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इस इंटरव्यू में आरिफ मोहम्मद खान ने यूपी-बिहार-दिल्ली के मुसलमानों पर क्या कहा?

आरिफ मोहम्मद खान. केरल के गवर्नर. हाल ही में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के एक सेशन में शरीक हुए थे. शीर्षक था ‘मेजॉरिटी-माइनॉरिटी: द बैटल ऑफ़ बिलॉन्गिंग. हाउ टू रीथिंक द मुस्लिम क्वेश्चन इन इंडिया’. सेशन के दौरान आरिफ मोहम्मद खान ने टीआरपी की दौड़ में फंसी भारतीय मीडिया पर सवाल खड़ा किया था. कहा कि मीडिया का काम राजनेताओं को सही रास्ते पर रखना था, लेकिन वो ख़ुद भटक गया है.

India Today Conclave
India Today Conclave 2021 के एक सेशन के दौरान आरिफ मोहम्मद खान.

इसी विषय पर शीबा असलम फहमी ने आरिफ मुहम्मद खान का अलग से इंटरव्यू किया. जानते हैं उन्होंने क्या-क्या कहा.


सवाल: इंडिया टुडे के मीडिया कॉन्क्लेव में आपने ये सवाल किया था कि मीडिया ने अपनी ज़िम्मेदारी कहां तक निभाई है. ये पहली बार हुआ है कि सत्ताधारी पक्ष से कोई ज़िम्मेदार शख़्सियत मुख्यधारा के मीडिया से ये सवाल करे, कहीं ना कहीं ये तो आरोप भी है?

जवाब: देखिए, न तो मैंने सवाल खड़ा किया और न मैंने आरोप लगाया. मैंने कहा कि मैं सबसे पहले अफ़सोस और दुख ज़ाहिर करना चाहता हूं. हिंदुस्तान आज़ादी की 75वीं सालगिरह मना रहा है. ये आज़ादी हमें मुल्क के बंटवारे के साथ मिली थी. वो बंटवारा कितना ख़ूनी था. कितना हिंसात्मक था. जिस सवाल को लेकर मुल्क तक़सीम हुआ, आज 75 साल बाद उसी सवाल को डिस्कस कर रहे हैं.

बहुत से लोगों की ये राय है कि अंग्रेज़ों ने जो सिस्टम हमारे मुल्क में चलाया था वो संवैधानिक था, क़ानूनी था. उस वक़्त के लिहाज से. क्योंकि उनकी पार्लियामेंट ने वो क़ानून पास किए थे. उस क़ानून के मुताबिक़ सेपरेट इलेक्टोरेट था. मुसलमान अपने नुमाइंदे चुनेंगे, हिन्दू अपने नुमाइंदे चुनेंगे. तो इसका मतलब क्या हुआ कि एक मुसलमान ही मुसलमान का प्रतिनिधित्व कर सकता है, कोई और नहीं कर सकता? यानी जनरल सीट से तो कोई भी लड़ सकता है, लेकिन मुसलमान सीट से सिर्फ़ मुसलमान ही लड़ सकता है.

हमारे बहुत से लीडर हैं, बल्कि मैं इस तरह कहूंगा कि थॉट-लीडर्स हैं, जिनका ये मानना है कि उस ही सिस्टम के चलते अलगाववाद की भावना इतनी बढ़ी कि आख़िरकार मुल्क का विभाजन हो गया.

आज़ाद होने के बाद हमने एक नया संविधान अपनाया. जिसमें हमने सेपरेट इलेक्टोरेट ख़त्म किया और छुआछूत को ख़त्म किया. संविधान सभा में कहा गया कि इन दोनों चीज़ों ने हिंदुस्तान के समाज को अंदर से कमज़ोर और खोखला कर दिया. तो जिस अलगाववाद और छुआछूत ने हमें वहां पर पहुंचा दिया कि कोई भी आता था और हम पर राज करता था, हमें उससे निजात मिला.

अंग्रेज़ इस मुल्क को एक क़ौम (राष्ट्रीयता) मानते ही नहीं थे. वो कहते थे कि ये तो मुख़्तलिफ़ समुदायों का संग्रह है. यानी समुदायों पर ज़ोर था. हमारे संविधान ने कहा कि हिंदुस्तान की संवैधानिक इकाई, यानी जो ईंट है इस बिल्डिंग की, वो इंडिविजुअल सिटीजन है‌- नागरिक है.

