिन से ही नहीं, सैलून से चलता आ रहा था. लोगों की तरफ इशारे किये जा रहे थे. लोगों के नाम लिए जा रहे थे. लेकिन कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे कुछ ठोस सबूत मिल सके. कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे किसी नतीजे पर पहुंचा जा सके.

इसी दौरान बीबीसी के एक इंटरव्यू के दौरान कपिल देव से इसी बारे में बात करने पर वो फफक के रो पड़े.


कहते हैं कि इंडिया को पहला वर्ल्ड कप दिलाने वाले के आंसुओं ने उसी दिन खुद को क्लीन चिट दिलवा दी थी. कई ये भी कहते हैं कि ये सब कुछ एक स्टंट था. कपिल की साख बचाने के लिए.


सारा खेल यहीं से उलट गया. दिनों दिन प्रभाकर के अकाउंट, उनकी संपत्ति खंगाली जाने लगी. Fallen Heroes के लिए एक नए हीरो के गिरने की तैयारी होने लगी. कोर्ट के फाइनल डिसीज़न में कपिल देव बरी हुए. मोहम्मद अजहरुद्दीन, नयन मोंगिया, अजय जडेजा, अजय शर्मा और मनोज प्रभाकर नापे गए. अली ईरानी, टीम इंडिया का फिज़ियो भी.Match Fixing

कपिल के बारे में कहा गया कि क्यूं विश्व जीतने वाला कप्तान किसी ऐसे चक्कर में पड़ेगा? क्यूं वो प्रभाकर जैसे अदने खिलाड़ी को पैसे ऑफर करेगा. लेकिन अगर स्टैट्स देखें तो कहानी और ही दिखेगी. 1989, जब प्रभाकर दोबारा टीम इंडिया में आये, तबसे कपिल के रिटायरमेंट तक, मनोज कहीं आगे थे. कपिल के 975 रनों के सामने प्रभाकर के 1106 रन थे. कपिल के 92 विकेटों के आगे 120 विकेट प्रभाकर के थे. आखिरी दो सालों में ये गैप बहुत ही बढ़ गया था.

कपिल ने कभी किसी कमरे में प्रभाकर से पैसे के बदले ख़राब खेलने की बात की थी या नहीं? प्रशांत वैद्य ने बीच के दरवाज़े से इन दोनों की बात सुनी थी या नहीं? अजहर ने किसी सट्टेबाज से पैसे मांग के कोई घड़ी खरीदी थी या नहीं? बड़े प्रोफाइल के केसों की जैसी फितरत होती है, उसी तर्ज़ पर ये केस केस भी इन सवालों के जवाब नहीं दे पाया. लेकिन इतना यकीन है कि गलती किसी की भी हो, ये इंडियन क्रिकेट पर ये सबसे गन्दा और गाढ़ा दाग था.

मनोज प्रभाकर ने अपने कैरियर के एक बड़े हिस्से में अपनी ही टीम के लोगों के स्टैण्डर्ड से ऊपर उठकर परफॉर्म किया. बल्ले से भी, बॉल से भी. लेकिन दुनिया की फितरत ही ऐसी ही है कि जो एक ऐब के आगे हजार हुनर को लात मार दरकिनार कर देती है. प्रभाकर ने जो किया, क्रिकेट के खिलाफ़ था. मगर उसके इतर वो जो कुछ था, वो सिर्फ मनोज प्रभाकर हो सकता था.


वीडियो- वो क्रिकेटर जिसने स्टैंड्स में घुस के दर्शकों को दौड़ा कर मारा

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