आप आर्टिकल 25 पढ़िए जिसमें धर्म की स्वतंत्रता की बात है. वो समुदाय के लिए फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन नहीं कहता. वो प्रत्येक व्यक्ति को बराबर से धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है. यहां तो सेक्युलर डेमोक्रेसी से पहले, ग़ुलामी में भी इंडिविजुअल (व्यक्तिगत) कॉन्सेप्ट रहा है. लेकिन बाक़ी दुनिया में सेक्युलर डेमोक्रेसी के साथ ये सिद्धांत आया.

जो आज़ादियां हैं संविधान में, वो व्यक्ति को दी गई हैं. अब हमारी ज़िम्मेदारी थी कि आज़ादी और संविधान बन जाने के बाद, ख़ासतौर से विभाजन का ज़ख्म झेलने के बाद हम अपने नए संविधान के मुताबिक़ जो एक नैतिकता है, जो एक दृष्टिकोण है, जो एक सोच है, समझ है, वो बनाते. हम ये नहीं कर पाए और ये स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए.

मैं मानता हूं कि ये राजनीतिक वर्ग की सबसे बड़ी नाकामी है. इसमें जो मील का पत्थर साबित हुआ वो था शाहबानो का केस. उसके अलावा भी बहुत चीज़ें हुईं. लेकिन जो सबसे बड़ा धक्का लगा सरकार के लेवल पर, वो लगा शाहबानो के केस में.

मीडिया के लिए मैंने सवाल नहीं किया, अफ़सोस का इज़हार किया. मैंने कहा कि जहां मैं, यानी पॉलिटिकल क्लास, ग़लती कर रहा था, वहां आपने सवाल नहीं उठाया. मीडिया को लोकतंत्र का उतना ही महत्वपूर्ण स्तम्भ माना जाता है जितना बाक़ी तीन स्तंभ. मैं अगर अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा न कर सकूं, तो आपका काम है मुझसे सवाल करना. आपका काम है मुझे ये बताना कि तुम जो काम कर रहे हो वो संविधान की आत्मा के अनुरूप नहीं है. लेकिन आप क्या कर रहे हैं? आप ऐसे इडियम और टर्मिनोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो बंटवारा कराने वाले हैं. ‘मुस्लिम क्वेश्चन – हिन्दू क्वेश्चन’, इसे इस्तेमाल कर रहे हैं.

संविधान में कोई अधिकार है जो हिन्दू के नाम पर दिया हो? मुसलमान के नाम पर दिया हो? सिख के नाम पर दिया हो? कुछ नहीं दिया! संविधान तो व्यक्ति या नागरिक की बात करता है. बजाय ये कहने के कि आप ये ग़लती कर रहे हैं, आप (यानी मीडिया) तो डिस्कशन इस पर करा रहे हैं की बहुसंख्यक क्या है, अल्पसंख्यक क्या है, मुस्लिम क्वेश्चन क्या है? क्या यही बहस करते रहेंगे हम?

इसीलिए मैंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर (बिपिन चंद्र) को कोट किया. जिन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि हमें चौकन्ना, सचेत होकर किसी भाषा या मुहावरे का इस्तेमाल करना चाहिए. क्योंकि अगर हम ऐसी भाषा और मुहावरे का इस्तेमाल करेंगे जिससे लोगों में ये भावना बढ़ेगी कि मेरा ताल्लुक़ इस संपद्राय से है, तो आगे चलकर वो ‘सांप्रदायिक चेतना’ में बदल जाती है. जबकि मेरे अंदर ये चेतना आनी चाहिए कि नागरिक के तौर पर मेरे अधिकार क्या हैं, मेरे कर्तव्य क्या हैं. लेकिन हमारे यहां हर व्यक्ति की इस चेतना को बढ़ाया जा रहा है कि उसका ताल्लुक़ किस संप्रदाय से है.

Arif Mohammad Khan
India Today Conclave 2021 के एक सेशन के दौरान आरिफ मोहम्मद खान.

सवाल: आपने भाषा का सवाल भी उठाया है. इसी से जुड़ा सवाल है, पत्रकारिता में भाषाई बदलाव पर. पहले कभी भी ये नहीं छप सकता था की हिंसा किन सम्प्रदायों के बीच हुई या मरने वालों के क्या नाम थे, जिससे उनके धर्म का पता चले. अब हर बात पर हिन्दू-मुस्लमान जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं. आप क्या महसूस करते हैं? आज कहां जा रही है पत्रकारिता?

जवाब: मैंने तो आपसे पहले ही कहा कि 1986 के बाद ये जो पतन है उसकी गति इतनी ज़्यादा है कि आप हिसाब-किताब नहीं रख सकते. मुझे अच्छी तरह याद है कि 70 और 80 के दशक में पंजाब के एक राजनीतिक दल ने एक समुदाय के लिए ‘क़ौम’ लफ्ज़ इस्तेमाल किया था. उस पर पूरे देश में इतनी उग्र प्रतिक्रिया आई कि किसी एक संप्रदाय के लिए क़ौम लफ़्ज़ कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं? उस वक़्त की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तक उस पर बोलीं और हद ये हो गई की उस पार्टी की जो समर्थक पार्टियां थीं, उन तक को ये कहने पर मजबूर होना पड़ा कि ये ग़लत हुआ है.

आज आप आमतौर से टीवी की डिबेट में सुनिए. बिरादरियों को, जातियों को ‘क़ौम’ कह कर पुकारा जाता है. हमारे हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के नेताओं ने जिस ‘क़ौम’ की कल्पना की थी, हमारे संविधान ने जिसका प्रावधान किया है, वो राष्ट्र है. यहां समुदाय हो सकते हैं, बहुत सारे, और हैं भी, लेकिन ‘क़ौम’ तो एक है, राष्ट्र तो एक है, वो कई नहीं हैं. तो ये हुआ है पतन. आज नहीं तो कल हमें इसका नोटिस लेना पड़ेगा और हमें अपनी भाषा को सुधारना पड़ेगा, अपने अंदर संयम लाना पड़ेगा!

सवाल: भाषाओं में भी पत्रकारिता होती है. उर्दू भाषा की जो पत्रकारिता है, उसके बारे में आपका क्या ख़्याल है? वहां क्या हो रहा है? क्या आप उर्दू के अख़बार-रिसाले देखते हैं? उर्दू मीडिया में क्या चल रहा है?

जवाब: अब तो मैं केरल में हूं और वहां तो उर्दू नहीं है. लेकिन मैं आपको शाहबानो के वक़्त की बताता हूं. दिल्ली से एक हफ़्तेवार अख़बार निकलता था. चार में से कम से कम तीन अंक उसके ऐसे होते थे, जिसमें पहले पृष्ठ पर ख़ंजर बना हुआ और उसमें से खून टपकता हुआ होता था. ये कोई तरीक़ा है?  ऐसा लगता है जैसे काग़ज़ को काला न कर रहे हों, बल्कि दिलों को काला करने की कोशिश कर रहे हों.

केरल और तमिलनाडु में सांप्रदायिकता नहीं है – आरिफ़ मोहम्मद खान

और ये लगातार वो लोग करते हैं जो आम लोगों के लिए पर्सनल लॉ की बात करेंगे, लेकिन उनकी ज़िंदगी देखिए, उनके अपने परिवार देखिए, तो पता चलता है की कुछ उल्टा मामला है. उनके अपने लिए पर्सनल लॉ नहीं है, लेकिन आम आदमी के लिए वो पर्सनल लॉ के बड़े मुजाहिद हैं.

पर्सनल लॉ बोर्ड के एक बड़े लीडर की अपनी बेटी की शादी हुई. उन्होंने रुपयों में नहीं सोने के तोलों में मेहर लिखवाया, तो उन्हें तो ये हक़ हासिल है. लेकिन शाहबानो को ये हक़ हासिल नहीं था. उनकी नज़र में वो उस शख़्स से 250 रुपये हासिल कर सके, जिसके लिए उसने पांच बच्चे पैदा किए, जिसका घर चलाया तक़रीबन 40-50 साल. और जिसको उसके शौहर ने बिना तलाक़ दिए निकाला. जब उसने पहली अर्ज़ी दी अदालत में तब वो तलाक़शुदा नहीं थी, उसने मेंटेनेंस मांगी थी. उसके शौहर ने अदालत से नोटिस मिलने के बाद कहा कि अब मैंने तलाक़ दे दी, तो ये तो ‘मिस्चीफ़’ है.  ‘मिस्चीफ़-मेकर्स’ के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है. तो अपने लिए एक स्टैंडर्ड है इन लोगों का. दूसरों के लिए दूसरा स्टैंडर्ड है.

मैं आपको इससे बढ़ कर एक बात कहता हूं. इस वक़्त देश में दो सूबे ऐसे हैं जहां आपको सांप्रदायिकता की भावना नज़र नहीं आती है. केरल और तमिलनाडु. पॉलिटिक्स में कम्युनिटी और बिरादरी के नाम पर पार्टियां बनी हुई हैं. जिसे ‘कम्युनलिस्म’ के अंदाज़ में हम समझते हैं ‘नफरत’. इन दो सूबों में ये नफरत नज़र नहीं आती. लेकिन लोग ये भूल जाते हैं कि कर्नाटक भी केरल की ही तरह था. हालांकि कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में एक फ़र्क़ था. वो ये कि कर्नाटक में उर्दू ज़ुबान थी. उत्तर प्रदेश और बिहार वाले (मुसलमान) कर्नाटक पहुंच गए. 1985 -86 के बाद और माहौल बदलता चला गया. केरल और तमिलनाडु वो इसलिए नहीं पहुंच पाते कि वहां उर्दू नहीं है.

अब इसमें ये मत समझिएगा कि मैं उर्दू ज़बान की बुराई कर रहा हूं. उर्दू की ख़ता कोई नहीं है. ये जो उत्तर प्रदेश और बिहार की अशराफ़ियां है (ऊंची ज़ात कहलानेवाले मुसलमान), इनका ज़हन इतना तक़सीमी है. पंजाबियों ने मुल्क नहीं बंटवाया है, सिंधियों ने नहीं बंटवाया, बंगालियों ने नहीं बंटवाया, यही यूपी-बिहार और दिल्ली के लोग थे. इन्होंने मज़हब का सवाल खड़ा किया. कहा इस्लाम ख़तरे में होगा, कहा उर्दू ज़ुबान ख़तरे में होगी, कहा मुस्लिम तहज़ीब ख़तरे में होगी अगर मुल्क नहीं बंटा तो!

हालांकि इनके अपने इलाक़े पाकिस्तान बनने वाले नहीं थे और आज पाकिस्तान में ये मुहाजिर बन के रह रहे हैं. वहां की मेनस्ट्रीम का हिस्सा नहीं बने. उर्दू तो कर्नाटक वाला भी बोलता है तभी उर्दू थी वहां पर. लेकिन जब तक यूपी और बिहार के लोग कर्नाटक नहीं पहुंचे, वहां का माहौल बिल्कुल केरल और तमिलनाडु की तरह था. तो अगर ये जाकर पूरे सूबे के माहौल को बदल सकते हैं, तो ख़ुद अपने यहां क्या करते हैं उसका तो तसव्वुर ही किया जा सकता है.

सवाल: मीडिया का सवाल सिर्फ़ भारत तक ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय फोरम का भी बड़ा सवाल है. ये सवाल सिर्फ फ़िरक़ापरस्ती के हवाले से नहीं बल्कि, पूंजीवाद के प्रोपैगेंडा टूल, एजेंडा और तकनीकी का सवाल भी है. क्या बिना मीडिया के ज़िंदगी का तसव्वुर मुमकिन है?

जवाब: नहीं, बिल्कुल मुमकिन नहीं, और बग़ैर मीडिया के जम्हूरियत तो चल ही नहीं सकती. लेकिन बग़ैर पॉलिटिशंस के भी नहीं चल सकती. तो क्या हम पॉलिटिशंस को बे-नकेल के छोड़ दें? हर किसी को अपनी मर्यादा में रहना है. हाथ उठाने की आज़ादी है कहां तक, जहां मेरा हाथ आपकी नाक से न टकराए. यही मेरी आज़ादी की हद है. हालांकि ‘धर्म’ शब्द का अर्थ रिलिजन नहीं है. लेकिन यहां मैं रिलिजन के सेंस में इस्तेमाल कर रहा हूं. कोई धार्मिक परंपरा, रिलीजियस ट्रेडिशन ऐसा नहीं है जो आपको ये हक़ देता हो कि आप दूसरे के पैर के ऊपर अपना पैर रख दें. बल्कि हर जगह कहा गया है कि दूसरे को तकलीफ़ न पहुंचाओ, इसके अलावा जो दिल चाहे वो काम करो. इसको कहते हैं गोल्डन रूल.

जो पर्सनल लॉ की बात करते हैं, उनके घर में ही पर्सनल लॉ नहीं है – आरिफ़ मोहम्मद खान

हमारी भारतीय परंपरा में व्यास ने हिंदुस्तान की सारी हिकमत की किताबों की तालीफ़ (दो चीजों को संयुक्त करना) की. उन्होंने अपनी सारी किताबों का निचोड़ क्या बताया? ‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् , परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’, अर्थात मैंने बहुत किताबें लिखी हैं, लेकिन सबका निचोड़ एक लाइन में सुन लो- दूसरे का भला करना सवाब का काम है, और दूसरे का बुरा करना गुनाह है. इसके अलावा और कुछ भी नहीं है सारी किताबों में.

सवाल: आपने नकेल की बात की, पॉलिटिकल क्लास और मीडिया पर. इस वक़्त बहुत बड़ा सवाल है मीडिया में क्रॉस इंटरेस्ट का. मीडिया का मालिक कौन है, उस मालिक के हितों की रक्षा का भी सवाल है. किस तरह की नकेल हो सकती है? क्योंकि सेल्फ-इम्पोज़्ड नकेल तो बड़े काम की नहीं है, इस पर समाज कैसे मंथन करे और एक राय पर पहुंचे?

जवाब: मुझे ये लगता है की डेमोक्रेसी में आप बाहर से इम्पोज़ नहीं कर सकते. अगर किसी भी इदारे को सेहतमंद तरीक़े से चलना है तो उन्हें ख़ुद अपने फ़ैसले करने पड़ेंगे. अगर हुकूमत को भी हम ये हक़ दे दें तो शायद उसके नतीजे बहुत अच्छे नहीं निकलेंगे. इसी तरह अगर हम मीडिया में बिल्कुल स्वच्छंदता कर दें तो उसके भी नतीजे अच्छे नहीं होंगे.

क्या पहले अख़बारों के मालिक नहीं होते थे? लेकिन उनमें इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि संपादक को कोई सुझाव भी दे दें. क्योंकि अख़बार चलता था संपादक के नाम से. वे (संपादक) इतने चरित्रवान लोग थे कि मालिक की हिम्मत नहीं होती थी उनसे कुछ कह सके! (लालकृष्ण) आडवाणी जी ने लिखा है, “आपातकाल में सरकार ने तो तुमसे बैठने के लिए कहा था, तुम लेट गए.”

एक बड़े लीडर के लिए कहा जाता था कि बड़े तानाशाही हैं, किसी की सुनते नहीं. मैंने उनके मातहत काम किया जूनियर मिनिस्टर के बतौर. एक नहीं, कई-कई क़िस्से हैं. जूनियर मिनिस्टर तो कैबिनेट में मुंह नहीं खोलते थे अपना, कैबिनेट मिनिस्टर भी डरते. हमने जूनियर मिनिस्टर रहते हुए फ़ैसले बदलवा दिए, तो अब अगर मैं मान के बैठ जाऊं कि लीडर अपनी राय के अलावा कुछ सुनेगा ही नहीं, और मैं अपने ऊपर ख़ुद पाबंदियां लगा लूं, तो कौन मेरी मदद करेगा?

एक मदमस्त हाथी की ताक़त का अंदाज़ा कीजिए, लेकिन उसके पैर में भी अगर एक रस्सी बंधी है तो वो खुद को बंधा मान लेता है, क्योंकि बचपन से उसको बांधा गया है. उसकी नफ़सियात है कि अगर पैर में रस्सी है तो वो हिल नहीं सकता. उसने अपने ऊपर एक ज़हनी बंदिश को क़ुबूल किया हुआ है. “राई ज़ोर इ ख़ुदी से परबत, परबत ज़ौफ़ ए ख़ुदी से राई”. इख़्लाक़ियात के लिए तो कुछ अपने अंदर से एक इंटेग्रिटी और करैक्टर की ज़रूरत होती है.

[शीबा असलम फ़हमी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता है. बीते कई वर्षों से मुस्लिम समुदाय के मसलों और अधिकारों पर मुख़्तलिफ़ लेखन कर रही और बात कर रही हैं. ये इंटरव्यू उन्होंने 10 अक्टूबर को दिल्ली के केरल भवन में लिया था.]

(India Today Conclave 2021 का सेशन यहां क्लिक करके देखा जा सकता है.)


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